मनुष्य अपने सपने में सुख-दुःख को सच क्यों मान लेता है? वसिष्ठ महर्षि इसका उत्तर देते हैं — ब्रह्म स्वयं स्वप्नद्रष्टा बनकर, अपनी ही कल्पना से रचे इस जगत को सत्य मान लेता है, और उसमें उठने वाले सुख-दुःख, मान-अपमान को अपना ही अनुभव समझता है। फिर भी वह कल्पित जगत कभी भी चेतना को, अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं छोड़ता — यही ब्रह्म का नित्य सत्य है।
नींद में देखा गया सपना हमें बिल्कुल सच लगता है, है ना — उसमें हम रोते हैं, डरते हैं, खुश होते हैं, लेकिन जागने के बाद वह सब एक पल में गायब हो जाता है। सपना देखते समय हम उसे सच क्यों मान लेते हैं?
यही प्रश्न श्रीराम वसिष्ठ महर्षि से पूछते हैं। द्वितीयलीला नामक देवी द्वारा सरस्वती देवी की आराधना करके, अपने पति से मिलने के लिए आकाशमार्ग से यात्रा करने की कथा से शुरू हुआ यह संवाद, अंततः ब्रह्म किस तरह जगत के रूप में फैलता है, और वह जगत वास्तव में किस तरह ‘है’ — इस गहन सत्य की ओर बढ़ता है।
द्वितीयलीला के मन में उठी अतृप्ति
श्री वसिष्ठ महर्षि रामचंद्र से कहने लगे — द्वितीयलीला नामक उस देवी ने अपनी पूजा-अर्चना से सरस्वती देवी को प्रसन्न कर लिया था। लेकिन अपने असली स्वरूप को समझने के मामले में उसमें अभी भी कुछ अधूरापन बाकी था। उसकी बुद्धि को और विकसित होने की जरूरत थी।
अपने उसी वासनामय शरीर के साथ पति को साक्षात देखने की इच्छा उसके मन में जाग उठी। शरीर सहित आकाश में एक कोमल पक्षी की तरह उड़ती हुई वह आगे बढ़ी। ‘अब मैं अपने पति को पा लूंगी’ — बस यही एक भाव उसे रोमांचित कर रहा था।
संकल्प के दर्पण में उभरा एक स्त्री-रूप
इस तरह चलते-चलते द्वितीयलीला को एक जगह अपने सामने एक स्त्री दिखाई दी। वह स्त्री कोई और नहीं थी — द्वितीयलीला के अपने ही ‘संकल्प’ नामक दर्पण में, सरस्वती देवी के संकल्प के प्रभाव से प्रतिबिंबित हुआ ‘कुमारी’ नामक एक स्त्री-रूप।
कुमारी का स्वागत, द्वितीयलीला का प्रश्न
उस कुमारी ने द्वितीयलीला को देखकर प्रसन्नता से बोला।
कुमारी: हे स्मृति-देवी की भक्त! सुंदरी! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारे लिए ही सरस्वती देवी की आज्ञा से इस आकाशमार्ग में प्रतीक्षा कर रही थी।
द्वितीयलीला: अरे वाह! तुम मुझसे पहले ही यहाँ आकर प्रतीक्षा कर रही थीं, इसके लिए धन्यवाद। देवांश से उत्पन्न तुम अगर यहाँ न दिखतीं, तो इस विशाल आकाश में मेरी क्या दशा होती, यह कहना मुश्किल था।
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‘महात्माओं का दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता’ — यह सत्य
द्वितीयलीला अपने मन की उतावली रोक नहीं पाई और कुमारी के सामने अपनी इच्छा बेझिझक कह डाली।
द्वितीयलीला: महात्माओं का दर्शन कभी भी निष्फल नहीं जाता — तुम जैसी उत्तम आत्मा का दर्शन यूँ ही नहीं होना चाहिए! मेरे पति कहाँ हैं? मुझे वहाँ तुरंत ले चलो।
कुमारी ने बताया रास्ता — सूक्ष्म शरीर
कुमारी ने उसे रोका और एक सूक्ष्म उपाय समझाया।
कुमारी: इतनी जल्दबाजी मत करो! मैंने स्थूल शरीर की बजाय अत्यंत सूक्ष्म, स्वभाव-सिद्ध आतिवाहिक शरीर, यानी सूक्ष्म शरीर धारण किया हुआ है — इस भावना को तुम दृढ़ता से अपनाओ। इस तरह सूक्ष्म शरीरधारिणी बनकर मेरा अनुसरण करो। तभी मैं तुम्हें तुम्हारे पति के पास ले जा सकूंगी।
ब्रह्मांड-कर्पूर को पार करती यात्रा
यह सुनते ही द्वितीयलीला आतिवाहिक शरीर धारण कर कुमारी का अनुसरण करने लगी। स्मृति-देवी सरस्वती द्वारा भेजी गई वह कुमारी आगे रास्ता दिखाती रही, और द्वितीयलीला ब्रह्मांड जितने विशाल आकाश में प्रवेश कर गई।
धीरे-धीरे दोनों ने मेघमंडल पार किया, फिर वायुमंडल में प्रवेश किया। सूर्यमार्ग को पार किया। नक्षत्रमंडल को लांघा। इंद्र, देवताओं, सिद्धलोक, यहाँ तक कि त्रिमूर्तियों को भी सहजता से पीछे छोड़ दिया। अंततः वे ब्रह्मांड-कर्पूर तक जा पहुँचीं।
बर्फ के टुकड़े को घड़े में रखने पर, घड़े में कोई छेद न होने पर भी बाहर की ओर बर्फ के टुकड़े पानी की बूँदों के रूप में रिसते हैं, है ना! उसी तरह ‘संकल्प-सिद्ध’ द्वितीयलीला ब्रह्मांड से बाहर निकल आई — चित्तमात्र शरीर वाली वह, संकल्पमात्र से उत्पन्न ‘ब्रह्मांडों’ नामक भ्रम को अपने भीतर ही अनुभव कर रही थी, यह समझ लो। हर अनुभव का मूल कारण संस्कार ही होता है।
अनंत ब्रह्मांडों से भरा चिदाकाश
इस तरह उसने ब्रह्मादि सभी लोकों को पार कर लिया। कुमारी देवी के साथ, ब्रह्मांड-कर्पूर — यानी समस्त लोकों के लिए आवश्यक स्थान — को भी पार कर गई। जल आदि सारे आवरणों को भी लांघ लिया। अंतहीन चिदाकाश में प्रवेश किया।
उस चिदाकाश में असंख्य ब्रह्मांड एक-दूसरे से बिना टकराए बिखरे हुए थे। तुमने देखा है ना, एक कीड़ा किस तरह एक बेर के फल में घुस जाता है? ठीक उसी तरह, वहाँ मौजूद असंख्य ब्रह्मांडों में से एक में हमारी द्वितीयलीला और कुमारी प्रवेश कर गईं। उस ब्रह्मांडमंडल के नीचे स्थित पद्मु के राज्य के पास पहुँचीं। धीरे-धीरे अंतःपुर में, पद्मु के भौतिक शरीर वाले कक्ष में प्रवेश किया।
श्रीराम का संदेह — इतनी लंबी अतुलनीय यात्रा?
यह यात्रा-वृत्तांत सुनकर श्रीराम कुतूहल से वसिष्ठ महर्षि की ओर देखने लगे।
श्रीरामचंद्र: क्या परमात्मा की दृष्टि में यह सूक्ष्म यात्रा वाकई इतनी विस्तृत रूप से हुई? गुरुदेव, मेरा एक संदेह दूर कीजिए — क्या वह ‘घर में’ रहते हुए भी अपने पति तक तुरंत पहुँच सकती थी? फिर उसने इतनी लंबी यात्रा क्यों की?
वसिष्ठ की शिक्षा — भावना ही सृष्टि की क्रिया है
वसिष्ठ महर्षि ने करुणापूर्वक इस संदेह का उत्तर दिया।
वसिष्ठ महर्षि: हे रामचंद्र! यह सूक्ष्म शरीर पूरी तरह उसकी भावना से ही बना है। उसके संकल्प में ‘मैं इतनी दूर से नहीं आ रही’ जैसा कोई भाव नहीं था — ‘मैं अपने पति को खोजते हुए आकाशमार्ग से जा रही हूँ’ यही भावना इस पूरी यात्रा को रचती गई। ऐसी भावना ही ब्राह्मी सृष्टि में पूरे संसार को अनुभव में लाती है।
ब्रह्म का स्वयं जगत के रूप में विस्तार
वसिष्ठ महर्षि यहाँ और गहरे सत्य को उजागर करने लगे। सभा में सन्नाटा छा गया, राम की आँखें उत्सुकता से चमक उठीं।
वसिष्ठ महर्षि: ब्रह्म एक ही है। यह सोचना गलत है कि वह समुद्र में घुल जाने जैसा विलीन हो जाता है, या यह कि समुद्र से अलग, द्वितीय कोई और तत्व है। ‘मैं-तुम-वह-यह सब द्रष्टा भी मुझी में है, अलग किसी अस्तित्व वाला ब्रह्म नहीं है’ — ‘मैं, तुम — यहाँ, वहाँ’ यह सब कुछ ब्रह्म ही बना रहता है। तब जो कुछ भी दिखता है, वह सब ब्रह्म ही बना रहता है।
सपना देखने वाला ही सपने का रचयिता है
जैसे कोई अपने सपने में पदार्थ, तुम-मैं-तुम्हारा-मेरा जैसी चीज़ें गढ़ लेता है, है ना! वह स्वयं स्वप्नद्रष्टा होते हुए भी, उस पूरे सपने को रचता हुआ उसका अनुभव पा रहा होता है। उस सपने में पदार्थ-समूह आदि को अपने ही भीतर होने के बावजूद, वह अपने भीतर ही ‘सुख-दुःख, मान-अपमान’ जैसे अनुभवों को अलग समझकर उन्हें भोगता है।
पंचभूतों का सूक्ष्म रूप
ठीक इसी तरह ब्रह्म — जो कि ब्रह्म-प्रकाश स्वरूप ही हैं ऐसे सूक्ष्म भूतों को, पंचभूतों को — द्रव, ठोस, वायु, तेज, आकाश — अपने भीतर ही अनुभव करता है। सूक्ष्म भूत-रूप धारण किए इस ब्रह्म-तत्व को, जल आदि आवरणों के रूप में अनुभव होने वाला यह स्थूलत्व अपनी ही कल्पना-शक्ति से प्राप्त होता है।
उस समय वह ब्रह्म स्वयं को इस ब्रह्मांड-स्वरूप में देखता है। बाहर जो व्यवहार दिखाई देता है, वह वास्तव में असत्य होने के बावजूद अभ्यास के कारण ‘ठोस सत्य’ जैसा प्रतीत होता है। देखो, इस तरह ब्रह्म-तत्व ‘मैं समष्टि-जीव हूँ’ यह सोचकर अपने मनोराज्य को इस ‘ब्रह्मांड’ के रूप में फैला देता है। उसी मनोराज्य को हम ‘जगत’ के नाम से पुकारते हैं।
संकल्प-शक्ति का नियम कभी नहीं टूटता
वसिष्ठ महर्षि ने यहाँ द्वितीयलीला को याद करते हुए कहा।
वसिष्ठ महर्षि: हे प्रिय लीला! यह सब संकल्पमात्र होते हुए भी एक निश्चित ‘संकल्प-शक्ति-नियम’ के अनुसार ही चलता है। यह नियम सृष्टि के आरंभ में जैसा था, वैसा ही आज भी है। चित्तवृत्तियाँ जिस रूप में होती हैं, आत्म-चेतना उसी रूप में प्रकट होती रहती है। इस जगत में एक भी घटना ‘अनियति’ यानी बिना नियम के नहीं घटती।
सोना अपना रूप नहीं छोड़ता
वसिष्ठ ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए आगे कहा।
वसिष्ठ महर्षि: क्या सोना कभी अपना आकार छोड़ता है? नहीं छोड़ता, है ना! यह जगत भी ठीक ऐसा ही है। यह उसी बदलते हुए ब्रह्म के भीतर ही स्थित है। ब्रह्म में ही बसा यह ‘जगत’ प्रलयकाल में भी शून्य नहीं हो सकता। सृष्टि के आरंभ में जो वस्तु जिस रूप में प्रकट हुई थी, वह आज भी वैसी ही है। पानी को जैसे तरंग-रूप स्वाभाविक है, वैसे ही ब्रह्म को जगत-रूप स्वाभाविक है।
बर्फ-ठंडक, आग-गर्मी की तरह चेतना-नियति
वसिष्ठ महर्षि अंत की ओर बढ़ते हुए, एक अंतिम उपमा से इस शिक्षा को दृढ़ किया।
वसिष्ठ महर्षि: जैसे ‘बर्फ-ठंडक’, ‘आग-गर्मी’ साथ-साथ रहते हैं, वैसे ही ‘चेतना-नियति’ भी साथ ही रहते हैं। जहाँ चेतना है, वहाँ सृष्टि भी होती है। आकाश-रूप ही यह पृथ्वी, जल, वायु आदि एक निश्चित नियम के अनुसार सृष्टि के आरंभ में जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं। उनके स्वभाव में तनिक भी बदलाव नहीं आया है।
नित्य-उदित चेतना ही जीव का वास्तविक स्वरूप
वसिष्ठ महर्षि ने अपनी शिक्षा को इस अंतिम घोषणा से पूर्ण किया।
वसिष्ठ महर्षि: इस तरह ये सभी नियम वैसे ही चलते रहते हैं। जन्म-मृत्यु-जीवन का नियम भी बिना बदले इसी तरह चलता रहता है। सभी जीव इसी नियम के अनुसार ही चलते हैं। लेकिन, इस जीव का वास्तविक स्वरूप सभी घटनाओं से परे, वह ‘नित्य-उदित चेतना’ ही है। इसमें संदेह करने योग्य कुछ भी नहीं है।
पंचभूतों का मूल स्वभाव — वसिष्ठ की शिक्षा के अनुसार
| भूत | मूल स्वभाव |
|---|---|
| आकाश (Space) | शून्य-स्वरूप |
| जल (Liquid) | प्रवाहमान स्वभाव |
आध्यात्मिक अंतरार्थ
द्वितीयलीला की आकाश-यात्रा केवल एक कथा नहीं है — यह दर्शाती है कि संकल्प किस तरह अत्यंत शक्तिशाली ढंग से अनुभव को रचता है। उसने ‘मैं दूर की यात्रा कर रही हूँ’ यह सोचा, इसीलिए वह सारी दूरी, वे सारे लोक उसके लिए वास्तविक अनुभव बन गए। ब्रह्म भी ठीक ऐसा ही है — ‘मैं समष्टि-जीव हूँ’ यह सोचने भर से ही यह जगत उसके अपने ही विस्तार के रूप में उत्पन्न हो गया।
जैसे सोना अपना आकार नहीं छोड़ता, वैसे ही ब्रह्म भी अपनी सच्ची सत्ता, अपनी नित्यता, अपनी शाश्वतता को कभी नहीं छोड़ता। जगत दिखे या न दिखे, ब्रह्म वैसा का वैसा ही बना रहता है। जब यह समझ आ जाए, तो हमारे अपने सुख-दुःख भी इसी संकल्प-नियम का हिस्सा हैं, इन्हें नित्य चेतना से अलग करके देखने की जरूरत नहीं है — यह बात स्पष्ट हो जाती है।
हमारे जीवन में उठने वाली हर भावना हमारे ही संकल्प से जन्म लेती है। एक पल रुककर, ‘यह अनुभव मेरी अपनी भावना ही तो है’ यह देख लेना ही सच्चा ध्यान है।
इस अध्याय का सारांश
द्वितीयलीला सरस्वती देवी की आराधना करके, अपने पति को देखने के लिए आकाशमार्ग से यात्रा करती है। रास्ते में उसे कुमारी नामक देवी का साथ मिलता है, जो उसे सूक्ष्म शरीर के माध्यम से यात्रा करने का उपाय बताती है। दोनों सभी लोकों को पार करके, अनंत ब्रह्मांडों में से होते हुए पद्मु के राज्य तक पहुँचती हैं। श्रीराम के संदेह के जवाब में वसिष्ठ बताते हैं कि यह पूरी यात्रा उसके संकल्प से ही संभव हुई, और ब्रह्म स्वयं जगत के रूप में विस्तार पाकर जीव के सारे अनुभव रचता है। सोना अपना आकार न छोड़ने की तरह, ब्रह्म भी अपने नित्य-चेतन स्वरूप को कभी नहीं छोड़ता — यह बात अंत में स्पष्ट की जाती है।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: संकल्प ही अनुभव को रचता है; ब्रह्म स्वयं जगत के रूप में विस्तार पाकर भी अपने नित्य-चेतन स्वरूप को कभी नहीं खोता।
- तात्विक शिक्षा: चेतना और नियति दोनों साथ-साथ ही रहते हैं — बर्फ-ठंडक, आग-गर्मी की तरह। जीव का वास्तविक स्वरूप सभी घटनाओं से परे वह नित्य-उदित चेतना ही है।
- अगले अध्याय से संबंध: द्वितीयलीला के पद्मु के राज्य तक पहुँचने के बाद आगे क्या होता है, यह कथा किस मोड़ पर पहुँचती है — इसका विवरण अगले एपिसोड में वसिष्ठ देंगे।
क्या सोना कभी अपना आकार छोड़ता है? वैसे ही जगत भी ब्रह्म को नहीं छोड़ता।
यह संकल्पमात्र होते हुए भी एक निश्चित नियम का ही पालन करता है।
जीव का वास्तविक स्वरूप सभी घटनाओं से परे वह नित्य-उदित चेतना ही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
योगवासिष्ठ में द्वितीयलीला कौन हैं?
द्वितीयलीला सरस्वती देवी की भक्त एक देवी हैं, जो अपने पति से मिलने की इच्छा से आकाशमार्ग से यात्रा करती हैं, और इसी यात्रा से ब्रह्म के जगत के रूप में विस्तार होने का सत्य सामने आता है।
कुमारी नामक पात्र कौन है, और वह क्यों प्रकट हुई?
कुमारी द्वितीयलीला के अपने संकल्प रूपी दर्पण में सरस्वती देवी के संकल्प के प्रभाव से प्रतिबिंबित हुआ एक स्त्री-रूप है, जो मार्गदर्शक बनकर आई।
सूक्ष्म शरीर क्या होता है?
सूक्ष्म शरीर का अर्थ है स्थूल भौतिक शरीर की बजाय अत्यंत सूक्ष्म, स्वभाव-सिद्ध आतिवाहिक शरीर — इसी के माध्यम से आकाशमार्ग में संचार करना संभव होता है।
ब्रह्म जगत के रूप में कैसे परिवर्तित होता है?
ब्रह्म ‘मैं समष्टि-जीव हूँ’ यह सोचकर अपने मनोराज्य को ब्रह्मांड के रूप में फैला देता है — उसी मनोराज्य को हम ‘जगत’ कहते हैं।
संकल्प-शक्ति का नियम क्या है?
संकल्प-शक्ति का नियम यह है कि चित्तवृत्तियाँ जिस रूप में होती हैं, आत्म-चेतना उसी रूप में प्रकट होती है — इस जगत में एक भी घटना बिना नियम के नहीं घटती।
जीव का वास्तविक स्वरूप क्या है?
जीव का वास्तविक स्वरूप सभी घटनाओं से परे वह नित्य-उदित चेतना ही है — वसिष्ठ ने स्पष्ट किया कि इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।
निष्कर्ष
द्वितीयलीला की यह यात्रा हमें एक गहरा सत्य सिखाती है — हमारा संकल्प ही हमारे अनुभव को रचता है, लेकिन उन अनुभवों के बीच भी नित्य चेतना बिना बदले बनी रहती है। सोना अपना आकार नहीं छोड़ता, वैसे ही ब्रह्म अपना सत्य नहीं छोड़ता — वसिष्ठ की यह बात मन में कितनी गहराई से बैठ जाती है। द्वितीयलीला अपने पति तक पहुँचने के बाद आगे क्या होता है? यह कथा हमें किस दिशा में ले जाएगी?