क्या मन के बिना यह जगत संभव है? मन ही माया है — वशिष्ठ मुनि का यह रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-5

मन क्या है? वशिष्ठ मुनि ने आकाश, मृगतृष्णा के उदाहरणों से राम को समझाया कि मन माया है। योगवासिष्ठ Season 3 Episode 5 का पूरा उपदेश पढ़ें।

मन क्या है, यह कहाँ से आता है — जब यह प्रश्न मन में उठे, तो योगवासिष्ठ का उत्तर चौंका देने वाला है। वशिष्ठ मुनि के अनुसार मन शुद्ध चैतन्य से अलग कोई वस्तु नहीं है, बल्कि यह सत्-असत् दोनों को प्रकाशित करने वाला एक संकल्प-रूप मात्र है। जैसे आकाश खाली होने पर भी नीला दिखाई देता है, वैसे ही मन भी भ्रम पैदा करने वाला एक निराकार स्पंदन है।

इंसान के जीवन में कभी न कभी यह शंका ज़रूर उठती है — जो संसार मैं देख रहा हूँ, जो सुख-दुख मैं अनुभव कर रहा हूँ, क्या ये सच में हैं, या यह सब मेरे मन का खेल है? यह प्रश्न कितना भी सामान्य लगे, इसकी गहराई अपार है।

अयोध्या की उस सभा में श्रीराम के मन में भी यही शंका उठी। पिछले दिन वशिष्ठ मुनि ने जो उपदेश दिया था, उसे याद करते हुए राम मन के असली स्वरूप के बारे में और स्पष्टता चाहते थे। वह संवाद किस दिशा में आगे बढ़ा, अब यही देखते हैं।

मन का रूप क्या है — राम का प्रश्न

सभा में सन्नाटा फैला हुआ था। श्रीराम वशिष्ठ मुनि की ओर देखते हुए, विनम्रता से अपनी शंका पूछने लगे। पिछले दिन मुनि ने जो उपदेश दिया था, उसमें यह स्पष्ट हुआ था कि यह पूरा जगत मन से ही उत्पन्न होकर प्रकाशित हो रहा है — यही बात राम ने याद करते हुए कही।

श्रीराम: हे भगवन्! वशिष्ठ मुनि, आपने कल मुझे जो उपदेश दिया, उससे यह स्पष्ट हो गया कि यह संपूर्ण जगत मन से ही उत्पन्न होकर प्रकाशित हो रहा है। परंतु इस मन का रूप क्या है? यह कहाँ रहता है, क्यों रहता है, कैसे रहता है? कृपया हमें समझाइए।

आकाश जैसा मन — निराकार का आकार

वशिष्ठ मुनि की आँखों में एक गहरी शांति झलक रही थी। उन्होंने एक सीधे से प्रश्न से ही उत्तर देना शुरू किया — जिसे हम आकाश कहते हैं, वह क्या है? क्या वहाँ शून्यता के अलावा और कोई पदार्थ है? क्या वहाँ नीले रंग की कोई वस्तु है — यही उन्होंने पूछा।

वशिष्ठ मुनि: जिसे हम आकाश कहते हैं, वह वास्तव में क्या है? क्या वहाँ शून्यता के सिवा और कुछ है? क्या वहाँ नीले रंग का कोई पदार्थ है? नहीं है! उसी तरह शून्य आकाश जैसे मन का भी कोई अलग रूप नहीं है।

माया में सच्चा अनुभव — मृगतृष्णा का उदाहरण

सभा में सब उत्सुकता से सुन रहे थे। वशिष्ठ ने कहा कि जैसे आकाश न अपने भीतर, न बाहर कहीं दिखाई देता है, फिर भी सर्वत्र फैला रहता है, वैसे ही मन भी अपने स्वरूप में उसी तरह व्याप्त रहता है। इस बात को समझाने के लिए मुनि ने एक सुंदर उदाहरण दिया — जैसे मृगतृष्णा में पानी दिखाई देने का अनुभव होता है, वैसे ही मन से इस जगत का अनुभव होता है।

वशिष्ठ मुनि: मृगतृष्णा में जैसे पानी दिखाई देने का अनुभव होता है, वैसे ही मन से इस जगत का अनुभव मिलना भी सत्य है। जैसे कोई अपने ही संकल्प से मन में उभरे दृश्य को देखता है — इस मन की यह रूप-रचना भी पूरी तरह भ्रम ही है।

शून्य मन की परिभाषा

यह शून्य मन को परिभाषित कैसे किया जाए, यह सवाल वशिष्ठ ने स्वयं उठाया और अपने उपदेश के लिए एक परिभाषा दी। सभा में सब उस परिभाषा की प्रतीक्षा उत्सुकता से करने लगे।

वशिष्ठ मुनि: इस शून्य मन को परिभाषित कैसे किया जाए, बताओ? तुम्हारी समझ के लिए एक परिभाषा देता हूँ, सुनो। सत् और असत् — यानी वास्तविक और अवास्तविक — दोनों वस्तुओं को जो प्रकाशित करता है, उसे ही मन कहते हैं।

चित्त से मन तक — मिट्टी और मिट्टी के ढेले का उदाहरण

इससे अधिक मन का कोई और आकार नहीं है, यह वशिष्ठ ने स्पष्ट किया। निराकार चित्त (शुद्ध चैतन्य) जब अर्धाकार रूप में स्थिर हो जाता है, तभी उसे मन कहा जाता है — यही उन्होंने विस्तार से समझाया। यानी मन, चित्त से भिन्न कोई वस्तु नहीं है, यह उन्होंने ज़ोर देकर कहा।

इसे समझाने के लिए मुनि ने मिट्टी और मिट्टी के ढेले का उदाहरण दिया। जैसे मिट्टी निराकार है, और मिट्टी का ढेला आकार लेकर भी मिट्टी से अलग नहीं होता, वैसे ही मन भी चित्त से अलग न होने वाला एक आकार-रूप है — यही समझना चाहिए।

संकल्प करने वाला — और संकल्प

संकल्प ही मन का रूप है, यह कहते हुए वशिष्ठ ने और गहराई से समझाना शुरू किया। संकल्प से पहले भी तो संकल्प करने वाला कोई होता है — यही प्रश्न उन्होंने सभा से पूछा।

वशिष्ठ मुनि: संकल्प ही मन का रूप है। संकल्प से पहले भी तो संकल्प करने वाला कोई होता है, है न! जो सबसे पहले की शुद्ध अवस्था है, उसे चित्त कहते हैं, और जब वही चित्त संकल्प करता है, तो उसे मन कहा जाता है।

वशिष्ठ मुनि: क्या पानी से उसकी तरलता अलग है? क्या वायु से उसका चलना अलग कहा जा सकता है? जहाँ संकल्प है, वहीं मन है। इन दोनों को कभी किसी ने अलग-अलग अनुभव नहीं किया है।

ब्रह्मदेव का जन्म — बोध-रूप प्रकाश

सभा में एक शांत उत्सुकता छाई हुई थी। वस्तु-समूह को, विषयों को ‘बोध’ के रूप में, अनुभव के रूप में प्रकाशित करने वाला ही मन है, वशिष्ठ ने कहा। यह जो प्रकाशित हो रहा है, वह सत्य है या असत्य, यह अलग बात है — इसे उन्होंने स्पष्ट किया।

मन जिस वस्तु का जैसा संकल्प करता है, उसी को वह वैसा ही अनुभव करता रहता है — यह वशिष्ठ ने समझाया। ऐसे मनोभाव से युक्त शुद्ध चैतन्य ही पितामह ब्रह्मदेव कहलाता है, यह उन्होंने बताया। वही ब्रह्मदेव आधिभौतिक बुद्धि (पदार्थ-समूह को पहचानने वाला तत्व) उत्पन्न करते हैं, यह मुनि ने विस्तार से समझाया।

वशिष्ठ मुनि: हे राम! जो श्रेष्ठ लोग हैं, वे मन में उठने वाली तृष्णा की धार को पार कर जाते हैं। इस दृश्य-जगत की रचना में सूत्रधार जो ‘दृष्टि का यह विस्तार’ है, वही संकल्प जगत के साक्षात होने का कारण है।

मन कर्मों का निर्माता — दृष्टि और सृष्टि एक ही हैं

सभा में सब वशिष्ठ की बातें ध्यान से सुन रहे थे। इस दृष्टि से ही जगत के आकार में यह पूरा भ्रम खड़ा होता है, मुनि ने कहा। हर एक सृष्टि में, हर स्थान पर नाम-रूप के साथ प्रकाशित होने के अनेक कारण जुड़े हुए हैं, यह उन्होंने समझाया।

पत्थर में, पर्वत में, साक्षी में, हर प्राणी में सूक्ष्म रूप से प्रकाशित होने वाली ये कर्म-संबंधी वृत्तियाँ, इन सबके पीछे मन ही मूल कारण है, वशिष्ठ ने स्पष्ट किया। अपनी इन वासनाओं को पूरा करने के लिए मूढ़ लोग जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और भटकाव जैसी परेशानियों में अपने आप को उलझाते रहते हैं, यह उन्होंने कहा।

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संसार — ‘त्रिपुटी’ से बचने का मार्ग

सभा में एक हलचल-सी दिखी। कर्मों से बड़े अनर्थ होते हैं, और यह ‘त्रिपुटी’ (दृश्य – द्रष्टा – दर्शन, यह तीन) मन के भीतर न घुसने दो, वशिष्ठ ने चेताया। यदि यह दृश्य हृदय में राग-द्वेष की आसक्ति के रूप में घुस जाए, तो यह जीव को तीनों लोकों में भटकाने का कभी न रुकने वाला चक्र बना देता है, यह उन्होंने कहा।

वशिष्ठ मुनि: हे रामचंद्र! अनुभव और प्रतिज्ञा से कहे मेरे इन वचनों को सुनो। बाहर दिखने वाले ये आकाश आदि पंचभूत हों, या भीतर उठने वाला ‘मैं’ का यह भाव हो — व्यवहार की अवस्था में ही अज्ञानी दृष्टि को ये अलग-अलग दिखते हैं।

वशिष्ठ मुनि: वास्तव में परमार्थ की दृष्टि में यह सब कुछ अविनाशी, जन्म-मृत्यु से रहित ब्रह्म ही है। ब्रह्म से अलग ‘जगत’ नाम की कोई वस्तु किसी भी क्षण कभी नहीं रही।

राम की शंका — बाँझ स्त्री के पुत्र का उदाहरण

श्रीराम इन बातों पर तुरंत बोल उठे। ‘यह जगत नहीं है’ सुनने में तो अच्छा लगता है, पर उनके अनुभव से यह मेल नहीं खाता, राम ने अपनी शंका बिना डर के कही।

श्रीराम: प्रभु! ‘यह जगत नहीं है’ — यह सुनने में तो अच्छा लगता है। पर हमारा अनुभव इससे मेल नहीं खाता। बाँझ स्त्री का पुत्र पहाड़ तोड़ रहा है, खरगोश के दो सींग कितने सुंदर हैं, चट्टान हाथ फैलाकर नाच रही है — ऐसा कहने से क्या होगा? हमारे लिए तो ‘यह जगत नहीं है’ कहना भी वैसा ही लगता है।

सपने जैसा जगत — वशिष्ठ का उत्तर

वशिष्ठ ने बिना किसी उत्तेजना के, शांत भाव से उत्तर दिया। उनकी बातें असंगत नहीं हैं, ध्यान से सुनने का आग्रह उन्होंने राम से किया। सच में बाँझ स्त्री के पुत्र की तरह ही यह सब भ्रम मात्र है, और स्वप्न में भी हम घर देखते हैं, लोगों को देखते हैं — क्या वे सच में होते हैं, यह उन्होंने पूछा।

वशिष्ठ मुनि: हे राघव! मेरे वचन असंगत नहीं हैं। मैं जो कहता हूँ, ध्यान से सुनो। सच में बाँझ स्त्री के पुत्र की ही तरह यह सब भ्रम मात्र है। ‘मुझे तो दिखाई देता है’ कहते हो? स्वप्न में भी तो तुम घर देखते हो, लोगों को देखते हो — क्या वे सच में होते हैं?

वशिष्ठ मुनि: मन असत्य होने पर भी, अपनी ही इच्छा से सच्चा शरीर मान लेता है, और फिर जादू की तरह इस जगत को इतना फैला देता है। चंचल शक्ति से युक्त यह मन स्वयं ही उभरता है, स्वयं ही भ्रम पैदा करता है।

ब्रह्म का असली स्वरूप

सभा में शांति छा गई। मन भी माया है, यह सुनकर राम ने फिर पूछा कि यह मायामय मन आखिर कहाँ से उत्पन्न होता है। इसके उत्तर में वशिष्ठ ने महाप्रलय के समय जो शेष रहता है, उसे समझाना शुरू किया।

वशिष्ठ मुनि: हे रामचंद्र! जब यह दृश्य-सृष्टि नाम-रूप के साथ पूरी तरह विलीन हो जाती है, उस महाप्रलय के समय शेष क्या रहता है? शांत, अखंड, निर्लिप्त, अद्वितीय सत्-वस्तु। यह जो केवल अनुभव-रूप है, इसका कोई नाम नहीं था, फिर भी शास्त्रों ने इसे ‘ब्रह्म’ नाम दिया है।

वशिष्ठ मुनि: आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा, शिव — यह सब नाम केवल समझाने के लिए रखे गए हैं। ये नाम उसके स्वाभाविक गुण नहीं हैं — मैं सबसे यही निवेदन करता हूँ कि केवल नाम-रूप की कल्पना से भेद मानने की कोई ज़रूरत नहीं है।

परम वस्तु — द्रष्टा और दृश्य से परे

सभा अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी। वही परम वस्तु एक ओर इस विशाल ब्रह्मांड की रचना करती है, और दूसरी ओर मानो कुछ भी न करते हुए मौन, निष्क्रिय, निर्लिप्त, शांत बनी रहती है, वशिष्ठ ने कहा। सभी प्राणियों का वास्तविक स्वरूप उससे अलग नहीं है, और उसमें कोई अवस्था-परिवर्तन नहीं होता, यह उन्होंने कहा।

वशिष्ठ मुनि: हे रामचंद्र! वही यहाँ है, वही वहाँ है — कोई और वस्तु है ही नहीं। वही सबके द्वारा सब प्रकार से पूजनीय है, नमन करने योग्य है। जो इसे समझ लेता है, उसकी सारी तुच्छता समाप्त हो जाती है।

मन का स्वरूप — वशिष्ठ के उदाहरणों का सार

उदाहरण समझने योग्य सत्य
आकाश का नीला दिखना मन का कोई सच्चा आकार नहीं है, यह केवल भ्रम है
मृगतृष्णा में पानी दिखना मन से मिलने वाला जगत का अनुभव सच नहीं, केवल कल्पना है
मिट्टी और मिट्टी का ढेला मन चित्त (शुद्ध चैतन्य) से अलग नहीं है
पानी-तरलता, वायु-गति संकल्प और संकल्प करने वाला कभी अलग नहीं होते
बाँझ स्त्री का पुत्र, खरगोश के सींग जो असंभव है वह जैसे भ्रम है, वैसे ही जगत का अस्तित्व भी भ्रम है
स्वप्न में घर, लोग दिखना जो सच में नहीं होता, वह भी अनुभव में सच जैसा लगता है

आध्यात्मिक सार

यह संवाद सिखाता है कि मन कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है, बल्कि यह शुद्ध चैतन्य का एक अर्धाकार रूप है। मन संकल्प के रूप में ही रहता है, संकल्प के बिना मन नहीं होता — यह सत्य वैसा ही सहज है जैसे पानी से उसकी तरलता अलग नहीं होती।

वशिष्ठ के दिए सभी उदाहरण एक ही बात को अलग-अलग कोणों से दिखाते हैं — मन और उसकी कल्पना यह जगत, दोनों का कोई सच्चा अस्तित्व नहीं है, पर अनुभव में यह सच जैसा लगता है। जैसे स्वप्न में दिखने वाले घर, लोग अनुभव में सच लगते हैं, पर जागने पर वे भ्रम साबित होते हैं, वैसे ही यह जागृत संसार भी आत्मज्ञान होने पर भ्रम समझ में आता है।

हम रोज़ जो संसार देखते हैं, वह मन की रचना है — यह याद रखें तो क्रोध, भय, दुख आने पर उनके पीछे मन के स्वभाव को देखना शुरू कर सकते हैं। हर दिन कुछ मिनट, मन में उठने वाले विचारों को केवल साक्षी भाव से देखने का अभ्यास करें।

इस अध्याय का सारांश

श्रीराम ने मन के रूप के बारे में पूछा, तो वशिष्ठ मुनि ने कहा कि मन का आकाश की तरह कोई स्वतंत्र रूप नहीं है — यह शुद्ध चैतन्य के संकल्प-रूप में स्थिर होने पर ही बनता है। मृगतृष्णा, मिट्टी-मिट्टी का ढेला, पानी-तरलता जैसे उदाहरणों से उन्होंने समझाया कि मन और चित्त अलग नहीं हैं। राम ने बाँझ स्त्री के पुत्र के उदाहरण से शंका जताई, तो वशिष्ठ ने स्वप्न में दिखने वाली वस्तुओं का उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि जगत मन की ही कल्पना है। अंत में उन्होंने ब्रह्म के सच्चे अद्वितीय स्वरूप को समझाया।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: मन शुद्ध चैतन्य से अलग कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है, यह संकल्प के रूप में बनने वाला एक भ्रामक आकार मात्र है। इस मन से ही जगत का अनुभव स्वप्न की तरह रचा जाता है।
  • तात्विक शिक्षा: सत् और असत् को प्रकाशित करने वाला मन, चित्त (शुद्ध चैतन्य) से अलग नहीं है। मिट्टी और मिट्टी के ढेले के संबंध की तरह मन चित्त का ही आकार-रूप है। यह सत्य जान लेने वाले ही जगत की मायावी प्रकृति को समझ पाते हैं।
  • अगले अध्याय से संबंध: मन माया है, इस सत्य से आगे बढ़कर, यह मायावी मन कैसे उत्पन्न होता है, इस प्रश्न पर वशिष्ठ और गहरा उपदेश देंगे।

संकल्प ही मन का रूप है — संकल्प के बिना मन कहीं नहीं होता।

स्वप्न में दिखने वाले घर सच हैं क्या, यह पूछो तो इस जागृत संसार के बारे में भी वही सवाल पूछना चाहिए।

ब्रह्म से अलग ‘जगत’ नाम की कोई वस्तु किसी भी क्षण कभी नहीं रही।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

योगवासिष्ठ के अनुसार मन क्या है?

योगवासिष्ठ के अनुसार मन वह अवस्था है जब शुद्ध चैतन्य (चित्त) संकल्प के रूप में अर्धाकार होकर स्थिर हो जाता है। इसका कोई स्वतंत्र, अलग आकार नहीं है — जैसे आकाश नीला दिखता है, वैसे ही यह भी एक भ्रामक रूप है।

क्या मन और चित्त (चैतन्य) अलग हैं?

नहीं, वशिष्ठ के अनुसार मन और चित्त अलग नहीं हैं। मिट्टी और मिट्टी के ढेले के संबंध की तरह — जैसे मिट्टी का ढेला आकार लेकर भी मिट्टी से अलग नहीं होता, वैसे ही मन भी चित्त से अलग नहीं है।

मृगतृष्णा के उदाहरण से वशिष्ठ ने क्या समझाया?

जैसे मृगतृष्णा में पानी दिखने का अनुभव सच न होकर भी वास्तविक लगता है, वैसे ही मन से मिलने वाला जगत का अनुभव भी असली अस्तित्व न होते हुए भी अनुभव में सच जैसा लगता है, यह वशिष्ठ ने समझाया।

श्रीराम ने बाँझ स्त्री के पुत्र के उदाहरण से क्या पूछा?

मन और जगत माया है, यह सुनने में तो अच्छा लगता है, पर उनका अनुभव उससे मेल नहीं खाता — असंभव चीज़ों (जैसे बाँझ स्त्री का पुत्र) की तुलना करते हुए राम ने अपनी शंका बिना डर के व्यक्त की।

वशिष्ठ ने जगत को माया कैसे सिद्ध किया?

स्वप्न में दिखने वाले घर, लोग अनुभव में सच जैसे लगते हैं, पर जागने पर पता चलता है कि वे नहीं थे। वैसे ही यह जागृत संसार भी मन की रचना है, यह वशिष्ठ ने समझाया।

वशिष्ठ ने ब्रह्म को कैसे परिभाषित किया?

महाप्रलय के समय जब सारे नाम-रूप विलीन हो जाते हैं, तब शेष रहने वाली शांत, अखंड, निर्लिप्त सत्-वस्तु को शास्त्रों ने ब्रह्म नाम दिया है। आत्मा, परमात्मा, शिव यह सब इसी वस्तु के अलग-अलग नाम हैं।

मन को माया क्यों कहा गया है?

मन का कोई स्वतंत्र, स्थायी अस्तित्व नहीं है, इसलिए इसे माया कहा गया है। यह शुद्ध चैतन्य पर बनने वाली एक अस्थायी संकल्प-स्पंदन मात्र है, कोई सच्ची स्वतंत्र वस्तु नहीं।

निष्कर्ष

यह परम वस्तु सबके द्वारा सब प्रकार से पूजनीय है, नमन करने योग्य है — वशिष्ठ के इन शब्दों ने सभा में सबके हृदय को छू लिया। जो इसे समझ लेता है, उसकी सारी तुच्छता समाप्त हो जाती है — इस गंभीर घोषणा के साथ उस दिन का उपदेश समाप्त हुआ। मन माया है, यह जानने के बाद भी, यह कैसे उत्पन्न होता है, यह संसार को इतना सच क्यों लगता है — इस गहरे प्रश्न का वशिष्ठ आगे क्या उत्तर देंगे?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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