मृत्यु के बाद जीवात्मा का क्या होता है? प्रेतस्थिति का रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-29

मृत्यु के बाद जीवात्मा का क्या होता है? स्थूलपापी से उत्तमधर्मी तक 6 प्रेतस्थितियों का रहस्य योगवाशिष्ठ S3 EP-29 में विस्तार से समझें।

मृत्यु के बाद जीवात्मा की यात्रा कैसे आगे बढ़ती है, योगवाशिष्ठ इसका अत्यंत स्पष्ट वर्णन करता है। देह त्यागने के बाद जीव अपनी वासनाओं और कर्मों की तीव्रता के अनुसार स्थूलपापी से लेकर उत्तमधर्मी तक छह प्रकार की अवस्थाएं प्राप्त करता है, और अंततः यह ज्ञान कराता है कि यह सब केवल चित्त का भ्रम मात्र है।

प्राण छूटने के बाद क्या होता है, यह भय और जिज्ञासा हर मनुष्य के अंतःकरण को जीवन में कभी न कभी अवश्य झकझोरती है। जब सारे रिश्ते, धन-संपदा और यह भौतिक शरीर यहीं छूट जाते हैं, तब सूक्ष्म रूप से शेष बची हमारी चेतना किस दिशा में जाती है, इस प्रश्न का उत्तर हर कोई खोजना चाहता है।

योगवाशिष्ठ में देवी सरस्वती रानी लीला को कर्मफल और मृत्यु के बाद की विभिन्न अवस्थाओं का अत्यंत सजीव बोध करा रही हैं। पाप और पुण्य की वासनाओं के अनुसार जीवात्मा किन-किन चरणों से गुजरती है और इन भ्रमों के पीछे छिपा परम सत्य क्या है, इसका स्पष्ट उद्घाटन यहाँ किया गया है।

मृत्युपरांत छह प्रेतस्थितियों का विभाजन

देवी सरस्वती ने लीला को संबोधित करते हुए मृत्यु के गूढ़ रहस्यों का सविस्तार वर्णन करना आरंभ किया। भौतिक देह त्यागने के उपरांत जीवात्मा की जो सूक्ष्म चैतन्य अवस्था शेष रह जाती है, शास्त्रों में उसे ही ‘प्रेत’ कहा गया है। मनुष्य द्वारा जीवनकाल में किए गए कर्मों और उसके चित्त में संचित वासनाओं की तीव्रता के आधार पर यह प्रेतस्थिति छह भिन्न रूपों में प्रकट होती है।

ये छह स्थितियाँ कोई बाहरी लोक मात्र नहीं हैं, अपितु जीवात्मा के अपने अंतःकरण में जमी हुई भावनाओं और संस्कारों के प्रत्यक्ष प्रतिबिंब हैं। देवी ने स्पष्ट किया कि घोर क्रूरता से लेकर परम पावन धर्म तक, प्रत्येक कर्म अपनी एक स्वतंत्र अनुभव-सृष्टि की रचना करता है।

देवी सरस्वती: लीला! देह त्यागने पर जीवात्मा की जो अवस्था शेष रहती है, उसे प्रेत कहते हैं। कर्मों की तीव्रता के अनुसार वे स्थितियाँ छह प्रकार की होती हैं, इन्हें ध्यानपूर्वक सुनो।

स्थूलपापी का पतन और दीर्घकालीन मूर्च्छा

प्रथम श्रेणी में वे स्थूलपापी आते हैं जिन्होंने अत्यंत जघन्य दुष्कर्म किए हैं और जिनके हृदय में दया का सर्वथा अभाव रहा है। प्राण त्यागते ही ऐसे पापी एक भारी शिला की भाँति पूर्ण जड़ता और गहरी मृत्यु-मूर्च्छा में समा जाते हैं। चेतना से शून्य यह अचेत अवस्था बहुत लंबे काल तक इसी प्रकार जमी रहती है।

कालांतर में जब वे इस मूर्च्छा से जागते हैं, तो उनकी दुष्प्रवृत्तियाँ और कुसंस्कार भयानक नरक-यातनाओं के रूप में उन पर टूट पड़ते हैं। वे सैकड़ों जन्मों और अनगिनत अधम योनियों में भटकते हुए अपार दुःख भोगते हैं। उनमें से कई तो मृत्यु-मोह शांत होने पर ‘मैं एक वृक्ष हूँ’ ऐसा मानकर वृक्ष आदि जड़ रूपों में आबद्ध होकर पृथ्वी पर नाना योनियों में भटकते रहते हैं।

देवी सरस्वती: महान दुष्कर्म करने वाला स्थूलपापी पाषाण के समान जड़ होकर लंबे समय तक मृत्यु-मूर्च्छा में पड़ा रहता है। तत्पश्चात नरक की यातनाएं भोगते हुए अंततः वृक्ष आदि योनियों में भटकता है।

मध्यम और सामान्य पापियों की गति

दूसरों से विश्वासघात करने और निर्दोषों को पीड़ा पहुँचाने जैसे मध्यम श्रेणी के पाप करने वालों को मध्यम पापी माना जाता है। ये भी मृत्यु के बाद कुछ काल तक पाषाणवत जड़ता को प्राप्त होते हैं, और उसके बाद पशु तथा अन्य वन्य जीवों की योनियों में प्रवेश कर उन शरीरों में भटकते रहते हैं।

वहीं दूसरी ओर, जिन्होंने केवल अल्प पाप किए हैं, वे सामान्य पापी आतिवाहिक देह धारण कर स्वप्नवत् संकल्पों के साथ जन्म-मरण के चक्र में घूमते रहते हैं। ‘यह वस्तु मिल जाए तो सुखी हो जाऊँगा, वह प्राप्त कर लूँ तो धन्य हो जाऊँगा’—इस प्रकार मृगतृष्णा के पीछे दौड़ने वाले हिरणों की भाँति वे निरंतर भ्रामक आशाओं के पीछे भागते हुए शोकग्रस्त रहते हैं।

देवी सरस्वती: सामान्य पापी मृगमरीचिका के पीछे भागने वाले अज्ञानी मृगों की तरह भ्रांतिपूर्ण आशाओं के पीछे दौड़ते रहते हैं और कभी वास्तविक शांति प्राप्त नहीं कर पाते।

सामान्य धर्मी और मध्यम धर्मी के अनुभव

अल्प मात्रा में धर्म का आचरण करने वाला सामान्य धर्मी भी कई बार जन्म और मृत्यु के चक्र से गुजरता है, किंतु अपने पुण्यबल के कारण उसे क्रमशः धन-संपत्ति और शास्त्र-सम्मत सत्कर्मों के प्रति स्वाभाविक रुचि प्राप्त होती है। परोपकार करने और स्वधर्म का पालन करने की निष्ठा उसके भीतर सुदृढ़ होती जाती है।

वहीं मध्यम स्तर के धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करने वाला मध्यम धर्मी मृत्यु के उपरांत आकाश की सूक्ष्म वायु द्वारा उच्च लोकों में पहुँचाया जाता है। वहाँ वह किन्नर, किंपुरुष और यक्ष शरीर धारण कर अपने पुण्यों का सुखद उपभोग करता है। जब वह पुण्य क्षीण हो जाता है, तब वह वहाँ से गिरकर अन्न-धान्य के रसों के माध्यम से किसी योग्य श्रेष्ठ मनुष्य के हृदय और वीर्य में प्रवेश करता है, और पुनः स्त्री-गर्भ से जन्म लेता है।

देवी सरस्वती: मध्यम धर्मी स्वर्गादि लोकों में पुण्यफल समाप्त होते ही पुनः अन्न के रसों के माध्यम से मानव-गर्भ में पहुँचकर नया जन्म प्राप्त करता है।

उत्तमधर्मी की यात्रा और अटल कर्म-नियम

महान पुण्यात्मा उत्तमधर्मी जीव मृत्यु के उपरांत अपने प्रबल शुभ संस्कारों के प्रभाव से स्वर्गलोक, विद्याधर पुरी तथा इलावृत्त में दिव्य देव-रूप धारण कर श्रेष्ठतम सुख भोगते हैं। तदुपरांत वे सर्व-सुलभ संपदाओं और सत्पुरुषों से युक्त पवित्र कुलों में मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं। पूर्वजन्म के पावन संस्कारों के कारण वे पुनः स्वाभाविक रूप से तप, ध्यान और त्याग के मार्ग पर प्रवृत्त होते हैं।

देवी सरस्वती ने स्पष्ट किया कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में हर किसी को इस कर्म-नियम के अधीन रहना ही पड़ता है। जिस प्रकार पैर का अँगूठा किसी कठोर शिला से टकराने पर चोट लगना एक स्वाभाविक सत्य है, उसी प्रकार पाप से दुःख, पुण्य से सुख और आत्मज्ञान से मोक्ष मिलना भी अटल और शाश्वत नियम है। ब्रह्मा और रुद्रादि देव भी इस कर्म-सिद्धांत का उल्लंघन नहीं कर सकते।

देवी सरस्वती: पैर का अँगूठा शिला से टकराने पर आघात लगना जितना निश्चित है, पाप से दुःख, पुण्य से सुख और ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होना भी उतना ही अकाट्य सत्य है!

मृत्यु-मूर्च्छा से यमपुरी की अनुभूतियों तक

देहपात के समय उत्पन्न हुई मृत्यु-मूर्च्छा से जब जीवात्मा जागती है, तो उसे ‘हाय! मैं मर गया’ ऐसा प्रबल भ्रम होता है। परिजनों द्वारा दिए जाने वाले पिंडदान और श्राद्ध-तर्पण आदि से उसे लगता है कि उसे पुनः नया शरीर मिल गया है, और वह विचित्र अनुभूतियों से घिर जाती है। अपने द्वारा किए गए पूर्व दुष्कर्मों को याद कर वह भय से कांपने लगती है।

दुष्कर्मी जीव यह कल्पना करता है कि यमदूत काले पाशों से उसे घसीटते हुए ले जा रहे हैं, और वह असिपत्र वन जैसे आरी जैसे धारदार पत्तों वाले नरकों तथा बर्फ के गड्ढों में गिर रहा है। वहीं पुण्यात्मा जीव स्वयं को शीतल, हरी-भरी दूब से ढके सुंदर मार्गों से यमपुरी जाते हुए और धर्मराज द्वारा अपने सत्कर्मों की प्रशंसा पाते हुए अपने ही हृदय में अनुभव करता है। ये समस्त स्वर्ग और नरक जीव के अपने ही चित्त में प्रतिबिंबित होने वाले दृश्य मात्र हैं।

देवी सरस्वती: पाप और पुण्य के ये समस्त अनुभव देह त्यागने के स्थान पर ही उनकी अपनी भावना-शक्ति द्वारा अनुभूत किए जाते हैं।

जीवात्मा के निरंतर आत्मनिरीक्षण के तीन सूत्र

संसार के इन अंतहीन दुःखों से मुक्त होने के लिए देवी सरस्वती ने प्रत्येक जीव को निरंतर अंतर्मुखी होकर स्वयं की परीक्षा करने हेतु तीन स्वर्णिम सूत्र प्रदान किए। पहला सूत्र यह है कि व्यक्ति प्रतिक्षण यह परखे कि वह जो आचरण कर रहा है, क्या वह श्रेष्ठ धर्म है अथवा दूसरों को कष्ट देने वाला दुष्कर्म?

दूसरा सूत्र यह है कि वह देखे कि कहीं वह राग-द्वेष के वशीभूत होकर अपने लिए नए दुःखों को तो आमंत्रित नहीं कर रहा है? तीसरा सूत्र यह है कि क्या वह इस अत्यंत दुर्लभ मानव देह और अमूल्य समय को आलस्य में नष्ट किए बिना आत्म-विचार में लगा रहा है? जब यह सजगता बनी रहती है, तभी मनुष्य पतन से बचकर सन्मार्ग पर अडिग रह सकता है।

देवी सरस्वती: क्या मैं श्रेष्ठ कर्मों का आश्रय ले रहा हूँ? क्या राग-द्वेष को जीत रहा हूँ? क्या समय का सदुपयोग कर रहा हूँ?—जो प्रतिक्षण स्वयं से यह पूछता है, वही सच्चा विवेकी है।

संसार-चक्र और आत्मस्वरूप की उपलब्धि

यमपुरी पहुँची जीवात्मा वहाँ अपने दंड अथवा सुख-भोग पूर्ण होते ही पुनः भूख और प्यास की वासना के साथ अन्न के दानों में प्रविष्ट होती है, और पुरुष के वीर्य के माध्यम से स्त्री के गर्भ में प्रवेश करती है। वहाँ शिशु रूप में जन्म लेकर, चंचल बाल्यावस्था और युवावस्था को पार करती हुई वह वृद्धावस्था, व्याधि और मृत्यु के अंतहीन चक्र में पुनः घूमने लगती है।

जिस प्रकार कोई पक्षी प्रातःकाल अपना घोंसला छोड़कर उड़ जाता है और दिनभर भटकने के बाद सायंकाल पुनः अपने नीड़ में लौट आता है, उसी प्रकार अज्ञानवश संसार में अनगिनत जन्मों तक भटकने के बाद भी जीवात्मा किसी दिन सद्गुरु के वचनों के मनन और सूक्ष्म आत्म-विचार द्वारा आकाश के समान निर्मल अपने सहज आत्मस्वरूप को पहचानकर मुक्त हो जाती है।

देवी सरस्वती: जिस प्रकार पक्षी दिनभर विचरण कर सायंकाल अपने घोंसले में लौट आता है, उसी प्रकार जीव भी अंततः अपने सहज सिद्ध आत्मस्वरूप को प्राप्त कर शांत होता है।

चित्त की संकीर्णता और विदूरथ के अंतिम क्षण

यद्यपि यह चित्त सर्वव्यापी सामर्थ्य रखता है, तथापि जिस प्रकार वायु में गति और अग्नि में ताप उसका स्वाभाविक धर्म है, उसी प्रकार स्वयं को सीमित कर लेना चित्त का स्वभाव बन गया है। स्पंदन और अस्पंदन—इन दो प्रवृत्तियों के आधार पर ही यह संपूर्ण चर और अचर जगत के रूप में भासित हो रहा है। यह जानना आवश्यक है कि चैतन्य सत्ता में यह सारा प्रपंच किरणों की भाँति केवल एक आभास मात्र है।

तभी देवी सरस्वती ने लीला को युद्धभूमि की ओर संकेत करते हुए दिखाया। वहाँ पूर्वजन्म का राजा पद्म ही विदूरथ के रूप में बाणों की वर्षा से विदीर्ण होकर भूमि पर मृतप्राय पड़ा था। उसके प्राण शरीर छोड़कर, पुष्पों से आच्छादित राजा पद्म के शव के हृदय-कमल में प्रविष्ट होने ही वाले थे। तब प्रबुद्ध लीला ने विस्मयचकित होकर पूछा, ‘हे माँ! यह जीव अब किस मार्ग से उस देह तक जाएगा? क्या हम भी इसके पीछे-पीछे चलकर उस यात्रा को देख सकती हैं?’

देवी सरस्वती: लीला! युद्धभूमि में विदूरथ देह त्यागकर राजा पद्म के मृत शरीर के हृदय में प्रवेश करने जा रहा है, ध्यान से देखो।

प्रबुद्ध लीला: माँ! यह अब किस मार्ग का अनुसरण करके यात्रा करेगा? क्या हम भी इसके पीछे चलकर उस यात्रा को देख सकती हैं?

छह प्रेतस्थितियाँ और उनके परिणाम

जीवात्मा का वर्ग मृत्युपरांत की प्राथमिक स्थिति प्राप्त होने वाला अगला जन्म / गति
स्थूलपापी शिला के समान दीर्घकालीन मृत्यु-मूर्च्छा घोर नरक-यातनाएँ तथा वृक्ष आदि स्थावर जन्म
मध्यम पापी कुछ समय तक पाषाणवत जड़ता पशु, पक्षी और अन्य तिर्यक योनियाँ
सामान्य पापी आतिवाहिक देह में स्वप्नवत् संकल्प अतृप्त वासनाओं से युक्त निरंतर संसारी जन्म
सामान्य धर्मी सामान्य मरणोपरांत अवस्था धन-धान्य और शास्त्र-निष्ठा से युक्त मानव जन्म
मध्यम धर्मी किन्नर, यक्ष आदि दिव्य शरीरों की प्राप्ति पुण्य क्षय होने पर अन्न-रस द्वारा पुनर्जन्म
उत्तम धर्मी स्वर्ग, विद्याधर व इलावृत्त के दिव्य भोग सत्कुलों में जन्म, स्वाभाविक तप व वैराग्य

आध्यात्मिक भावार्थ

मृत्यु के बाद अनुभूत होने वाले स्वर्ग और नरक आकाश में किसी सुदूर स्थान पर स्थित नहीं हैं। जीवित रहते हुए हमारे मन पर जो वासनाएँ और विचार अंकित हो जाते हैं, वे ही मृत्यु-मूर्च्छा के पश्चात स्वप्न-सृष्टि की भाँति हमारे सम्मुख प्रत्यक्ष हो उठते हैं।

चित्त अपनी अनंत शक्ति को स्वयं ही संकुचित करके सीमाओं में बाँध लेता है, और इसी कारण यह जन्म-मरण का भ्रम उत्पन्न होता है। जिस प्रकार वायु में स्पंदन स्वाभाविक है, उसी प्रकार चित्त में परिमितता की भ्रांति आ गई है। इस मायावी दृश्य को पहचानकर अपने नित्य आत्मस्वरूप में स्थित होना ही मुक्ति का एकमात्र मार्ग है।

हमारा प्रत्येक कर्म और मन में पोषित प्रत्येक विचार हमारी भावी चेतना का निर्माण कर रहा है। किसी को कष्ट न पहुँचाना, अमूल्य समय को व्यर्थ न गँवाना और प्रतिक्षण आत्मनिरीक्षण करना ही चित्त की वास्तविक शांति की आधारशिला है।

इस अध्याय का सारांश

देवी सरस्वती ने रानी लीला को जीवात्मा की छह प्रेतस्थितियों का विस्तार से बोध कराया। घोर पापी पाषाणवत मूर्च्छा पाकर नरक और वृक्ष योनियों में भटकते हैं। मध्यम और सामान्य पापी पशु योनियों तथा वासनामय संसारी जन्मों को प्राप्त होते हैं। पुण्यात्मा अपने पुण्यों के अनुसार यक्ष और देव-भोग भोगकर पुनः सत्कुलों में जन्म लेते हैं। पाप से दुःख, पुण्य से सुख और ज्ञान से मोक्ष मिलना सृष्टि का अटल नियम है। अंत में विदूरथ द्वारा देह त्यागकर राजा पद्म के शरीर में प्रवेश करने की घटना के साथ यह संवाद आगे बढ़ता है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: जीवात्मा के अपने संकल्प और वासनाएँ ही मरणोपरांत की गति निर्धारित करते हैं; केवल आत्मज्ञान ही इस जन्म-मरण के चक्र को समाप्त कर सकता है।
  • तात्विक शिक्षा: पाप से दुःख, पुण्य से सुख और ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होना एक ऐसा सार्वभौमिक नियम है जिससे ब्रह्मा और रुद्र भी परे नहीं हैं।
  • अगले अध्याय से संबंध: विदूरथ की सूक्ष्म चेतना युद्धभूमि से राजा पद्म के मृत शरीर में किस मार्ग से प्रवेश करती है और लीला-सरस्वती उसका अनुसरण कैसे करती हैं, यह अगले प्रसंग में उद्घाटित होगा।

जिस प्रकार पैर का अँगूठा शिला से टकराने पर आघात लगना निश्चित है, उसी प्रकार कर्म का फल मिलना भी उतना ही अकाट्य सत्य है।

पक्षी दिनभर आकाश में विचरण करने के बाद सायंकाल जैसे घोंसले में लौट आता है, वैसे ही जीव को भी अंततः अपनी आत्मा में ही विश्राम पाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शास्त्रों में प्रेतस्थिति किसे कहा गया है?

स्थूल शरीर त्यागने के उपरांत जीवात्मा की जो सूक्ष्म चैतन्य अवस्था शेष रह जाती है, उसे ही शास्त्रों में प्रेतस्थिति कहा गया है।

घोर पाप करने वाले जीवों की मृत्यु के बाद क्या गति होती है?

स्थूलपापी पाषाण के समान लंबी मूर्च्छा में पड़े रहते हैं, जिसके बाद वे घोर नरक-यातनाएँ और वृक्ष आदि जड़ योनियाँ प्राप्त करते हैं।

कर्म-सिद्धांत का सबसे अटल और शाश्वत नियम क्या है?

पाप से दुःख, पुण्य से सुख और केवल आत्मज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है—यह त्रिमूर्ति पर भी लागू होने वाला सार्वभौमिक नियम है।

पुण्यात्मा स्वर्ग-भोग समाप्त होने के बाद पुनः जन्म कैसे लेते हैं?

पुण्य क्षीण होने पर वे आकाश मार्ग से अन्न-रसों में समाकर योग्य पुरुष के वीर्य के माध्यम से स्त्री-गर्भ में प्रविष्ट होते हैं।

मनुष्य को प्रतिदिन कौन सा आत्मनिरीक्षण करना चाहिए?

क्या मैं श्रेष्ठ कर्म कर रहा हूँ, क्या राग-द्वेष से मुक्त हो रहा हूँ और क्या मानव जीवन का सदुपयोग कर रहा हूँ—यह निरंतर विचारना चाहिए।

निष्कर्ष

कर्मों के परिणाम और वासनाओं से निर्मित यह संसार-चक्र कितना विचित्र और यथार्थ है, इसका विशद वर्णन देवी सरस्वती ने किया। युद्धभूमि में प्राण त्याग रहे विदूरथ की चेतना राजा पद्म के शरीर में किस पथ से जाएगी? लीला इस अलौकिक यात्रा को कैसे देखेगी?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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