आकाश का नीलापन सच है या भ्रम? परमात्मा का स्वरूप कैसे जानें? | Yoga Vasistha S3 EP-7

परमात्मा का स्वरूप कैसा है, यह वशिष्ठ महर्षि ने राम को समझाया। आकाश के नीलेपन की उपमा से जगत की मिथ्या-प्रकृति।

परमात्मा का स्वरूप क्या है, वह कहाँ रहता है — इस प्रश्न का उत्तर वशिष्ठ महर्षि एक ही वाक्य में देते हैं — परमात्मा कोई अलग से खोजने वाली वस्तु नहीं है। ज्ञानस्वरूप वही चेतना भूत-भविष्य-वर्तमान के रूप में, द्रष्टा-दर्शन-दृश्य के रूप में, जड़-अजड़ सबमें व्याप्त है। जैसे सूर्य प्रकाश का आधार है, वैसे ही दिखने वाली हर चीज़ का आधार परमात्मा का यही स्वरूप है।

अपने चारों ओर फैले इस संसार को देखकर कभी मन में यह सवाल उठा है कि यह सब कहाँ से आया, इसके पीछे कौन है? किताबें पढ़ने पर भी, गुरुओं के पास जाने पर भी जब इस सवाल का साफ़ जवाब नहीं मिलता, तो मन एक अजीब-सी बेचैनी में डूब जाता है। यह इंसान की सबसे पुरानी खोज है।

श्रीराम भी उसी स्थिति में हैं। जन्म-मरण के इस चक्र से पूरी तरह मुक्त होने के लिए, पहले ‘मैं’ नाम की इस अवधारणा में असल में क्या छिपा है, यह जानने की उनके मन में गहरी तड़प है। उसी तड़प के साथ उन्होंने वशिष्ठ महर्षि के सामने एक सीधा सवाल रखा — वह परमात्मा का स्वरूप कैसा होता है?

राम का सवाल — ‘मैं’ नाम के भ्रम से मुक्ति कैसे मिले?

सभा में सन्नाटा छा गया। श्रीराम वशिष्ठ महर्षि की ओर देखते हुए, अपने मन में बहुत दिनों से दबे सवाल को बाहर लाए। उनकी आवाज़ में एक विनम्र-सी बेचैनी झलक रही थी। यह महज़ बौद्धिक जिज्ञासा नहीं थी, बल्कि जीवन को समझने की सच्ची तड़प थी।

श्रीराम: हे महर्षि! ‘मैं यह हूँ’ — इसे न जान पाने के कारण ही तो जीव को यह संसार जकड़ लेता है! तो फिर इन सब जीवों में रहकर, सबको चला रहा वह ‘स्वयं’ कौन है? क्या वह आकाश-रूप है? किस आधार पर, कहाँ, कैसे टिका हुआ है?

साधु-संगत, सच्छास्त्र — रास्ता कहाँ है?

राम की बातों में एक साफ़ उलझन झलक रही है। ज्ञानी लोग हमेशा कहते हैं — साधु-संगत और सच्छास्त्र के अध्ययन से ही परमात्मा को जाना जा सकता है। लेकिन उस परमात्मा का असली स्वरूप क्या है, यह जाने बिना ये बातें केवल बातें बनकर रह जाती हैं, ऐसा उन्हें लग रहा है।

श्रीराम: आपने कहा कि साधु-संगत और सच्छास्त्र से वे प्राप्त हो सकते हैं। तो कृपया बताइए, उस परमपुरुष का स्वरूप क्या है।

वशिष्ठ का उत्तर — जन्म के जंगल में भटकती बुद्धि

वशिष्ठ महर्षि के चेहरे पर एक गहरी करुणा उभर आई। राम के सवाल की गहराई को समझते हुए, वे पहले लोगों की एक आम भूल की ओर इशारा करना चाहते थे — जीव को परमात्मा समझ बैठने के भ्रम की।

वशिष्ठ महर्षि: हे राम! ‘जन्म’ नाम के इस जंगल में भटकते किसी एक चेतन जीव को देखकर ‘यही परमात्मा है’ मान लेने वाले लोग, चाहे कितने भी विद्वान हों, परमात्मा के स्वरूप की पूरी समझ नहीं रखते।

जीव-भ्रम ही दुःख की जड़ है

सभा में सब ध्यान से सुनने लगे। वशिष्ठ ने अपनी बात को और गहराई से खोलना शुरू किया, इस संसार के दुःख की असली वजह बताते हुए।

वशिष्ठ महर्षि: क्यों? क्योंकि इस संसार के भीतरी दुःखों की जड़ जीव-भ्रम ही है! सिर्फ़ एक को जान लेने से क्या फ़ायदा? जब किसी एक जीव की जीव-भावना से शुरू होकर, धीरे-धीरे ‘सभी जीव परमात्मा-स्वरूप ही हैं’ यह सर्वात्म-भाव समझ में आ जाए, तभी सारे दुःख अपने आप शांत हो जाते हैं।

विष घटे तो उसका असर भी घटता है

वशिष्ठ ने एक छोटे-से उदाहरण से इस बात को और साफ़ किया। सभा में बैठे लोग सिर हिलाते हुए उन शब्दों को मन में उतार रहे थे।

वशिष्ठ महर्षि: जैसे विष हट जाए तो उसका असर भी हट जाता है, वैसे ही यह दृश्य-जगत परमात्मा-स्वरूप के रूप में अनुभव में आ सकता है।

ज्ञानस्वरूप — जो एक जगह से दूसरी जगह नहीं बदलता

श्रीराम ने अब और स्पष्टता से पूछा — परमात्मा का रूप बताइए, ताकि उन्हें देखकर मन का मोह पूरी तरह मिट जाए। वशिष्ठ ने उनकी इस इच्छा को मान्यता देते हुए, परमात्मा के असली लक्षणों को एक-एक कर खोलना शुरू किया। उनकी आवाज़ में एक अनुभव-सिद्ध स्थिरता गूँज रही थी।

वशिष्ठ महर्षि: जो ज्ञानस्वरूप क्षणभर में एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाता, जिस बोधरूपी समुद्र में भूत-भविष्य-वर्तमान के रूप में दिखने वाला यह ‘काल’ भी मिथ्या ही है…

वह बोध, जिसमें सब कुछ जाना जाता है

सभा में कोई हिल नहीं रहा था। वशिष्ठ के शब्द एक-एक कर, परमात्मा के स्वरूप-लक्षणों की तरह धीरे-धीरे प्रवाहित हो रहे थे।

वशिष्ठ महर्षि: जिस ‘बोध’ में यह पूरा जगत जाना जाता है, जिसमें द्रष्टा-दर्शन-दृश्य असल में न होते हुए भी, होने जैसे दिखाई देते हैं…

असत्य होते हुए भी सत्य-सा दिखना

वशिष्ठ ने लक्षणों की उस सूची को आगे बढ़ाया, हर वाक्य एक सूत्र की तरह ठहरता जा रहा था।

वशिष्ठ महर्षि: यह पूरा संसार असत्य होते हुए भी जिसमें सत्य जैसा दिखता है, अनादि काल से यह सृष्टि-प्रवाह जिसमें मिथ्या रूप में भासता है…

चिन्मात्र — पत्थर की तरह अचल नहीं

सभा में एक सूक्ष्म-सी अनुभूति फैल गई। वशिष्ठ यहाँ एक अहम चेतावनी दे रहे हैं — इस चेतना को जड़ता समझने की भूल न करने की।

वशिष्ठ महर्षि: जो ‘चिन्मात्र’ (बोध नाम की यह भावना) चेतन होते हुए भी, पत्थर की तरह बिना किसी बदलाव के सदा अचल है… जो जड़ होते हुए भी जड़ नहीं है, जो इन सब बाहरी-भीतरी वस्तुओं के साथ रहकर भी सारे व्यवहार चला रहा है…

सूर्य के प्रकाश की तरह हर जगह फैला हुआ

वशिष्ठ ने अपनी बात को एक सुंदर उपमा के साथ पूरा किया। सभा में सबके चेहरों पर एक स्पष्टता उभरी, यह बात बहुत सीधे समझ में आ गई।

वशिष्ठ महर्षि: हे राम! यही परमात्मा का स्वरूप है। जैसे सूर्य आदि सभी प्रकाशमान वस्तुओं का रूप प्रकाश ही है, वैसे ही यह जो कुछ दिखाई देता है, वह जिसमें है, वही परमात्मा का व्याप्त रूप है, यह समझ लो।

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आकाश नीला दिखता है, पर उसमें नीलापन नहीं है

श्रीराम ने एक और सवाल पूछा — परमात्मा ही एकमात्र सद्रूप है, यह दृश्य-जगत सब अनित्य, मिथ्या है, यह उन्हें अनुभव के स्तर पर कैसे पता चले। वशिष्ठ ने इसके जवाब में आकाश की ओर उँगली उठाई। उस उदाहरण ने सभा में सबकी नज़रें एक पल में ऊपर उठा दीं।

वशिष्ठ महर्षि: हे राम! उस आकाश की ओर देखो। वहाँ कुछ नीला-सा दिख रहा है न! तो क्या आकाश में कोई नीले रंग की चीज़ है? नहीं है न! जैसे आकाश असल में शून्य है, रूप-रहित है, वैसे ही उस चिन्मय ब्रह्म में यह भ्रम-सा जगत भी दिखाई दे रहा है।

प्रलयकाल में बचता है केवल बोध-स्वरूप

वशिष्ठ ने बात आगे बढ़ाई, प्रलय की स्थिति का वर्णन करते हुए।

ऐसा ज्ञान मिलने पर ब्रह्म का स्वरूप अपने आप समझ में आ जाता है, और ‘यह जगत मिथ्या है’ — इस ज्ञान के बिना ब्रह्म को जानने का और कोई उपाय नहीं है, यह उन्होंने स्पष्ट कर दिया।

वशिष्ठ महर्षि: ‘प्रलयकाल’ नाम की स्थिति में यह सारा दृश्य-समूह नष्ट हो जाता है। तब वह परम पुरुष अकेला ही शेष रहता है, यही ‘बोध-स्वरूप’ है।

तू-मैं-वह-जगत लय हो जाएँ तो जो बचता है

वशिष्ठ ने राम को सीधे संबोधित करते हुए एक ध्यान-सूत्र दिया। यह केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि स्वयं-अनुभव तक ले जाने वाला रास्ता था।

वशिष्ठ महर्षि: यानी… तुम्हारी दृष्टि में ‘तू-मैं-वह-जगत’ नाम की यह सारी चीज़ पूरी तरह लय हो जाए, तो तब तुझमें जो शेष रहता है, वही वह है। उस शुद्ध विज्ञान-तत्त्व में ही इस पूरे दृश्य-जाल का जन्म, स्थिति और लय — सब होता है, यह समझो।

गहरी नींद की जड़-अवस्था मोक्ष नहीं है

वशिष्ठ ने तुरंत एक ज़रूरी चेतावनी जोड़ी, ताकि कोई इस बात को ग़लत न समझ बैठे। दर्पण में प्रतिबिंब बनने के लिए दृश्य-भाव का होना ज़रूरी है, यह उन्होंने याद दिलाया।

वशिष्ठ महर्षि: ‘गहरी नींद में बनने वाली जड़-अवस्था ही बोध-स्वरूप है’ — यह भ्रम मत पालना। अगर दृश्य-भाव न हो, तो ब्रह्म का प्रतिबिंब भी नहीं बनता।

दृश्य को त्यागना यानी जड़ता को अपनाना नहीं है

वशिष्ठ ने इस सूक्ष्म भेद को और स्पष्ट करते हुए, चींटी से लेकर ब्रह्मा तक सभी जीवों का उदाहरण दिया। सभा में कुछ लोग हैरानी से एक-दूसरे को देखने लगे।

वशिष्ठ महर्षि: ‘यह जगत सत् नहीं है’ — यही असली ज्ञान है, यही वह अवस्था है। ‘दृश्य को त्यागना’ का मतलब ‘जड़ता को अपनाना’ नहीं है, यह मैं फिर से याद दिला रहा हूँ। गहरी नींद के समय चींटी से लेकर ब्रह्मा तक सब दृश्य-रहित जड़ता में ही तो रहते हैं न! क्या उसे मोक्ष कहा जाता है? नहीं।

दृश्य स्वतंत्र नहीं है — यह स्वकल्पित है

सभा में सन्नाटा और गहरा हो गया। वशिष्ठ अपनी बात को अंतिम मोड़ की ओर ले जा रहे थे, यह दृश्य-जगत असल में स्वतंत्र नहीं है, यह ज़ोर देकर कहते हुए।

वशिष्ठ महर्षि: यह दृश्य स्वयं से नहीं है। यह स्वकल्पित माया के कारण ही सभी प्राणियों को अलग-अलग तरह से महसूस होता है। सभी जीव-जंतुओं में एक-सा बसा हुआ ब्रह्म इस दृश्य-अनुभव से कभी, किसी क्षण भी छुआ नहीं जाता — यही सबसे बड़ा संस्कार, यही सही दृष्टि, यही मोक्ष है।

अँगूठी सोने से अलग नहीं है

वशिष्ठ ने अपनी बात को एक सुंदर, स्पष्ट उपमा के साथ समाप्त किया। सभा में बैठे लोगों के मन में यह उदाहरण गहरे उतर गया।

वशिष्ठ महर्षि: हे प्रिय राघव! यह जो विशाल ब्रह्मांड दिख रहा है, वह कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ। यह सब उसी निर्मल चेतना से कल्पित है। इसलिए इसका असली स्वरूप ब्रह्म ही है। जैसे आभूषण सोना ही है, और कुछ नहीं न! वैसे ही यह जगत भी मिथ्या है। यह कभी बना ही नहीं। ‘अँगूठी’ नाम की चीज़ सोने से अलग कहीं है क्या? नहीं है न! ब्रह्म-तत्त्व ही नित्य सत्य है।

परमात्मा के स्वरूप-लक्षण — वशिष्ठ की शिक्षा का सार

लक्षण अर्थ
ज्ञानस्वरूप एक जगह से दूसरी जगह नहीं बदलता, स्थिर है
बोध (Knowing) इसी के कारण पूरा जगत जाना जाता है
चिन्मात्र चेतन होते हुए भी पत्थर की तरह अचल है
जड़-अजड़ जड़ होते हुए भी जड़ नहीं है
सूर्य का प्रकाश जैसे यह हर उजाले का आधार है, वैसे ही यह हर चीज़ का आधार है
आकाश का नीलापन दिखता है, पर असल में वह रंग है नहीं — भ्रम की उपमा
अँगूठी-सोना दिखने वाला जगत अपने मूल ब्रह्म से अलग नहीं है

आध्यात्मिक सार

इस संवाद में वशिष्ठ महर्षि की शिक्षा का सार एक ही है — परमात्मा कोई दूर कहीं खोजने वाली अलग वस्तु नहीं है। वह हर अनुभव का आधार बना बोध है, हर दृश्य के पीछे टिकी चेतना है। हम जो कुछ देखते हैं, वह सब उसी चेतना में दिखने वाला मिथ्या रूप है।

जैसे आकाश में नीला रंग दिखता है, पर असल में वहाँ नीलापन नहीं है, वैसे ही यह संसार दिखता तो है, पर इसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। जैसे अँगूठी सोने से अलग नहीं है, वैसे ही जगत ब्रह्म से अलग नहीं है। यह समझ जब केवल शब्द न रहकर गहरा अनुभव बन जाए, तभी सारे दुःख अपने आप घट जाते हैं, यह वशिष्ठ ने स्पष्ट किया।

यहाँ एक ज़रूरी चेतावनी भी है — इस ज्ञान को निर्जीव, जड़ अवस्था समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। गहरी नींद में मन का काम न करना मोक्ष नहीं है, क्योंकि वहाँ बोध पूरी तरह अनुपस्थित है। असली मोक्ष है — इस संसार को अनुभव करते हुए भी, यह जानते हुए कि वह मुझे छूता तक नहीं, यह स्पष्ट बोध।

आज जो संसार आप देख रहे हैं, उसमें बदलते दृश्यों के पीछे एक न बदलने वाला बोध है, इसे एक बार शांति से महसूस करें। वही बोध सच है, बाकी सब उस पर पड़ने वाला प्रतिबिंब मात्र है, यह मन में बार-बार दोहराएँ।

इस अध्याय का सारांश

श्रीराम ने परमात्मा का स्वरूप पूछा, तो वशिष्ठ महर्षि ने उसे ज्ञानस्वरूप, बोध और सूर्य के प्रकाश की तरह हर चीज़ का आधार बताया। जीव को परमात्मा समझ बैठना ही दुःख की जड़ है, और सर्वात्म-भाव जागने पर दुःख अपने आप घट जाता है, यह उन्होंने कहा। आकाश के नीलेपन के भ्रम की उपमा से जगत की मिथ्या-प्रकृति समझाई, और अँगूठी-सोने की उपमा से यह भी बताया कि जगत ब्रह्म से अलग नहीं है। गहरी नींद की जड़-अवस्था मोक्ष नहीं है, यह भी स्पष्ट किया।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: परमात्मा का स्वरूप कहीं अलग से खोजने वाली चीज़ नहीं है — वह हर अनुभव का आधार बना ज्ञानस्वरूप है, सूर्य के प्रकाश की तरह सब में व्याप्त है।
  • तात्विक शिक्षा: जीव-भ्रम मिटने पर ही दुःख अपने आप शांत होता है। दृश्य-जगत आकाश के नीलेपन की तरह भ्रम मात्र है, अँगूठी सोने से अलग न होने की तरह, जगत ब्रह्म-तत्त्व से अलग नहीं है।
  • अगले अध्याय से संबंध: परमात्मा का स्वरूप समझने के बाद, यह भौतिक दृष्टि (पंचभौतिक दृष्टि) कैसे बनी, इसे कैसे पार किया जाए, यह वशिष्ठ अगली शिक्षा में बताएँगे।

जैसे सूर्य प्रकाश का आधार है, वैसे ही दिखने वाली हर चीज़ का आधार परमात्मा का यही स्वरूप है।

आकाश में नीला रंग न होने की तरह, यह जगत भी ब्रह्म में केवल भ्रम बनकर दिख रहा है।

अँगूठी सोने से अलग न होने की तरह, यह संसार ब्रह्म-तत्त्व से अलग नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

योगवाशिष्ठ के अनुसार परमात्मा का स्वरूप क्या है?

परमात्मा का स्वरूप ज्ञानस्वरूप है, बोध के रूप में है — यह सूर्य के प्रकाश की तरह हर दृश्य और अनुभव का आधार है। यह एक जगह से दूसरी जगह नहीं बदलता, स्थिर चेतना है।

जगत मिथ्या है, इसे कैसे समझें?

वशिष्ठ द्वारा दी गई आकाश के नीलेपन की उपमा से यह स्पष्ट होता है — आकाश नीला दिखता है, पर असल में वह रंग वहाँ नहीं है, वैसे ही जगत दिखता तो है, पर वह ब्रह्म पर पड़ा हुआ भ्रम मात्र है।

क्या गहरी नींद की जड़-अवस्था मोक्ष है?

नहीं, वशिष्ठ महर्षि ने स्पष्ट कहा है कि गहरी नींद में बनने वाली जड़ता बोध-स्वरूप नहीं है। यह केवल बोध-रहित स्तब्धता है, मोक्ष का मतलब है स्पष्ट बोध से भरी अवस्था।

सर्वात्म-भाव का मतलब क्या है?

सर्वात्म-भाव का मतलब है ‘सभी जीव परमात्मा-स्वरूप ही हैं’ यह समझ। यह भाव जागने पर सारे दुःख अपने आप शांत हो जाते हैं, यह वशिष्ठ ने बताया।

अँगूठी-सोने की उपमा का अर्थ क्या है?

जैसे अँगूठी सोने से कहीं अलग नहीं होती, वैसे ही यह दिखने वाला जगत भी ब्रह्म-तत्त्व से अलग नहीं है। दोनों एक ही मूल-तत्त्व के अलग-अलग रूप मात्र हैं।

जीव को परमात्मा समझ बैठने का क्या मतलब है?

जन्म नाम के जंगल में भटकते किसी एक चेतन जीव को देखकर ‘यही परमात्मा है’ मान लेना एक भूल है, यह वशिष्ठ ने कहा — चाहे कोई कितना भी विद्वान हो, इस भ्रम में पड़ने पर परमात्मा के स्वरूप की पूरी समझ नहीं बनती।

दृश्य को त्यागने का क्या मतलब है?

दृश्य को त्यागने का मतलब जड़ता को अपनाना नहीं है। सिर्फ़ ‘मैं यह दृश्य नहीं देखूँगा’ कहकर आँखें बंद कर लेने से परम-तत्त्व का अनुभव नहीं मिलता, यह वशिष्ठ ने स्पष्ट किया।

निष्कर्ष

वशिष्ठ की इस शिक्षा से सभा में एक गहरी शांति फैल गई — जगत मिथ्या होते हुए भी, ब्रह्म-तत्त्व ही नित्य सत्य है, यह राम को साफ़ समझ में आ गया। लेकिन इस उदाहरण ने राम के मन में एक और सवाल जगा दिया — इतने सूक्ष्म ब्रह्म में इतना विशाल जगत कैसे समा गया? इस सवाल का जवाब वशिष्ठ महर्षि क्या देते हैं, यह अगले एपिसोड में जानेंगे।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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