द्रष्टा से पहले भी कोई ‘देखने वाला’ था? मृत्यु के बाद क्या होता है? | Yoga Vasistha S3 EP-25

द्रष्टा और दृश्य एक ही समय कैसे जन्म लेते हैं? मृत्यु के बाद क्या होता है? सरस्वती देवी ने लीलादेवी को बताया गहरा सत्य।

इस संसार को देख रहे ‘मैं’ नामक भाव से पहले भी कोई ‘द्रष्टा’ था या नहीं, यह पूछा जाए तो, वशिष्ठ महर्षि का उत्तर यही है — दृश्य से पहले द्रष्टा नहीं होता, द्रष्टा और दृश्य दोनों एक ही साथ जन्म लेने वाली एक ही चेतना की अभिव्यक्ति हैं, और अंततः दोनों चिदात्मा का ही स्वरूप हैं, इनसे अलग कुछ भी नहीं है।

जब कोई अपने किसी प्रियजन को खो देता है, तो वह दुख कितना भारी होता है, यह हर किसी को पता है। मन जैसे पूरी तरह उलझ जाता है, और वह पीड़ा कभी न खत्म होने वाली लगती है।

लीलादेवी भी उसी स्थिति में है। उसका पति विदूरथ युद्धभूमि में मूर्छित पड़ा है, और उसका हृदय दुख से भर गया है। सरस्वती देवी का दिया गया उत्तर इस कथा को एक नया मोड़ देता है — सपना, सच्चाई, मृत्यु, पुनर्जन्म — ये सारी अवधारणाएँ एक साथ प्रश्नों के घेरे में आ जाती हैं।

आँखों के सामने बिखरते बेटे के लिए माँ की चीत्कार

पूर्वलीला ने अपने प्रिय विदूरथ को देखा। उसका शरीर भूमि पर पड़ा था, केवल साँसें आ-जा रही थीं, प्राण अभी छूटने ही वाला था। उसके हृदय को अकथनीय पीड़ा ने घेर लिया। अपने बेटे को रक्त की धारा में तड़पते देखने से बढ़कर किसी माँ के लिए और क्या पीड़ा हो सकती है?

आँसुओं से भरी आँखों के साथ उसने सरस्वती देवी की ओर देखा।

पूर्वलीला: माँ! मैं यह दुख सहन नहीं कर पा रही हूँ। मेरा पति वहाँ रक्त की धारा में प्राण छोड़ने वाला है। इससे तो अच्छा होता कि उसकी जगह मुझे ही टुकड़ों में काट दिया जाता!

पूर्वलीला: माँ, मुझे ही दंड दो। तुम तो शीतल हृदय वाली माँ हो! अपनी भक्त को इतने कष्ट क्यों दे रही हो, मुझे बताओ।

सरस्वती देवी की मुस्कान — यह सब बस एक सपना है

सरस्वती देवी के चेहरे पर एक मुस्कान चमकी। लीलादेवी की आँखों के सामने दिख रहे इस भयंकर दृश्य के पीछे छिपे सत्य को उन्होंने खोलना शुरू किया।

‘तुमने यहाँ एक अद्भुत युद्ध का दृश्य देखा है, लेकिन सच्ची दृष्टि से देखो तो यह सब बस स्वप्न के समान ही है। इस स्वप्न जैसे जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है, यह क्या तुम्हें पता है?’ उन्होंने लीलादेवी से पूछा।

सरस्वती देवी: क्या हुआ, लीलादेवी? फिर से आश्चर्य से माया में फँस रही हो! विदूरथ का यह विशाल राज्य पद्मु के घर के आकाश में ही है, और पद्मु का पूरा साम्राज्य वसिष्ठ के घर के आकाश में ही है — यह भूल गई क्या?

घर के आकाश में ही समाया पूरा ब्रह्मांड

सभा में एक सन्नाटा फैल गया। लीलादेवी की आँखों में अब आश्चर्य और भय दोनों मिले हुए भाव थे। सरस्वती देवी ने फिर से जोर देकर कहा कि यह सब विदूरथ के संकल्प-जगत के रूप में वसिष्ठ ब्राह्मण के घर के आकाश में ही समाया हुआ है।

‘तुम-मैं-यह मूर्छित द्वितीय लीला-विदूरथ-सिंधुराज-उनके शस्त्र-प्रयोग-चारों समुद्रों तक फैला यह पूरा ब्रह्मांड’ — ये सब गिरिग्राम नाम के घर के आकाश में ही स्थित हैं, यह उन्होंने समझाया।

सरस्वती देवी: इस तरह की स्वप्न जैसी, असत्य घटनाओं के लिए तुम्हें दुखी होने की क्या ज़रूरत है, यह मुझे समझ नहीं आता।

मोह छोड़कर बंधनों को समझो

सरस्वती देवी का स्वर अब कोमल हो गया, लेकिन दृढ़ता बनी रही। उन्होंने लीलादेवी के कंधे पर हाथ रखा और माँ की तरह समझाते हुए कहा — इन सब रिश्ते-नातों को किसने बनाया है, क्यों बनाया है, यह समझो।

यह सब खुद अपनी ही कल्पना है, इससे अलग कुछ नहीं, उन्होंने स्पष्ट किया। दुख कोई सच्चाई नहीं है, वह तो मन का खुद बनाया हुआ भ्रम मात्र है।

सरस्वती देवी: इसलिए बेटी! मोह में न फँसकर यह समझो कि ये रिश्ते-नाते किस तरह के हैं, किसने इन्हें बनाकर तुम्हें दुख दिया है।

आत्मा कभी-कभी दृश्य से एकाकार हो जाती है

सरस्वती देवी ने अब आत्मा के स्वभाव के बारे में गहरा उपदेश देना शुरू किया। उन्होंने बताया कि शुद्ध स्वरूप वाली आत्मा कभी-कभी बिना किसी कारण के दृश्य, प्रेम आदि भावों की कल्पना कर लेती है, उनसे एकाकार हो जाती है, और अपने असली स्वरूप को भूलकर अनेक शरीरों में तन्मय होकर व्यवहार करती है।

और कभी-कभी वही आत्मा शरीर से एकत्व न मानकर, अपने चैतन्य स्वरूप में ही शांत बुद्धि से रहती है। सबका आधार होने वाली उस आत्मा को वास्तव में न जन्म है, न नाश; ये जन्म-अस्तित्व-नाश केवल शरीरों के होते हैं। आत्मा शुद्ध, नित्य, अखंड और अप्रमेय है, यह उन्होंने स्पष्ट किया।

दृश्य की सच्ची शुरुआत कहाँ है?

लीलादेवी की आँखों में अब जिज्ञासा चमकी। दुख कुछ कम हुआ, और एक नया प्रश्न उसके मन में उभरा। द्रष्टा (देखने वाला) और दृश्य (दिखने वाली चीज़) — इन दोनों के संबंध को, इनके सच्चे स्वरूप को जानना चाहा, और उसने सरस्वती देवी से पूछा।

‘द्रष्टा’ नामक भाव से पहले क्या था? यह ‘द्रष्टापन’ की गाँठ कहाँ से शुरू हुई? क्या इसकी कोई शुरुआत ही नहीं है, उसने पूछा।

लीलादेवी: यह द्रष्टा और दृश्य का संबंध कहाँ से शुरू हुआ? ‘द्रष्टापन’ से पहले जो ‘द्रष्टा’ था, वह कौन है? क्या इस द्रष्टापन की कोई शुरुआत है भी या नहीं?

द्रष्टा और दृश्य एक साथ जन्म लेते हैं

सरस्वती देवी ने जैसे कोई चित्र खींचते हुए समझाना शुरू किया। उन्होंने बताया कि द्रष्टा (देखने वाला) और दृश्य (दिखने वाली चीज़) दोनों एक ही समय, एक साथ उभरने वाले स्वरूप के भाग हैं। इसी ‘द्रष्टा-दृश्य’ जोड़ी से मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार जैसे अंतःकरण के तत्व बनते हैं, यह उन्होंने समझाया।

सबका मूल कारण चिदात्मा ही है, और वही इस पूरे संसार का, इस द्रष्टा-दृश्य की परंपरा का मूल स्रोत है, यह उन्होंने स्पष्ट किया। इसे समझ लेना ही असली साधना है।

यह जो दिख रहा है, यह किसका आधार है?

लीलादेवी के मन में एक और सवाल उठा। यह दिख रहा संसार बहुत विस्तृत, बहुत विविधतापूर्ण लगता है। यह किसके लिए, किस आधार पर बना है, यह जानना चाहा, और उसने सरस्वती देवी से पूछा।

क्या यह जगत किसी ‘अनुभव करने वाले’ के आश्रय पर टिका है, या फिर अनुभव करने वाले व्यक्ति के अनुसार बदलता रहता है, यह शंका उसने व्यक्त की।

लीलादेवी: यह जो सब दिख रहा है, यह किसके आधार पर टिका है? यह किसी ‘अनुभवकर्ता’ के आश्रय में है, या फिर अनुभव करने वाले व्यक्ति के अनुसार बदलता है? इसकी शुरुआत आखिर कहाँ है?

अनंत चिद-अणु, और उनमें अनंत जगत

सरस्वती देवी ने अपने उपदेश को और विस्तार दिया। उन्होंने बताया कि अनंत संख्या में चिद-अणु हैं, और उनमें से हर चिद-अणु में फिर से अनगिनत जगत समाए हुए हैं। उन जगतों के हर एक कण में फिर से कई जगत हैं — यह क्रम कभी खत्म नहीं होता।

उन जगतों में से किसी एक जगत के किसी स्थान के महल में पद्मु का भौतिक शरीर है, यह उन्होंने बताया। इस तरह गिरिग्राम-जगत, पद्मु-राज्य-जगत, विदूरथ-राज्य-जगत में तुम-मैं जैसे स्वयं की आत्मा की ही अभिव्यक्तियाँ हैं, यह उन्होंने स्पष्ट किया।

मृत्यु के बाद क्या होता है?

लीलादेवी ने देखा कि उसकी सह-पत्नी द्वितीय लीला भी अपने पति विदूरथ के गिरते ही मूर्छित हो गई। विदूरथ की जीव-चेतना पद्मु के शरीर की जगह की ओर यात्रा करने लगी। द्वितीय लीला की जीव-चेतना भी पद्मु तक पहुँचने की उतावली में थी।

‘यह द्वितीय लीला हमारे महल में कैसे पहुँचेगी? वहाँ किस रूप में रहेगी? मैं उसकी सह-पत्नी कैसे बनूँगी?’ प्रथम लीला ने आश्चर्य से पूछा।

प्रथम लीला: यह द्वितीय लीला हमारे महल में कैसे पहुँचेगी? वहाँ किस रूप में रहेगी? मैं उसकी सह-पत्नी कैसे बन जाऊँगी? पद्मु के राजभवन की सेविकाएँ इसे कैसे देखेंगी?

मन की वृत्ति ही दूसरी लीला बन जाती है

सरस्वती देवी ने मुस्कुराते हुए माना कि यह सब बहुत ही अद्भुत है। उन्होंने बताया कि विदूरथ की मन की वृत्ति ने ही उसे उभारा था, और वह मरते ही उसका चित्त लीलादेवी का रूप धारण करके, उस मानसिक कल्पना से यह द्वितीय लीला के रूप में प्रकट हुई।

उसके संकल्प के अनुसार ही उसने अपनी प्रिय लीला को बाहरी रूप से देख पाया। यह सब बहुत अनोखा है, और ‘बाहरी भाव’ यानी भौतिक रूपों को सच मानने की संकुचित सोच जब बनती है, तब ‘यही नाम-रूप ही सत्य है’ यह सोचता रहता है, यह उन्होंने बताया।

पुनर्जन्म यानी एक सपने से दूसरे सपने में यात्रा

सरस्वती देवी ने अब मृत्यु के बाद का रहस्य खोलना शुरू किया। उन्होंने बताया कि विदूरथ ‘मृत्यु’ नामक मूर्छा को पाने के बाद, ‘पुनर्जन्म’ नामक एक और भ्रम में प्रवेश करने लगा। यह सब एक सपने से दूसरे सपने में जाने जैसा ही है, यह उन्होंने स्पष्ट किया।

उस पुनर्जन्म के अनुभव में उसकी अपनी वासनाएँ ही ‘लीला’ के रूप में यहाँ मिलीं। पुनर्जन्म का अर्थ है एक सपने से दूसरे सपने में प्रवेश करना, और इन दोनों को देखने वाले द्रष्टा का सच्चा स्वरूप ही परमात्मा का स्वरूप है, यह बात उन्होंने पहले कही थी, उसे याद कराया।

सरस्वती देवी: तुम्हारे बारे में जो संकल्प बना था, वही लीला बन गया, इसलिए तुम ही वह लीला हो! चिदात्मा तो सर्वव्यापी है! इसीलिए, वासना से भरे एक और शरीर को — तुम ही, अपने जैसे रूप में — देख लिया तुमने।

सपने में गाँव, सपने में लोग

सरस्वती देवी ने अब एक सरल उदाहरण से इस रहस्य को खोला। उन्होंने बताया कि सर्वव्यापी ब्रह्म तत्व की एक अनोखी विशेषता है — वह जहाँ जिस रूप की वासना रखता है, वहाँ उसी तरह वह पूरा दृश्य-व्यवहार ‘बाहरी’ रूप में दिखने लगता है।

‘मैं सपने में एक गाँव गया। वहाँ की गलियों में कुछ लोगों से बात की’ — इस सपने का सारा भाव अंदर ही बनता है, फिर भी वह बाहरी रूप में ही अनुभव होता है, यह उन्होंने उदाहरण देकर समझाया। आत्मा सदा सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है, इसीलिए वह अपनी वासना के अनुसार दिखना, चमकना, अनुभव पाना आदि सब लीलामात्र के रूप में होता रहता है।

वसिष्ठ-अरुंधती का उदाहरण — मृत्यु-मूर्छा का भ्रम

सरस्वती देवी ने एक अद्भुत उदाहरण से अपने उपदेश को और स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि वसिष्ठ और अरुंधती नाम के एक ब्राह्मण दंपति, दोनों अपनी-अपनी ‘मृत्यु-मूर्छा’ पाने के बाद, फिर से ‘कोई और जगह’ का भ्रम पाते हैं।

उस ‘दूसरी जगह’ मानी जाने वाली जगह पर, ‘यह हमारे माता-पिता हैं… यह हमारा देश है… यह हमारा धन है… यह हमारा कर्म है… हमने इस तरह विवाह किया… एक हुए… यह हमारे लोग हैं… यह मेरी पत्नी मुझे बहुत प्रिय है… यह मेरा पति मेरे लिए एक मधुर बंधन है… यह मुझे कभी नहीं छोड़ेगा’ — इस तरह की बुद्धि बना लेते हैं वे।

बदलते प्रवाह में अस्थिरता

सरस्वती देवी ने अपने उपदेश को समापन की ओर ले जाते हुए कहा — इस सृष्टि के सभी जीव उन-उन चीज़ों, व्यक्तियों, विषयों के प्रति अपनी बुद्धि के बल पर कई तरह के भ्रमात्मक संबंध खुद ही बना लेते हैं।

इसके लिए हर रोज़ के अनुभव वाले सपने को ही उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। सपने में देखे घर को ‘यह मेरा घर है’, सपने में देखे लोगों को ‘यह मेरे शत्रु-मित्र हैं’ — उस सपने के समय स्वप्न देखने वाला सच्चा अनुभव ही पाता है, है न! लेकिन वह घर, वे लोग, हैं क्या? यदि हैं, तो कहाँ हैं? और यदि नहीं हैं, तो वे सारे अनुभव कहाँ से आए?

द्वितीय लीला के अपने पति तक पहुँचने का क्षण

यह द्वितीय लीला अपने पति के मरने से कुछ क्षण पहले ही जीव-प्राणों के साथ इस शरीर से बाहर निकल गई। ‘मृत्यु-मूर्छा’ पाने के बाद वह अपनी इच्छा के अनुसार चित्त-आकाश में ‘अस्तित्व’ का अनुभव पाने लगी। धीरे-धीरे वह अपनी पूर्व वासनाओं (द्वितीय लीला के रूप में रहे संस्कार) के अनुसार आगे बढ़ने लगी।

पूर्व स्मृति के अनुसार अपने पति की समीपता पाने के लिए वह पद्मु के भौतिक शरीर वाले महल की ओर जा रही है। वहाँ वह पद्मु से मिलने जा रही है — यह सब आत्मा का स्वयं का बनाया हुआ संकल्प-लीला ही है, इससे अलग कुछ नहीं, यह सरस्वती देवी ने स्पष्ट किया।

द्रष्टा-दृश्य और जगतों की संरचना

अवधारणा विवरण
द्रष्टा देखने वाला — दृश्य के साथ एक ही समय उभरने वाला स्वरूप भाग
दृश्य दिखने वाली चीज़ — द्रष्टा के साथ ही बनने वाला प्रतिबिंब
चिदात्मा द्रष्टा-दृश्य दोनों का मूल कारण, सर्वव्यापी चेतना
चिद-अणु हर चिद-अणु में अनंत जगत समाए होने की संरचना
मृत्यु-मूर्छा एक सपने से दूसरे सपने में प्रवेश करने वाली संधि-अवस्था
पुनर्जन्म पूर्व वासनाओं के आधार पर नई लीला के रूप में बनने की प्रक्रिया

आध्यात्मिक अंतरार्थ

यह अध्याय एक गहरा सत्य खोलकर दिखाता है — दृश्य और द्रष्टा दो अलग-अलग वस्तुएँ नहीं हैं, ये एक ही समय उभरने वाली एक ही चेतना के दो पहलू मात्र हैं। हम जो कुछ देखते हैं, अनुभव करते हैं, वह सब हमारे अपने चित्त द्वारा बनाया गया संकल्प-संसार ही है।

मृत्यु कोई अंत नहीं है, वह तो एक सपने से दूसरे सपने में होने वाला परिवर्तन मात्र है। दुख, बंधन, प्रेम — ये सब हमारी बनाई हुई वासनाओं का ही परिणाम हैं। आत्मा शुद्ध है, नित्य है, अखंड है — उसके लिए न जन्म है, न मृत्यु।

आज अपने दुख का कारण बने किसी बंधन को याद करें — यह सोचें कि वह असल में कितना आपके अपने मन की ही रचना है। यही प्रश्न आपका पहला ध्यान बन सकता है।

इस अध्याय का सारांश

पूर्वलीला अपने पति विदूरथ की मृत्यु-अवस्था देखकर दुखी होती है। सरस्वती देवी बताती हैं कि यह सब स्वप्न जैसा है, और घर के आकाश में ही ब्रह्मांड समाए हुए हैं। द्रष्टा-दृश्य एक ही समय जन्म लेने वाले स्वरूप भाग हैं, और चिदात्मा ही इन सबका मूल कारण है। मृत्यु के बाद द्वितीय लीला अपनी वासनाओं के अनुसार पद्मु की ओर यात्रा करती है। वसिष्ठ-अरुंधती के उदाहरण से मृत्यु-मूर्छा और पुनर्जन्म के भ्रम को समझाया जाता है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: द्रष्टा और दृश्य एक ही समय उभरने वाले चिदात्मा के स्वरूप भाग हैं; मृत्यु और पुनर्जन्म एक सपने से दूसरे सपने में होने वाली यात्रा मात्र है।
  • तात्विक शिक्षा: सबका आधार होने वाली आत्मा को वास्तव में न उत्पत्ति है, न नाश; शरीरों की उत्पत्ति-स्थिति-लय ही होती रहती है। आत्मा शुद्ध, नित्य, अखंड और अप्रमेय है।
  • अगले अध्याय से संबंध: द्वितीय लीला के पद्मु के पास पहुँचने के बाद क्या होगा, वह किन नए अनुभवों में प्रवेश करेगी, इसे अगले अध्याय में वसिष्ठ बताएँगे।

द्रष्टा और दृश्य दोनों एक ही क्षण में जन्म लेने वाली एक ही चेतना के दो रूप हैं।

मृत्यु का अर्थ अंत नहीं है, वह तो एक सपने से दूसरे सपने में होने वाली यात्रा है।

आत्मा को न जन्म है, न मृत्यु — यह परिवर्तन केवल शरीरों के साथ होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

योगवासिष्ठ में द्रष्टा और दृश्य का क्या अर्थ है?

द्रष्टा का अर्थ है देखने वाला, दृश्य का अर्थ है दिखने वाली चीज़। ये दोनों अलग-अलग जन्म नहीं लेते — एक ही समय, एक साथ उभरने वाली एक ही चिदात्मा के स्वरूप भाग हैं, यह सरस्वती देवी लीलादेवी को सिखाती हैं।

मृत्यु के बाद जीव के साथ क्या होता है, यह योगवासिष्ठ में क्या कहा गया है?

मृत्यु एक ‘मृत्यु-मूर्छा’ मात्र है, उसके बाद जीव अपनी पूर्व वासनाओं के आधार पर ‘पुनर्जन्म’ नाम के एक और भ्रम में प्रवेश करता है। यह एक सपने से दूसरे सपने में जाने जैसा ही है, इससे अलग कुछ नहीं।

पूर्वलीला क्यों दुखी हुई?

पूर्वलीला ने अपने पति विदूरथ को युद्धभूमि में मूर्छित, प्राण छोड़ते देखकर गहरा दुख अनुभव किया। उसने सरस्वती देवी से अपने बदले खुद को दंड देने की प्रार्थना की।

सरस्वती देवी ने क्यों कहा कि घर के आकाश में ब्रह्मांड समाया है?

विदूरथ का पूरा राज्य पद्मु के घर के आकाश में है, और पद्मु का साम्राज्य वसिष्ठ के घर के आकाश में है — यह दिखाकर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दिखने वाला पूरा संसार सपने जैसा है, स्थिर नहीं है।

वसिष्ठ-अरुंधती के उदाहरण से क्या समझना चाहिए?

वसिष्ठ-अरुंधती नाम के ब्राह्मण दंपति मृत्यु-मूर्छा पाने के बाद किसी और लोक में माता-पिता, रिश्तेदार जैसे नए बंधन भ्रम से बना लेते हैं। यह दिखाता है कि हम जो भी बंधन बनाते हैं, वे सब अपनी ही बुद्धि से बनाए गए हैं।

क्या आत्मा को जन्म और मृत्यु होती है?

नहीं। आत्मा शुद्ध, नित्य, अखंड और अप्रमेय है। जन्म, अस्तित्व, नाश जैसे परिवर्तन केवल शरीरों के साथ होते हैं, आत्मा के साथ नहीं।

स्वप्न का उदाहरण क्यों दिया गया?

जैसे सपने में देखे घर को ‘मेरा घर’ और सपने में देखे लोगों को ‘मेरे रिश्तेदार’ माना जाता है, वैसे ही जागते समय भी हम जो संसार, बंधन देखते हैं, वे भी उसी स्वभाव के हैं, यह दिखाने के लिए यह उदाहरण दिया गया है।

निष्कर्ष

सरस्वती देवी के उपदेश ने लीलादेवी के दुख को घोल दिया, और एक नई समझ दी — यह पूरा दृश्य चिदात्मा की संकल्प-लीला मात्र है। मृत्यु कोई अंत नहीं है, वह तो दूसरे सपने में जाने वाली यात्रा है। अब द्वितीय लीला अपनी पूर्व वासनाओं के अनुसार पद्मु के महल की ओर यात्रा कर रही है। वहाँ उसके और पद्मु के बीच क्या होगा? वह मिलन किस नई लीला को उजागर करेगी?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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