मृत्यु क्या है? प्राण छूटते समय जीव के साथ क्या घटित होता है? | Yoga Vasistha S3 EP-27

मृत्यु क्या है? प्राण छूटते समय जीव को कैसा अनुभव होता है? योग वाशिष्ठ S3 EP-27 में जानिए देवी सरस्वती द्वारा उद्घाटित मृत्यु का वास्तविक रहस्य।

मृत्यु का अर्थ जीव का सर्वथा नष्ट हो जाना नहीं है; चित्त में जमी तीव्र वासनाओं के कारण प्राणवायु की गति रुक जाने पर उत्पन्न होने वाला एक भ्रम मात्र है। अंतःकरण में संचित राग-द्वेष और संकल्पों के कारण ही जीव मृत्यु की भयानक पीड़ा और नरक जैसी अनुभूतियों की स्वयं कल्पना करके उन्हें भोगता है।

जीवन में हर मनुष्य को कभी न कभी जो भय सबसे अधिक सताता है, वह मृत्यु ही है। शरीर से प्राण अलग होने के उस अंतिम क्षण में वास्तव में क्या होता है और मनुष्य कैसी असहनीय वेदना से गुजरता है, यह संशय प्रत्येक हृदय में बना ही रहता है।

ज्ञान की खोज में अग्रसर रानी लीला के मन में भी ठीक यही जिज्ञासाएं उत्पन्न हुईं। उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए, साक्षात ज्ञानस्वरूपा देवी सरस्वती ने मृत्यु के पीछे छिपे भौतिक और दार्शनिक रहस्यों का अत्यंत विस्तार से उद्घाटन किया।

दृश्य जगत की भ्रांति — रानी लीला का संशय

आत्म-विचार में लीन रानी लीला का अंतःकरण और अधिक स्पष्टता पाने के लिए व्याकुल हो उठा। देवी सरस्वती की ओर देखते हुए उन्होंने अत्यंत विनयपूर्वक अपने मन का संशय प्रकट किया। देवी ने पहले समझाया था कि नियति, पदार्थ, स्वभाव और इन शरीरों की उत्पत्ति तथा विनाश सब माया का ही प्रभाव है, और वास्तव में यह जगत कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ। किंतु जो संसार हमारी आंखों के सामने इतने प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहा है और अनुभव में आ रहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है?

इस प्रश्न पर देवी सरस्वती मंद मुस्कान के साथ बोलीं। उन्होंने स्मरण कराया कि जैसे स्वप्न में स्त्री-समागंग केवल एक अनुभवात्मक भ्रम बनकर रह जाता है, वैसे ही इस दृश्य जगत की अनुभूति भी केवल एक मिथ्या प्रतीति है। आत्मस्वरूप को भूल जाने और सांसारिक कामनाओं के निरंतर अभ्यास के कारण ही बाह्य विषयों पर यह दृढ़ विश्वास स्थापित हो गया है। उस चिदाकाश की लीला के प्रभाव से ही असत्य जन्म और मरण भी सत्य की भांति प्रतीत हो रहे हैं।

रानी लीला: हे देवी! आप कहती हैं कि यह जगत कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ, तो फिर हमारे अनुभव में आने वाले ये संबंध, सुख और दुःख क्या हैं?

देवी सरस्वती: लीला! स्वप्न में होने वाला मिलन जिस प्रकार केवल भ्रम होता है, यह दृश्य जगत भी वैसा ही मिथ्या है। अज्ञानवश की गई कामनाओं का निरंतर अभ्यास ही इसे सत्य जैसा दिखाता है। शुद्ध आत्मा और संस्कारों का यही पारस्परिक प्रभाव संसार चक्र कहलाता है।

चिदाकाश में स्पंदित होते तीन दृष्टांत

देवी सरस्वती ने अपने उपदेश को और अधिक गहराई से स्पष्ट करते हुए कहा कि यह संपूर्ण सृष्टि केवल चिदाकाश का ही स्पंदन है। ‘मैं और तुम’ के भाव से दिखने वाला यह सब कुछ उसी शुद्ध चैतन्य में अज्ञानवश भासित हो रहा है। आकाश संवित् को ग्रहण करना ही बाह्य आकाश बन जाता है, काल संवित् को स्वीकार करना ही काल प्रतीत होता है, और जल संवित् की अनुभूति ही जल के रूप में ढल जाती है। जैसे मनुष्य अपने स्वप्न में स्वयं ही अनेक प्रकार की वस्तुओं को देखता है, वैसे ही वह चिद्वस्तु अपने भीतर ही इस जगत की कल्पना कर रही है।

इस मायावी शक्ति को समझाने के लिए देवी ने तीन स्पष्ट दृष्टांत दिए। पहला, स्वप्नावस्था में किसी व्यक्ति का व्यर्थ के भयों और सुखों का अनुभव करना। दूसरा, किसी मानसिक विक्षिप्त व्यक्ति का यह भ्रम पाल लेना कि उसके निकट कोई अदृश्य सत्ता उपस्थित है। तीसरा, किसी जादूगर द्वारा अपनी मायावी शक्ति से दर्शकों की आंखों के सामने न होते हुए भी एक अद्भुत दृश्य रचकर उन्हें भ्रमित कर देना। इस प्रकार जो जिस वस्तु की जैसी कल्पना करता है, उसे वैसा ही प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है।

देवी सरस्वती: आकाश, जल, पृथ्वी और वायु — ये सभी वस्तुतः असत्य हैं। जब यह स्थूल देह ही असत्य है, तब इसकी इंद्रियों द्वारा देखा जाने वाला दृश्य सत्य कैसे हो सकता है? जैसे लोग बाजीगर की माया देखकर भ्रमित हो जाते हैं, वैसे ही चित्त अपने भीतर ही इन दृश्यों की कल्पना करके उन्हें भोगता है।

युग धर्म और आयु की नियति

मृत्यु के स्वरूप को समझाने से पूर्व, देवी ने यह स्पष्ट किया कि मनुष्य की आयु का निर्धारण कैसे होता है। सृष्टि के आरंभ में स्थापित नियति के अनुसार विभिन्न युगों के आधार पर एक सामान्य आयु सीमा निर्धारित की गई थी। सत्ययुग में चार सौ वर्ष, त्रेतायुग में तीन सौ वर्ष, द्वापरयुग में दो सौ वर्ष और कलियुग में सौ वर्ष की सामान्य आयु का विधान निश्चित हुआ।

परंतु यह आयु केवल युगों की संख्या तक ही सीमित नहीं रहती। देश, काल, क्रिया तथा पदार्थों की शुद्धि और अशुद्धि के अनुसार मनुष्य की आयु में निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले धर्म और अधर्म रूपी कर्मों का फल उनकी प्राणशक्ति को सीधा प्रभावित करता है। वेदोक्त स्वधर्म का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले समाज में औसत आयु बढ़ जाती है; किंतु जब धर्म का त्याग कर दिया जाता है, तब आयु क्षीण होने लगती है। अंततः जब निर्धारित समय पूरा हो जाता है, तब कर्मानुसार मर्मभेदी वेदना आरंभ होती है और जीव को मृत्यु अपने आगोश में ले लेती है।

देवी सरस्वती: लीला! स्वधर्म का आचरण करके शांत चित्त रखने वाला मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करता है। शास्त्र-निषिद्ध कर्म करने वालों को अकाल मृत्यु घेर लेती है। आयु समाप्त होते ही प्राणों का आधार बनी नाड़ियां शिथिल होने लगती हैं।

मरने वाले जीवों के तीन प्रकार — मूर्ख, धारणाभ्यासी और युक्तिमान

मृत्यु के विषय में अपनी जिज्ञासा बढ़ाते हुए रानी लीला ने पूछा कि साधारण अज्ञानी जनों की मृत्यु और योगियों की मृत्यु में क्या अंतर होता है। उत्तर में देवी सरस्वती ने देहत्याग करने वाले जीवों को तीन श्रेणियों में विभाजित करके समझाया। पहली श्रेणी ‘मूर्ख’ जीवों की है। ये इंद्रिय भोगों को ही अंतिम सत्य मानकर, देह के प्रति अत्यधिक आसक्ति रखते हुए घोर अज्ञान की स्थिति में प्राण त्यागते हैं और भयानक अंधकार में जा गिरते हैं।

दूसरी श्रेणी ‘धारणाभ्यासी’ साधकों की है। ये प्राणायाम और धारणा के अभ्यास द्वारा अपने मन व प्राण को नाभि, हृदय, भ्रूमध्य अथवा ब्रह्मरंध्र जैसे केंद्रों में स्थिर करने में समर्थ होते हैं। ये अभ्यास के बल पर देह छूटने के समय होने वाले कष्ट को सहजता से सह लेते हैं। तीसरी श्रेणी ‘युक्तिमान’ अर्थात आत्मज्ञानियों की है। वे भलीभांति जानते हैं कि ‘हम शुद्ध चैतन्य स्वरूप हैं और इस दृश्य प्रपंच से हमारा कोई संबंध नहीं है।’ जिस प्रकार जल में उठने और विलीन होने वाली तरंगों से जल का नाश नहीं होता, उसी प्रकार देह से परे अपने आत्मतत्व को जानने वाले ज्ञानियों को मृत्यु का तनिक भी कष्ट नहीं होता।

रानी लीला: हे देवी! क्या मृत्यु का अनुभव सभी के लिए एक जैसा होता है? योगियों के देहत्याग और साधारण मनुष्यों की मृत्यु में क्या भेद है?

देवी सरस्वती: अज्ञानी जन अपने राग-द्वेष के कारण अत्यंत विलाप करते हुए मरते हैं। धारणा का अभ्यास करने वाले प्राण को साधकर पीड़ा पर विजय पा लेते हैं। किंतु आत्मज्ञानी युक्तिमान पुरुष देह को पुराने वस्त्र की भांति त्यागकर, परम शांति और सहज आनंद का ही अनुभव करते हैं।

अज्ञानी की मृत्यु का दृश्य — भीतर उठता भयानक तूफान

विवेकहीन अज्ञानी अपनी अंतिम घड़ियों में जिस दारुण यातना को सहता है, उसका देवी ने अत्यंत सजीव चित्रण किया। मृत्यु निकट आने पर उसका स्वर अवरुद्ध हो जाता है, आंखों की दृष्टि धुंधली पड़ जाती है और मुख की कांति नष्ट हो जाती है। भरी दोपहरी में भी उसे तारे दिखाई देने लगते हैं और दसों दिशाएं घोर अंधकार से घिर जाती हैं। उस समय वह जीव असह्य मानसिक संताप से तड़प उठता है।

उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो उसके सामने पूरी पृथ्वी तीव्र गति से चकरा रही हो, वह स्वयं आकाश में उड़ा जा रहा हो या कोई गहरा अचेतन अंधकार उसे निगल रहा हो। उसे लगता है कि वह किसी अथाह काले कुएं में गिरता चला जा रहा है। कभी ऐसा अनुभव होता है मानो वह किसी भारी शिला के नीचे दबकर पिस रहा हो और उसका दम घुट रहा हो। अपार पीड़ा के कारण वह चिल्लाना चाहता है किंतु कंठ से ध्वनि नहीं निकलती; भय से हृदय फटता हुआ सा जान पड़ता है और अज्ञानवश उसके प्राण खिंचने लगते हैं।

देवी सरस्वती: अज्ञानी जब मरता है, तब उसके भीतर के समस्त संचित संस्कार मिलकर एक भीषण भ्रम का जाल रचते हैं। उसे लगता है कि कोई उसे बलपूर्वक खींच रहा है, वह जल के भंवर में डूब रहा है या दहकती ज्वालाओं में जल रहा है — वह स्वयं के ही मानसिक तूफानों में घिर जाता है।

वायु यंत्र का चक्रव्यूह और अंतःकरण का पतन

अपने ही अंतःकरण के संशयों में डूबा वह अज्ञानी जीव विचित्र मानसिक यातनाओं को स्वयं ही भोगता है। उसे अनुभव होता है मानो वह किसी विशाल चक्र (घूमते हुए यंत्र) पर बंधा हुआ तीव्र वेग से वायुमंडल में चक्कर काट रहा हो, या आकाश की असीम ऊंचाइयों से किसी गहरी खाई में सीधा गिर रहा हो। कभी उसे लगता है कि वह भीषण हिमपात में बर्फ की भांति पिघल रहा है; सगे-संबंधियों का विलाप सुनते हुए भी वह ऐसी संज्ञाहीन स्थिति में पहुंच जाता है जहां वह चाहकर भी एक शब्द नहीं बोल पाता।

उसकी अपनी ही सांसों की आवाज उसे किसी भयानक चक्रवाती तूफान जैसी प्रतीत होती है। समस्त इंद्रियां निष्प्राण होने लगती हैं और उसे भ्रम होता है कि समूचा आकाश उसी के ऊपर टूट पड़ा है। यह सब बाहर कहीं घटित नहीं हो रहा होता; मनुष्य ने जीवन भर जिस ‘यह शरीर ही मैं हूँ और ये रिश्ते ही मेरे हैं’ की दृढ़ आसक्ति को पाला था, वही मोह उससे इन भयानक दृश्यों की कल्पना करवाकर यह घोर संताप झेलने पर विवश करता है।

रानी लीला: हे देवी! उस जीव को इतनी दारुण दुर्गति क्यों भोगनी पड़ती है? क्या यह सब वास्तव में बाहर घटित हो रहा होता है?

देवी सरस्वती: यह सब केवल उसके अंतःकरण में उपजी माया का खेल है। उसने जीवन भर देह के साथ स्वयं को एकाकार मानकर जिया था, इसलिए जब वह देह नष्ट होने लगती है, तो ‘मैं नष्ट हो रहा हूँ’ के इसी भयानक भय से वह इस संकट की स्वयं रचना कर लेता है।

शरीर में प्राणवायु का अवरोध और नाड़ियों का विनाश

भौतिक देह में मृत्यु किस प्रकार घटित होती है, देवी सरस्वती ने इसकी वैज्ञानिक एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की। मनुष्य के शरीर में वात, पित्त और कफ आदि धातुएं एक निश्चित संतुलन में प्रवाहित होती हैं। स्वस्थ शरीर में ‘समान वायु’ निरंतर गतिशील रहकर ग्रहण किए गए आहार-रस को समस्त नाड़ियों तक समभाव से पहुंचाती है। उस अवस्था में देह तेजस्वी, सक्रिय और चैतन्य बनी रहती है।

किंतु जब आयु क्षीण हो जाती है अथवा कोई असाध्य रोग उत्पन्न होता है, तब नाड़ियों के मार्ग अवरुद्ध होने लगते हैं। शरीर की धातुएं अपना बल और स्निग्धता खो देती हैं। समान वायु के संचरण में विकार आ जाता है, जिससे भीतर की वायु बाहर नहीं निकल पाती और बाहर की प्राणवायु भीतर प्रवेश नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप नाड़ियों की कार्यप्रणाली पूरी तरह ठप हो जाती है। नाड़ियों में प्राणवायु की गति का यह पूर्ण विराम ही कायिक दृष्टि से ‘मृत्यु’ कहलाता है।

देवी सरस्वती: जैसे सूर्य के अस्त होने पर प्रकाश की किरणें धीरे-धीरे विलीन हो जाती हैं, वैसे ही मृत्यु के समीप आने पर जीव की इंद्रियां अपनी शक्ति खो बैठती हैं। स्मृति और भविष्य की योजनाएं लुप्त हो जाती हैं, समस्त इंद्रियां निष्क्रिय हो जाती हैं और प्राण की गति सदा के लिए थम जाती है।

शाश्वत शुद्ध चैतन्य ही परम सत्य

अज्ञानी जीव अपने ही संकल्पों के जाल में उलझकर ‘मेरा जन्म हुआ, मैं मर रहा हूँ’ के भ्रम में अंतहीन जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है। वही संकल्प-नियति उससे नाना प्रकार के शरीरों और उनके कर्मफलों की रचना करवाकर भोगवाती है। चित्त में संचित हुई वासनाएं ही अगले जन्मों के बीज बन जाती हैं।

किंतु जिस ज्ञानी ने अचल आत्मतत्व का साक्षात्कार कर लिया है, उसका इस जन्म-मरण से कोई संबंध नहीं रहता। जिस प्रकार समुद्र में असंख्य तरंगें और फेन बनते-मिटते रहते हैं किंतु जल कभी नहीं बदलता, उसी प्रकार शरीरों के उत्पन्न होने और नष्ट होने पर भी शुद्ध चैतन्य में कभी कोई विकार नहीं आता। वह आत्मतत्व सदा निर्मल, नित्य और सर्वव्यापी होकर प्रकाशित रहता है।

देवी सरस्वती: लीला! नदी के प्रवाह में उठने वाली लहरों की भांति जन्म-मरण की ये समस्त उपाधियां दृश्य प्रपंच से संबंधित हैं, दृष्टा स्वरूप आत्मा से नहीं। आत्मा कभी किसी भाव अथवा अभाव से लिप्त नहीं होती, वह सदा शुद्ध स्वरूप ही रहती है। जो इस सत्य को जान लेता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।

मृत्यु को प्राप्त होने वाले जीवों का वर्गीकरण — अनुभूतियों में भेद

जीवों का वर्ग अंतःकरण की स्थिति मृत्यु के समय की अनुभूति
मूर्ख (अज्ञानी जन) देहाभिमान, तीव्र राग-द्वेष और सांसारिक वासनाओं में अत्यधिक आसक्ति अंधकारमय कुएं में गिरना, भारी शिला के नीचे दबना, चक्र पर घूमने जैसी भयानक भ्रांतियां और दारुण वेदना
धारणाभ्यासी (साधक) प्राणायाम, नाड़ी-नियंत्रण और प्राणवायु को विशिष्ट चक्रों में स्थिर करने का अभ्यास योगबल के प्रभाव से शरीर छूटने के कष्ट को सहजता से सहन करके शांत भाव से प्रयाण करना
युक्तिमान (आत्मज्ञानी) शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध और ‘मैं यह नश्वर शरीर नहीं हूँ’ का अटल निश्चय बिना किसी भय अथवा शोक के परम शांति, सहज आनंद और पूर्ण मुक्ति का अनुभव

आध्यात्मिक अंतर्निहित भाव

मृत्यु केवल भौतिक शरीर में होने वाला एक स्वाभाविक परिवर्तन है, आत्मा का विनाश कदापि नहीं। जब तक मनुष्य अज्ञानवश इस हाड़-मांस की देह को ही ‘मैं’ मानता रहता है, तब तक मृत्यु उसे एक भयानक प्रलय और दारुण दंड के रूप में प्रतीत होती है। मन में बैठी तीव्र वासनाएं ही अंतकाल में नरक की यातनाओं का काल्पनिक भ्रम रचकर जीव को संतापित करती हैं।

धारणा के नियमित अभ्यास अथवा आत्म-विचार द्वारा अपनी प्राणशक्ति और मन को वश में रखने वाले साधक के लिए मृत्यु का कोई भय नहीं रह जाता। ‘मैं इस नाशवान शरीर से सर्वथा भिन्न शुद्ध चैतन्य हूँ’ — इस सत्य में प्रतिष्ठित हो जाना ही मृत्यु के भय और पीड़ा से पार पाने का एकमात्र यथार्थ मार्ग है।

क्या इस क्षण आप स्वयं को केवल रक्त-मांस का यह नश्वर शरीर मान रहे हैं, अथवा इन सभी परिवर्तनों को देखने वाले एक शांत, साक्षी चैतन्य के रूप में अनुभव कर रहे हैं? यह छोटा सा आत्मबोध आपके भीतर के समस्त भयों को जड़ से मिटा सकता है।

इस अध्याय का सारांश

देवी सरस्वती ने रानी लीला को दृश्य जगत की मिथ्या प्रकृति का बोध कराते हुए मृत्यु के भौतिक और दार्शनिक रहस्यों का उद्घाटन किया। उन्होंने विभिन्न युगों की आयु-नियति और कर्मों के आधार पर आयु में होने वाले परिवर्तनों को समझाया। देहत्याग करने वाले जीवों को मूर्ख, धारणाभ्यासी और युक्तिमान वर्गों में बांटा गया। अज्ञानी जन अपनी वासनाओं के कारण मृत्यु के समय जिन भयानक भ्रांतियों को भोगते हैं और नाड़ियों में प्राणवायु का संचार रुक जाने की जो शारीरिक प्रक्रिया होती है, उसका विशद वर्णन करते हुए देवी ने स्पष्ट किया कि आत्मा सर्वदा अजर-अमर और शुद्ध चैतन्य स्वरूप है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: मृत्यु की पीड़ा चित्त के संस्कारों और वासनाओं द्वारा रचित एक आत्म-निर्मित भ्रम मात्र है; विशुद्ध आत्मतत्व का कभी न जन्म होता है, न मरण।
  • तात्विक शिक्षा: धातुओं की शिथिलता से नाड़ियों में प्राणवायु का रुक जाना ही बाह्य मृत्यु है। किंतु अज्ञानवश कल्पित किए गए मोह और भय ही आंतरिक मृत्यु-यातनाओं का मूल कारण हैं।
  • अगले अध्याय से संबंध: मृत्यु को केवल एक मानसिक भ्रम के रूप में जान लेने के पश्चात, रानी लीला अपने दिवंगत पति महाराज पद्म के जीव की वर्तमान स्थिति और परलोक के दृश्यों को देखने का रहस्य अगले अध्याय में समझेंगी।

स्वप्न की घटनाओं की भांति इस दृश्य जगत के समस्त जन्म और मरण केवल चिदाकाश के स्पंदन मात्र हैं।

मनुष्य जिस वस्तु का जैसा दृढ़ संकल्प करता है, वह अपनी ही उस संकल्प-माया का बंदी बन जाता है।

नदी की तरंगें भले ही विलीन हो जाएं किंतु जल शेष रहता है; उसी प्रकार शरीरों के पतन के बाद भी शुद्ध चैतन्य कभी नष्ट नहीं होता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मृत्यु के समय मनुष्य को कैसा अनुभव होता है?

अज्ञानी मनुष्य को मृत्यु के समय दिशाहीनता, गहरे काले कुएं में गिरने, भारी पत्थर के नीचे दबने और चक्रव्यूह में घूमने जैसी अत्यंत भयानक भ्रांतियों और मानसिक यातनाओं का अनुभव होता है।

साधारण मनुष्यों और योगियों की मृत्यु में क्या अंतर है?

साधारण मनुष्य देहाभिमान और भय के कारण तड़पते हुए प्राण त्यागते हैं, जबकि आत्मज्ञानी और धारणाभ्यासी साधक आत्मनिष्ठा अथवा प्राण-नियंत्रण के बल पर बिना किसी संताप के शांत भाव से देह छोड़ते हैं।

शास्त्रों के अनुसार विभिन्न युगों में मनुष्य की आयु कैसे निर्धारित थी?

सृष्टि की आदि-नियति के अनुसार सत्ययुग में 400 वर्ष, त्रेतायुग में 300 वर्ष, द्वापरयुग में 200 वर्ष और कलियुग में 100 वर्ष की सामान्य आयु सीमा निश्चित की गई थी।

मनुष्य की आयु घटती या बढ़ती क्यों है?

स्वधर्म के निष्ठापूर्वक पालन, सात्विक जीवन और पवित्र कर्मों से आयु में वृद्धि होती है; जबकि शास्त्र-विरुद्ध आचरण और अधर्म के कारण अकाल मृत्यु प्राप्त होती है।

शरीर में भौतिक रूप से मृत्यु कैसे घटित होती है?

शरीर में समान वायु का संतुलन बिगड़ने और नाड़ियों के अवरुद्ध हो जाने से जब प्राणवायु का संचरण पूर्णतः रुक जाता है, तब भौतिक देह निष्प्राण हो जाती है।

निष्कर्ष

देवी सरस्वती का यह उपदेश स्पष्ट करता है कि मृत्यु केवल भौतिक शरीर का एक स्वाभाविक रूपांतरण है, जबकि नित्य सत्य आत्मा सर्वदा अमर है। मृत्यु के उपरांत जीव किन लोकों की यात्रा करता है? रानी लीला अपने पति महाराज पद्म के सूक्ष्म जीव को कैसे देख पाईं? इस अलौकिक परलौकिक यात्रा के रहस्यों को हम अगले प्रसंग में जानेंगे।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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