वासनाएं परलोक यात्रा और पिंडदान का रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-30

योगवाशिष्ठ S3 EP-30: मृत्यु के बाद जीव की गति, वासनाओं की यात्रा और पिंडदान का वास्तविक अर्थ महर्षि वशिष्ठ द्वारा समझाया गया गूढ़ दार्शनिक रहस्य।

क्या मृत्यु के बाद जीव की यात्रा को केवल उसके मन की वासनाएं और संस्कार ही तय करते हैं? योगवाशिष्ठ के अनुसार, जब जीव शरीर का त्याग करता है, तो वह अपनी पूर्व वासनाओं के आधार पर ही विभिन्न लोकों की अनुभूति करता है। संबंधियों द्वारा किया गया पिंडदान और शुभ संकल्प भी उस जीव के विश्वास और भावना-बल के अनुरूप ही फल प्रदान करते हैं।

जब हम अपने किसी प्रियजन को खो देते हैं, तब क्या हमारे द्वारा किए गए शास्त्रोक्त कर्म वास्तव में उन तक पहुंचते हैं? यह संशय कभी न कभी हर मनुष्य के हृदय में अवश्य उठता है। प्राणों के अनंत वायु में विलीन हो जाने के बाद उस जीव की आगे की यात्रा कैसे होती है, यह जानने की जिज्ञासा अत्यंत स्वाभाविक है।

परम सत्य यही है कि हमारे अंतःकरण में छिपे संस्कार और वासनाएं ही मरणोपरांत के लोकों का निर्माण करती हैं। युद्धभूमि में विदूरथ के प्राण छूटने के क्षण से लेकर, सरस्वती और लीला की परलोक यात्रा तथा पिंडदान के पीछे छिपे गूढ़ मर्म को महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम के समक्ष अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रकट किया है।

दिव्यदृष्टि का वरदान और शोक निवारण

ज्ञानरूपा श्री सरस्वती देवी ने लीला से वार्तालाप करते हुए परलोक यात्रा के रहस्य को स्पष्ट करना आरंभ किया। उन्होंने समझाया कि चिन्मय स्वरूप वाला जीव सदा यही मानता रहता है कि वह अत्यंत दूर स्थित किसी परलोक की ओर जा रहा है, किंतु यह सब उसके मन की ही एक धारणा होती है।

देवी ने बताया कि विदूरथ के संदर्भ में भी ठीक यही घटित हो रहा है; वह अपने हृदय में गहराई से अंकित वासना-मार्ग का ही अनुसरण करते हुए आगे बढ़ रहा है। लीला के मन में अपने पति का सामीप्य पाने की उत्कट अभिलाषा थी, जिसे देखकर सरस्वती देवी ने उसे सब कुछ प्रत्यक्ष देखने के लिए दिव्यदृष्टि प्रदान की।

उन पावन वचनों को सुनते ही लीला के हृदय में समाया सारा दुख पूरी तरह विलीन हो गया। अज्ञान का अंधकार छंट गया और उसके अंतःकरण में ज्ञान का दिव्य सूर्य प्रकाशित हो उठा।

श्री सरस्वती देवी: लीला! चिन्मय स्वरूप जीव यह मानते हुए कि वह परलोक जा रहा है, वास्तव में अपने वासना-पथ पर ही गमन करता है। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि प्रदान कर रही हूँ, आओ हम उसी मार्ग पर चलें।

युद्धभूमि में विदूरथ का प्राणोत्क्रमण

उधर रणभूमि में धराशायी हुए राजा विदूरथ का भौतिक देह धीरे-धीरे चेतना खोने लगा। उसकी आंखों की चमक क्षीण हो गई, पुतलियां फिर गईं, होंठ सूख गए, चेहरे का तेज लुप्त हो गया और शरीर सूखे पत्ते की भांति पीला पड़ गया।

प्राणवायु भौरों के समूह की तरह गुंजार करते हुए नासिका छिद्रों के समीप मंडराने लगी। अंगों की सारी हलचल पूरी तरह थम गई। जिस प्रकार कोई पक्षी वृक्ष की डाल को छोड़कर आकाश में उड़ जाता है, ठीक उसी प्रकार प्राणवायु ने उस राजा के नश्वर शरीर का सदा के लिए परित्याग कर दिया।

उस क्षण सरस्वती और लीला दोनों अपनी दिव्यदृष्टि से उस जीव की गति को देखने लगीं। विदूरथ की जीव-चेतना वायु के साथ एकाकार होकर, अपने भीतर की प्रबल वासनाओं के वेग के अनुसार आकाश मार्ग में सुदूर यात्रा करने लगी।

मरणमूर्छा और यमदर्शन का अनुभव

शरीर छोड़ते ही मरणमूर्छा की गहन स्तब्धता में लीन हुई वह जीव-चेतना, कुछ ही क्षणों में सचेत होकर सर्वथा नवीन अनुभवों का साक्षात्कार करने लगी। जिस प्रकार वायु में सुगंध का सूक्ष्म कण समा जाता है, उसी प्रकार आकाश तत्व में रहते हुए भी विदूरथ के मन ने एक विचित्र जगत की रचना कर ली।

उस जीव ने अनुभव किया कि पृथ्वी पर बंधु-बांधवों द्वारा उसके निमित्त और्ध्वदैहिक कर्म और उत्तरक्रियाएं संपन्न करने से उसे सूक्ष्म देह प्राप्त हो गया है। तत्पश्चात उसने देखा कि यमदूत आकर उसे यमराज की पुरी में ले गए हैं और यम की न्यायसभा में प्रस्तुत कर दिया है।

यमराज ने अपने दूतों से कहा कि इस पुण्यात्मा ने जीवन भर कोई पाप नहीं किया और अनन्य भक्ति से सरस्वती देवी की आराधना की है, अतः यह अपने पूर्व जन्म के शरीर यानी राजा पद्म के देह में पुनः प्रवेश करने का सर्वथा अधिकारी है। यह सब उस जीव ने अपनी ही भावना में देखा। उसी क्षण, जैसे किसी यंत्र से छूटा हुआ पत्थर वेग से जाता है, वैसे ही वह जीव-चेतना आकाश मार्ग से होती हुई दूसरे ब्रह्मांड में स्थित राजा पद्म के राजमहल में तीव्रता से पहुंच गई।

यमराज (जीव की भावना में): हे दूतों! इस पुण्यात्मा ने कभी अधर्म का आचरण नहीं किया और यह जगज्जननी की कृपा का पात्र रहा है। इसे पुष्पों से सुरक्षित रखे गए राजा पद्म के शरीर में प्रवेश करने दो।

श्रीराम का संशय – पद्म के देह की प्राप्ति कैसे संभव?

राजसभा में इस वृत्तांत को एकाग्रचित्त होकर सुन रहे श्रीराम ने विस्मय से महर्षि वशिष्ठ की ओर देखा। बहुत समय पूर्व त्यागे गए पूर्व जन्म के शरीर के मार्ग को पहचानकर विदूरथ की चेतना उसमें कैसे प्रवेश कर सकी, यह रहस्य समझ न आने पर उन्होंने महर्षि से प्रश्न किया।

महर्षि ने शांत मुखमंडल के साथ श्रीराम के संशय का निवारण करने की तैयारी की। जीव के अंतःकरण में अंकित संस्कारों का बल कितना असीम और प्रबल होता है, यह सिद्ध करने वाले सत्य को वे सभा के समक्ष प्रकट करने लगे।

श्रीराम: हे ब्रह्मज्ञान के सागर महर्षि वशिष्ठ! विदूरथ की जीव-चेतना पूर्व जन्म के राजा पद्म के भौतिक देह वाले राजमहल को इतनी सटीकता से कैसे पहचान पाई? वह उस मार्ग में कैसे प्रविष्ट हुई?

मिट्टी के बीज का दृष्टांत – वासनाओं का विस्तार

महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम की ओर करुणाभरी दृष्टि से देखते हुए उत्तर दिया। विदूरथ की जीव-चेतना में पूर्व वासना के बल से ‘मैं ही पद्म हूँ’ यह सूक्ष्म अहंकार विद्यमान था। इसी कारण वह चेतना स्वाभाविक रूप से उस देह वाले राजमहल की ओर आकर्षित हो गई।

मिट्टी के एक छोटे से बीज में शाखाओं और जटाओं से युक्त विशाल वटवृक्ष सूक्ष्म रूप में समाया रहता है। अनुकूल देश, काल, मिट्टी और जल मिलते ही वही बीज एक विराट वृक्ष के रूप में प्रकट हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जीव के हृदय में स्थित वासनाओं को जब कोई प्रेरक निमित्त मिलता है, तो वे पूरे लोकों के रूप में विस्तृत हो जाती हैं।

जैसे बीज में अंकुर और हृदय में स्वप्न छिपा रहता है, वैसे ही चित्-स्वरूप जीव अपनी ही भावना के द्वारा अपने भीतर तीनों लोकों की रचना करके उनका अनुभव करता है। वास्तव में जीव का न कोई जन्म होता है और न कोई मृत्यु; यह सब केवल वासना जनित भ्रांति मात्र है।

महर्षि वशिष्ठ: हे राम! जैसे बीज में महावृक्ष छिपा रहता है, वैसे ही जीव के भीतर संपूर्ण जगत वासना के रूप में स्थित होता है। जब उन वासनाओं को उद्बोधन मिलता है, तो वे स्पष्ट अनुभवों के रूप में विकसित हो जाती हैं। यह जन्म-मरण का चक्र केवल एक भ्रम ही है।

पिंडदान पर श्रीराम का तार्किक प्रश्न

महर्षि की गूढ़ व्याख्या सुनकर श्रीराम के मन में एक और गंभीर धर्म-संशय उत्पन्न हुआ। जब सब कुछ जीव के संस्कार-बल से ही घटित होता है, तो क्या मृत व्यक्ति के लिए संबंधियों द्वारा किए जाने वाले पिंडदान से वास्तव में कोई फल प्राप्त होता है, यह उन्होंने पूछा।

स्थूल शरीर से रहित मृत जीव को पृथ्वी पर जीवित मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले शास्त्रोक्त कर्म किस प्रकार लाभ पहुंचाते हैं, इसे स्पष्ट करने की श्रीराम ने विनम्र प्रार्थना की।

श्रीराम: हे महर्षि! जब सब कुछ केवल संस्कारों का ही प्रभाव है, तो यह क्यों कहा जाता है कि संबंधियों द्वारा दिए गए पिंडदान से मृतक को नवीन शरीर प्राप्त होता है? क्या उनका किया हुआ कर्म मृत जीव को वास्तव में प्राप्त होता है? वह उस तक कैसे पहुंचता है?

भावना-बल और गरुड़ोपासक का दृष्टांत

महर्षि वशिष्ठ ने मंद मुस्कान के साथ इस गूढ़ रहस्य का उद्घाटन किया। बाहर से पिंड अर्पित किया गया हो या न किया गया हो, यदि मृतक यह भावना कर ले कि ‘मुझे पिंड प्राप्त हो गया है’, तो उसे उसका फल अवश्य मिल जाता है। चित्त जिस रूप की भावना करता है, जीव वही रूप धारण कर लेता है।

इस सृष्टि की समस्त वस्तुएं भावना के बल से ही सत्य के समान अनुभूत होती हैं। गरुड़ोपासक के दृष्टांत द्वारा महर्षि ने समझाया कि तीव्र भावना-बल से विष को भी अमृत में बदला जा सकता है। सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति चाहे कितनी भी दूर क्यों न हो, एक सिद्ध गरुड़ोपासक अपनी दृढ़ भावना के बल से उसके विष के प्रभाव को नष्ट कर देता है।

बिना किसी कारण के किसी के मन में कोई भावना उत्पन्न नहीं होती। सबका मूल अधिष्ठान परब्रह्म ही है। उसी परब्रह्म के आधार पर मन सत्य और असत्य तथा कार्य और कारण की कल्पना करके उनका अनुभव करता है।

महर्षि वशिष्ठ: हे राम! चित्त जैसी भावना में रहता है, जीव वैसा ही रूप प्राप्त कर लेता है। जैसे गरुड़ोपासक अपने संकल्प-बल से दूर स्थित विष को भी हर लेता है, वैसे ही भावना-बल असत्य को भी सत्य की भांति अनुभूत करा देता है।

नास्तिक जीव बनाम संबंधियों का धर्म-संकल्प

श्रीराम ने एक और जटिल प्रश्न रखा। यदि ‘मेरे लिए कोई श्राद्ध या पिंडदान नहीं करेगा’ ऐसा मानने वाला कोई नास्तिक जीव मर जाए, और उसके संबंधी शास्त्रोक्त विधि से गोदान और भूदान करें, तो क्या उसका फल उस जीव को मिलेगा या नहीं?

इस पर महर्षि वशिष्ठ ने अत्यंत स्पष्ट और शास्त्रसम्मत निर्णय दिया। संबंधियों द्वारा धर्म-भावना से, शास्त्रविहित मंत्र, द्रव्य और काल के नियमों का पालन करते हुए किए गए दान-पुण्य निश्चय ही शुभ फल प्रदान करते हैं।

मृतक की अपनी कल्पित वासना की तुलना में शास्त्रप्रमाण से युक्त संबंधियों का शुभ संकल्प अत्यंत प्रबल होता है। किंतु यदि मृतक शास्त्रों से घोर द्वेष करने वाला परम नास्तिक रहा हो, तो उसका अपना नकारात्मक संकल्प ही अधिक प्रभावी हो जाता है। दोनों पक्षों में से जिसका संकल्प-बल अधिक प्रबल होगा, विजय उसी की होती है।

श्रीराम: हे महर्षि! जो जीव यह मानता हो कि उसके लिए कोई कर्म नहीं करेगा, उसके निमित्त यदि संबंधी सत्संकल्प से दान करें, तो कौन सा बल अधिक प्रभावी होगा? उस मृतक को फल कैसे प्राप्त होगा?

महर्षि वशिष्ठ: हे राम! मृतक का संकल्प-बल और संबंधियों का शास्त्रीय शुभ संकल्प-बल — इन दोनों में से जो भी अधिक प्रबल होगा, वही दूसरे को पराजित कर देगा। इसीलिए ‘इस प्रेत का कल्याण हो!’ ऐसे उदात्त संकल्प के साथ धर्मकर्मों का अनुष्ठान करना सर्वदा श्रेयस्कर है।

वासनाएं, मरणोपरांत गति और पिंडदान के तत्व का विश्लेषण

विषय योगवाशिष्ठ का दार्शनिक सिद्धांत
परलोक यात्रा यह कोई भौतिक यात्रा नहीं है; यह केवल जीव के आंतरिक संस्कारों और मन की वासनाओं का विस्तार है।
बीज और महावृक्ष का दृष्टांत जैसे बीज में वृक्ष समाया रहता है, वैसे ही जीव के चित्त में संपूर्ण संसार चक्र और विभिन्न लोक वासना रूप में स्थित हैं।
पिंडदान का रहस्य बाह्य कर्मकांड से अधिक महत्वपूर्ण ‘मुझे पिंड प्राप्त हुआ’ यह जीव का भाव और संबंधियों का शास्त्रीय संकल्प है।
गरुड़ोपासक का दृष्टांत जिस प्रकार तीव्र भावना-बल से विष अमृत बन जाता है, उसी प्रकार मन अभाव को भी भाव में रूपांतरित कर देता है।
संकल्पों का संघर्ष यदि मृतक की नास्तिक वासना की तुलना में संबंधियों का शास्त्रोक्त धर्म-संकल्प अधिक प्रबल हो, तो शुभ फल प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक अंतर्गूढ़ भाव

यह अध्याय मृत्यु और श्राद्ध कर्मों के पीछे छिपे गहन मनोविज्ञान और चेतना के परम रहस्य को उद्घाटित करता है। मृत्यु के पश्चात जीव किसी सुदूर लोक की यात्रा पर नहीं जाता; वह तो अपने ही मन में संचित संस्कारों को एक चलचित्र की भांति प्रत्यक्ष करते हुए उनका अनुभव करता है।

जीवित रहते हुए हम जैसी वासनाओं और विचारों का पोषण करते हैं, मृत्यु के समय वही वासनाएं एक नए संसार के रूप में हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं। इसी प्रकार पितृकर्म केवल यांत्रिक अनुष्ठान नहीं हैं; वे प्रियजनों के पवित्र और प्रेमपूर्ण संकल्प की तरंगें हैं। शुद्ध भाव से की गई प्रार्थना चेतना के स्तर पर मृतक की आत्मा को परम शांति प्रदान करती है।

अपने दैनिक जीवन में निर्मल, निस्वार्थ और शुभ संकल्पों को धारण करने का अभ्यास कीजिए। हमारे विचार ही हमारे भविष्य और लोकों का निर्माण करते हैं, इस सत्य को समझकर हर क्षण शांत और पवित्र भावों के साथ जिएं।

इस अध्याय का सारांश

श्री सरस्वती देवी द्वारा दिव्यदृष्टि प्रदान किए जाने से लीला का सारा शोक दूर हो गया। रणभूमि में राजा विदूरथ के प्राण छूटे और वासना के वेग से वे राजा पद्म के शरीर में कैसे प्रविष्ट हुए, इसका महर्षि वशिष्ठ ने विशद वर्णन किया। जैसे बीज में वृक्ष छिपा रहता है वैसे ही जीव में संपूर्ण लोक समाए हैं, और पिंडदान का फल जीव के भावना-बल तथा संबंधियों के शास्त्रीय शुभ संकल्प पर निर्भर करता है, यह तत्व महर्षि ने प्रतिपादित किया।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: जीव की मरणोपरांत गति को कोई बाहरी स्थान नहीं, बल्कि उसके अंतःकरण की वासनाएं और संकल्प-बल ही निर्धारित करते हैं।
  • तात्विक शिक्षा: चित्त जिस रूप की भावना करता है, चेतना वैसा ही रूप धारण कर लेती है। यह संपूर्ण जगत केवल हमारे आंतरिक संस्कारों का ही प्रतिबिंब है, उससे भिन्न कुछ नहीं।
  • अगले अध्याय से संबंध: वासना-बल किस प्रकार भौतिक देह की सीमाओं को पार कर जाता है, यह जानने के बाद, जब वह जीव राजा पद्म के शरीर में पुनः जागृत होगा, तब उस राजभवन में क्या अद्भुत घटनाएं घटेंगी, इसका उद्घाटन अगले अध्याय में होगा।

चित्त जिस भाव में स्थित होता है, जीव भी उसी रूप को धारण कर लेता है।

जैसे बीज में अंकुर छिपा होता है, वैसे ही हृदय में तीनों लोक समाए हुए हैं।

मृतक की वैयक्तिक भावना की तुलना में शास्त्रीय धर्म-संकल्प कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या पिंडदान वास्तव में मृत जीव तक पहुंचता है?

हाँ, जब मृत जीव का भावना-बल और संबंधियों का शास्त्रसम्मत शुभ संकल्प एकाकार होते हैं, तो पिंडदान का प्रभाव उस सूक्ष्म शरीर को निश्चित रूप से शांति प्रदान करता है।

मृत्यु के पश्चात जीव परलोक कैसे जाता है?

जीव भौतिक रूप से कहीं बाहर यात्रा नहीं करता; वह अपने हृदय में संचित पूर्व वासनाओं और संस्कारों के आधार पर ही उन लोकों की मानसिक अनुभूति करता है।

गरुड़ोपासक के उदाहरण से वशिष्ठ जी ने क्या सिद्ध किया?

उन्होंने यह सिद्ध किया कि संकल्प और भावना के बल से दूर स्थित विष के प्रभाव को भी नष्ट किया जा सकता है, अर्थात मन की दृढ़ भावना असत्य को भी सत्य में बदल देती है।

क्या नास्तिक मृतक के लिए संबंधियों द्वारा किया गया श्राद्ध फल देता है?

यदि मृतक के नास्तिक भाव की तुलना में संबंधियों का शास्त्रीय धर्म-संकल्प अधिक बलवान हो तो श्राद्ध अवश्य फल देता है; जो भी संकल्प अधिक शक्तिशाली होगा, वही प्रभावी रहता है।

विदूरथ की चेतना राजा पद्म के शरीर तक कैसे पहुंची?

उसके अंतःकरण में ‘मैं ही पद्म हूँ’ यह पूर्व वासना संस्कार रूप में विद्यमान थी, जिसके जाग्रत होते ही वह जीव-चेतना सरलता से पद्म के शरीर की ओर आकर्षित होकर उसमें प्रविष्ट हो गई।

निष्कर्ष

जीव के समस्त सांसारिक बंधनों और मरणोपरांत के अनुभवों का मूल कारण उसके चित्त में स्थित वासनाएं ही हैं। महर्षि वशिष्ठ के उपदेशानुसार शुभ संकल्पों के द्वारा अशुभ वासनाओं पर विजय पाना ही मोक्ष का सच्चा मार्ग है। अब देखना यह है कि पद्म के शरीर में प्रविष्ट हुई वह जीव-चेतना जब पुनः जागृत हुई, तब उस राजप्रासाद में क्या अलौकिक दृश्य उपस्थित हुआ?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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