नींद में दिखने वाला संसार जागने के बाद जैसे झूठा साबित हो जाता है, क्या जागते हुए दिखने वाला यह जगत भी वैसा ही है? वसिष्ठ मुनि ने लीला देवी को ‘गिरि’ गाँव के ब्राह्मण दंपति की जो कथा सुनाई, योगवासिष्ठ उसी के माध्यम से उत्तर देता है — जागृत और स्वप्न, दोनों ही चिदाकाश की रचनाएँ हैं, और दोनों समान रूप से असत्य हैं।
क्या कभी आपने ऐसा सपना देखा है, जिसमें आप एक विशाल राज्य के स्वामी हों, बड़े-बड़े महल हों, अपने सारे प्रियजन आपके साथ हों — और जागने के बाद वह सब एक पल में गायब हो जाए? उस क्षण आपको यही लगता है ना, कि वह जो दिखा था झूठ था, और अभी जो दिख रहा है वही सच है।
ठीक यही सवाल लीला देवी ने माँ सरस्वती के सामने उठाया। जब उसे पता चला कि एक छोटे से घर में रहने वाले ब्राह्मण दंपति की कहानी में वह खुद छिपी हुई है, तो उसे जो आश्चर्य हुआ, और उसके बाद देवी सरस्वती ने जो उत्तर दिया — वह बताता है कि यह पूरा जगत कैसे चिदाकाश का एक प्रतिबिंब मात्र है।
गिरि गाँव में एक ब्राह्मण की कथा
देवी सरस्वती ने लीला देवी को पहले बताए गए सृष्टि-रहस्य को और गहराई से समझाना शुरू किया। उन्होंने बताया कि चिदाकाश में, एक दूर-दराज़ जगह पर एक विशाल भवन है, जो पंचभूतों में से एक — आकाश नामक शीशे से ढका हुआ है।
उस भवन में लोकपाल खंभों जैसे हैं। चौदह लोक उसके कमरे हैं। उन कमरों में असंख्य प्राणी रहते हैं। ब्रह्मदेव नामक प्रजापति इस घर के मालिक की तरह हैं, जो अपने ही बनाए घोंसले में खुद फँसे हुए रहते हैं।
उस भवन के ऊपर आकाश में विचरते सिद्ध, लोक, नगर — सब मच्छरों जैसे दिखाई देते हैं। ऐसे उस भवन में ‘गिरि’ नाम का एक गाँव है। उस गाँव के एक घर में वसिष्ठ नाम का एक ब्राह्मण रहता है।
वे दोनों वसिष्ठ अलग-अलग हैं
वह ब्राह्मण वेदों में बताए गए नियमों का पालन करता था, बिना किसी रोग या भय के, शांत मन से पत्नी-बच्चों के साथ गृहस्थ जीवन बिता रहा था। उसका नाम, धन, उम्र, विद्या, वैभव — सब देखने में वसिष्ठ मुनि जैसा ही लगता था, पर वह इक्ष्वाकु वंश के पुरोहित सप्तर्षि वसिष्ठ नहीं था।
उस ब्राह्मण की पत्नी का नाम भी अरुंधती ही था। इक्ष्वाकुओं के सद्गुरु वसिष्ठ की धर्मपत्नी भी अरुंधती ही जीवित थीं। पर देवी सरस्वती ने स्पष्ट किया कि ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग दंपति थे।
वह ब्राह्मण अपनी पत्नी से सच्चा प्रेम करता था। उसका पूरा संसार उसी में समाया हुआ था। एक दिन उस ब्राह्मण ने एक बहुत बड़ा काम करने का निश्चय किया।
ब्राह्मण की तपस्या, राज्य का वरदान
एक दिन शांत मन से उस ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा, ‘अब मुझे इस राज्य-वैभव से क्या लेना-देना? मैं यह गृहस्थ जीवन छोड़कर तपस्या करूँगा।’
उस दिन से उसने राज-काज में कोई रुचि नहीं ली, और एक तपोवन में जाकर कठोर तपस्या करने लगा। लंबे समय तक तपस्या करने के बाद उसके सामने ब्रह्मदेव प्रकट हुए।
ब्राह्मण: इस तपस्या के फल स्वरूप मुझे एक भव्य राज्य चाहिए, जिसे मैं बहुत लंबे समय तक भोग सकूँ।
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वरदान पाकर ब्राह्मण राजा बना
ब्रह्मदेव ने उसकी इच्छा स्वीकार करते हुए कहा, ‘जैसा तुमने चाहा वैसा ही होगा,’ और वरदान देकर अंतर्धान हो गए। उस वरदान के फलस्वरूप वह ब्राह्मण अपनी नींद में ही एक महान राजा बन गया, और एक विशाल राज्य पर शासन करने लगा।
उस सपने में वह राज-भोग भोगते, सेनाएँ चलाते, शत्रु राजाओं को जीतते हुए बहुत लंबा समय बिता चुका था। वह सपना उसे पूरी तरह सच्चा अनुभव लगा, क्योंकि उस सपने का समय उसके मन को यथार्थ जैसा ही महसूस हुआ।
अंततः जब उस राज्य में युद्ध और शत्रुओं से लड़ाई चल रही थी, उसी दौरान वह ब्राह्मण मारा गया। मरते ही वह अपने सपने से जाग उठा — उसे एहसास हुआ कि वह अब भी अपने छोटे से घर में, अपनी पत्नी के पास ही सोया हुआ है।
जागे हुए ब्राह्मण का आश्चर्य
जागते ही उस ब्राह्मण को एक पल के लिए बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ। इतने लंबे समय तक जो राज्य, सेनाएँ, युद्ध, मृत्यु उसने भोगे थे, वे सब एक क्षण में गायब हो गए। उसका असली जीवन यहीं इसी छोटे घर में जस का तस मौजूद था।
ब्राह्मण: हाय! यह सारा राज्य-वैभव क्या एक सपना ही था? इतने समय तक जो संसार, वे युद्ध, वह मेरा राज्य-शासन मैंने भोगा, वह सब आखिर गया कहाँ?
आठ दिनों में छिपे कई वर्ष
उस ब्राह्मण ने यह बात अपनी पत्नी को बताई। वह भी हैरान रह गई, क्योंकि असल में वह ब्राह्मण केवल आठ दिन ही सोया था। पर अपने सपने में उसने कई वर्षों तक राज्य किया, यह अनुभव किया था।
देवी सरस्वती ने यही अद्भुत घटना लीला देवी को उदाहरण के रूप में सुनाई। देवी सरस्वती ने स्पष्ट किया कि वह ब्राह्मण और उसकी पत्नी कोई और नहीं, बल्कि खुद लीला देवी और उसका पति ही थे। यह जानकर कि उन दोनों की मृत्यु तो आठ दिन पहले ही हो चुकी थी, लीला देवी को परम आश्चर्य हुआ।
लीला देवी का संदेह – यह कैसे संभव है?
देवी सरस्वती की सारी बातें सुनकर लीला देवी कुछ देर सोचती हुई मौन हो गई। उसे गहरा आश्चर्य हुआ। फिर उसने अपना संदेह देवी सरस्वती के सामने रखा।
लीला देवी: हे देवी! आपकी बातें मेरी बुद्धि को कुछ असंगत सी लग रही हैं। यह कहना कि वह ब्राह्मण एक छोटे से घर में रहता था और आठ दिन पहले ही मर गया था, और वह हम ही थे — यह तो बड़ी विचित्र बात है!
लीला देवी: क्या मान लूँ कि हमारा यह विशाल राज्य उस ब्राह्मण के घर में समाया हुआ है? अभी मेरे पति परलोक में हैं ना! वहाँ के महान राज्य, विस्तृत भूमियाँ, पर्वत, दिशाएँ — यह सब उस छोटे से कमरे में कैसे समा सकते हैं?
हाथी, सिंह, मच्छर – लीला देवी के प्रश्नों की बौछार
लीला देवी अपनी शंका और तीव्रता से व्यक्त करती रही। उसने पूछा कि क्या कोई मदमस्त विशाल हाथी सरसों के एक दाने में समा सकता है, क्या एक छोटा सा मच्छर सिंहों के झुंड को, और ऐसे अनेक झुंडों को निगल सकता है।
लीला देवी ने देवी सरस्वती से कहा, ‘आपकी बातें ऐसी लग रही हैं जैसे कोई भँवरा पल भर में मेरु पर्वत को चबाकर निगल गया हो।’ उसने पूछा कि क्या अपने सपने में दिखने वाले बादलों से प्रभावित होकर उस कमरे की दीवारें नाचने लगेंगी, जिसमें वह सो रही है।
लीला देवी: हे सर्वेश्वरी! जैसे यह सब असंभव है, वैसे ही मुझे लगता है कि उस ब्राह्मण के घर में धरती, पर्वत होना भी असंभव है। हे माँ, हम आपके जैसे मूर्ख और अज्ञानी बच्चे कुछ जाने-अनजाने पूछ बैठें, तो क्या महात्माओं और जगत की माता आप जैसी को क्रोध आएगा? नहीं आएगा। मुझे भरोसा दिलाने के लिए कृपया बताइए कि आखिर सत्य क्या है।
देवी सरस्वती का उत्तर – माया का स्वरूप
लीला देवी के सारे सवाल सुनकर देवी सरस्वती ने शांत भाव से उत्तर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस माया के स्वरूप और स्वभाव को समझकर, इसी में प्रतिष्ठित रहने वाली लीला देवी को इन बातों पर आश्चर्य करने की ज़रूरत नहीं है।
देवी सरस्वती: पुत्री लीला! मैं कुछ भी झूठ नहीं कह रही हूँ। ‘लोगों को झूठ नहीं बोलना चाहिए’ — यह नियम जगत को सिखाने वाले हम स्वयं सत्यस्वरूप ही हैं। अगर हम ही इस नियम का उल्लंघन करें, तो फिर उत्तम आचरण का पालन कौन करेगा? इसलिए जान लो, जो मैं कह रही हूँ वह पूर्ण सत्य है।
देवी सरस्वती: उस ब्राह्मण की जीवात्मा ने वहाँ गृह-आकाश में आकाश-रूप धारण किया, और वही आकाश-रूप एक विशाल जगत के रूप में दिखाई देने लगा।
मेरी पत्नी, मेरे पति की स्मृतियाँ कहाँ गईं?
देवी सरस्वती की बातें सुनकर लीला देवी के मन में एक और संदेह उठा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सपने में बने रिश्ते और अनुभूतियाँ जागने के बाद आखिर कहाँ चले जाते हैं।
लीला देवी: तो फिर ‘मेरी पत्नी, मेरे पति, मेरे बच्चे, हमारा घर’ — ये सारी स्मृतियाँ कहाँ चली गईं?
देवी सरस्वती: रात में जब तुम सपना देखती हो, तब बने ‘मेरी पत्नी – मेरे पति – मेरे बच्चे – मेरा घर’ — ये सारी बातें नींद खुलते ही कहाँ चली जाती हैं, बताओ? सपने के समय उस सपने की चीज़ें, घटनाएँ, लोग सच लगते हैं, और जागृत अवस्था का सारा व्यवहार असत्य जैसा, अस्तित्वहीन सा महसूस होता है।
द्रष्टा, कल्पना, जागृत-स्वप्न-सुषुप्ति
देवी सरस्वती ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा। ठीक वैसे ही जब जागृत अवस्था में आते हैं यानी नींद खुलती है, तब सपने का सारा व्यवहार भ्रम मात्र, असत्य सा लगता है। पर यही जागृत व्यवहार जागृत अवस्था के समय ठोस और सच्चा जैसा अनुभव होता है।
द्रष्टा अपनी ही कल्पना या भावना के द्वारा जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति — इन तीन अवस्थाओं की रचना करता है। जागृत और स्वप्न दोनों दृश्य से जुड़े हैं, जबकि सुषुप्ति यानी गहरी नींद पूरी तरह मौन रहती है।
जैसे स्वप्न में जागृत अवस्था की स्मृतियाँ न होकर वह असत्य सा लगता है, वैसे ही जागृत अवस्था में स्वप्न की स्मृतियाँ असत्य, अस्तित्वहीन सी रह जाती हैं। इसी तरह ‘हम ब्राह्मण दंपति थे’ — यह ज्ञान इस राजा-रानी के जन्म में उन्हें याद नहीं आया, क्योंकि वह भी एक स्वप्न-तुल्य, भ्रामक भावना ही थी। हर प्राणी का पूर्व जन्म का अनुभव इसी तरह होता है।
चिदाकाश का प्रतिबिंब – यह जगत मिथ्या है
देवी सरस्वती अपनी शिक्षा को समापन की ओर ले जाते हुए समझाने लगीं कि यह पूरा जगत एक ही तरह की बात है। क्या एक छोटे से शीशे में बड़ी चीज़ें, एक विशाल दृश्य नहीं दिखता — पर वह जो दिखता है, वह असल में झूठा ही होता है ना!
ठीक वैसे ही सूक्ष्म अंतःकरण में प्रतिबिंबित होने वाले विशाल जगत भी मिथ्या हैं। उनमें दिखने वाली धरती वगैरह भी मिथ्या हैं। ये सब सत्य-स्वरूप चिदाकाश के — जल में पड़ने वाले प्रतिबिंब जैसे ही चमत्कार मात्र हैं।
निर्मल आकाश-स्वरूप परब्रह्म में यह असत्य सृष्टि सत्य जैसी प्रतीत होती है। जगत में इससे बढ़कर कोई और सत्य नहीं है। सबके हृदय में बसी ‘चिदात्मा’ का यह अनुभव ही आरोपण मात्र के रूप में इस जगत में प्रतिबिंबित होता है।
गिरि गाँव में ही चिदाकाश, उसी घर में विश्व
देवी सरस्वती ने अपनी व्याख्या को एक निर्णायक घोषणा से समाप्त किया। रेगिस्तान में मृगमरीचिका में पानी कहाँ होता है? केवल कल्पना से बनी स्मृति से, कहानी की घटनाओं जैसे उठने वाले ये ‘धरती, अनुभव, घटनाएँ, संबंध’ आदि सब सच कैसे हो सकते हैं?
यह घर, यह गृह-आकाश जिसमें तुम, मैं और बाकी चीज़ें हैं — ये सब चिदाकाश ही हैं, और कुछ भी नहीं। पर जैसे अँधेरे में किसी चीज़ को देखने के लिए दीपक सहायता करता है, वैसे ही ये सारी बातें ‘इस जगत की मिथ्या-प्रकृति’ समझने के लिए प्रमाण और उदाहरण बनकर सहायता कर रही हैं।
देवी सरस्वती: ‘गिरि’ गाँव के उस घर के चिदाकाश में ही वह ब्राह्मण है। उसी गृह-आकाश में समुद्रों सहित पूरी धरती भी है। हे पुत्री! एक त्रसरेणु (परमाणु) में भी अनेक जगत-समूहों का अनुभव हो सकता है।
देवी सरस्वती: फिर उस ब्राह्मण के घर में नगर, उपवन आदि समाए होने में आश्चर्य ही क्या है? ‘कल्पना’ की कोई सीमा है भला? इसमें कुछ भी अनोखा नहीं। छोटे से छोटे परमाणु जैसे इस ‘मन’ में ही यह पूरा जगत समाया हुआ है, यह क्या तुम नहीं जानतीं? यह तो बहुत साधारण सी बात है। इस पर तुम इतना संदेह क्यों कर रही हो?
तीन अवस्थाएँ – द्रष्टा की कल्पना कैसे काम करती है
| अवस्था | स्वभाव | अनुभव करने का तरीका |
|---|---|---|
| जागृत | दृश्य के साथ | सच्चे और ठोस रूप में अनुभव होता है |
| स्वप्न | दृश्य के साथ | अनुभव के समय सच लगता है, बाद में मिथ्या प्रतीत होता है |
| सुषुप्ति/गहरी नींद | मौन, दृश्यरहित | न स्मृति रहती है, न अनुभव |
आध्यात्मिक निहितार्थ
यह कथा हमें एक ही बात सिखाती है – द्रष्टा अपनी ही कल्पना या भावना के द्वारा जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति – इन तीन अवस्थाओं की रचना खुद करता है। जिस अवस्था में हम होते हैं, वही अवस्था सच्ची लगती है, और बाकी अवस्थाएँ झूठी प्रतीत होती हैं।
जैसे ब्राह्मण की कथा में आठ दिन की नींद में कई वर्षों का राज-जीवन समा गया, वैसे ही एक छोटे से गृह-आकाश में पूरा जगत समा सकता है, यह देवी सरस्वती सिखाती हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि समय और स्थान भी मन द्वारा गढ़ी गई सापेक्ष धारणाएँ ही हैं।
सबके हृदय में बसी चिदात्मा का यही अनुभव इस जगत के रूप में प्रतिबिंबित होता है। यह समझ में आ जाए, तो हम जो हर रिश्ता, हर ज़िम्मेदारी निभाते हैं, वह एक अस्थायी कल्पना मात्र लगने लगती है — पर उसी कल्पना को सम्मान और धर्म के साथ निभाना ही जीवन-मुक्ति का मार्ग है।
आज रात सोने से पहले एक क्षण के लिए सोचिए – दिनभर आपने जो खुशियाँ, दुख, ज़िम्मेदारियाँ महसूस कीं, वे नींद में कैसे गायब हो जाती हैं। उसी नज़र से जागृत अवस्था के अनुभवों को भी देखने की कोशिश कीजिए – लगाव कम किए बिना ही, भार हल्का हो जाएगा।
इस अध्याय का सारांश
देवी सरस्वती लीला देवी को चिदाकाश में बसे एक विशाल भवन का वर्णन करती हैं, जिसमें ‘गिरि’ गाँव में वसिष्ठ नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी अरुंधती के साथ रहता है। तपस्या करके ब्रह्मदेव से वरदान पाकर वह राज्य पाता है, और सपने में कई वर्षों तक राजा बनकर जीता और मरता है। जागने पर उसे पता चलता है कि वह केवल आठ दिन ही सोया था। यह दंपति स्वयं लीला देवी और उसका पति ही हैं, यह जानकर लीला देवी आश्चर्य से भर उठती है और प्रश्नों की झड़ी लगा देती है। देवी सरस्वती समझाती हैं कि जागृत और स्वप्न दोनों समान रूप से द्रष्टा की कल्पना हैं, और यह जगत चिदाकाश का प्रतिबिंब मात्र है।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: जागृत और स्वप्न, दोनों ही अवस्थाएँ द्रष्टा अपनी ही कल्पना से रचता है – जिसे भी हम अनुभव कर रहे होते हैं, वही सच लगता है, बाकी सब मिथ्या प्रतीत होता है।
- तात्विक शिक्षा: यह जगत सबके हृदय में बसी चिदात्मा का अनुभव मात्र है – जो आरोपण मात्र से प्रतिबिंबित मिथ्या है, केवल परब्रह्म ही एकमात्र सत्य है।
- अगले अध्याय से संबंध: लीला देवी को अभी और स्पष्टता चाहिए – इस माया के स्वरूप और स्वभाव को देवी सरस्वती अगले एपिसोड में और गहराई से कैसे समझाती हैं, यह हम देखेंगे।
जैसे स्वप्न में जागृत अवस्था की स्मृतियाँ न होकर वह असत्य लगता है, वैसे ही जागृत अवस्था में स्वप्न की स्मृतियाँ अस्तित्वहीन सी रह जाती हैं।
छोटे से छोटे परमाणु जैसे इस मन में ही यह पूरा जगत समाया हुआ है।
जैसे अँधेरे में किसी चीज़ को देखने के लिए दीपक सहायता करता है, वैसे ही ये सारी बातें जगत की मिथ्या-प्रकृति समझने के लिए उदाहरण बनकर सहायता करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गिरि गाँव का वह ब्राह्मण कौन था?
उस ब्राह्मण का नाम वसिष्ठ था, पर वह इक्ष्वाकु वंश के पुरोहित सप्तर्षि वसिष्ठ मुनि नहीं था। उसकी पत्नी का नाम भी अरुंधती था, पर वह भी कोई और ही थी। योगवासिष्ठ के अनुसार ये दोनों दंपति बिल्कुल अलग-अलग थे।
उस ब्राह्मण ने कौन सी तपस्या की थी?
गृहस्थ जीवन त्यागकर, राज्य पाने की इच्छा से ब्राह्मण ने कठोर तपस्या की। ब्रह्मदेव प्रकट होकर उसकी इच्छा पूरी करने का वरदान देते हैं।
ब्राह्मण के सपने में क्या हुआ?
ब्रह्मदेव के वरदान के फलस्वरूप ब्राह्मण अपनी नींद में एक महान राजा बन गया, और कई वर्षों तक राज्य किया, युद्धों में लड़ा और अंततः मारा गया। पर असल में वह नींद में केवल आठ दिन ही बिता चुका था।
लीला देवी और उसके पति का उस ब्राह्मण की कहानी से क्या संबंध है?
देवी सरस्वती के अनुसार वह ब्राह्मण और उसकी पत्नी असल में लीला देवी और उसका पति ही थे। देवी सरस्वती ने बताया कि उन दोनों की मृत्यु केवल आठ दिन पहले ही हुई थी, पर उस जीवन में उन्होंने राज्य करने का पूरा अनुभव पाया।
जागृत और स्वप्न को योगवासिष्ठ समान क्यों बताता है?
जैसे स्वप्न में जागृत अवस्था के अनुभव असत्य लगते हैं, वैसे ही जागृत अवस्था में स्वप्न के अनुभव असत्य लगते हैं। द्रष्टा अपनी ही कल्पना से जिस अवस्था में होता है, उसी को सत्य मान लेता है, इसलिए योगवासिष्ठ दोनों को समान रूप से मिथ्या बताता है।
एक छोटे से गृह-आकाश में पूरा जगत कैसे समा सकता है?
देवी सरस्वती के अनुसार, जैसे एक छोटे शीशे में बड़ा दृश्य प्रतिबिंबित हो जाता है, वैसे ही सूक्ष्म अंतःकरण में विशाल जगत प्रतिबिंबित होता है। मन परमाणु जितना छोटा होते हुए भी, उसी में पूरा जगत समाया हो सकता है, इसलिए यह संभव है।
चिदाकाश क्या है?
चिदाकाश यानी चैतन्य का आकाश – सबके हृदय में बसी चिदात्मा का अनुभव। यह पूरा जगत उसी चिदाकाश में आरोपण मात्र से, जल में पड़ने वाले प्रतिबिंब जैसे एक मिथ्या चमत्कार के रूप में दिखता है, ऐसा योगवासिष्ठ बताता है।
निष्कर्ष
देवी सरस्वती का यह उदाहरण मन को शांत भी करता है, और गहराई से सोचने पर भी मजबूर करता है – अगर यह जगत केवल चिदाकाश का एक प्रतिबिंब है, तो जिन रिश्तों और ज़िम्मेदारियों से हम इतने बंधे हुए हैं, वे आखिर कितने सच हैं? लीला देवी के मन में अभी भी बचे संदेहों का देवी सरस्वती अगला उत्तर क्या देती हैं, इसके लिए अगले एपिसोड की प्रतीक्षा करते हैं।