हमें दूसरे लोक क्यों नहीं दिखाई देते? चित्शक्ति का रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-17

लीलादेवी को सरस्वती देवी द्वारा बताया गया संकल्प और चित्शक्ति का रहस्य - दूसरे लोक क्यों नहीं दिखते, जानिए Yoga Vasistha S3 EP-17 में।

हमें अपने संसार के अलावा दूसरे लोक क्यों दिखाई नहीं देते? वशिष्ठ मुनि कहते हैं – हर जीव को अपने पूर्व संस्कारों के प्रभाव से एक विशेष दृष्टि प्राप्त होती है, उसी दृष्टि के अनुसार उसे अपना लोक ही सत्य और स्थिर प्रतीत होता है; अनंत चित्शक्ति एक ही है, परंतु वह हर मन में अलग-अलग रूप में प्रतिबिंबित होती है।

क्या हम रोज़ जो संसार देखते हैं, केवल वही सत्य है? क्या कभी ऐसे लोक हो सकते हैं, जिन्हें हमने कभी देखा या सोचा भी न हो – यह विचार कभी मन में उठा है? आकाश में तारों को देखते हुए, रात के सन्नाटे में अकेले बैठे हुए, यह प्रश्न मन को कुरेदने लगता है।

लीलादेवी को अपनी माता सरस्वती देवी की कृपा से दिव्यदृष्टि प्राप्त होने के बाद, अब उनके मन में एक और गहरी जिज्ञासा जन्म लेती है। अरुंधती-वशिष्ठ के घर जाने से पहले, वह अपनी माता से इस जिज्ञासा का समाधान माँगती हैं।

लीलादेवी के मन में नई जिज्ञासा

लीलादेवी अपनी माता की ओर कृतज्ञता से देखती हैं। “माँ, तुम्हारे वचनों की श्रृंखला से मुझे दिव्यदृष्टि प्राप्त हुई है। जैसे सूर्य उदय होते ही सब कुछ दिखाई देने लगता है, वैसे ही तुम्हारी कृपा से अब मुझे महान ज्ञान प्राप्त हुआ है,” वह कहती हैं।

पर उस कृतज्ञता के पीछे एक जिज्ञासा छिपी हुई है। लीलादेवी फिर बोलती हैं – “मुझे पता है तुम सत्यस्वरूपिणी हो, हमेशा सत्य ही कहती हो। फिर भी, मेरे पूर्व संस्कारों के प्रभाव से मेरे मन में अभी भी कुछ जिज्ञासा, कुछ कौतूहल शेष है।”

वह अपनी असली इच्छा व्यक्त करती हैं – उन्हें उस ‘गिरि’ गाँव में स्थित अरुंधती-वशिष्ठ के घर ले जाया जाए। पर वहाँ जाने से पहले, वह अपने मन के इस प्रश्न का उत्तर चाहती हैं।

लीलादेवी: माँ, यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो, तो मुझे उस ‘गिरि’ गाँव में स्थित अरुंधती-वशिष्ठ के घर ले चलो।

श्री सरस्वती देवी का उत्तर – पहले समाधि

श्री सरस्वती देवी अपनी पुत्री की इच्छा सुनती हैं। उनके चेहरे पर एक सूक्ष्म करुणा झलकती है, क्योंकि लीलादेवी ने जो माँगा है, वह कोई साधारण बात नहीं है।

“ठीक है, चलते हैं। पर पहले तुम्हें समाधि का सहारा लेना होगा,” वह कहती हैं। ये शब्द लीलादेवी को शायद तुरंत समझ में न आएँ, पर सरस्वती देवी अपनी व्याख्या आगे बढ़ाती हैं।

समाधि के प्रभाव से स्थूल शरीर को त्यागकर, इंद्रियों की पकड़ से परे उस चिद्रूप, चित्चैतन्य ही जिसका स्वरूप है – उस पवित्र दृष्टि को अपनाना होगा, यह वह बताती हैं।

यह मात्र यात्रा की एक विधि नहीं है, बल्कि एक गहरे तात्त्विक सत्य का द्वार है – शरीर केवल एक वस्त्र मात्र है, असली तत्व वही चित्चैतन्य है।

श्री सरस्वती देवी: पहले तुम्हें समाधि का सहारा लेकर, उस समाधि के प्रभाव से इस स्थूल शरीर को त्यागना होगा।

दूसरे शरीरों में प्रवेश की विद्या

सरस्वती देवी अपनी शिक्षा जारी रखती हैं। कई उत्तम दृष्टिसंपन्न सिद्ध पुरुष अपने शरीर को त्यागकर, दूसरों के शरीर में प्रवेश करते हैं और उन्हें बिना बताए ही उनके अनुभवों को साझा करते हैं, वह बताती हैं।

यह सुनने में विचित्र लग सकता है, पर यह योगसिद्धि से संभव होने वाली एक प्रक्रिया है। इसे ‘परकाया प्रवेश’ कहा जाता है, और इसी मार्ग से लीलादेवी अपनी इच्छा पूरी कर सकती हैं, सरस्वती देवी उन्हें आश्वासन देती हैं।

यहाँ लीलादेवी के मन में एक और जिज्ञासा उठती है – आखिर शरीर है क्या? इसे इस तरह छोड़ना, फिर किसी और में प्रवेश करना, क्या यह वाकई संभव है – यह प्रश्न उन्हें बेचैन करने लगता है।

क्या ‘मैं’ का भाव सूक्ष्म है?

लीलादेवी सीधे अपनी जिज्ञासा पूछती हैं – “किस विशेष तत्व के कारण अंगत्व को प्राप्त हुई यह सूक्ष्म चेतना स्वयं ही एक अभिमान बनकर, अंतरंग ‘मैं’ की अनुभूति के रूप में स्थिर हो जाती है?”

यह प्रश्न बहुत गहरा है। हम सबमें ‘मैं’ का भाव है, पर यह ‘मैं’ शरीर है, मन है, या कोई और सूक्ष्म तत्व – यह उलझन स्वाभाविक रूप से उठती है।

श्री सरस्वती देवी इस प्रश्न का गहरा उत्तर देना शुरू करती हैं, यह समझाते हुए कि अंगत्व क्या है और यह कैसे बनता है।

लीलादेवी: किस विशेष कारण से यह सूक्ष्म चेतना स्वयं ही ‘मैं’ की अनुभूति में बदल जाती है?

शरीर से जुड़ा ‘मैं’ भाव कैसे उत्पन्न होता है?

सरस्वती देवी समझाती हैं – इस शरीर में एक चैतन्य शक्ति है। जब वह शक्ति स्वयं को इस शरीर से जोड़ लेती है, तब वह ‘मैं यह शरीर हूँ’ का भाव उत्पन्न करती है।

यह कोई बाहरी शक्ति नहीं है जो आकर थोपी गई हो, यह उसी चैतन्य द्वारा स्वयं रची गई एक भ्रांति है। यही भ्रांति जीव को काल और स्थान की सीमाओं में बाँध देती है।

यहीं से जीवों के बीच विविधता शुरू होती है – हर जीव अपने संस्कारों के अनुसार एक-एक शरीर, एक-एक लोक को ‘अपना’ मानकर जीता है। यही विविधता इस बात का कारण है कि हम सबको अलग-अलग लोक दिखाई देते हैं।

अनुभवों की विविधता – एक ही चेतना, अलग-अलग अनुभूतियाँ

सरस्वती देवी अपनी शिक्षा और आगे बढ़ाती हैं। एक ही अनंत चित्शक्ति होने के बावजूद, वह हर जीव के मन में अलग-अलग रूप में प्रतिबिंबित होती है – जैसे पानी में पड़ा चंद्रमा का प्रतिबिंब लहरों के अनुसार अलग-अलग दिखाई देता है।

एक जीव को दिखाई देने वाला लोक, दूसरे जीव को दिखाई देने वाले लोक से अलग होने का कारण यही है कि हर जीव ने अपने पूर्व कर्मों से एक विशेष दृष्टिकोण बना लिया है।

यही दृष्टिकोण उसके लोक को उसके लिए ‘सत्य’ और स्थिर बना देता है। इसीलिए एक जीव को अपने लोक के अलावा दूसरे जीव का लोक सामान्यतः दिखाई नहीं देता, अनुभव में नहीं आता।

‘ब्रह्मा’ नामक मिथ्या वृत्तांत

सरस्वती देवी यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं – जिस ‘ब्रह्मा’ को सृष्टिकर्ता माना जाता है, वह भाव भी एक भ्रम ही है। यह ‘ब्रह्मा’ नामक भाव कई व्यष्टि चेतनाओं का समूह मात्र है, स्वयं में स्वतंत्र रूप से विद्यमान कोई विशेष व्यक्ति नहीं है।

यह बात लीलादेवी को कुछ आश्चर्यचकित करती है। “जिसे सब सृष्टिकर्ता कहते हैं, वह ब्रह्मा भी एक भ्रम ही है?” यह प्रश्न उनके मन में उठने लगता है।

सरस्वती देवी इस जिज्ञासा को पहले ही भाँपकर, अपनी व्याख्या जारी रखती हैं – सृष्टि, स्थिति और लय, ये तीनों कार्य भी वह चित्शक्ति स्वयं में ही करने वाली एक लीला मात्र है।

संकल्प ही सब कुछ का आधार है

सरस्वती देवी अब एक और गहरा सत्य प्रकट करती हैं – जब तक संकल्प है, जब तक जानना है, तभी तक यह शरीरों का व्यवहार बना रहता है। संकल्प ही इन शरीरों के मिलने और बिछुड़ने का मूल कारण है।

वह लीलादेवी को एक महत्वपूर्ण बात बताती हैं – “संकल्प करो, और इस शरीर को छोड़ दो।” यहाँ शरीर मात्र संकल्प के आधार पर बना एक ढाँचा है।

तुम्हारा शरीर, यह लोक, यह अनुभव – ये सब उसी मूल चेतना की संकल्प शक्ति से ही आकार लेते हैं। इसीलिए यदि संकल्प बदला जा सके, तो इस शारीरिक सीमा को पार करना संभव है।

श्री सरस्वती देवी: जब तक संकल्प है, तभी तक शरीरों का यह व्यवहार बना रहता है। इसलिए, केवल संकल्प मात्र से इस शरीर को त्याग दो।

लीलादेवी का निर्णय – दूसरे शरीर में प्रवेश

इस शिक्षा को समझकर, लीलादेवी अपनी माता के सुझाव को शिरोधार्य करती हैं। “संकल्प-पूर्वक इस शरीर को त्यागकर, अब मुझे अपनी यात्रा आगे बढ़ाने दो,” वह कहती हैं।

यहाँ से उनकी यात्रा एक नए चरण में प्रवेश करती है – शरीर के भाव से परे जाकर, अपनी संकल्प शक्ति से नए लोकों, नए अनुभवों को देखने के लिए वह तैयार होती हैं।

सरस्वती देवी अपनी पुत्री को यह मार्ग कैसे अपनाना है, किस क्रम में संकल्प करना है – यह समझाना शुरू करती हैं, आगे होने वाले महान अनुभव के लिए मार्ग प्रशस्त करते हुए।

शरीर और चेतना के बीच संबंध

भाव व्याख्या
स्थूल शरीर संकल्प के आधार पर बना एक अस्थायी ढाँचा
संकल्प शरीर के व्यवहार और जगत के अनुभव का मूल आधार
चित्शक्ति एक ही, पर हर जीव के मन में अलग-अलग रूप में प्रतिबिंबित होने वाली
ब्रह्मा व्यष्टि चेतनाओं का समूह मात्र, कोई स्वतंत्र व्यक्ति नहीं

आध्यात्मिक निहितार्थ

इस संवाद में छिपा असली सत्य यह है कि हम जो संसार देखते हैं, हमारा शरीर, हमारा ‘मैं’ का भाव – ये सब हमारे संकल्प पर निर्भर हैं। यह केवल एक दार्शनिक चर्चा नहीं है, बल्कि यह हमारे अनुभव के मूल कारण को उजागर करने वाला एक महत्वपूर्ण सत्य है।

हर जीव को अपना ही लोक दिखाई देने का कारण यही है कि उसके पूर्व संस्कारों के प्रभाव से एक विशेष दृष्टिकोण बना है। यदि इस दृष्टिकोण को बदला जा सके, तो नए अनुभवों, नए लोकों के द्वार खुल सकते हैं।

शरीर शाश्वत नहीं है, यह केवल संकल्प से बना एक अस्थायी रूप मात्र है – यह सत्य हमारे भीतर अहंकार को कम करके, हमें एक विशाल दृष्टि प्रदान करता है।

क्या आप आज किसी अनुभव को ‘यह सच है, यही स्थायी है’ मानकर चल रहे हैं? उस अनुभव के पीछे आपका संकल्प, आपका दृष्टिकोण कितनी भूमिका निभा रहा है – एक बार गहराई से देखिए।

इस अध्याय का सारांश

लीलादेवी को अपनी माता सरस्वती देवी की कृपा से दिव्यदृष्टि प्राप्त होने के बाद, वह अरुंधती-वशिष्ठ के घर जाना चाहती हैं। इसके लिए सरस्वती देवी उन्हें पहले समाधि द्वारा स्थूल शरीर त्यागने और परकाया प्रवेश की विद्या सीखने का सुझाव देती हैं। इस पर लीलादेवी पूछती हैं कि ‘मैं’ का भाव कैसे बनता है। सरस्वती देवी बताती हैं कि चैतन्य के शरीर से जुड़ने पर अंगत्व का भाव उत्पन्न होता है, और एक ही चित्शक्ति हर जीव में अलग-अलग रूप में प्रतिबिंबित होती है। वह यह भी कहती हैं कि ब्रह्मा भी व्यष्टि चेतनाओं का समूह मात्र है, और संकल्प ही शरीर के व्यवहार का मूल है, तथा लीलादेवी को संकल्पपूर्वक शरीर त्यागने का मार्ग दिखाती हैं।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: हर जीव को दिखाई देने वाला लोक उसके संकल्प और पूर्व संस्कारों से बने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है; एक ही चित्शक्ति अनेक रूपों में प्रतिबिंबित होती है।
  • तात्विक शिक्षा: ‘मैं’ का अंगत्व भाव चैतन्य के शरीर से जुड़ने पर उत्पन्न होने वाली एक भ्रांति मात्र है; संकल्प बदलने पर इस शारीरिक सीमा को पार करना संभव है।
  • अगले अध्याय से संबंध: संकल्प शक्ति से शरीर त्यागने वाली लीलादेवी की यात्रा यहाँ से एक नए अध्याय में प्रवेश करती है।

जैसे सूर्य उदय होते ही सब कुछ दिखाई देने लगता है, वैसे ही गुरु की कृपा से परम ज्ञान प्राप्त होता है।

जब तक संकल्प है, तभी तक शरीरों का यह व्यवहार बना रहता है।

एक ही चित्शक्ति है, पर हर मन में अलग-अलग रूप में प्रतिबिंबित होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हमें दूसरे लोक क्यों दिखाई नहीं देते?

हर जीव को अपने पूर्व संस्कारों के प्रभाव से एक विशेष दृष्टिकोण प्राप्त होता है, उसी के अनुसार उसे केवल अपना लोक ही सत्य दिखाई देता है; इसीलिए दूसरे जीवों के लोक हमें अनुभव में नहीं आते।

परकाया प्रवेश क्या है?

परकाया प्रवेश योगसिद्धि द्वारा संभव होने वाली एक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपना शरीर त्यागकर दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करके उसके अनुभव साझा करता है, यही मार्ग सरस्वती देवी ने लीलादेवी को सिखाया।

‘मैं’ का भाव कैसे बनता है?

जब चैतन्य शक्ति स्वयं को शरीर से जोड़ लेती है, तब ‘मैं यह शरीर हूँ’ का भाव उत्पन्न होता है; यह बाहर से नहीं आता, बल्कि चैतन्य द्वारा स्वयं रची गई एक भ्रांति है।

क्या ब्रह्मा भी एक भ्रम है?

सरस्वती देवी के अनुसार, सृष्टिकर्ता माने जाने वाला ‘ब्रह्मा’ व्यष्टि चेतनाओं का समूह मात्र है, स्वयं में स्वतंत्र रूप से विद्यमान कोई विशेष व्यक्ति नहीं है।

संकल्प और शरीर के बीच क्या संबंध है?

संकल्प ही शरीर के व्यवहार का मूल आधार है; जब तक संकल्प है, तभी तक शरीर के रूप में व्यवहार चलता रहता है, और संकल्प बदलने पर शरीर की सीमा को पार किया जा सकता है।

क्या समाधि द्वारा शरीर त्यागना संभव है?

हाँ, सरस्वती देवी के अनुसार, समाधि के प्रभाव से स्थूल शरीर त्यागकर उस चित्चैतन्य स्वरूप वाली पवित्र दृष्टि को अपनाना एक संभव योगमार्ग है।

निष्कर्ष

लीलादेवी अब अपनी माता द्वारा दिखाए गए मार्ग पर संकल्पपूर्वक अपना शरीर त्यागने के लिए तैयार हो रही हैं। एक ही चित्शक्ति अनेक रूपों में प्रतिबिंबित होने का यह रहस्य समझने के बाद, वह किस नए लोक को देखेंगी, कौन-सा नया अनुभव उनकी प्रतीक्षा कर रहा है – यह हम अगले एपिसोड में जानेंगे।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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