क्या जीव सीमित है या असीमित? ब्रह्म के जगत के रूप में विस्तार होने का रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-12

क्या जीव सीमित है या असीमित? वशिष्ठ मुनि द्वारा ब्रह्म और जगत के रहस्य को उजागर करने वाला योगवासिष्ठ का अध्याय।

जीव सीमित है या असीमित, इस शंका का वशिष्ठ मुनि स्पष्ट उत्तर देते हैं। अहंकार और जगत, दोनों का जन्म ही नहीं हुआ, इसलिए इन्हें ‘नहीं है’ कहना ही सही है। सत्य एक ही है — परब्रह्म। इसी को जीव अनेक शरीरों और जगत के रूप में अनुभव कर रहा है।

हम सबके मन में कभी न कभी यह सवाल उठता है — ‘मैं’ जो हूँ, वह कितना सच है? मेरा शरीर, मेरे विचार, मेरे चारों ओर फैला यह संसार — क्या यह सब शाश्वत है, या हम किसी सीमा में बँधे हुए हैं?

श्रीराम के मन में भी यही शंका उठी और वे वशिष्ठ मुनि के सामने खड़े हो गए। जब यह सारा जगत एक विशाल चित्र जैसा, एक अद्भुत नाटक जैसा प्रतीत होता है, तो इसमें जीव का स्थान क्या है — वह सीमित है या असीमित, इस गहरे विचार-मंथन में वशिष्ठ मुनि श्रीराम को लेकर चलते हैं।

समुद्र की लहरें, आकाश के बादल

वशिष्ठ मुनि ने श्रीराम की ओर देखते हुए पहला प्रश्न रखा। उन्होंने याद दिलाया कि अब तक जिस विषय पर विचार किया गया है, उसके अनुसार यह दृश्य-समूह जगत और अहंकार वास्तव में हैं ही नहीं। चूँकि इनका जन्म ही कभी नहीं हुआ, इसलिए ‘नहीं है’ कहना ही तर्कसंगत और उचित है, यह उन्होंने ज़ोर देकर कहा।

सभा में सब मौन होकर सुन रहे थे। वशिष्ठ मुनि ने स्पष्ट किया कि जो कुछ भी है, वह केवल एक ही सत्य तत्व है, और वह है ब्रह्म। इसके अलावा कहीं कुछ और नहीं है, यह उन्होंने गंभीरता से घोषित किया।

इस सत्य को समझाने के लिए वशिष्ठ मुनि ने एक उपमा दी। जैसे शांत समुद्र का जल अपने जलत्व को छोड़े बिना ही चंचल लहरों का रूप ले लेता है, वैसे ही यह सब होता है, उन्होंने कहा।

उसी तरह परम आकाश भी अपने आकाश-स्वरूप को छोड़े बिना ही जीव-रूप में प्रकट होता है। संकल्प जिसका रूप है, वह ‘चिद्वृत्ति’ ही इन असंख्य जीव-रूपों को धारण किए हुए है, वशिष्ठ मुनि ने यह समझाया।

वशिष्ठ मुनि: अब तक हमने जो विचार किया, उसके अनुसार इसका आश्रय लेने वाला यह जगत और अहंकार का समूह है ही नहीं — क्योंकि इसका जन्म ही नहीं हुआ, इसलिए ‘नहीं है’ कहना ही उचित है।

एक ही चित्रकार, अनंत चित्र

वशिष्ठ मुनि ने यहाँ पहले जीव का प्रसंग छेड़ा। उन्होंने समझाया कि जीवत्व की शुरुआत करने वाले उस पहले जीव को, यानी विराट या प्रजापति ब्रह्मा के चित्स्वरूप आकाश-देह को ही हम ‘अतिवाहिक’ या ‘सूक्ष्म शरीरत्व’ कहते हैं।

जहाँ तक दृश्य की बात है, यह सब सपने में दिखने वाले पर्वतों जैसा प्रतीत होता है, वशिष्ठ मुनि ने कहा। यह किसी चित्रकार द्वारा एकाग्रचित्त होकर रचे गए ‘सेवादल’ नाम के पंचरंगी चित्र जैसा है।

जब एक चित्रकार किसी महान चित्र की रचना करता है, तो उस चित्र की समस्त कुशलता उसके चित्त में ही सदा छिपी रहती है, वशिष्ठ मुनि ने याद दिलाया। ठीक इसी तरह यह जगत भी किसी स्तंभ पर उकेरी गई शिल्प-आकृति जैसा है।

विराट-पुरुष नामक उस स्तंभ में जो ‘पत्थर’ समाया हुआ है, वही आदि प्रजापति ब्रह्मा है। उसके और सामान्य जीव के बीच कोई सहकारी ‘उत्पत्ति-कारण’ नहीं है, वशिष्ठ मुनि ने यह स्पष्ट किया।

श्रीराम का प्रश्न — क्या जीव सीमित है?

श्रीराम यह सुनकर कुछ उलझन में आगे बढ़े। उन्होंने पूछा कि अब तक जो कहा गया, उसके अनुसार जीव तो अनेक सीमित रूपों में दिखाई देता है, तो फिर वह सीमित है या असीमित?

श्रीराम: स्वामी! आपने अभी जो कहा, उसके आधार पर मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि यह जीव सीमित है या असीमित।

‘सीमित’ शब्द का अर्थ ही नहीं है

वशिष्ठ मुनि इसका उत्तर देने से पहले एक क्षण मौन रहे, फिर गहन विचार-मंथन शुरू किया। उन्होंने पूछा कि ‘सीमित’ शब्द तो सामान्य रूप से इस्तेमाल किया जाता है, पर किस प्रमाण के आधार पर इसे स्थापित किया जा रहा है?

वशिष्ठ मुनि ने निर्णय सुनाया कि भ्रम पैदा करने वाला यह शरीरों का प्रसंग ही सब कुछ है, वास्तव में इन दृष्टांतों में से कुछ भी टिकता नहीं है। दृष्टा, सर्वव्यापी, परमात्मा में यह सब भेदरहित होकर स्थित है, उन्होंने बल देकर कहा।

उन्होंने समझाया कि ब्रह्म में, उस प्रजापति ब्रह्म में वैश्वानर के रूप में गिनी जाने वाली सारी सृष्टियाँ एक ही संकल्प हैं। समय के अनुसार उत्पन्न होती दिखने वाली यह रचना, परमेश्वर के संकल्प में ही सन्निहित है, उन्होंने कहा।

वशिष्ठ मुनि: ‘सीमित’ किस प्रमाण से तय कर रहे हो? शरीरों के भेद के आधार पर ही न! शरीर है ही नहीं, यह तो केवल भ्रम मात्र है।

कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर — भेद कहाँ है?

वशिष्ठ मुनि ने यहाँ दो प्रकार के शरीरों का वर्णन किया। एक सूक्ष्म शरीर, और दूसरा कारण शरीर — यानी हर वस्तु का मूल कारण होने वाला शरीर।

उन्होंने बताया कि सभी शरीरों के भीतरी तत्वों में कोई तारतम्य नहीं है, केवल ‘मैं’ अनुभव करने वाली भावना के कारण जड़त्व और जीवत्व जैसे भेद कल्पित हो गए हैं।

वशिष्ठ मुनि ने स्पष्ट किया कि शरीर के अनुसार ‘मैं यहाँ हूँ’ का अनुभव पाकर, जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहने वाला जीव — यही ‘मैं’ की अनुभूति ही बंधन का कारण है।

इसी देहाभिमान से उत्पन्न संबंध ही जीव को परमेश्वर से अलग दिखाता है, जबकि वास्तव में दोनों एक ही हैं, यह उन्होंने गंभीरता से घोषित किया।

सृष्टि-क्रम — इच्छा से लेकर क्रिया तक

सभा में जब एक प्रश्न उठा, तो वशिष्ठ मुनि ने सृष्टि के क्रम को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि महात्मा ऋषियों की समझ के अनुसार, किसी कार्य के होने से पहले एक प्रेरणा, फिर संकल्प, और उसके बाद क्रिया — यह क्रम चलता है।

पहले इच्छा, फिर संकल्प, उस संकल्प से प्रयास, और अंततः कर्मों का निर्माण — इसी क्रम में हर कार्य आकार लेता है, वशिष्ठ मुनि ने बताया।

‘प्राण’ कर्ता के रूप में, ‘हृदय’ मनोभाव के रूप में, और ‘चित्त’ क्रिया को प्रेरित करने वाले संकल्प के रूप में कार्य करते हैं — ये तीनों मिलकर एक यात्रा की तरह आगे बढ़ते हैं, उन्होंने समझाया।

इसी सामूहिक क्रिया के द्वारा ही जगत नाम की यह पूरी दुनिया रूप लेती है, और यही समस्त गणना का कारण है, वशिष्ठ मुनि ने कहा।

‘मैं’ नाम का एक शब्द, अनेक तरंगें

वशिष्ठ मुनि ने यहाँ ‘मैं’ नामक भावना को गहराई से समझाया। जैसे समुद्र में हर लहर अलग-अलग दिखाई देती है, वैसे ही ‘मैं’ नाम का एक ही शब्द अनेक अर्थों में फैल जाता है, उन्होंने कहा।

उन्होंने समझाया कि शरीर के प्रति लगाव के कारण ‘मैं’ कारण के रूप में, प्रयास के रूप में स्थिर हो जाता है। इसी को ‘ब्रह्म’ शब्द से जोड़ते हुए, उन्होंने जगत को व्यक्त करने वाला शब्द इस्तेमाल किया।

इस ‘मित्र’ नाम के शब्द के द्वारा (दिखाई देने वाले ‘युग’ के अर्थ में) यह समूचा संसार-व्यवहार स्थित है, और इसे केवल एक ‘शब्द-दृष्टि’ से ही समझा जा सकता है, वशिष्ठ मुनि ने समझाया।

‘नीत्व-निर्नीति’ नामक विशिष्ट सिद्धांत

वशिष्ठ मुनि ने बताया कि यह ‘मित्र’ और ‘अहंकार’ भी एक साथ जुड़ा हुआ कार्य है — मैं जीव, मूलाधार और मूल-कारण से जुड़ा हुआ हूँ।

उन्होंने कहा कि यह किसी ‘संकल्प’ के समान ही विस्तृत होकर, नित्य तृष्णा नहीं है, बल्कि इसी रूप में इसका नाम ‘क्षण-नर-रस-गंध-मय’ रखा गया है।

‘नीत्व’ नामक तत्व अनेक कर्तृत्व और परस्पर-रक्षा के परत्व का निर्वहन करता है — इसे लांघने पर, इस नीत्व-नीति-नियम में कोई हानि नहीं होती, यह उन्होंने समझाया।

कारण-स्वरूप वह ‘नाय’ ही… अन्य कोई कारण-मूल नहीं है… वही है! यह दृष्टि ही अद्वितीय मानकर, इस भावना को समझ पाना संभव हो, तो यह दृष्टि ही ‘एकत्व’ के बोध को जोड़ने वाली है।

निष्कर्ष — राम को मिली शांति

श्रीराम ने यह सारी बातें बड़े ध्यान से सुनीं। उन्होंने समझा कि यह एकमात्र ‘जगत’ अपने ही स्वरूप के प्रतिबिंब के विलास के रूप में फैलकर, किसी वैदिक-वैदांतिक अनुभव के बिना ही, स्वयं में ही प्रकाशित होकर, स्वयं में ही समाया रहता है।

राम ने यह भी समझा कि यह सृष्टि भी ‘प्रधान’ नामक उस अनंत ब्रह्म का ही रूप है, और ‘मैं’ नाम की इस अनुभूति का मूल कारण भी वही अभि-प्रत्यय है, जिसे समझना ही आवश्यक है।

वशिष्ठ मुनि: इन सूत्रों के माध्यम से अभी इतना ही रहस्य समझ में आ जाए तो पर्याप्त है, राम! कर्म के द्वारा ही यह जगत अनुभव में आया है, पर वास्तव में यह सब ब्रह्म ही है।

सृष्टि-क्रम — इच्छा से कर्म तक

चरण स्वरूप भूमिका
1 इच्छा (कामना) प्रेरणा-चरण
2 संकल्प मनोभाव
3 प्रयास क्रिया-प्रेरणा
4 कर्म परिणाम-रूप — जगत

आध्यात्मिक निहितार्थ

इस अध्याय में वशिष्ठ मुनि ने जो सार बताया, वह यही है — जीव सीमित है या असीमित, यह प्रश्न ही व्यर्थ है, क्योंकि सीमितता तो केवल देहाभिमान से उत्पन्न भ्रम मात्र है।

जैसे समुद्र लहरों में बदलकर भी अपना जलत्व नहीं खोता, वैसे ही परब्रह्म अनेक जीव-रूपों में फैलकर भी अपनी अखंडता नहीं खोता। इसी सत्य को समझ लेना ही जीवन्मुक्ति का मार्ग है।

जब भी आपको लगे कि आप किसी सीमा में बँधे हुए हैं, तो याद रखें कि वह सीमा शरीर से जुड़ी हुई है, आपके वास्तविक स्वरूप से नहीं। यही एक बोध आपके मन को अपार स्वतंत्रता देगा।

इस अध्याय का सारांश

श्रीराम ने पूछा कि जीव सीमित है या असीमित, इसका वशिष्ठ मुनि ने गहन उत्तर दिया। जगत और अहंकार, दोनों का जन्म ही नहीं हुआ, इसलिए जो कुछ भी है, वह एक ही ब्रह्म है। जैसे समुद्र लहरों में और आकाश बादलों में बदलता है, वैसे ही परब्रह्म जीव-रूपों में प्रकट होता है। देहाभिमान ही सीमितता का कारण है, वास्तव में जीव और परमात्मा एक ही हैं। सृष्टि इच्छा से संकल्प, प्रयास और कर्म के क्रम में आकार लेती है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: जीव सीमित है या असीमित, यह प्रश्न ही व्यर्थ है — क्योंकि सीमितता केवल देहाभिमान से उत्पन्न भ्रम है; वास्तव में सब कुछ ब्रह्म ही है।
  • तात्विक शिक्षा: जैसे समुद्र अपना जलत्व खोए बिना लहरों में बदल जाता है, वैसे ही परब्रह्म अपना स्वरूप खोए बिना जीव-रूपों में फैल जाता है।
  • अगले अध्याय से संबंध: जीव की सीमितता के इस भ्रम को समझने के बाद, अगले एपिसोड में वशिष्ठ मुनि इस सृष्टि-प्रक्रिया को और भी सूक्ष्मता से, कारण-कार्य संबंधों के साथ स्पष्ट करेंगे।

‘सीमित’ शब्द का प्रमाण शरीर का भेद ही है, और जब शरीर ही भ्रम है, तो सीमितता कहाँ रही?

समुद्र लहरों में बदलकर भी जलत्व नहीं खोता, ब्रह्म जीव-रूपों में बदलकर भी अखंडता नहीं खोता।

इच्छा से संकल्प, संकल्प से क्रिया — इसी क्रम में जगत आकार लेता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या जीव सीमित है या असीमित?

वशिष्ठ मुनि के अनुसार यह प्रश्न ही व्यर्थ है, क्योंकि सीमितता देहाभिमान से उत्पन्न भ्रम मात्र है। वास्तव में जीव स्वयं परब्रह्म ही है, इसलिए सीमितता का कोई अर्थ नहीं रहता।

समुद्र-लहर की उपमा का क्या अर्थ है?

समुद्र अपने जलत्व को छोड़े बिना ही चंचल लहरों का रूप ले लेता है। वैसे ही परम आकाश भी अपने आकाश-स्वरूप को खोए बिना जीव-रूप में प्रकट होता है — यह ब्रह्म के जगत के रूप में प्रकट होने को दर्शाता है।

आदि प्रजापति कौन हैं?

आदि प्रजापति का अर्थ है वह शुद्ध तत्व, जिसमें हर जीव पूर्णतः आत्मा ही है — इसी आत्म-समष्टि-सृष्टि भाव को प्राप्त तत्व को ‘आदि प्रजापति’ कहा गया है।

सृष्टि किस क्रम में होती है?

वशिष्ठ मुनि के अनुसार सृष्टि इच्छा (कामना) से संकल्प, संकल्प से प्रयास, और प्रयास से कर्म के क्रम में आकार लेती है।

देहाभिमान से क्या होता है?

देहाभिमान के कारण ‘मैं’ की अनुभूति उत्पन्न होती है, जिसके चलते जीव जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। यही देहाभिमान जीव को परमेश्वर से अलग दिखाता है।

कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर में क्या भेद है?

वशिष्ठ मुनि के अनुसार इन दोनों के भीतरी तत्वों में कोई वास्तविक भेद नहीं है — केवल ‘मैं’ अनुभव करने वाली भावना के कारण ही जड़त्व और जीवत्व जैसे भेद कल्पित हो जाते हैं।

निष्कर्ष

इन सूत्रों के माध्यम से अभी इतना ही रहस्य समझ में आ जाए तो पर्याप्त है — कर्म के द्वारा ही यह जगत अनुभव में आया है, पर वास्तव में यह सब ब्रह्म ही है, वशिष्ठ मुनि के इस शांत संदेश से श्रीराम का मन भर गया। यह सृष्टि-क्रम वशिष्ठ मुनि आगे और कितनी गहराई से समझाते हैं, यह हम अगले एपिसोड में देखेंगे।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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