स्फटिक, सपना और सोना — अगर यह संसार झूठ है, तो इतना सच क्यों लगता है? | Yoga Vasistha S3 EP-23

मिथ्या संसार इतना सच क्यों लगता है? वशिष्ठ के आभूषण-सोने के उदाहरण से योगवासिष्ठ S3 EP-23 में यह सत्य समझें।

अगर यह संसार सपने जैसा ही है, तो यह इतना सच क्यों महसूस होता है? योगवासिष्ठ का उत्तर स्पष्ट है — यह असत् संसार केवल उन्हीं मूढ़ लोगों को सत्य लगता है, जिनके पास तत्त्वज्ञान नहीं है। जैसे कोई अज्ञानी आभूषण में छिपे सोने को नहीं देख पाता, वैसे ही वे लोग ‘मैं-तुम-यह जगत’ के भ्रम में ही डूबे रहते हैं। वशिष्ठ महर्षि इसकी तुलना एक लंबे सपने से करते हैं।

क्या कभी नींद में आपने सपना देखा है कि ‘मैं मर गया हूँ’? उस पल वह डर, वह पीड़ा पूरी तरह सच लगती है, है ना। लेकिन जागते ही वह सब एक पल में गायब हो जाता है। क्या कभी आपको लगा है कि हमारा असली जीवन भी बिल्कुल ऐसा ही है?

सभा में छठे दिन की चर्चा शुरू हो चुकी थी। श्रीराम के मन में अभी भी कई सवाल बाकी थे। वशिष्ठ महर्षि बार-बार कह रहे थे कि यह जगत मिथ्या है, लेकिन यह आँखों के सामने दिखने वाली सच्चाई जैसा अनुभव क्यों होता है, यह बात उन्हें समझ नहीं आ रही थी। इसी शंका को दूर करने के लिए वशिष्ठ ने एक अद्भुत उपमा से अपनी शिक्षा आरंभ की।

अंधेरे में डरा हुआ बालक

सभा में सन्नाटा छा गया। वशिष्ठ महर्षि की आँखों में गहरी करुणा झलक रही थी। श्रीराम की ओर देखते हुए वे धीरे-धीरे बोलने लगे।

“हे रामचंद्र! अब हम छठे दिन की चर्चा आरंभ कर रहे हैं”, वशिष्ठ ने कहा।

वशिष्ठ महर्षि: केवल मूर्ख, अज्ञानी और जिसकी बुद्धि उत्तम नहीं है, वही इस असत् जगत को हीरे जैसा ठोस और सत्य मान बैठता है।

वशिष्ठ महर्षि: क्या तुमने नहीं देखा — अज्ञान और भोलेपन में डूबा एक बालक अंधेरे में सूखे पेड़ को देखकर ‘यह भूत है’ समझकर डर जाता है और दुःख पाता है?

सूरज की किरणों का मृगजल

वशिष्ठ की बातें आगे बढ़ रही थीं। सभा में मौजूद सभी लोग ध्यान से सुन रहे थे। इन शब्दों के पीछे एक गहरा सत्य छिपा है, यह सबको महसूस हो रहा था।

वशिष्ठ ने स्पष्ट किया कि जिसका कोई आकार ही नहीं है, ऐसा यह जगत भी तत्त्वज्ञान से रहित मूढ़ लोगों को अनेक दुखों की शृंखला दे सकता है। जैसे रेगिस्तान में सूरज की किरणें पशुओं को पानी का भ्रम दिखाती हैं, वैसे ही मूढ़ को यह सब बिल्कुल सच लगता है, अनुभव में आता है।

वशिष्ठ महर्षि: क्या कभी सपने में तुम्हें ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि ‘मैं मर गया हूँ’? जो मूढ़ है, जिस पर मूर्खता हावी है, उसके लिए इस ‘जगत’ नामक दृश्य से बच पाना असंभव सा हो जाता है।

आभूषण में न दिखने वाला सोना

सभा में अब सबका ध्यान वशिष्ठ के अगले उदाहरण पर टिक गया। उन्होंने एक नए नजरिए से इस विषय को समझाना शुरू किया।

अज्ञानी को केवल आभूषण दिखता है, पर उस आभूषण में छिपा सोना नहीं दिखता। जबकि जो सुनार केवल सोने को देखता है, उसे तो अनेक आभूषणों में भी वही एक सोना ही अनुभव होता है।

वशिष्ठ ने साफ कहा कि जिसमें ‘महानता’ नहीं है, उसे इस जगत में परम तत्व नहीं दिखता, बल्कि ‘तुम-मैं-नगर-शहर’ जैसी भ्रामक चीज़ें ही दिखाई देती हैं। इस पर सभा में कोई भी कुछ नहीं बोल सका।

वशिष्ठ महर्षि: जिस तरह किसी नेत्र-रोगी को आकाश में फूल, बाल, पंख जैसी असत् वस्तुएँ दिखाई देती हैं, ठीक वैसे ही जिसकी दृष्टि परमार्थ से रहित है, उसे यह जगत दिखाई देता है।

वशिष्ठ महर्षि: इसलिए, हे राघव! ‘अहंकार’ आदि भावों से भरा यह जगत केवल एक लंबे सपने के समान ही समझना चाहिए।

श्रीराम की शंका — सपने के पुरुष

वशिष्ठ की बात खत्म होते ही श्रीराम के चेहरे पर एक नई शंका उभरी। उन्होंने तुरंत अपने मन का सवाल रखा।

श्रीराम को याद आया कि ‘विदूरथ’ नामक पात्र ने अपनी सृष्टि में दिखने वाले लोगों के बारे में सरस्वती देवी से सवाल पूछा था। सपने में दिखने वाले वे पुरुष कहाँ तक सत्य हैं और कहाँ तक नहीं, यह समझाने का अनुरोध राम ने वशिष्ठ से किया।

श्रीराम: सपने जैसे वे पुरुष कहाँ तक सत्य हैं, कृपया और स्पष्ट कीजिए।

अचेत्य — जिसे जाना नहीं जा सकता

वशिष्ठ कुछ देर मौन रहे। फिर गहरी आवाज़ में उत्तर देना शुरू किया। सभा में सबकी साँसें मानो थम सी गई थीं।

वशिष्ठ ने समझाया कि शुद्ध स्वरूप परमात्मा को मन और बुद्धि से प्रकट नहीं किया जा सकता, इसीलिए उसे ‘अचेत्य’ कहा जाता है। वह चिन्मात्र स्वरूप है, शांत है, और उसकी कोई सीमा नहीं है — यही सत्य है।

वशिष्ठ महर्षि: तुम्हारा, मेरा, सबका वास्तविक स्वरूप वही है। वह सर्वव्यापी है, सर्वशक्तिमान है, सबकी आत्मा है, फिर भी किसी खंड की तरह भ्रामक कार्य में उलझता नहीं है।

साधना — सोना और आभूषण

इस गहरी शिक्षा को सुनकर श्रीराम और गहरे विचार में डूब गए। तब वशिष्ठ ने एक सुंदर उपमा से शंका दूर की।

वशिष्ठ ने स्पष्ट किया कि साधना नामक ‘उपदेश’ — यहाँ तक कि साथ में मिलने वाला उपदेश भी अंततः शिष्य के आत्म-साक्षात्कार तक ही काम आता है; जैसे ही वह स्वयं को जान लेता है कि वह स्वयं ही वह स्वरूप है, तब वह उपदेश भी अनावश्यक हो जाता है।

वशिष्ठ महर्षि: ‘आभूषण’ में जो दिखता है, वह सोना ही है! लेकिन जैसे ही ‘यह सोना है’ यह ज्ञान हो जाता है, आभूषण का नाम-रूप मिथ्या लगने लगता है, है ना।

चौथे दिन की घोषणा — वशिष्ठ की नई दिशा

सभा में बातचीत लगातार जारी थी। ऐसा ज्ञान कैसे हो सकता है, इसे आगे समझाते हुए वशिष्ठ ने शिक्षा को एक कदम और आगे बढ़ाया।

वशिष्ठ ने बताया — जैसे कोई राजा अपने राज्य को कुछ समय के लिए भूलकर, एक गरीब के सपने में स्वयं गरीब बनकर जीता है, और जागने पर उसे याद आता है कि वह तो राजा है — ठीक वैसे ही यह आत्मा भी अपने असली स्वरूप को भूलकर इस जगत नामक भ्रम में उलझी हुई है।

वशिष्ठ महर्षि: ‘तुम, मैं, यहाँ, वहाँ, कभी यह देखा था’ — ऐसा सोचना ही मूर्खता है। यह केवल अज्ञान के कारण ही होता है।

जागृति और स्वप्न का अंतर

वशिष्ठ ने अपनी शिक्षा को और स्पष्ट करने के लिए एक तालिका प्रस्तुत की। द्रष्टा नामक भाव से जागृति और स्वप्न — ये दोनों अनुभव अवस्थाएँ कैसे बनती हैं, यह उन्होंने दिखाया।

वशिष्ठ ने स्पष्ट किया कि जागृति के समय जागृति का अनुभव होता है, और स्वप्न के समय स्वप्न का अनुभव होता है, लेकिन ये दोनों ही द्रष्टा नामक एक ही मूल से उत्पन्न होते हैं।

वशिष्ठ महर्षि: जहाँ तक बात है जागृति के ‘अनुभव’ की, वह केवल जागृति के समय ही होता है… यह न जन्म लेता है, न नष्ट होता है, यह केवल एक ‘अनुभव-अवस्था’ मात्र है।

सत् और असत् — पिता-पुत्र का संवाद

सभा में एक नया मोड़ आया। वशिष्ठ ने ‘सत्’ का अर्थ बताना शुरू किया — जो हमेशा रहता है, और ‘असत्’ यानी जो कभी नहीं रहता।

इस संदर्भ में वशिष्ठ ने इसी को ‘ब्रह्म’ नाम से भी वर्णित किया। यह हर काल में व्याप्त सत् है, परमात्मा का तत्व है, यह उन्होंने समझाया।

वशिष्ठ महर्षि: यह जगत न तो पूरी तरह सत्य है, न ही पूरी तरह असत्य। यह दृश्यमान संसार अत्यंत दुर्बोध विषय है।

ब्रह्म ही सब कुछ है — अंतिम निर्णय

वशिष्ठ की शिक्षा अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी। इस जगत का, इस शरीर का, इस मन का मूल ब्रह्म ही है, इसके अलावा कुछ नहीं, यह उन्होंने ज़ोर देकर कहा।

वशिष्ठ ने निश्चित रूप से कहा कि इस जगत से अलग कोई ब्रह्म नहीं है, और ब्रह्म से अलग कोई जगत नहीं है — दोनों एक ही सत्य के दो पहलू हैं।

वशिष्ठ महर्षि: मेरे विचार से, यह जगत किसी भी तरह ब्रह्म से अलग नहीं है। इस जगत का, इस शरीर का असली नाम-रूप ब्रह्म ही है।

अनुभव अवस्थाओं का अंतर — द्रष्टा से जागृति और स्वप्न कैसे बनते हैं

मूल अनुभव अवस्था स्वभाव
द्रष्टा जागृति का अनुभव केवल जागृति काल में होने वाला
द्रष्टा स्वप्न का अनुभव केवल स्वप्न काल में होने वाला
दोनों का आधार अनुभव-अवस्था (State of Experience) स्थायी न रहने वाली, बदलती रहने वाली

आध्यात्मिक सार

यह अध्याय हमें एक मूल सत्य बताता है — हम जो कुछ भी देखते हैं, वह हमारी दृष्टि के स्तर पर ही निर्भर करता है। जैसे अंधेरे में सूखे पेड़ को भूत समझने वाला बालक, वैसे ही जिसके पास तत्त्वज्ञान नहीं है, वह इस अस्थायी संसार को ही शाश्वत सत्य मान बैठता है।

जैसे सोने को न पहचान पाने वाला अज्ञानी आभूषण को ही असली मान लेता है, वैसे ही हम भी ‘मैं-तुम-यह संसार’ जैसे नामों और रूपों के पीछे छिपे एक ही सत्य (ब्रह्म तत्व) को भूल जाते हैं। जागृति और स्वप्न — दोनों ही एक ही द्रष्टा से उत्पन्न अनुभव हैं, यह समझ लेना ही असली जागृति है।

आज आप जिस भी कठिनाई का सामना करें, एक पल रुककर देखिए — क्या यह सच में इतनी स्थायी है, या आपकी दृष्टि बदलते ही यह बदल जाएगी? इसी सवाल को हर दिन मन में दोहराइए।

इस अध्याय का सारांश

छठे दिन की चर्चा में वशिष्ठ महर्षि बताते हैं कि यह जगत इतना सच क्यों लगता है। वे कहते हैं कि तत्त्वज्ञान से रहित मूढ़ लोगों को ही यह मिथ्या संसार सत्य लगता है, जैसे अंधेरे में बालक भूत देखता है, या आभूषण में सोना नहीं दिख पाता। राम की शंका के उत्तर में वे परमात्मा को ‘अचेत्य’ कहते हुए बताते हैं कि वही सब कुछ है। अंत में वे यह निश्चित करते हैं कि जागृति और स्वप्न दोनों एक ही द्रष्टा से उत्पन्न अनुभव अवस्थाएँ हैं, और जगत तथा ब्रह्म में कोई भेद नहीं है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: तत्त्वज्ञान से रहित मन को ही यह अस्थायी जगत शाश्वत सत्य लगता है; जागृति और स्वप्न दोनों एक ही द्रष्टा से उत्पन्न अनुभव मात्र हैं।
  • तात्विक शिक्षा: ब्रह्म के अलावा कुछ भी नहीं है — यह जगत, यह शरीर सब ब्रह्म के ही नाम-रूप हैं, इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
  • अगले अध्याय से संबंध: इस ब्रह्म-तत्व की पुष्टि के बाद, वशिष्ठ मन के स्वभाव को और गहराई से समझाने की तैयारी करते हैं।

अंधेरे में सूखे पेड़ को भूत समझने वाले बालक की तरह, अज्ञानी इस असत् जगत को ही सत्य मान बैठता है।

सोने को ही देखने वाले सुनार को अनेक आभूषणों में भी वही एक सोना अनुभव होता है।

जगत से अलग कोई ब्रह्म नहीं है, ब्रह्म से अलग कोई जगत नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अगर यह संसार मिथ्या है, तो यह इतना सच क्यों लगता है?

वशिष्ठ महर्षि कहते हैं कि तत्त्वज्ञान से रहित मूढ़ लोगों को ही यह असत् संसार सत्य लगता है। जैसे अंधेरे में सूखे पेड़ को भूत समझने वाला बालक, अज्ञान के कारण ही यह भ्रम पैदा होता है।

वशिष्ठ द्वारा दिया गया आभूषण-सोने का उदाहरण क्या दर्शाता है?

अज्ञानी को केवल आभूषण दिखता है, उसमें छिपा सोना नहीं दिखता; जबकि सोने को देखने वाले सुनार को हर आभूषण में वही एक सोना अनुभव होता है। इसी तरह ज्ञानी को नाम-रूपों के पीछे एक ही ब्रह्म तत्व दिखाई देता है।

‘अचेत्य’ कौन है?

मन और बुद्धि से जिसे प्रकट नहीं किया जा सकता, ऐसे शुद्ध स्वरूप परमात्मा को ही वशिष्ठ ‘अचेत्य’ कहते हैं। वह चिन्मात्र स्वरूप, शांत और सर्वव्यापी है।

जागृति और स्वप्न में क्या अंतर है?

दोनों ही एक ही द्रष्टा से उत्पन्न अनुभव-अवस्थाएँ हैं — जागृति का अनुभव केवल जागृति काल में, और स्वप्न का अनुभव केवल स्वप्न काल में होता है। दोनों ही स्थायी नहीं रहते।

जगत और ब्रह्म के बीच क्या संबंध है?

वशिष्ठ के अनुसार जगत से अलग कोई ब्रह्म नहीं है, और ब्रह्म से अलग कोई जगत नहीं है। यह जगत और शरीर सब ब्रह्म के ही नाम-रूप हैं।

श्रीराम ने कौन सी शंका पूछी थी?

श्रीराम ने विदूरथ नामक पात्र के संदर्भ में पूछा कि सपने में दिखने वाले पुरुष कहाँ तक सत्य होते हैं, इसे और स्पष्ट करने का अनुरोध वशिष्ठ से किया।

निष्कर्ष

जब वशिष्ठ ने स्पष्ट कर दिया कि यह जगत और यह शरीर सब ब्रह्म के ही नाम-रूप हैं, इसके अलावा कुछ नहीं, तो सभा में एक गहरी शांति छा गई। लेकिन यह प्रश्न अभी भी बाकी है कि मन नामक यह माया कैसे काम करती है, यह भ्रम कैसे पैदा करती है — इसका उत्तर वशिष्ठ अपनी अगली शिक्षा में देने वाले हैं।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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