अज्ञानवश मांगी गई अनुचित कामनाएं पूरी होने पर सुख नहीं, बल्कि अनंत दुख ही मिलता है—योगवाशिष्ठ यह स्पष्ट करता है। राक्षसी कर्कटी सूई का रूप धारण कर घोर यातनाएं भोगने के बाद, तीव्र पश्चाताप के साथ पुनः तपस्या करके आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करती है। यह अध्याय सिखाता है कि कामनाओं का अंत ही परम शांति का मार्ग है और आत्मज्ञान ही जीव को सच्ची मुक्ति दिलाता है।
जीवन में हम अनगिनत कामनाएं करते हैं। लेकिन जब वे पूरी होती हैं, तब जाकर अहसास होता है कि जो हमने मांगा था, वह अमृत नहीं बल्कि विष था। अज्ञानता से किए गए संकल्प मनुष्य को बंधनों में जकड़कर और अधिक संताप में धकेल देते हैं। ऐसे समय में उत्पन्न पश्चाताप यदि सही साधना का रूप ले ले, तो वही जीव को परम पद तक पहुंचा देता है।
श्रीराम को महर्षि वशिष्ठ द्वारा सुनाई जा रही कर्कटी की कथा का यह अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। प्राणियों का रक्त-मांस चूसने के लिए सूई बनी कर्कटी ने उस तुच्छ शरीर में जो नारकीय यातनाएं भोगीं, उन्होंने उसके भीतर विवेक को कैसे जगाया और अंततः उसने ब्रह्मज्ञान कैसे प्राप्त किया, यह प्रसंग उसी का सजीव चित्रण करता है।
पश्चाताप की ज्वाला में सूचिका
श्रीराम शांत भाव से सुन रहे थे, तभी महर्षि वशिष्ठ ने कर्कटी के अंतर्मन में उठे तीव्र द्वंद्व और संताप का वर्णन करना आरंभ किया। पूरी राजसभा उस राक्षसी की दुर्दशा पर विचार कर स्तब्ध रह गई। सूई के रूप में कर्कटी भूमि पर लोटते हुए अपने पिछले जीवन को याद कर फूट-फूटकर विलाप करने लगी थी। चारों ओर घृणित मैल, धूल और रक्त के कीचड़ के सिवा उसे कोई अन्य आश्रय दिखाई नहीं दे रहा था।
कभी हिमालय के समान विशालकाय शरीर रखने वाली वह राक्षसी, अब मनुष्यों के पैरों तले कुचली जा रही थी और कांटों में फंसकर छटपटा रही थी। भयंकर भूख से तड़पने के बावजूद, उस सूक्ष्म शरीर से वह भोजन का एक ग्रास भी नहीं खा पा रही थी—ऐसी दयनीय स्थिति हो गई थी उसकी। न कोई बंधु-बांधव था, न मित्र, और न ही कोई सहारा देने वाला। हवा के झोंकों के साथ तिनके की तरह उड़ते हुए एक जीवित शव की भांति जीना उसके लिए असह्य वेदना बन चुका था।
उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। महर्षि वशिष्ठ ने उसके विलाप भरे वचनों को सभा के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा —
कर्कटी: हाय! मैंने कितने भारी अविवेक के कारण यह सूचिका रूप मांग लिया? इस अत्यंत सूक्ष्म और दुर्बल रूप से मैं भोजन का एक निवाला तक नहीं खा पा रही हूँ! मेरे वे पर्वताकार विशाल अंग-प्रत्यंग कहाँ चले गए? तब मैं पहाड़ों जैसे मांस-पिंडों को तृप्तिपूर्वक खाया करती थी। और आज, दूसरों के पैरों में चुभती हुई, धूल में लोटती हुई, रक्त-मांस की दुर्गंध में सड़ती हुई ऐसा नीच जीवन जी रही हूँ। किसलिए है यह व्यर्थ का जीवन?
अज्ञान का दुष्परिणाम – विनाशकाले विपरीत बुद्धि
कर्कटी का पश्चाताप और अधिक तीव्र हो उठा। उसे भलीभांति बोध हो गया कि स्वयं उसने ही ब्रह्माजी की तपस्या करके यह विपत्ति अपने सिर मोल ली थी। मृत्यु की इच्छा करने पर भी न मरने वाला अमरत्व कितना बड़ा अभिशाप है, यह अब उसकी समझ में पूरी तरह आ चुका था। जहां अज्ञान प्रवेश करता है, वहां सबसे पहले दुर्बुद्धि घर बनाती है, और वही दुर्बुद्धि समस्त अनर्थों का कारण बनती है—यह सत्य उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से जान लिया था।
मांत्रिकों के मंत्रों के प्रभाव में आकर, विभिन्न तंत्रों और औषधियों द्वारा रोके जाने पर जब उसे भयंकर आघात सहने पड़ते, तो उसकी पीड़ा अवर्णनीय हो जाती थी। उसे यह भी अहसास हुआ कि केवल तुच्छ रक्त पीने की लालसा के अतिरिक्त उसके पास स्वाद लेने वाली जिह्वा तक नहीं है। उसके कारण संसार के निर्दोष और सज्जन प्राणी पीड़ित हो रहे थे, जबकि स्वयं उसे तनिक भी तृप्ति प्राप्त नहीं हो रही थी।
सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति सांस थामकर उसके इस अंतर्मंथन को सुन रहा था। वशिष्ठजी ने उसके रुदन को आगे बढ़ाते हुए कहा —
कर्कटी: मेरी दशा तो ऐसी हो गई है जैसे एक पिशाच से पीछा छूटा तो दूसरे ने जकड़ लिया। ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ के अनुसार, मैंने अपने ही हाथों से अपने लिए यह नरक तैयार किया है। इस कीट-समान शरीर में पड़ी मुझ जैसी अधम का उद्धार करने वाला कौन महात्मा होगा? यदि ज्ञान प्राप्ति के लिए किसी सत्पुरुष की शरण में जाना भी चाहूँ, तो क्या मुझ जैसी दुष्ट जीव को वे अपने पास फटकने देंगे? इस घोर अज्ञान की अवस्था से मुक्ति पाने का क्या कोई मार्ग है?
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हिमालय शिखर पर पुनः तपस्या
दीर्घकाल तक विचार करने के उपरांत कर्कटी के चित्त में धीरे-धीरे एक स्थिरता आने लगी। पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों की प्रेरणा से उसके भीतर एक दिव्य विचार कौंधा। पश्चाताप की अग्नि ने उसके भीतर के अहंकार को भस्म कर दिया था। उसने निश्चय किया कि इन दुखों से पार पाने का एकमात्र उपाय पुनः तपस्या करना ही है। उसने जान लिया कि निष्कपट मन से परमात्मा की शरण लेना ही एकमात्र कल्याणकारी मार्ग है।
वह प्राणियों में प्राणवायु के रूप में प्रवेश कर, उनके हृदय-कमल में स्थित रहते हुए, किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाए बिना धीरे-धीरे हिमालय के उत्तुंग शिखर पर पहुंच गई। वहां एक एकांत निर्जन स्थान पर वह अचल भाव से बैठ गई और दिन-रात का भेद भुलाकर अत्यंत एकाग्र चित्त से तपस्या करने लगी। भीषण वर्षा, प्रखर धूप और बर्फीले तूफान भी उसके इस दृढ़ संकल्प को तनिक भी डिगा नहीं सके।
वशिष्ठजी ने उसकी इस तपस्या और निष्ठा की सराहना करते हुए श्रीरामचंद्रजी से कहा —
महर्षि वशिष्ठ: हे प्रिय राम! श्रद्धापूर्वक की गई तपस्या कभी निष्फल नहीं होती। उस राक्षसी ने समस्त बाह्य क्रियाओं का त्याग कर दिया और एकाग्र चित्त से सत्यस्वरूप आत्मभाव में लीन हो गई। स्वयं आत्मा के वास्तविक स्वरूप और स्वभाव का विचार करने से उसके भीतर दिव्य ज्ञान का उदय हुआ। आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति होते ही उसका समस्त चित्त परम शांत हो गया और उसके सारे पाप भस्म हो गए।
तीनों लोकों को स्पर्श करती तपोऽग्नि – इंद्र की चिंता
कर्कटी द्वारा की जा रही आत्मज्ञान की तपस्या कोई साधारण तपस्या नहीं थी। उसके अंतःकरण से प्रस्फुटित होती दिव्य तपोऽग्नि का प्रभाव धीरे-धीरे समस्त लोकों में फैलने लगा। पृथ्वी, आकाश और दिशाएं तपने लगीं। वातावरण ऐसा हो गया मानो पर्वत पिघल जाएंगे। स्वर्गलोक के अधिपति देवराज इंद्र इस असाधारण ताप को देखकर अत्यंत भयभीत और चिंतित हो उठे।
इंद्र ने तत्काल त्रिलोक-संचारी महर्षि नारद की शरण ली। वे यह जानने के लिए व्याकुल थे कि समस्त लोक इस प्रकार क्यों संतप्त हो रहे हैं। उन्होंने देवर्षि नारद के चरणों में प्रणाम कर इस घोर तपस्या के पीछे का रहस्य बताने की प्रार्थना की।
नारदजी ने मंद मुस्कान के साथ इंद्र से कहा —
महर्षि नारद: हे देवेंद्र! पूर्वकाल में ब्रह्माजी को प्रसन्न करके सूक्ष्म जीवसूचिका बनी कर्कटी राक्षसी को तुम जानते ही हो! अपनी अल्पबुद्धि के कारण उसने जो वरदान प्राप्त किया था, उसने उसे केवल असहनीय दुख ही दिया। प्राणियों के शरीरों में प्रवेश कर शूल-पीड़ा देते हुए उसने स्वयं भी अपार कष्ट झेले। अब विवेक जागृत होने पर, उस पापी शरीर से मुक्ति और आत्मशांति के लिए वह हिमालय पर यह अद्भुत तप कर रही है। उसी के तपोतेज से यह संपूर्ण जगत इस प्रकार प्रज्वलित हो रहा है।
वायुदेव की खोज – समाधि अवस्था का दर्शन
नारदजी के वचन सुनकर इंद्र ने तुरंत वायुदेव को बुलवाया। उन्होंने वायुदेव को आज्ञा दी कि वे स्वयं जाकर देखें कि कर्कटी कहाँ है और किस दशा में है। वायुदेव ने अपनी दिव्य गति और दृष्टि से पूरे भूमंडल में खोज की और अंततः हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों पर अत्यंत सूक्ष्म रूप में, निश्चल बैठी कर्कटी को खोज निकाला। उसके चारों ओर चिदग्नि की ज्वालाएं प्रज्वलित हो रही थीं।
वायुदेव उसके समीप पहुंचे और उसे समाधि से जगाने का प्रयास किया। उन्होंने तीव्र गति से वायु प्रवाहित की, मेघ-गर्जन के समान स्वर में उसे पुकारा। किंतु कर्कटी बाह्य जगत को पूरी तरह विस्मृत कर चुकी थी। उसका चित्त परब्रह्म में लीन हो चुका था, इसलिए वायुदेव के शब्द भी उसे डिगा न सके।
वायुदेव तुरंत इंद्र के पास लौट आए और उन्होंने इस प्रकार निवेदन किया —
वायुदेव: हे इंद्र! वह राक्षसी कोई साधारण तपस्या नहीं कर रही है। वह आत्मज्ञान रूपी महा-अग्नि में लीन है। स्वयं वह हिमवान पर्वत भी अपनी स्वाभाविक शीतलता खोकर अग्निकुंड के समान तप रहा है। यदि उस पर शीघ्र कृपा न की गई तो संपूर्ण लोकों पर भारी संकट आ सकता है। केवल हमारे पितामह ब्रह्माजी ही उसे शांत कर सकते हैं।
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कर्कटी ने हिमालय के शिखरों पर निश्चल समाधि में बैठकर जिस परम शांति की अनुभूति की, उसे अपने पूजा कक्ष अथवा ध्यान स्थल में अनुभव करें।
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ब्रह्माजी का प्राकट्य – निष्काम वैराग्य
इंद्र आदि समस्त देवता ब्रह्मलोक पहुंचे और उन्होंने पितामह ब्रह्माजी से सारा वृत्तांत कह सुनाया। ब्रह्माजी ने देवताओं को अभय दिया और तत्काल हिमालय के शिखर पर तपस्यारत कर्कटी के समक्ष प्रकट हो गए। कर्कटी अपने तप से विशुद्ध बुद्धि प्राप्त कर ‘मैं ही आत्मा हूँ, सर्वत्र परब्रह्म ही व्याप्त है’—इस अद्वैत भाव से निश्चल समाधि में मग्न थी।
ब्रह्माजी ने उसे स्नेहपूर्वक पुकारा। उन मधुर वचनों को सुनते ही कर्कटी समाधि से बाह्य चेतना में लौटी। सम्मुख साक्षात् सृष्टिकर्ता को खड़े देखकर भी उसके मन में कोई सांसारिक कामना उत्पन्न नहीं हुई। उसे भलीभांति स्मरण था कि पूर्व में कामनाएं करके उसने कैसी नारकीय यातनाएं झेली थीं।
ब्रह्माजी ने करुणापूर्वक उसे संबोधित करते हुए कहा —
ब्रह्माजी: पुत्री! दीर्घकाल से की गई तुम्हारी इस निष्ठापूर्ण तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे चित्त के समस्त संशय नष्ट हो चुके हैं। तुम्हें जो वर चाहिए, मांगो, मैं प्रदान करता हूँ।
कर्कटी: हे लोकनाथ! सत्यस्वरूप आत्मा को जान लेने के बाद अब और क्या पाना शेष रह जाता है? ज्ञानोदय हो जाने के उपरांत मुझे किसी भी सांसारिक भोग की लालसा नहीं है। पूर्व में अज्ञानवश कामनाएं करके मैंने असीम दुख उठाया है। अब मेरे भीतर कोई संकल्प नहीं है, न ही मुझे कोई वर चाहिए। केवल उस परम शांति में स्थित रहना ही मुझे प्रिय है।
ईश्वर नियति – स्थूल देह की पुनः प्राप्ति
कर्कटी के निष्काम वैराग्य को देखकर ब्रह्माजी अत्यंत प्रसन्न हुए। किंतु उन्होंने उसे समझाया कि इस सृष्टि में प्रत्येक जीव को अपने प्रारब्ध कर्म और ईश्वरीय नियति के अनुसार चलना ही पड़ता है। आत्मज्ञान सिद्ध हो जाने पर भी, जब तक देह है, तब तक जगत में धर्मपूर्वक जीवन यापन करने की आवश्यकता उन्होंने स्पष्ट की। जैसे बीज में विशाल वृक्ष छिपा रहता है, वैसे ही राक्षसी स्वभाव पूर्णतः नष्ट हो जाने पर भी पूर्व शरीर का सूक्ष्म संस्कार अभी शेष था।
उन्होंने बताया कि उसके पूर्व संकल्प के अनुसार उसे पुनः वही पुराना पर्वताकार स्थूल शरीर प्राप्त होगा, किंतु उसका आचरण एक जीवन्मुक्ता की भांति परम पवित्र होना चाहिए। ज्ञान रूपी रत्न-आभूषण से सुशोभित मन के साथ, लोकहित करते हुए जीवन जीने का उन्होंने निर्देश दिया।
ब्रह्माजी ने उसके कर्तव्य को स्पष्ट करते हुए आज्ञा दी —
ब्रह्माजी: हे पुत्री! तुम ब्रह्मज्ञानी हो चुकी हो। किंतु ईश्वरीय नियति के अनुसार तुम्हें अभी कुछ समय पृथ्वी पर रहकर उसके उपरांत विदेहमुक्ति प्राप्त करनी है। तुम्हारे पूर्व संकल्प के अनुसार तुम्हें पुनः वही विशाल शरीर प्राप्त होगा। किंतु अब से तुम किसी भी साधु-सज्जन को पीड़ित नहीं करोगी। सदैव समाधि-निष्ठा में रहते हुए, संसार में धर्मभ्रष्ट आचरण करने वाले दुष्टों और अज्ञानियों को ही केवल देह-पोषण हेतु आहार के रूप में स्वीकार करोगी। तुम जीवन्मुक्ता होकर इस पृथ्वी पर विचरण करो!
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भूख की परीक्षा – वायुदेव का दिव्य प्रबोधन
ब्रह्माजी के अंतर्धान होने के पश्चात कर्कटी ने काले मेघ के समान अपना वही पूर्व विराट रूप पुनः प्राप्त कर लिया। किंतु उसके भीतर पूर्वकालीन क्रूरता का लेशमात्र भी नहीं बचा था। उसने दीर्घकाल तक हिमालय में निश्चल समाधि में समय बिताया। एक दिन जब वह समाधि से जागी, तो उसे तीव्र भूख का अनुभव हुआ। सामने कई प्राणी दिखाई दे रहे थे, किंतु अन्यायपूर्वक किसी भी जीव को पीड़ा न पहुंचाने की धर्मबुद्धि ने उसे रोक दिया।
उसने दृढ़ निश्चय किया कि भले ही भूख से यह शरीर नष्ट हो जाए, किंतु वह अधर्म से प्राप्त आहार को स्पर्श भी नहीं करेगी। उसने माना कि अधर्म का भोजन विष के समान त्याज्य है। आकाश से उसकी इस धर्मनिष्ठा को देखकर वायुदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उसके सम्मुख प्रकट हो गए। उन्होंने उसके इस धर्म-विचार की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
वायुदेव ने उसकी सराहना करते हुए और उसका कर्तव्य स्मरण कराते हुए कहा —
वायुदेव: हे कर्कटी! तुम्हारा यह विवेक अत्यंत प्रशंसनीय है। तुम जैसे ब्रह्मज्ञानी महात्माओं के लिए देह-पोषण कोई दोष नहीं है। अज्ञान में डूबे, इंद्रिय-लोलुप और धर्मभ्रष्ट दुष्टों को ही तुम आहार के रूप में स्वीकार करो। जो जिज्ञासु हों, उन्हें आत्मज्ञान का उपदेश दो। इससे तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।
कर्कटी: हे पिता वायुदेव! आपने मुझे सन्मार्ग दिखाया है। आपकी आज्ञा के अनुसार ही मैं आत्मज्ञान के जिज्ञासुओं को ज्ञान प्रदान करूंगी। केवल विवेकहीन, अधर्मी दुष्टों को ही क्षुधा-निवारण हेतु ग्रहण करूंगी और सदा धर्म के मार्ग पर ही रहूंगी।
कर्कटी के जीवन का आध्यात्मिक विकास क्रम
| चरण | शारीरिक स्थिति | मानसिक स्थिति | दार्शनिक परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रारंभिक अवस्था | विशाल राक्षसी देह | तीव्र तामसिक भूख और क्रूरता | अज्ञानवश सूई का रूप मांगना |
| मध्यवर्ती अवस्था | सूक्ष्म जीवसूचिका (विषूचिका) | पश्चाताप, असहायता और दुख | बाह्य भोगों की निःसारता का बोध |
| तपोवस्था | हिमालय शिखर पर सूक्ष्म रूप | निश्चल एकाग्रता और आत्मविचार | आत्मसाक्षात्कार और पापों का क्षय |
| सिद्धावस्था (जीवन्मुक्ति) | पुनः प्राप्त स्थूल देह | निष्काम वैराग्य और ब्रह्मभाव | ईश्वरीय नियति के अनुसार धर्ममय जीवन |
आध्यात्मिक भावार्थ
कर्कटी की कथा केवल एक राक्षसी का आख्यान नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक जीव की आध्यात्मिक विकास यात्रा का प्रतीक है। जीव अज्ञानतावश सांसारिक कामनाएं करता है और जब वे सिद्ध हो जाती हैं, तो उनके बंधनों में जकड़कर विलाप करता है। सांसारिक सुख दूर से अत्यंत आकर्षक प्रतीत होते हैं, किंतु भोगने पर वे नरक के समान दुखदायी सिद्ध होते हैं।
जब तीव्र पश्चाताप जागता है, तभी अंतर्मुखी यात्रा आरंभ होती है। जब मन बाह्य विषयों से विमुख होकर आत्मविचार की ओर मुड़ता है, तब ब्रह्मज्ञान का उदय होता है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भी जब तक शरीर है, तब तक प्रारब्ध कर्म के अनुसार धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करना ही जीवन्मुक्त का सच्चा लक्षण है।
क्या आपके जीवन में भी कामनाएं पूरी होने के बाद असंतोष ही शेष रह जाता है? यदि हाँ, तो बाह्य वस्तुओं में भटकने के बजाय अपने भीतर स्थित आत्मशांति को खोजने के लिए प्रतिदिन कुछ समय मौन रहकर आत्मविचार अवश्य करें।
इस अध्याय का सारांश
सूई के रूप में दारुण दुख भोगने के बाद राक्षसी कर्कटी ने पश्चातापपूर्वक हिमालय पर घोर तपस्या की। उसकी तपोऽग्नि से तीनों लोक संतप्त हो उठे, तब नारदजी के परामर्श पर देवताओं ने ब्रह्माजी की शरण ली। ब्रह्माजी ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा, किंतु आत्मज्ञान प्राप्त कर चुकी कर्कटी ने किसी सांसारिक भोग की कामना नहीं की। ईश्वरीय नियति के अनुसार उसे उसका पूर्व स्थूल शरीर पुनः प्राप्त हुआ। भूख लगने पर भी अधर्म का भोजन त्यागने वाली कर्कटी को वायुदेव ने उपदेश दिया कि वह केवल धर्महीन दुष्टों का ही भक्षण करे।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: अज्ञानजनित कामनाएं दुख का कारण हैं; केवल निष्काम तप और आत्मविचार ही जीव को शाश्वत मुक्ति और परम शांति प्रदान कर सकते हैं।
- तात्विक शिक्षा: आत्मज्ञान प्राप्त ज्ञानी का देह अथवा सांसारिक भोगों के प्रति कोई आसक्ति-भाव नहीं रहता। ईश्वरीय नियति के अनुसार शरीर रहे या जाए, इसकी चिंता किए बिना धर्म का पालन करना ही ज्ञानी का लक्षण है।
- अगले अध्याय से संबंध: स्थूल देह को पुनः प्राप्त कर ज्ञानी कर्कटी धर्मसम्मत आहार की खोज में एक गहन वन में प्रवेश करती है, जहाँ एक प्रबुद्ध राजा और उसके मंत्री के साथ होने वाला उसका दार्शनिक संवाद अगले अध्याय में उद्घाटित होगा।
जहाँ अज्ञान प्रवेश करता है वहाँ पहले दुर्बुद्धि आती है, और वही दुर्बुद्धि समस्त अनर्थों की मूल जड़ है।
देह नष्ट हो सकती है किंतु आत्मा नहीं; अधर्म से जीने की अपेक्षा भूख से शरीर का त्याग कर देना कहीं अधिक श्रेयस्कर है।
आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर चुके विवेकी पुरुष को यह संपूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप ही दिखाई देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कर्कटी सूई का रूप प्राप्त करने के बाद क्यों पश्चाताप करने लगी?
सूई बनने के बाद वह भोजन का एक ग्रास भी नहीं खा पा रही थी, लोगों के पैरों तले कुचली जा रही थी और मांत्रिकों की औषधियों से निरंतर चोटें खाकर असह्य दुख भोग रही थी, इसी कारण कर्कटी को गहरा पश्चाताप हुआ।
कर्कटी द्वारा की गई दूसरी तपस्या की क्या विशेषता थी?
दूसरी बार उसने किसी सांसारिक भोग की कामना नहीं की, बल्कि केवल आत्मसाक्षात्कार और आत्मविचार के लिए पूर्ण एकाग्रता के साथ हिमालय पर तपस्या की।
ब्रह्माजी के प्रकट होने पर कर्कटी ने वरदान क्यों नहीं मांगा?
तपस्या के प्रभाव से आत्मज्ञान प्राप्त कर चुकी कर्कटी को संपूर्ण जगत ब्रह्ममय प्रतीत होने लगा था; समस्त कामनाओं का क्षय हो जाने और परम शांति प्राप्त होने के कारण उसने कोई सांसारिक वर नहीं मांगा।
ब्रह्माजी ने कर्कटी को क्या आदेश दिया?
ईश्वरीय नियति के अनुसार उसे पुनः पूर्व स्थूल देह धारण कर सज्जनों को कष्ट न पहुंचाने और केवल अधर्मी दुष्टों को ही आहार के रूप में ग्रहण करते हुए जीवन्मुक्ता बनकर रहने का आदेश दिया।
भूख लगने पर कर्कटी ने क्या धर्मसम्मत निर्णय लिया?
कर्कटी ने यह दृढ़ निश्चय किया कि अधर्मपूर्वक किसी निर्दोष को पीड़ित करके भोजन प्राप्त करने की अपेक्षा भूख से इस नश्वर शरीर का त्याग कर देना कहीं श्रेष्ठ है।
वायुदेव ने कर्कटी को क्या प्रबोधन दिया?
उसकी आत्मज्ञान निष्ठा की प्रशंसा करते हुए वायुदेव ने उपदेश दिया कि वह जिज्ञासुओं को ज्ञान प्रदान करे और केवल धर्मभ्रष्ट दुष्टों को देह-पोषण हेतु ग्रहण करना सर्वथा धर्मसम्मत है।
निष्कर्ष
कर्कटी का यह आख्यान प्रमाणित करता है कि अनुचित कामनाओं से पतन को प्राप्त हुआ जीव भी सच्चे पश्चाताप और आत्मविचार द्वारा परम पावन ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता है। स्थूल देह पुनः प्राप्त करने के उपरांत भी उसकी राक्षसी वृत्ति नष्ट हो चुकी थी और देवत्व जागृत हो चुका था। किंतु उस विशालकाय देह के साथ वन में विचरण करती कर्कटी को वह विवेकशील राजा कौन मिला? उस रात्रि गहन वन में उनके मध्य क्या दार्शनिक संवाद हुआ?