ब्रह्मांडों में ऊपर-नीचे-आगे-पीछे की धारणा आखिर कहाँ से आई? | Yoga Vasistha S3 EP-20

ब्रह्मांडों में ऊपर-नीचे की दिशाओं की धारणा कहाँ से आई, वशिष्ठ महर्षि की व्याख्या। योग वासिष्ठ S3 EP-20 पढ़ें।

क्या ब्रह्मांडों में ऊपर, नीचे, आगे, पीछे की धारणा वास्तव में है? वशिष्ठ महर्षि के अनुसार, दिशाओं की यह अवधारणा अखंड ब्रह्म में स्वाभाविक रूप से नहीं है। अज्ञानी जीव अपने अनुभव में जो कल्पनाएँ रचते हैं, वही कल्पनाएँ ब्रह्मांडों और उनके बीच की दिशाओं के रूप में दिखाई देती हैं। कल्पना से ही ये उत्पन्न होती हैं, और कल्पना से ही टिकी रहती हैं।

रात के आकाश में तारों को देखते हुए कभी न कभी हर किसी के मन में यह सवाल उठता है – यह ब्रह्मांड कितना विशाल है, इसका अंत कहाँ है, ऊपर क्या है, नीचे क्या है। यह प्रश्न केवल खगोलशास्त्रियों का नहीं है, यह हर इंसान के मन में किसी न किसी क्षण उभरता ही है।

ठीक यही जिज्ञासा श्रीराम के मन में भी उठी। वशिष्ठ महर्षि द्वारा पहले सुनाई गई ब्रह्मांडों की कथाओं को सुनने के बाद, उनके मन में एक सूक्ष्म कौतुक जगा – इन असंख्य ब्रह्मांडों में ऊपर, नीचे की धारणा आखिर कहाँ से उत्पन्न हुई? सभा में यही प्रश्न पूछने के लिए राम तैयार हुए।

स्वप्न में जन्म लेते विचित्र संसार

वशिष्ठ महर्षि ने अपनी बात जारी रखी। उनके स्वर में एक गहरी दार्शनिक गंभीरता झलक रही थी। सभा में सब लोग उनके आगे के शब्दों की प्रतीक्षा उत्सुकता से कर रहे थे।

“ये सारे जगत अनुभव से अलग नहीं हैं, लेकिन अज्ञानियों को ये वास्तविकता के रूप में अनुभव होते हैं। उनके अनुभव के बारे में ही मैंने अब तक बताया है। अज्ञान के कारण ही ये जगत अलग-अलग दिखते हैं” वशिष्ठ ने कहा।

उन्होंने आगे कहा, “जीव के मन में उत्पन्न होने वाला भ्रम कैसा होता है, जानते हो? यह वैसा ही है जैसे कोई बालक अपनी कल्पना में विवाह आदि की कल्पनाएँ रचकर, उन्हें सच मान लेता है। इन ब्रह्मांडों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश भी ऐसे ही हैं। ये कल्पना में ही उत्पन्न होते हैं, और कल्पना से ही टिके रहते हैं” उन्होंने समझाया।

यह सुनते ही सभा में एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। बालक की कल्पना वाला यह उदाहरण सबके मन को छू गया। हर किसी के अनुभव में सच लगने वाला यह संसार, वास्तव में एक कल्पना का प्रवाह ही है क्या – यह विचार सभासदों के चेहरों पर झलक रहा था।

राम की जिज्ञासा – दिशाओं का प्रश्न

यह बात सुनकर श्रीराम तुरंत खड़े नहीं हुए, लेकिन उनकी आँखों में एक प्रश्न चमक उठा। वशिष्ठ की ओर विनयपूर्वक देखते हुए, उन्होंने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की।

“हे महर्षि! यह ऊर्ध्व-अधो-तिर्यक, यानी ऊपर-नीचे-पीछे की यह कल्पना क्या इन ब्रह्मांडों से आती है? ये सब जिस ब्रह्म पर आधारित हैं, उसमें तो स्वाभाविक रूप से नहीं है! फिर ब्रह्मांड में यह ऊपर-नीचे-पीछे-आगे की कल्पना कैसे आ गई? इन ब्रह्मांडों के बारे में और बताइए” राम ने पूछा।

राम के प्रश्न में गहरा तर्क छिपा था। जब अखंड, रूपरहित ब्रह्म में दिशाओं की धारणा को कोई स्थान ही नहीं है, तो ये कहाँ से उत्पन्न हुई – यही उनकी जिज्ञासा थी। सभा में उपस्थित बड़े-बुजुर्गों ने भी इस प्रश्न को बड़ी श्रद्धा से सुना, क्योंकि यही प्रश्न उनके मन के किसी कोने में भी दबा हुआ था।

आँख के दोष से आकाश में दिखने वाले बाल

वशिष्ठ महर्षि ने मुस्कराते हुए राम के प्रश्न का उत्तर देना शुरू किया। उन्होंने एक सरल दृष्टांत से इस गहरी बात को समझाने का प्रयास शुरू किया।

“रतौंधी के दोष वाली आँखों को आकाश में बाल दिखते हैं, है ना! असल में आकाश में कोई बाल नहीं होते, फिर भी उस दोष से पीड़ित आँख को वे दिखते हैं। ठीक इसी तरह, अविद्या नाम के दोष से पीड़ित व्यक्ति को, अविनाशी और असीम परब्रह्म में ये सारे ब्रह्मांड दिखाई देते हैं” वशिष्ठ ने कहा।

यह दृष्टांत सुनकर सभा में एक सहज समझ की लहर दौड़ गई। आँख के दोष से जो नहीं है वह दिखाई देना – यह अनुभव सभी को परिचित था। वशिष्ठ ने इस साधारण अनुभव के सहारे ही ब्रह्मांडों के अस्तित्व के रहस्य को खोलने का प्रयास किया।

ईश्वर संकल्प में पदार्थों की अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं

वशिष्ठ महर्षि ने अपनी बात को और आगे बढ़ाया। सभा में सब उनकी बात को बड़े ध्यान से सुन रहे थे।

“सारे पदार्थ ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही व्यवहार करते हैं। उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं है। हमारे इस ब्रह्मांड में पार्थिव, यानी स्थूल भाग नीचे की ओर है, और आकाश ऊपर की ओर है” वशिष्ठ ने समझाया।

उन्होंने आगे कहा, “ज्योतिष्क्रम को जानने वाले महापंडित कहते हैं कि यह ब्रह्मांड आकाश में स्थित मिट्टी के पिंड जैसा है, दस दिशाएँ इसके खोल की तरह हैं। जैसे किसी चींटी के शरीर की तरह, इसके नीचे वाले भाग में भूमंडल स्थित है” उन्होंने तुलना करते हुए कहा।

यह सुनते ही सभा में धीरे-धीरे समझ फैलने लगी। चींटी के शरीर की उपमा से ब्रह्मांड की संरचना को समझना सभासदों के लिए आसान हो गया। लेकिन वशिष्ठ के आगे के शब्द एक और गहरे सत्य की ओर ले जाने वाले थे।

अनेक ब्रह्मांडों में छिपे समूह

वशिष्ठ महर्षि ने ब्रह्मांडों की विविधता का वर्णन जारी रखा। उनके शब्दों में एक विस्तृत दृष्टिकोण झलक रहा था।

“कुछ ब्रह्मांडों की भूमि में मनुष्य नहीं हैं, केवल पेड़-पौधे हैं। उनके आकाश भाग में केवल देवता और किन्नर रहते हैं। कुछ और ब्रह्मांड उसी क्षण रची गई प्राणी-समूहों, गाँवों, नगरों और पहाड़ों से भरे उत्पन्न हो रहे हैं” वशिष्ठ ने बताया।

“ये सब चिदाकाश में ही स्थित रहते हैं, और उसी में विलीन हो जाते हैं। जैसे बर्फ के टुकड़े अनेक आकार ले लेते हैं, पर स्वाभाविक रूप से सब जल ही हैं! इस सृष्टि की हर वस्तु का कारण आत्मतत्व ही है, वही उसका मूल अंश है” उन्होंने कहा।

बर्फ के टुकड़ों वाली यह उपमा सभा में एक खास प्रभाव छोड़ गई। विविधता से भरे रूप मूल में एक ही तत्व हैं – यह विचार सभासदों के मन में गहराई से बस गया। इन शब्दों के बाद सभा में कोई कुछ नहीं बोला, सब लोग चिंतन में डूब गए।

चिदाकाश सागर में ब्रह्मांड की लहरें

वशिष्ठ महर्षि ने इस उपदेश को एक अद्भुत उपमा के साथ और विस्तार दिया। उनके स्वर में एक गहरी लय झलक रही थी।

“पूर्णतः शुद्ध चिदाकाश सागर में ब्रह्मांड नाम की लहरें निरंतर उठती रहती हैं। फिर उसी सागर में विलीन हो जाती हैं। भविष्य में भी ऐसी अनेक ब्रह्मांड-लहरें उठने वाली हैं” वशिष्ठ ने कहा।

उन्होंने आगे कहा, “उनमें से कुछ, संकल्प के अभाव में, ‘अंधकार’ रूप धारण करके शून्य में सोई हुई हैं, ऐसा माना जा सकता है। कुछ ब्रह्मांड-लहरें कल्पांत तक…” वशिष्ठ अपनी बात जारी ही रख रहे थे कि सभा और गहरे सन्नाटे में डूब गई।

सागर-लहर की अभेदता का ज्ञान

वशिष्ठ महर्षि ने इस उपदेश को एक निर्णायक सूत्र के साथ पूर्ण करने का प्रयास शुरू किया। उनके शब्दों में एक स्पष्ट निश्चय गूंज रहा था।

“इसलिए, सागर और लहर में केवल नाम-रूप का भेद है, वस्तु में कोई भेद नहीं है! सागर-लहर के इस संबंध की, यानी असली एकता की स्थिति को जो जानता है, वह इस संसार में कभी भी विस्मय में नहीं पड़ता” वशिष्ठ ने समझाया।

“‘चित्तत्व’ नाम का यह ‘ज्ञान-चैतन्य’ प्रमुख रूप से इन ब्रह्मांडों में विद्यमान है, जिन वैषम्य भावों की कल्पना की गई है, उनका वह गहराई से विश्लेषण करता है। ऐसे व्यक्ति को निर्विकार ज्ञानानंद एकत्व स्वरूप का अनुभव होता है” उन्होंने कहा।

अंत में उन्होंने कहा, “इन कल्पनाओं से रचे गए ज्ञान के कारण, इन कल्पनाओं में सृष्टि, स्थिति और लय – यह सब उसी कल्पना के कारण स्वीकार किए जाते हैं” यह कहकर उन्होंने अपने उपदेश को अभी के लिए पूरा किया।

वशिष्ठ महर्षि द्वारा दी गई उपमाएँ – उनका दार्शनिक अर्थ

उपमा दार्शनिक अर्थ
बालक की कल्पना (विवाह आदि की कल्पनाएँ) अज्ञानी जो संसार अनुभव करता है, वह भी एक कल्पना का प्रवाह ही है, पर उसे सत्य लगता है
रतौंधी का दोष – आकाश में बाल दिखना अविद्या के दोष से ही अविनाशी ब्रह्म में ब्रह्मांड दिखाई देते हैं
चींटी का शरीर – ब्रह्मांड की संरचना ब्रह्मांड आकाश में स्थित मिट्टी के पिंड जैसा है, भूमंडल इसका निचला भाग है
बर्फ के टुकड़े – जल विविधता से भरे रूप मूल में एक ही आत्मतत्व हैं
सागर-लहर ब्रह्मांड चिदाकाश सागर में उठने वाली लहरों जैसे हैं, नाम-रूप का भेद है, वस्तु का भेद नहीं

आध्यात्मिक अंतरार्थ

इस अध्याय का मुख्य सत्य यह है कि ऊपर-नीचे-आगे-पीछे की धारणा, और अनेक ब्रह्मांडों की धारणा – ये सब अखंड चैतन्य में स्वाभाविक रूप से नहीं हैं। ये अज्ञान नाम के दोष के कारण ही दिखाई देने वाली कल्पनाएँ हैं।

आँख के दोष से आकाश में बाल दिखने की तरह, अविद्या के कारण अविनाशी ब्रह्म में यह असंख्य संसार दिखाई देता है। जैसे बर्फ के टुकड़े अलग-अलग दिखते हुए भी सब जल ही हैं, वैसे ही ये सारे ब्रह्मांड एक ही चैतन्य तत्व के अलग-अलग रूप मात्र हैं।

सागर-लहर की उपमा इस पूरे उपदेश का सार जैसी है। लहर सागर से अलग नहीं है, वैसे ही यह सारी सृष्टि उस एक चैतन्य से अलग नहीं है। इस अभेद ज्ञान को प्राप्त करने वाला कभी किसी चीज़ से आश्चर्यचकित नहीं होता, न ही डरता है।

अपने जीवन में जो विरोधाभास और भेद सामने आते हैं, वे भी ऐसे ही हो सकते हैं, यह सोचिए। एक बार जब यह समझ में आ जाए कि मूल तत्व एक ही है, तो बाहरी भेद मन पर उतना बोझ नहीं डालते।

इस अध्याय का सारांश

वशिष्ठ महर्षि ब्रह्मांडों के बारे में आगे बताते हुए कहते हैं कि वे केवल अज्ञानियों के अनुभव में ही वास्तविक दिखते हैं। बालक की कल्पना की उपमा से समझाया कि यह सृष्टि कल्पना का प्रवाह है। राम ने पूछा कि दिशाओं की धारणा कहाँ से आई, तो वशिष्ठ ने रतौंधी के दोष और आकाश में बाल दिखने की उपमा से उत्तर दिया। चींटी के शरीर की तुलना से ब्रह्मांड की संरचना, और बर्फ के टुकड़ों की उपमा से विविधता में एकता को समझाया। अंत में सागर-लहर की उपमा से बताया कि इन कल्पनाओं को जानने वाला अभेद ज्ञान प्राप्त करके निर्विकार स्थिति में रहता है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: ब्रह्मांडों में दिखने वाली दिशाएँ और भेद सब अज्ञान के कारण रचे गए हैं, मूल में अखंड चैतन्य एक ही है।
  • तात्विक शिक्षा: सागर-लहर की अभेदता जानने वाला संसार में कभी विस्मित नहीं होता, वह निर्विकार ज्ञानानंद स्वरूप का अनुभव करता है।
  • अगले अध्याय से संबंध: ब्रह्मांडों की अभेद तत्व को समझने के बाद, राम के आगे के प्रश्न इस ज्ञान को और गहराई से खोलेंगे।

बर्फ के टुकड़े अनेक आकार ले लेते हैं, पर वे असल में जल ही हैं।

सागर और लहर में केवल नाम और रूप का भेद है, कोई और भेद नहीं है।

अविद्या के दोष से पीड़ित व्यक्ति को ही अविनाशी ब्रह्म में यह सारे ब्रह्मांड दिखते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रह्मांडों में ऊपर-नीचे की धारणा क्यों है?

दिशाओं की यह धारणा अखंड ब्रह्म में स्वाभाविक रूप से नहीं है। अज्ञान नाम के दोष के कारण ही ये धारणाएँ दिखाई देती हैं, यह वशिष्ठ महर्षि ने समझाया – यह वैसा ही है जैसे आँख के दोष से आकाश में बाल दिखना।

योग वासिष्ठ में बर्फ के टुकड़ों की उपमा का अर्थ क्या है?

बर्फ के टुकड़े अलग-अलग आकार में होते हुए भी, वे सब मूल रूप से जल ही हैं, यह उपमा बताती है कि ये सारे ब्रह्मांड अलग-अलग दिखते हुए भी मूल में एक ही चैतन्य तत्व हैं।

सागर-लहर की उपमा किस बारे में बताती है?

सागर और लहर में केवल नाम और रूप का भेद होता है, वस्तु के रूप में कोई भेद नहीं होता, यह उपमा बताती है। इसी तरह ब्रह्मांड और उनका मूल चैतन्य अभिन्न हैं, यह वशिष्ठ ने समझाया।

ब्रह्मांड कैसे उत्पन्न होते हैं और कैसे विलीन होते हैं?

चिदाकाश सागर में ब्रह्मांड नाम की लहरें निरंतर उठती रहती हैं, फिर उसी सागर में विलीन हो जाती हैं, यह वशिष्ठ महर्षि ने बताया। भविष्य में भी ऐसी अनेक ब्रह्मांड-लहरें उठने वाली हैं।

अभेद ज्ञान प्राप्त करने वाले को क्या अनुभव होता है?

सागर-लहर के संबंध का अभेद ज्ञान प्राप्त करने वाला इस संसार में कभी आश्चर्यचकित नहीं होता। उसे निर्विकार ज्ञानानंद एकत्व स्वरूप का अनुभव होता है, यह वशिष्ठ ने समझाया।

क्या सभी ब्रह्मांडों में एक जैसे ही जीव होते हैं?

नहीं, वशिष्ठ के अनुसार कुछ ब्रह्मांडों में मनुष्य नहीं होते, केवल पेड़-पौधे होते हैं, उनके आकाश भाग में देवता और किन्नर रहते हैं। कुछ अन्य में गाँव, नगर, पहाड़ होते हैं – इस तरह हर ब्रह्मांड विविधता से भरा है।

निष्कर्ष

यह उपदेश मन को एक गहरी शांति देता है – जितने भी रूप हैं, जितने भी ब्रह्मांड हैं, मूल एक ही है, यह सत्य। सागर-लहर की अभेदता को जानने वाला कभी किसी चीज़ से विचलित नहीं होता। इन कल्पनाओं के पीछे छिपे असली चैतन्य स्वरूप को राम आगे और कितनी गहराई से जानने वाले हैं?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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