अहंकार वास्तव में क्या है? चित्शक्ति के जगत बनने का रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-13

अहंकार आखिर क्या है? चित्शक्ति के जगत बनने के रहस्य को वशिष्ठ महर्षि समझाते हैं। योगवासिष्ठ S3 EP-13।

अहंकार कोई अलग वस्तु नहीं है, यह तो चित्शक्ति के प्रकट होने का एक तरीका मात्र है। वशिष्ठ महर्षि बताते हैं — चैतन्य ही अपने आपको जानने की स्फुरणा के माध्यम से जगत, मन और जीव के रूप में दिखाई दे रहा है। इस स्फुरणा को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि अहंकार स्वयं ब्रह्म ही है।

हम में से बहुतों के मन में यह सवाल हमेशा घूमता रहता है — ‘मैं’ नाम की यह भावना आखिर आती कहाँ से है? यह शरीर, ये विचार, ये इच्छाएँ, क्या सच में मैं यही हूँ, या फिर इन सबके पीछे कुछ और है? जीवन में कभी न कभी, किसी शांत क्षण में, यह प्रश्न हर किसी को छू जाता है।

श्रीराम भी इसी शंका के साथ वशिष्ठ महर्षि के सामने खड़े थे। जगत क्या है, अहंकार क्या है, और इन दोनों का चैतन्य से क्या संबंध है — इन गहरे सवालों के उत्तर के लिए सभा प्रतीक्षा कर रही थी। महर्षि अब अपना उपदेश शुरू करने वाले थे।

जब चित्शक्ति ने खुद को देखा

सभा-मंडप में सन्नाटा छा गया। वशिष्ठ महर्षि अपने आसन पर बैठे, करुणा भरी नज़रों से श्रीराम की ओर देख रहे थे। उनके शब्दों में कोई गहरा सत्य छिपा है, यह सभा में मौजूद सभी को महसूस हो रहा था।

महर्षि ने बोलना शुरू किया — “चित्शक्ति स्वयं-प्रकाशित है। उसका न कोई नाम है, न कोई रूप। लेकिन उसकी अपनी ही स्फुरणा ‘जगत’ के रूप में प्रतिबिंबित हो रही है। यह मन, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत, पर्वत, दिशाएँ — यह सब उस चैतन्य के संकल्पपूर्वक की गई सृष्टि का एक विचित्र खेल मात्र है।”

सभा में सभी सांस रोककर सुन रहे थे। यह सुनते ही श्रीराम की आँखों में एक प्रश्न चमका, पर वे बोले नहीं — उनके मन ने कहा कि गुरु की बात आगे बढ़ने देनी चाहिए।

वशिष्ठ महर्षि: इस जगत का स्वरूप, इसका दर्शन चैतन्य में ही घटित होता है, है ना! तो क्या यह समझना कठिन है कि यह जगत चित्शक्ति का ही धर्म (कार्य) है?

जगत को हटा दें तो बचता क्या है?

महर्षि कुछ देर मौन रहे। उस मौन में एक गहरा अर्थ छिपा हुआ महसूस हो रहा था। फिर उन्होंने अपने उपदेश को और गहराई तक ले जाना शुरू किया।

“जगत को हटा दें तो जो बचता है, वह चित्शक्ति की शक्ति ही है। तब बचने के लिए न कोई नाम है, न कोई रूप,” यह कहकर वे थोड़ा रुके, फिर आगे बोले — “‘जगत को हटाना’ मतलब क्या है? दरअसल जगत की जो धारणा है, उसी को हटाना है।”

वशिष्ठ महर्षि: हे राघव! सच तो यह है कि तुम धारणाओं से परे हो, धारणाओं को रचने वाले हो, धारणाओं में बंधे हुए नहीं। यही शाश्वत सत्य है।

जगत का भाव मिटने पर जड़-शक्ति का क्या होता है?

सभा में कुछ लोगों के चेहरों पर संदेह झलक रहा था — अगर जगत केवल एक भावना है, तो जड़ पदार्थ का क्या होगा, यह सवाल सबके मन में उठ रहा था। वशिष्ठ ने इस शंका को पहले ही भांप लिया और बोलने लगे।

“हमने अभी कहा कि ‘जगत’ का भाव मिटने पर जड़ पदार्थ का परिणाम भी ‘चित्शक्ति’ में घुल जाता है। जब तक जगत का भाव है, तब तक भेद-भाव नहीं मिटता,” उन्होंने ज़ोर देकर कहा।

यह सुनते ही सभा में किसी के मुँह से एक शब्द नहीं निकला — हर कोई मानो इस प्रश्न को अपने भीतर ले गया हो, ऐसा प्रतीत हुआ।

चित्शक्ति की स्वतंत्रता कहाँ है?

वशिष्ठ ने अपनी आवाज़ और स्थिर कर ली। अब वे यह समझाने वाले थे कि जगत को स्वतंत्र सत्ता कहाँ प्राप्त है।

“अब बताओ! इस जगत को स्वतंत्र सत्ता कहाँ है? फिर से कह रहा हूँ, ध्यान से सुनो,” कहते हुए उन्होंने सीधे श्रीराम की आँखों में देखा।

वशिष्ठ महर्षि: ‘चित्शक्ति’ में ‘जगत को प्रकट करने’ की जो शक्ति है, वह स्वयं-निर्मित है… वह उस शक्ति से अलग नहीं है। वही जीव-रूप में, तन्मात्रा-रूप में प्रतिभासित होकर जगत के रूप में दिखाई देती है।

प्राण के साथ जुड़ी अहंभाव-स्फुरणा

सभा एक और गहरे मौन में डूब गई। महर्षि अब यह समझाने लगे कि ‘जीव’ शब्द कैसे जन्म लेता है, उनकी आवाज़ में एक सूक्ष्म करुणा झलक रही थी।

“चित्त के साथ जुड़ी हुई अहंभाव-स्फुरणा ही, प्राण के साथ मिलकर, ‘जीव’ नाम की संज्ञा पाती है,” यह कहकर उन्होंने इस चमत्कार को और स्पष्ट रूप से समझाना शुरू किया।

वशिष्ठ महर्षि: चमत्कार देखा तुमने? ‘चित्शक्ति’… उसकी ‘स्फुरणा’ अहंभाव के कारण अलग होकर जीव की संज्ञा पाती है। लेकिन यह भेद (विभाजन) एक खेल मात्र है, वास्तविकता नहीं।

अहंकार को जीतने का असली अर्थ क्या है?

यहाँ सभा में एक सूक्ष्म हलचल दिखी — कई साधक ‘अहंकार को जीतना’ शब्द का कोई और ही अर्थ समझते हैं, यह जागरूकता उनके चेहरों पर झलक रही थी। वशिष्ठ अब इसी भ्रम को दूर करने वाले थे।

“‘अहंभाव को जीतना’ का मतलब है… उसे उसके वास्तविक स्वरूप में देखना। इसका मतलब यह नहीं है कि उसे एक वस्तु मानकर हटाने का प्रयास किया जाए,” उन्होंने स्पष्ट किया।

यह कहने के बाद महर्षि ने एक चेतावनी भी जोड़ी — ऐसा प्रयास करते रहने का मतलब है अहंकार के अस्तित्व को स्वीकार कर लेना, और इसके आगे माया का दायरा और फैलता ही जाएगा, यह समझने को कहा।

“खेल के समान ही ‘अहंभाव’ को जब वास्तविक दृष्टि से देखा जाता है, तब पता चलता है — ‘यह तो ब्रह्म ही है’,” कहकर उन्होंने बात समाप्त की।

कर्ता और कर्म में कोई भेद नहीं

सभा में अब एक नया सवाल उभरा — अहंकार का प्राण से क्या संबंध है? वशिष्ठ ने मानो इस सवाल को पहले ही भांप लिया हो, वे स्वयं इसे समझाने लगे।

“चैतन्य की दृष्टि से अहंकार ही हर चीज़ का कर्ता है। क्रिया की दृष्टि से प्राण ही ‘कर्म’ है। ‘कर्ता’ का मतलब है क्रिया करने वाला, है ना! कर्ता और क्रिया में कोई भेद नहीं है,” उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा।

उन्होंने आगे कहा — इसलिए अहंकार और प्राण में कोई भेद नहीं है, कर्ता का कार्यात्मक विशेष रूप ही कर्म है, और इसीलिए जिसे हम ‘जीव’ कहते हैं, वह वास्तव में कर्म ही है, यह उन्होंने ज़ोर देकर बताया।

पुरुष का चित्त, दर्पण में प्रतिबिंब

वशिष्ठ अब ‘पुरुष’ शब्द को सामने लाए — क्रियामय जीव ही पुरुष (पुरुषार्थ, यानी प्रयत्न-स्वरूप) का चित्त है, यह उन्होंने बताया। यही चित्त इंद्रिय-रूप में तरह-तरह से प्रतीत हो रहा है, यह उन्होंने समझाया।

“अब कार्य-कारण भाव (Effect & cause experiences) की बात करें, तो यह सब वास्तव में भ्रम मात्र है। या फिर दर्पण में दिखने वाले प्रतिबिंब जैसा,” कहकर उन्होंने एक उदाहरण लिया — “यह पूरा जगत चित्-प्रकाश का ही अंश है, इसलिए इसमें भेद के लिए कोई जगह नहीं है। यह सब अभेद ही है।”

श्लोक — आत्मा न कटती है, न जलती है

सभा में एक क्षण के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। वशिष्ठ ने अब एक संस्कृत श्लोक का उच्चारण किया, जिसकी ध्वनि पूरी सभा को छू गई:

अच्छेद्योहमदाह्योहमक्लेद्योशोष्येवच, नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोहमिति स्थितम्।

वशिष्ठ महर्षि: अहंकार की आधारभूत आत्मा को न कोई काट सकता है, न जला सकता है, न भिगो सकता है, न सुखा सकता है। वह हर समय, हर विकार से परे है। वह नित्य है, सर्वव्यापी है, स्थिर है, और अचल भी है।

अपने स्वरूप की अज्ञानता से आने वाले दुर्भाग्य

महर्षि के स्वर में एकाएक करुणा भर गई। अब वे यह समझाने लगे कि जो लोग इस तत्व को नहीं समझते, उनकी दशा कैसी होती है, उनके शब्दों में एक दर्द महसूस हो रहा था।

“हे राघव! हमने आत्मा के स्वरूप को (या ब्रह्म-तत्व को) पहचान लिया है। जो हमने स्वयं अनुभव करके जाना है, वही हम संसार को बता रहे हैं,” कहकर उन्होंने आगे चेतावनी दी — “अपने असली स्वरूप को न पहचानने वाले कई लोग भ्रामक और दुःखदायी बातों का, जैसे दूसरों को नुकसान पहुँचाने और दूसरों की निंदा करने जैसे नीच कार्यों का सहारा ले रहे हैं।”

सभा में सभी के सिर थोड़े झुक गए — यह बात मानो सीधे उन्हीं के लिए कही गई हो, ऐसा बहुतों को महसूस हुआ। शास्त्रों द्वारा बताए गए सत्य को कुछ लोग नकारते हैं, और इसी वजह से अनेक दुर्भाग्य झेलते हैं, यह महर्षि ने आगे कहा।

ज्ञानी को दिखने वाला चिदाकाश

वशिष्ठ अब यह समझाने लगे कि ज्ञानी का अनुभव कैसा होता है, उनकी आवाज़ में एक शांति उतर आई।

“यह सारा दृश्य-व्यवहार का खेल केवल ‘अज्ञानी’ के लिए ही चलता है। उसी के लिए यह सब साकार होकर, विकारों के साथ अर्थपूर्ण बनता है — लेकिन ज्ञानी के लिए… यह दृश्य सहित सारे सत्-असत् भाव, जैसे नदी का पानी समुद्र में जाकर मिल जाता है, वैसे ही चिदाकाश में समा जाते हैं,” उन्होंने इस अनुभव का वर्णन किया।

इस बात का अर्थ और गहराई से समझ में आए, इसके लिए उन्होंने एक और उदाहरण जोड़ा — जैसे पानी में डाला गया नमक घुल जाता है, वैसे ही ज्ञानी अपने पास आने वाले हर नाम-रूप को अपने असली स्वरूप में पूरी तरह विलीन कर लेता है।

वशिष्ठ महर्षि: हे राम! अब हमें बार-बार ज्ञानियों की दृष्टि को ही अपनाना चाहिए। अज्ञानियों की भेद-दृष्टि को कितना भी खंगालें, उससे क्या फायदा?

वृक्ष, वसंत, रस — ब्रह्म हर जगह एक ही है

सभा में एक नई उत्सुकता जाग उठी — वशिष्ठ अब उपनिषदों के द्रष्टाओं द्वारा दिया गया एक सुंदर उदाहरण लाने वाले हैं, यह सभी ने भांप लिया।

“उपनिषदों के द्रष्टाओं ने ‘चित्’ की तुलना एक वृक्ष से, ‘माया’ की तुलना वसंत के आगमन से, ‘जड़-शक्ति’ की तुलना उस वृक्ष के रस से, और ‘काल-दूरी’ आदि की तुलना उस चित्-वृक्ष के फूलों और फलों से की है,” उन्होंने समझाया।

यह उदाहरण इसलिए दिया गया है ताकि यह पता चले कि वही ब्रह्म हर समय, हर जगह, हर रूप में प्रकट होता है, महर्षि ने स्पष्ट किया। शून्य-स्वरूप आकाश, स्पंदन-धर्मी वायु, तेज, जलराशि, पृथ्वी, औषधि-स्वरूप चंद्रमा, महाज्योति-स्वरूप सूर्य जैसे रूपों में वही अद्वितीय ब्रह्म प्रकट होता है, यह उन्होंने विस्तार से बताया।

वशिष्ठ महर्षि: ‘ब्रह्म-सत्ता’ के अलावा इनकी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। मान लो, अपने असली स्वरूप के ज्ञान से यह दृश्य-जगत लुप्त हो जाए… तो ‘चित्-ब्रह्म’ अपने पूर्व-भाव में ही स्थित हो जाएगा।

जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति, क्या जगत असत्य है?

सभा अब एक और सूक्ष्म प्रश्न की ओर बढ़ी — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीनों अवस्थाओं में भी वही ब्रह्म स्फुरित हो रहा है, यह वशिष्ठ ने बताया। ये तीनों अवस्थाएँ जड़-भाव के मेल या मन के भाव की प्राप्ति का अनुभव मात्र हैं, यह उन्होंने याद दिलाया।

इनमें दिखने वाला अंतर केवल इन दोनों के मिश्रण में ही है, और ‘ब्रह्म-सत्ता’ से ही ‘जगत-सत्ता’ बनती है, यह उन्होंने कहा। लेकिन जब द्रष्टा से अलग होकर, स्वरूप की दृष्टि से देखा जाए, तो जगत असत्य ही है।

वशिष्ठ महर्षि: यह जगत हमें ऐसा क्यों प्रतीत हो रहा है? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि तुम इसे उसी रूप में मानते हो, इसीलिए ऐसा हो रहा है।

चित्शक्ति — चार उपमाओं के माध्यम से समझें

उपनिषद की उपमा प्रतीकात्मक अर्थ
चित् (वृक्ष) नित्य चैतन्य, सबका मूल स्रोत
माया (वसंत का आगमन) सृष्टि को प्रेरित करने वाली शक्ति
जड़-शक्ति (वृक्ष का रस) पंचभूतात्मक संसार का सार
काल-दूरी आदि (फूल-फल) काल, दूरी जैसे अनुभव के रूप

आध्यात्मिक निहितार्थ

इस अध्याय का असली सत्य यह है कि ‘मैं’ नाम की भावना कोई अलग वस्तु नहीं है, यह तो चित्शक्ति के स्वयं को प्रकट करने का एक तरीका मात्र है। अहंकार को शत्रु समझकर हटाने का प्रयास करने से हम उसके अस्तित्व को और मजबूत बना देते हैं।

इसके बजाय, जब अहंकार को उसके वास्तविक स्वरूप में — ब्रह्म की एक अभिव्यक्ति के रूप में — पहचान लिया जाता है, तो वह स्वयं ही शांत हो जाता है। जगत, जीव, मन, प्राण — ये सब एक ही चैतन्य के अलग-अलग पहलू मात्र हैं।

अपने रोज़मर्रा के जीवन में एक क्षण रुककर देखें कि ‘मैं’ नाम की भावना कहाँ से उठती है — क्या यह विचार के साथ ही आती है, या फिर विचार से पहले भी मौजूद रहती है? इसी प्रश्न को अपना ध्यान बनाएँ।

इस अध्याय का सारांश

वशिष्ठ महर्षि इस अध्याय में अहंकार के असली स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। चित्शक्ति स्वयं-प्रकाशित है, उसका कोई नाम-रूप नहीं है; उसकी स्फुरणा ही जगत, मन और अहंकार के रूप में दिखाई देती है। अहंकार को जीतने का मतलब उसे एक वस्तु की तरह हटाना नहीं, बल्कि उसे वास्तविक दृष्टि से देखना है। कर्ता और कर्म में कोई भेद नहीं, अहंकार और प्राण में भी कोई भेद नहीं। ज्ञानी के लिए यह पूरा जगत चिदाकाश में विलीन होता हुआ प्रतीत होता है। उपनिषद के द्रष्टा चित् की तुलना वृक्ष से, माया की तुलना वसंत से करते हुए बताते हैं कि ब्रह्म हर जगह व्याप्त है। जगत असत्य है या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर है — हम उसे वैसा ही मानते हैं, इसीलिए वह वैसा ही प्रतीत होता है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: अहंकार कोई अलग वस्तु नहीं है, यह चित्शक्ति के स्वयं को प्रकट करने का एक तरीका मात्र है। इसे वास्तविक दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि यह ब्रह्म ही है।
  • तात्विक शिक्षा: कर्ता और कर्म में, अहंकार और प्राण में कोई भेद नहीं है। जब तक जगत का भाव रहता है, तभी तक भेद-भाव बना रहता है; अपने असली स्वरूप का ज्ञान होते ही यह भेद चिदाकाश में विलीन हो जाता है।
  • अगले अध्याय से संबंध: अहंकार, जगत और चैतन्य के बीच के इस संबंध को समझने के बाद, अगले अध्याय में वशिष्ठ इस तत्व को और गहराई से, जीव के बंधन और मोक्ष के दृष्टिकोण से विस्तार देंगे।

अहंकार को जीतने का मतलब उसे वस्तु की तरह हटाना नहीं, बल्कि वास्तविक दृष्टि से देखना है।

कर्ता और क्रिया में कोई भेद नहीं है — इसीलिए जिसे हम ‘जीव’ कहते हैं, वह कर्म ही है।

जो लोग अपने असली स्वरूप को नहीं पहचानते, वे भ्रम में पड़कर दुःखदायी कार्यों का सहारा लेते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

योगवासिष्ठ के अनुसार अहंकार का असली मतलब क्या है?

अहंकार कोई अलग वस्तु नहीं है, यह चित्शक्ति की स्वयं-स्फुरणा से बनने वाला एक प्रकट होने का तरीका है। वशिष्ठ महर्षि इसे ब्रह्म का ही एक पहलू बताते हैं।

अहंकार को जीतने का क्या मतलब है?

अहंकार को जीतने का मतलब उसे किसी वस्तु की तरह मानकर हटाने की कोशिश करना नहीं है, बल्कि उसे वास्तविक दृष्टि से देखकर यह समझना है कि ‘यह तो ब्रह्म ही है’।

वशिष्ठ ने कर्ता और कर्म में भेद न होने की बात क्यों कही?

कर्ता वह है जो क्रिया करता है। कर्ता का कार्यात्मक विशेष रूप ही कर्म है, इसीलिए वशिष्ठ बताते हैं कि अहंकार (कर्ता) और प्राण (कर्म) के बीच वास्तव में कोई भेद नहीं है।

ज्ञानी और अज्ञानी के लिए जगत का अनुभव कैसे अलग होता है?

अज्ञानी के लिए जगत वास्तविक और विकारों से भरा हुआ दिखाई देता है। जबकि ज्ञानी के लिए यह पूरा दृश्य चिदाकाश में विलीन होता हुआ महसूस होता है, ठीक वैसे जैसे नदी का पानी समुद्र में जाकर मिल जाता है।

ब्रह्म की तुलना वृक्ष से क्यों की गई है?

उपनिषद के द्रष्टाओं ने चित् की तुलना वृक्ष से, माया की तुलना वसंत के आगमन से, और जड़-शक्ति की तुलना वृक्ष के रस से की है — इसका मकसद यह दिखाना है कि ब्रह्म हर समय, हर रूप में प्रकट होता है।

क्या जगत असत्य है, इस पर वशिष्ठ का क्या कहना है?

वशिष्ठ कहते हैं कि द्रष्टा से अलग होकर, स्वरूप की दृष्टि से देखने पर जगत असत्य ही है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म-सत्ता से ही जगत-सत्ता बनती है।

निष्कर्ष

सभा में एक गहरी शांति छा गई। वशिष्ठ की कही बात सबके मन में गहरे उतर गई — हम इस जगत को जिस रूप में मानते हैं, वह हमें उसी रूप में प्राप्त होता है। इस सत्य को समझने के बाद, जगत, जीव और अहंकार, इन तीनों के पीछे आखिर सचमुच क्या बचता है? अगले एपिसोड में वशिष्ठ इसी प्रश्न का उत्तर देने वाले हैं।


Share your love
A. Ravinder, RamthaMedia
A. Ravinder, RamthaMedia
Articles: 226