मृत्यु का भय सामने आने पर मनुष्य की वास्तविक रक्षा क्या है? बाहरी अस्त्र-शस्त्र या राजसत्ता का बल नहीं, बल्कि केवल आत्मज्ञान ही जीव को समस्त भयों से सदा के लिए मुक्त करता है। योगवासिष्ठ में कर्कटी राक्षसी द्वारा किरात राजा विक्रम से पूछे गए गूढ़ दार्शनिक प्रश्न हमारे भीतर के अज्ञान को भेदकर, परमात्मा के साक्षात्कार का परम सत्य उजागर करते हैं।
जीवन में जब अप्रत्याशित संकट और भयानक चुनौतियाँ सामने आती हैं, तब हमारा विवेक किस प्रकार प्रतिक्रिया देता है, इसी पर हमारा भविष्य निर्भर करता है। अत्यंत विकट प्राण-संकट के क्षणों में भी धैर्य न खोते हुए आत्मबल के साथ अडिग रहना ही एक विवेकशील मनुष्य का सच्चा लक्षण है।
सूर्य के प्रकाश से विहीन घने अंधकारमय वन में भूख से व्याकुल कर्कटी राक्षसी किरात राज्य की सीमा में प्रविष्ट हुई। आधी रात के समय प्रजा-रक्षा के लिए शस्त्र धारण कर वन में विचरण कर रहे राजा विक्रम और उनके मंत्री को देखकर, राक्षसी ने उनकी परीक्षा लेने हेतु अद्भुत दार्शनिक प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
घने जंगल में अंधकार का तांडव – किरात राज्य में कर्कटी का प्रवेश
हिमालय के वनों और उत्तुंग पर्वत श्रेणियों को पार करते हुए कर्कटी एक किरात देश की सीमा में पहुँची। उस समय आकाश घने काले बादलों से ढका हुआ था। धरती पर काजल जैसे घने अंधकार के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। अमावस्या की उस गहन कालिमा में दूर कहीं किरात राज्य के घरों में छोटे-छोटे दीपक टिमटिमा रहे थे।
उस निर्जन आधी रात के पहर में भयानक पिशाच स्वच्छंद विचरण कर रहे थे। निकटवर्ती गाँवों के सभी लोग और जीव-जंतु गहरी नींद में डूबे हुए थे। तालाबों से मेंढकों की टर्र-टर्र, झाड़ियों की ओट से झींगुरों की अनवरत ध्वनि और ठंडी रात की हवा से हिलते पेड़ों की सरसराहट उस वन को और अधिक भयावह बना रही थी।
ऐसे घोर अंधकार में कर्कटी ने अपनी तीव्र भूख मिटाने के लिए आहार की खोज में चारों ओर दृष्टि दौड़ाई।
प्रजा-रक्षा हेतु निकले किरात राजा विक्रम
उस किरात राज्य पर विक्रम नाम के एक परम प्रतापी और महाबुद्धिमान राजा शासन कर रहे थे। प्रजा के कष्टों को स्वयं जानना ही राजधर्म है, इस निष्ठा के साथ वे आधी रात को अपने प्रधान मंत्री के साथ शस्त्र धारण कर वन में गश्त लगा रहे थे। उनका ध्येय वन के हिंसक जीवों और वेताल आदि दुष्ट शक्तियों से प्रजा को सुरक्षित रखना था।
प्रजा को सता रही अज्ञात व्याधियों के निवारण हेतु दुर्लभ औषधियों की खोज करना भी उस रात्रि-भ्रमण का एक अन्य मुख्य उद्देश्य था। बिना किसी भय के आगे बढ़ते उन दोनों शूरवीरों को दूर छिपकर बैठी कर्कटी ने देखा।
अपनी आँखों के सामने उन दोनों को चलते देखकर राक्षसी के मन में विचित्र विचार उठने लगे।
कर्कटी का आत्म-मंथन – ज्ञानी कौन? अज्ञानी कौन?
राजा और मंत्री को देखते ही कर्कटी के मन में पहले तो अपार हर्ष हुआ। उसने सोचा कि उसे उत्तम आहार मिल गया है। किंतु तुरंत ही उसकी बुद्धि ने विवेकपूर्वक विचार करना आरंभ किया। यदि ये दोनों आत्मज्ञान से हीन केवल अज्ञानी हैं, तो इनका अस्तित्व इस पृथ्वी पर भार मात्र है। ऐसे अज्ञानी लोक-परलोक में निरंतर दुःख ही पाते हैं। संसार को अनर्थ पहुँचाने वाले अज्ञानियों का भक्षण करना तो लोकहित ही होगा।
किंतु केवल बाहरी रूप-रंग देखकर किसी को ज्ञानी या अज्ञानी ठहराना असंभव है। ज्ञानी पुरुष मनुष्यों, पशुओं, राक्षसों, पिशाचों और देवताओं में भी हो सकते हैं। वैसे ही अज्ञानी भी कहीं भी पाए जा सकते हैं। इसलिए कर्कटी ने निश्चय किया कि पहले इनकी परीक्षा लेनी चाहिए।
यदि वे उत्तम आत्मज्ञानी निकले, तो प्राण देकर भी उनकी रक्षा करनी चाहिए, न कि उन्हें कोई कष्ट पहुँचाना चाहिए।
कर्कटी: आत्मज्ञान से संपन्न सत्पुरुष अपने अमृत वचनों से अन्य जनों को इस जीवन से भी कहीं अधिक परमानंद प्रदान करते हैं। इस शरीर का पोषण भी तभी सार्थक है जब आत्मा को जाना जाए।
मेघ-गर्जना जैसी कर्कटी की हुंकार
आत्मज्ञानियों के सत्संग से मिलने वाली शांति को अमूल्य समझकर कर्कटी ने उनके अंतर्मन को परखने का निर्णय लिया। तुरंत ही उस घने जंगल को दहलाते हुए उसने मेघ-गर्जना जैसे गंभीर स्वर में ललकारना शुरू किया। उस ध्वनि से वृक्ष काँप उठे और निकटवर्ती पर्वत प्रतिध्वनित हो गए।
उस स्वर की भीषणता ऐसी थी कि कोई साधारण मनुष्य होता तो उसका हृदय फट जाता और वह वहीं प्राण त्याग देता। किंतु राजा विक्रम और उनके मंत्री तनिक भी विचलित हुए बिना निर्भय खड़े रहे।
राक्षसी की गर्जना का किरात राजा ने अत्यंत गंभीरता से उत्तर दिया।
कर्कटी: अरे तुच्छ जीवों! तुम कौन हो? यहाँ क्यों आए हो? यदि मौन रहे, तो एक ही क्षण में तुम दोनों मृत्यु के गाल में समा जाओगे! शीघ्र बताओ तुम कौन हो!
विक्रम: अरे तुच्छ प्राणी! वास्तव में तू कौन है? कहाँ से बोल रहा है? जरा सामने आ और अपना रूप हमें दिखा। तेरी इस खोखली गर्जना से डरकर मूर्छित होने वाला यहाँ कोई नहीं है। हम भी देखना चाहते हैं कि तेरा सामर्थ्य कितना है।
मंत्री की राजनीति – साम मार्ग
राजा के वचन सुनकर कर्कटी ने अपना विकराल और विशाल राक्षसी रूप उनके समक्ष प्रकट किया। आकाश को छूते उस विशालकाय शरीर को देखकर भी राजा और मंत्री के मुख पर भय का कोई चिह्न तक न उभरा। तब महाराज के मंत्री आगे बढ़े और अत्यंत विवेक तथा शांति से बात करने लगे।
मंत्री ने समझाया कि धर्म के ज्ञाता विद्वान किसी भी छोटे कार्य को भी क्रोध से नहीं, अपितु विवेकपूर्ण विचार से संपन्न करते हैं। किसी कार्य की सिद्धि के लिए साम, दाम, भेद और दंड के चार उपाय हैं, जिनमें से सर्वप्रथम साम मार्ग का ही वे अनुसरण कर रहे हैं।
मंत्री के ऐसे विवेकपूर्ण और गंभीर वचनों को सुनकर कर्कटी चकित रह गई।
मंत्री: हे राक्षसी! तुझे इतना क्रोध क्यों है? तुच्छ लोग ही छोटी-छोटी बातों पर तीव्र क्रोध दिखाते हैं। विवेकशील पुरुष सदैव उचित रीति से ही कार्य करते हैं। तेरी जो भी इच्छा हो बता, हम उसे पूरा करने के लिए तत्पर हैं।
आत्मविद्या के बिना राजा व्यर्थ है
मंत्री के धैर्य और निर्भीक वचनों को देखकर कर्कटी को लगा मानो एक ही सागर में दो पावन नदियाँ आकर मिल गई हों। मृत्यु को साक्षात सामने देखकर भी अडिग रहे उनके साहस को देखकर उसने माना कि वे अवश्य ही आत्मज्ञानी होंगे। उसने सोचा कि यदि उनके मन में कोई संशय हो तो उसका समाधान करे और अपने संशयों का निवारण भी उनसे करवाए।
उसने स्पष्ट किया कि आत्मज्ञान के बिना राजा राजा नहीं होता और आत्मज्ञान के बिना मंत्री मंत्री नहीं होता। इसके बाद वह उनके समक्ष कुछ अत्यंत गहन दार्शनिक प्रश्न प्रस्तुत करने के लिए तैयार हुई।
उसने चेतावनी दी कि यदि उन्होंने सही उत्तर दिए तो वह उनकी पूजा करेगी, अन्यथा अपना आहार बना लेगी।
कर्कटी: हे राजन्! समस्त ज्ञानों में आत्मज्ञान ही सर्वोपरि है। क्या आप इस राजविद्या को जानते हैं? यदि जानते हैं तो आप धन्य हैं। यदि नहीं, तो अपनी क्षुधा शांत करने हेतु मुझे आपका भक्षण करना ही पड़ेगा। मेरे प्रश्नों को ध्यानपूर्वक सुनिए।
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सृष्टि का रहस्य – कर्कटी के प्रश्नों की प्रथम शृंखला
उस घने अंधकार में कर्कटी ने अपने दार्शनिक प्रश्नों का प्रवाह आरंभ किया। वास्तव में एक होते हुए भी उपाधियों के भेद से जो अनेक रूपों में प्रतीत होता है, वह अद्वितीय तत्व क्या है? जिस प्रकार समुद्र में तरंगें उठती और विलीन होती हैं, उसी प्रकार किस सूक्ष्म परमाणु में ये अनंत कोटि ब्रह्मांड उत्पन्न और लय होते हैं?
वह कौन सा आकाश है जो शून्य नहीं है? बिना किसी रूप-रंग के होते हुए भी नित्य सत्य रूप से विद्यमान सत्ता कौन सी है? वास्तव में ‘मैं’ कौन हूँ? और तुम दोनों के भीतर रहते हुए ‘मैं’ का बोध कराने वाला वह मूल चैतन्य कौन सा है?
उसकी वाणी में गंभीरता बढ़ती गई और प्रश्नों की गहराई और अधिक विस्तृत होती चली गई।
कर्कटी: वह क्या है जो स्वयं चलते हुए भी कभी गति नहीं करता? सर्वत्र व्याप्त होकर भी शिला की भाँति एक ही स्थान पर अचल रहने वाला वह चेतन तत्व कौन सा है? चिदाकाश में इन समस्त विचित्र जगतों की रचना करने वाला वह चित्रकार कौन है?
प्रकाश तत्व – कर्कटी के प्रश्नों की द्वितीय तरंग
कर्कटी के प्रश्न निरंतर जारी रहे। वह परम तत्व कौन सा है जो अग्नि होते हुए भी दाहकता से रहित है, और स्वयं भौतिक अग्नि न होते हुए भी सदा प्रकाशमान रहता है? सूर्य, चंद्र, अग्नि और नक्षत्रों से भी परे अनुपम दीप्तिमान होकर, स्वयं कोई दृश्य न होते हुए भी जो सबको देख रहा है, वह द्रष्टा कौन है?
वृक्षों, लताओं, जन्मांधों और इंद्रियों को प्रकाशित करने वाला वह ज्ञान-नेत्र कौन सा है? आकाशादि पंचमहाभूतों की सृष्टि कर, संपूर्ण जगत को ‘सत्ता’ का स्वरूप प्रदान करने वाला वह मूल कारण कहाँ छिपा है?
उसके प्रश्न बाह्य जगत से मुड़कर अंतरात्मा के साक्षात्कार की ओर अग्रसर हुए।
कर्कटी: यह जगत किसमें समाया हुआ है? वास्तव में कुछ भी न होते हुए भी सर्वत्र क्या प्रकाशित हो रहा है? वह कौन सा सूक्ष्म अणु है जो एक ही समय में अत्यंत दूर भी है और अत्यंत निकट भी?
दृष्टांतों की गहराई – अनंत परब्रह्म के प्रश्न
जिस प्रकार सुवर्ण ही कंगन, कुंडल और मुद्रिका जैसे आभूषण बन जाता है, उसी प्रकार द्रष्टा, दर्शन और दृश्य के रूप में भासित होने वाला वह तत्व क्या है? जैसे समुद्र की लहरें जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही सृष्टि की संपूर्ण विविधता किस एक सत्य में समाहित है? जैसे एक सूक्ष्म बीज में विशाल वटवृक्ष छिपा रहता है, वैसे ही भूत, भविष्य और वर्तमान को अपने भीतर समेटे रखने वाली वह नित्य वस्तु कौन सी है?
बाल के अग्रभाग के एक लाखवें हिस्से से भी अधिक सूक्ष्म होते हुए भी, जो मेरु पर्वत से अनंत गुना विशाल है, वह विचित्र स्थिति क्या है? संपूर्ण भोगों को भोगते हुए प्रतीत होकर भी जो कमल-पत्र पर जल की बूँद की तरह निर्लिप्त रहता है, वह क्या है?
उसका पूछा गया प्रत्येक प्रश्न उपनिषदों के सार को प्रतिध्वनित करते हुए उस शांत रात्रि में गूँज उठा।
कर्कटी: जिसे जान लेने मात्र से यह संपूर्ण संसार-चक्र एक बालक के खेल जैसा प्रतीत होने लगता है, और जिसे पा लेने के बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रहता… उस परम सत्य का मुझे बोध कराइए!
वन का सन्नाटा – राजा विक्रम और मंत्री का धीर मौन
इस प्रकार कर्कटी राक्षसी ने अपने मन के समस्त दार्शनिक संशयों को एक के बाद एक उस रात्रि में प्रस्तुत किया। उसने चुनौती दी कि वे शास्त्रसम्मत और आत्मानुभूति के आधार पर इन सभी प्रश्नों का उत्तर देकर उसके संशयों को छिन्न-भिन्न करें।
उसकी वाणी विराम लेते ही उस अंधकारमय वन में अचानक एक गंभीर सन्नाटा छा गया। उस भयानक राक्षसी के प्रश्नों की अगाध गहराई को सुनकर किरात राजा विक्रम और उनके मंत्री तनिक भी विचलित नहीं हुए।
उनके चेहरों पर एक शांत मुस्कान खिल उठी। आत्मज्ञान के दिव्य प्रकाश से उन गूढ़ पहेलियों को सुलझाने के लिए वे पूर्णतः तत्पर हो गए।
कर्कटी: हे राजन्! अपने उत्तरों से मेरे भीतर के संशयों का निवारण कीजिए। यदि आप ऐसा कर सके, तो आप ही सच्चे ज्ञानी हैं। अन्यथा आपका आहार करने में मुझे कोई दोष नहीं लगेगा!
कर्कटी द्वारा पूछे गए गूढ़ प्रश्न – उनका दार्शनिक भावार्थ
| कर्कटी द्वारा प्रयुक्त रूपक / प्रश्न | शास्त्रीय दार्शनिक भावार्थ (आत्म-तत्व) |
|---|---|
| उपाधियों के भेद से अनेक रूपों में दिखने वाली एकमात्र वस्तु | परब्रह्म / शुद्ध चैतन्य (समस्त जीवों में एकरूप आत्मा) |
| परमाणु में अनंत ब्रह्मांडों का तरंगों की तरह उठना | हृदयाकाश / चिदाकाश (सर्वाधार चैतन्य क्षेत्र) |
| चलते हुए भी अचल, शिला की भाँति स्थिर रहने वाला तत्व | साक्षी चैतन्य (देह के गतिमान होने पर भी आत्मा अचल रहती है) |
| सुवर्ण के आभूषण बनने की तरह द्रष्टा-दृश्य रूप में भासित होना | माया के प्रभाव से विविध रूपों में दिखने वाला अद्वैत सत्य |
| बीज में वृक्ष की तरह त्रिकाल को धारण करने वाला मूल | कालातीत परमात्मा का वास्तविक स्वरूप |
| केश के लाखवें भाग से भी सूक्ष्म, मेरु से भी विशाल | ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ – आत्मा का सर्वव्यापी लक्षण |
आध्यात्मिक भावार्थ
कर्कटी राक्षसी द्वारा किरात राजा से पूछे गए प्रश्न केवल एक कथा के संवाद नहीं हैं; वे अद्वैत वेदांत के सर्वोच्च रहस्यों को उद्घाटित करने वाले तत्व-विचार हैं। बाह्य दृष्टि से क्रूर राक्षसी प्रतीत होने वाली कर्कटी का भी अंतर्मन में आत्मज्ञान के लिए तड़पना इस बात का प्रमाण है कि प्रत्येक जीव के भीतर मुक्ति की स्वाभाविक प्यास विद्यमान रहती है।
राजा और मंत्री के सामने साक्षात मृत्यु खड़ी थी, फिर भी वे स्थितप्रज्ञ बने रहे; इसका एकमात्र कारण उनका आत्मज्ञान ही था। ‘मैं यह नश्वर शरीर नहीं, शाश्वत आत्मा हूँ’ – इस सत्य का अनुभव जिसे हो जाए, उसे मृत्यु का भय छू भी नहीं सकता। कर्कटी का हर प्रश्न भौतिक संसार से दृष्टि हटाकर भीतर स्थित परमात्मा की ओर ले जाने का मार्गदर्शन करता है।
दैनिक जीवन में जब भी संकट और भय घेर लें, तब बाहरी परिस्थितियों से विचलित हुए बिना अपने भीतर के शांत साक्षी चैतन्य की शरण लेनी चाहिए। समस्त समस्याओं का अंतिम और स्थायी समाधान आत्म-विचार ही है।
इस अध्याय का सारांश
घने वन में प्रविष्ट कर्कटी राक्षसी, आधी रात को प्रजा की रक्षा हेतु भ्रमण कर रहे किरात राजा विक्रम और उनके मंत्री से मिलती है। उनके साहस की परीक्षा लेने तथा अपने दार्शनिक संशयों का निवारण करने के लिए वह परब्रह्म तत्व से संबंधित अनेक गूढ़ और प्रतीकात्मक प्रश्न पूछती है।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: आत्मज्ञान के बिना जीवन व्यर्थ है; विवेकशील मनुष्य मृत्यु के समक्ष भी विचलित न होकर आत्मज्ञान की निष्ठा में अडिग रहता है।
- तात्विक शिक्षा: परमात्मा ही एकमात्र सत्य है; उपाधियों के कारण भले ही भिन्नता दिखे, पर सृष्टि, स्थिति और लय सब कुछ चिदाकाश में ही घटित होते हैं।
- अगले अध्याय से संबंध: कर्कटी द्वारा पूछे गए इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तर किरात राजा विक्रम और उनके मंत्री ने वेदांत सम्मत रीति से किस प्रकार दिए, यह हम अगले अध्याय में जानेंगे।
इस शरीर का पोषण भी तभी सार्थक है जब आत्मा को जाना जाए।
विवेकशील पुरुष सदैव उचित रीति से ही कार्य संपन्न करते हैं।
समस्त ज्ञानों में आत्मज्ञान ही सर्वोपरि राजविद्या है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कर्कटी राक्षसी ने किरात राजा को तुरंत क्यों नहीं मारा?
किरात राजा और मंत्री के असीम धैर्य व शांति को देखकर कर्कटी समझ गई कि वे आत्मज्ञानी हो सकते हैं। ज्ञानियों को कष्ट पहुँचाना महापाप मानकर उसने पहले परीक्षा लेने का निर्णय किया।
कर्कटी द्वारा पूछे गए प्रश्नों का मुख्य उद्देश्य क्या था?
यह परखना कि वे दोनों वास्तविक आत्मज्ञानी हैं या नहीं, और साथ ही अपने अंतर्मन में स्थित परब्रह्म तत्व से जुड़े गूढ़ संशयों का समाधान पाना ही कर्कटी का मुख्य उद्देश्य था।
आत्मज्ञान को ‘राजविद्या’ क्यों कहा जाता है?
समस्त विद्याओं में सर्वोच्च होने और जीव को संसार के समस्त बंधनों से मुक्त कर शाश्वत आनंद प्रदान करने के कारण आत्मज्ञान को राजविद्या कहा जाता है।
शून्य न होने वाला आकाश क्या है?
भौतिक आकाश शून्य जैसा प्रतीत होता है, जबकि संपूर्ण सृष्टि का आधारभूत ‘चिदाकाश’ (चैतन्य आकाश) नित्य सत्य ज्ञान से परिपूर्ण है, इसलिए वह शून्य नहीं है।
सुवर्ण और आभूषणों का दृष्टांत क्या दर्शाता है?
जिस प्रकार सोना एक होते हुए भी अनेक आभूषणों के रूप में दिखाई देता है, उसी प्रकार एकमात्र परमात्मा ही इस दृश्य जगत, दृष्टा और दर्शन के विविध रूपों में प्रतीत होता है।
मृत्यु के भय पर विजय पाने का क्या मार्ग है?
‘मैं नश्वर देह नहीं, नित्य अविनाशी आत्मा हूँ’ – यह दृढ़ अपरोक्ष आत्मानुभूति ही मृत्यु के भय को समूल नष्ट करने का एकमात्र मार्ग है।
निष्कर्ष
उस घने अंधकारमय वन में कर्कटी द्वारा पूछे गए प्रश्नों ने सृष्टि के मूल रहस्यों को स्पर्श किया। अब देखना यह है कि राक्षसी के इन गूढ़ आत्मज्ञान प्रश्नों का किरात राजा विक्रम और उनके मंत्री क्या अद्भुत उत्तर देते हैं? उनका यह संवाद किन परम सत्यों को प्रकट करता है? इसे हम अगले अध्याय में जानेंगे।