पत्थर जैसे निर्विकार बनकर जीने से मोक्ष नहीं मिलता क्या? जीवन्मुक्त की सच्ची पहचान | Yoga Vasistha S3 EP-8

क्या जीते-जी मोक्ष संभव है? वशिष्ठ मुनि द्वारा बताए गए जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति के लक्षण जानें।

क्या जीते-जी मोक्ष संभव है, और जीवन्मुक्त पुरुष असल में कैसा होता है? वशिष्ठ मुनि के अनुसार, जीवन्मुक्त संसार को शून्यवत देखते हुए भी सारे लौकिक व्यवहार पूर्ववत निभाता है। उसका मुख सुख में न खिलता है, न दुःख में सिकुड़ता है — निर्विकार चेतना में स्थित रहकर, जागते हुए भी वह सोए हुए इंसान जैसी शांति में रहता है।

सुख आए तो हँसना, दुःख आए तो टूट जाना — यही तो हम सबकी ज़िंदगी है। पर अगर कोई इंसान इन दोनों से बेपरवाह, हमेशा एक जैसा बना रहे तो? क्या हम उसे पत्थर-दिल मान लेंगे, या समझेंगे कि वह किसी बहुत ऊँची अवस्था में पहुँच गया है?

श्रीराम का वशिष्ठ मुनि से यही प्रश्न, जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति का असली अर्थ खोल देने वाले एक अद्भुत संवाद की शुरुआत बन गया। इस अध्याय में वशिष्ठ जो जवाब देते हैं, वह जीते-जी मोक्ष की पूरी अवधारणा को ही एक नया मोड़ दे देता है।

ज्ञानियों के आनंद के पीछे का रहस्य

सभा में सन्नाटा छा गया। वशिष्ठ मुनि ने अपनी बात शुरू की। जिन्होंने अपना चित्त ब्रह्म में स्थिर कर लिया है, जो ब्रह्म में स्थित प्राणियों के साथ एक हो गए हैं, वे आपस में ब्रह्म के बारे में ही बातें करते रहते हैं — यह उन्होंने बताया। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो केवल ज्ञान-दृष्टि से ही संतुष्ट होकर आनंद पाते हैं।

ब्रह्म-विचार में डूबे ऐसे ज्ञानियों को ही जीवन्मुक्ति मिलती है, वशिष्ठ ने यह स्पष्ट किया। पर वे यहीं नहीं रुके — ऐसे जीवन्मुक्त ही आगे जाकर विदेहमुक्त भी बनते हैं, यह बात उन्होंने सभा को बताई।

वशिष्ठ मुनि: जिन्होंने अपना चित्त ब्रह्म में स्थिर कर लिया है, जो ब्रह्म में स्थित प्राणियों के साथ एक हो गए हैं, वे आपस में उस ब्रह्म के बारे में ही बातें करते रहते हैं। उनमें से कुछ केवल ज्ञान-दृष्टि से ही संतुष्ट होकर आनंद पाते हैं। ऐसे ब्रह्म-विचारपरायण लोगों को ही जीवन्मुक्ति मिलती है। और ऐसे जीवन्मुक्त ही विदेहमुक्त भी बनते हैं।

राम की उत्सुकता, गुरु के जवाब की शुरुआत

श्रीराम ने हाथ जोड़कर वशिष्ठ की ओर देखा। ब्रह्मज्ञानी के रूप में प्रसिद्ध अपने गुरु से इन दो अवस्थाओं के बीच का फर्क जानने की उत्सुकता उनकी आँखों में साफ झलक रही थी।

जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त — दोनों के लक्षण क्या हैं, यह समझाने की विनती राम ने की। यह जानकर, शास्त्र-दृष्टि से और अपनी बुद्धि से, वे इन्हें प्राप्त करने का प्रयास कर सकेंगे, यह उन्होंने कहा।

श्रीराम: ब्रह्मज्ञानी! जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त के लक्षण हमें बताइए। आपकी बात सुनकर, शास्त्र-दृष्टि से और अपनी बुद्धि से, हम इन्हें पाने का प्रयास कर सकेंगे।

शून्य में टिके रहकर भी संसार में चलने वाला

वशिष्ठ ने जीवन्मुक्त के लक्षण बताना शुरू किया। शास्त्र-विधि का पालन करते हुए भी, इस सृष्टि को शून्यवत समझने वाले को ही जीवन्मुक्त कहा जाता है, उन्होंने बताया।

ऐसा व्यक्ति लौकिक कार्य करते हुए भी, ज्ञान से युक्त होकर, जागते हुए भी सोए हुए इंसान जैसा निर्विकार बना रहता है, वशिष्ठ ने कहा। उसका मुख सुख मिलने पर खिलता नहीं, दुःख आने पर सिकुड़ता नहीं — हर हाल में एक-सा ही रहता है, उन्होंने ज़ोर देकर कहा।

जो जब जिस समय करना ज़रूरी हो, वह उसे उसी तरह दूसरों के अनुकूल निभाता रहता है, वशिष्ठ ने बताया। जागते हुए भी जो निर्विकार आत्मतत्व में टिका रहता है, वह सुषुप्त अवस्था वाले इंसान जैसा ही तो है, उन्होंने पूछा।

वशिष्ठ मुनि: शास्त्र-विधि का पालन करते हुए भी इस सृष्टि को शून्यवत समझने वाले को ही जीवन्मुक्त कहा जाता है। स्वाभाविक रूप से चल रहे लौकिक कार्यों को निभाते हुए, ज्ञान से युक्त होकर, जागते हुए भी सोए हुए इंसान जैसा निर्विकार बने रहने वाला ही जीवन्मुक्त है। उसका मुख सुख मिलने पर खिलता नहीं, दुःख आने पर सिकुड़ता नहीं। हर समय एक-सा ही रहता है।

सोता हुआ दिखने पर भी अविद्या-मुक्त जागृत पुरुष

इसलिए यह लगेगा कि यह व्यक्ति सो रहा है, वशिष्ठ ने कहा। पर असल में अविद्या नाम की नींद पूरी तरह खत्म हो चुकी होती है, आत्मा के मामले में वह सदा जागृत ही रहता है, उन्होंने समझाया।

इस देह और इंद्रियों के बारे में ‘यह मेरा है’ या ‘मैं इनका हूँ’ — ऐसा वह कभी नहीं सोचता, वशिष्ठ ने स्पष्ट किया। इसलिए उसके भीतर कोई उद्वेग नहीं उठता, उन्होंने कहा। जागृत और स्वप्न — दोनों अवस्थाएँ शांत हो जाने के कारण, वह स्वप्न-अवस्था से भी परे होता है।

वशिष्ठ मुनि: आत्मा के मामले में वह सदा जागृत ही है। देह और इंद्रियों के बारे में ‘यह मेरा है’ या ‘मैं इनका हूँ’ — ऐसा वह कभी नहीं सोचता। इसीलिए भीतर कोई उद्वेग उसे छूता नहीं।

हवा से हिलता पेड़, न हिलने वाला पहाड़

इस अवस्था को समझाने के लिए वशिष्ठ ने एक दृश्य सामने रख दिया। मान लो, तेज़ हवा चल रही है। उस हवा के झोंके से पहाड़ पर खड़ा पेड़ हिलता है, पर पहाड़ तो नहीं हिलता — यह उन्होंने पूछा।

ठीक वैसे ही, बाहर से खुशी, दुःख, राग, द्वेष, भय जो भी दिखाई दे, भीतर वह आकाश जैसा साफ और शांत ही बना रहता है, वशिष्ठ ने समझाया। अपना असली स्वरूप क्या है, और क्या नहीं है — यह उसे पूरी तरह पता होता है, उन्होंने कहा।

वशिष्ठ मुनि: मान लो तेज़ हवा चल रही है। उस हवा के झोंके से पहाड़ पर खड़ा पेड़ हिलता है, पर पहाड़ तो नहीं हिलता! बाहर से खुशी, दुःख, राग, द्वेष, भय वह दिखाए भी, भीतर वह आकाश जैसा साफ और शांत ही बना रहता है।

कर्तापन-रहित कर्म, बंधन-रहित जीवन

मैं किसी भी काम का कर्ता नहीं हूँ, चैतन्य-स्वरूप होने के कारण मैं न जन्मा, न मरूँगा, न कुछ करता हूँ — फिर मेरे लिए बंधन क्या और मोक्ष क्या, इस निरहंकार भावना के साथ वह जीता है, वशिष्ठ ने बताया।

जिसमें कर्तापन का अभिमान नहीं है, वह कर्म करे या न करे, बुद्धि से किसी चीज़ को छूता ही नहीं। चिद्-आत्म-स्वरूप वही है, जो आवरण हटने पर प्रलय और आवरण रहने पर सृष्टि की कल्पना करता है — यह समझ उसे रहती है, वशिष्ठ ने कहा। करते हुए भी न करने वाला, देखते हुए भी न देखने वाला बनकर वह समय बिताता है; न किसी को डराता है, न खुद संसार को देखकर डरता है।

वशिष्ठ मुनि: मैं किसी भी काम का कर्ता नहीं हूँ। चैतन्य-स्वरूप होने के कारण मैं न जन्मा, न मरूँगा, न कुछ करता हूँ। फिर मेरे लिए बंधन क्या, मोक्ष क्या? चिद्-आत्म-स्वरूप मैं ही हूँ, जो आवरण हटने पर प्रलय और आवरण रहने पर सृष्टि की कल्पना करता हूँ।

अनासक्ति से ही मुक्ति

जीवन्मुक्त को इस संसार से ‘रत्ती भर’ भी आसक्ति नहीं होती, वशिष्ठ ने स्पष्ट किया। आसक्ति होने पर ही तो बंधन होता है — उन्होंने पूछा; आसक्ति न हो तो जीवन्मुक्ति के कारण किसी को क्या कमी रह जाएगी, उन्होंने कहा।

वह देहधारी होकर भी निराकार है, मन रहते हुए भी अमनस्क है, वशिष्ठ ने बताया। सबकी तरह इस संसार में विचरण करते हुए भी, वह सदा निश्चिंत रहता है। संसार के व्यवहारों में शामिल होकर भी, वह कामनाओं के वेग के आगे तनिक भी नहीं झुकता, और हर किसी में आत्मा की पूर्णता को ही सदा देखता रहता है, उन्होंने विस्तार से बताया।

वशिष्ठ मुनि: जीवन्मुक्त को इस संसार से रत्ती भर भी आसक्ति नहीं होती। आसक्ति हो तभी तो बंधन होता है? आसक्ति न रहे तो जीवन्मुक्ति के कारण किसी को क्या कमी रह जाएगी? वह देहधारी होकर भी निराकार है, मन रहते हुए भी अमनस्क है।

देह त्यागने पर मिलती है विदेहमुक्ति

यहाँ श्रीराम ने बीच में एक संदेह उठाया। ऐसा जीवन्मुक्त धीरे-धीरे समय के साथ देह त्याग करने के बाद विदेहमुक्त बनता है, प्राण-वायु की गति रुकने के बाद निश्चलता को पाता है, और वही निश्चलता मोक्ष हो सकती है — यह उन्होंने पूछा।

ऐसा विदेहमुक्त फिर न जन्म लेता है, न मरता है, न व्यक्त होता है, न अव्यक्त — दूर हो या पास, वह हर जगह व्याप्त रहता है, यह संवाद आगे बढ़ता गया।

श्रीराम: हे राम! हे राघव! अभी तक आपने जो ‘यह जीवन्मुक्ति की संपदा है’ बताया, उसे भी जीवन्मुक्त धीरे-धीरे छोड़ देता है। इस समय मेरी इस मन की उलझन को सुलझा दें।

साक्षी-भाव में राम को वशिष्ठ का अंतिम निर्णय

तब वशिष्ठ ने स्पष्ट किया कि यह सब कुछ आपसी सापेक्ष दृष्टि से ही है, यह ‘अनुभूति-मात्र’ क्षेत्र किसी और चीज़ जैसा नहीं है। सूक्ष्म, स्थूल और कारण शरीरों का अभाव ही परमार्थ है, स्वरूप में टिक जाना ही सच्ची साधना है, उन्होंने कहा।

यानी मन किसी भी आकार में न रहकर, केवल स्वरूप-मात्र चैतन्य बचा रहे, तो वही विदेहमुक्ति है, वशिष्ठ ने साफ किया। यह दृष्टि सिर्फ सापेक्ष है, परमार्थ दृष्टि में तो सृष्टि-प्रलय जैसा कोई भेद ही नहीं है, यह उन्होंने सभा को समझाया।

वशिष्ठ मुनि: यह पूरी दृष्टि आपस में सापेक्ष ही है। परमार्थ दृष्टि में सृष्टि और प्रलय जैसा कोई भेद ही नहीं है। मन किसी भी आकार में न रहे, केवल स्वरूप-मात्र चैतन्य ही बचा रहे — यही विदेहमुक्ति है।

सर्वव्यापक अवस्था, भेद-रहित दृष्टि

यह दृष्टि सारे लोकों को प्रकाशित करने वाला स्वरूप, हर संकल्प से परे है, वशिष्ठ ने बताया। सर्वव्यापक यह ‘ज्ञ’ स्वरूप कई नामों से पुकारा जाता है, पर सच में कोई नाम उसके लिए पूरा नहीं पड़ता, उन्होंने कहा।

यह होने और न होने — दोनों से परे ‘सत्’ है, बिना किसी कारण के विद्यमान रहता है, वशिष्ठ ने स्पष्ट किया। मन की सारी गतिविधियाँ इस दृष्टि के अधीन हैं, पर परम तत्व तो सदा निर्विकार, नित्य ही चमकता रहता है, यह उन्होंने सभा को बताया।

वशिष्ठ मुनि: यह दृष्टि सर्वव्यापक है। यह ‘यह’, ‘वह’, ‘यह नाम’ — इस भेद से परे है। होने और न होने से परे ‘सत्’ है यह। बिना किसी कारण के विद्यमान रहता है। मन की सारी गतिविधियाँ इसके अधीन हैं। परम तत्व तो सदा निर्विकार, नित्य ही चमकता रहता है।

जीवन्मुक्त बनाम विदेहमुक्त — लक्षणों की तुलना

लक्षण जीवन्मुक्त विदेहमुक्त
देह शरीर के साथ लौकिक व्यवहार जारी रहता है देह त्याग की अवस्था
सुख-दुःख बाहर व्यक्त करे भी, भीतर अचल सुख-दुःख से कोई संबंध ही नहीं
कर्तापन कर्म करते हुए भी ‘मैं नहीं करता’ का भाव कर्म का प्रश्न ही नहीं
उपमा हवा से हिलता पेड़, न हिलने वाला पहाड़ जैसा आकाश जैसा सर्वव्यापक, निराकार

आध्यात्मिक अर्थ

इस अध्याय का असली सत्य यह है कि मोक्ष का मतलब भावनाओं को दबा देना नहीं है। जीवन्मुक्त पत्थर की तरह जड़ नहीं बन जाता; वह हँसता है, प्रतिक्रिया देता है, संसार और लोगों के बीच रहता है — पर उस प्रतिक्रिया के पीछे ‘मैं कर रहा हूँ’ का भाव नहीं होता।

हवा से हिलते पेड़ और न हिलने वाले पहाड़ की उपमा यहाँ सबसे अहम है। बाहरी व्यवहार बदलता रहे, पर भीतर की चेतना अचल रहती है। इसी को ‘साक्षी-भाव’ कहते हैं — करते हुए भी न करने वाला, देखते हुए भी न देखने वाला होना।

आज किसी कठिन परिस्थिति में प्रतिक्रिया देते हुए भी, उस प्रतिक्रिया से अलग एक कोने में शांत बने रहने की कोशिश करें। यही इस शिक्षा का आपके जीवन में उतरना होगा।

इस अध्याय का सारांश

श्रीराम के प्रश्न का उत्तर देते हुए वशिष्ठ मुनि जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति के लक्षण समझाते हैं। जीवन्मुक्त संसार में रहते हुए भी भीतर निर्विकार, निष्काम, कर्तापन-रहित जीवन जीता है। हवा से हिलते पेड़ और स्थिर पहाड़ की उपमा से वशिष्ठ इस अवस्था को स्पष्ट करते हैं। देह त्यागने के बाद मिलने वाली अवस्था को विदेहमुक्ति कहा जाता है, जो सर्वव्यापक, निराकार, भेद-रहित चेतना की अवस्था है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: मोक्ष का मतलब संसार से भाग जाना नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए भी उससे परे रहना है।
  • तात्विक शिक्षा: कर्तापन-रहित कर्म, आसक्ति-रहित जीवन, साक्षी-भाव — यही जीवन्मुक्ति के असली लक्षण हैं।
  • अगले अध्याय से संबंध: सर्वव्यापक चैतन्य तत्व को और गहराई से समझाने वाला संवाद अगले एपिसोड में जारी रहेगा।

हवा से पहाड़ पर पेड़ हिले भी, पहाड़ तो नहीं हिलता।

करते हुए भी न करने वाला, देखते हुए भी न देखने वाला बनकर समय बिताने वाला ही जीवन्मुक्त है।

आसक्ति न हो तो बंधन ही नहीं रहता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जीवन्मुक्त कौन होता है?

शास्त्र-विधि का पालन करते हुए, संसार को शून्यवत समझते हुए, लौकिक व्यवहार निभाते हुए भी भीतर निर्विकार रहने वाला ही जीवन्मुक्त है।

जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त में क्या फर्क है?

जीवन्मुक्त देह के साथ रहते हुए ही इस अवस्था को पाता है; देह त्यागने के बाद मिलने वाली निराकार, सर्वव्यापक अवस्था को विदेहमुक्ति कहते हैं।

क्या जीवन्मुक्त को सुख-दुःख का अहसास नहीं होता?

बाहर से वह खुशी और दुःख दिखा भी सकता है, पर भीतर वह आकाश जैसा साफ और अचल ही बना रहता है।

हवा से हिलते पेड़ की उपमा का मतलब क्या है?

यह उपमा दिखाती है कि बाहरी व्यवहार बदल सकता है, पर भीतर की चेतना पहाड़ जैसी अचल ही रहती है।

कर्तापन का अभिमान न होने का मतलब क्या है?

कर्म करते हुए भी ‘मैं कर रहा हूँ’ का भाव न होना ही कर्तापन का अभिमान न होना है।

क्या विदेहमुक्त फिर से जन्म लेता है?

नहीं, विदेहमुक्त फिर न जन्म लेता है, न मरता है; वह व्यक्त भी नहीं है, अव्यक्त भी नहीं — वह सर्वव्यापक ही रहता है।

जीवन्मुक्ति में आसक्ति न होना क्यों ज़रूरी है?

आसक्ति हो तभी बंधन बनता है; आसक्ति न हो तो संसार में रहते हुए भी कोई बंधन नहीं रहता।

निष्कर्ष

यह दृष्टि आपस में सापेक्ष है, परमार्थ में सृष्टि-प्रलय जैसा कोई भेद ही नहीं है — वशिष्ठ के इन शब्दों की गूँज मन में देर तक बनी रहती है। मन किसी भी आकार में न रहे, केवल स्वरूप-मात्र चैतन्य ही शेष रह जाए — यही विदेहमुक्ति है, यह बात अगले एपिसोड में सर्वव्यापक तत्व को और किस गहराई तक खोलकर दिखाएगी?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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