ब्रह्म से जीव की उत्पत्ति कैसे हुई? | Yoga Vasistha S3 EP-36

ब्रह्म से जीव कैसे उत्पन्न हुआ? आकाश का नीलापन और साक्षी दीपक के दृष्टांतों से महर्षि वासिष्ठ का उपदेश। योग वासिष्ठ S3 EP-36.

असीम परब्रह्म से सीमित जीव कैसे उत्पन्न हुआ, इस प्रश्न का उत्तर मनोभ्रांति में ही निहित है। जैसे महासागर में उठने वाली तरंग जल से भिन्न नहीं होती, वैसे ही परमात्मा के चैतन्य में उदित हुई जीव-भावना भी साक्षात ब्रह्म स्वरूप ही है। आत्म-दर्शन के अभाव से उत्पन्न अविद्या के मिटते ही जीव ही शाश्वत परब्रह्म है, यह योग वासिष्ठ स्पष्ट करता है।

जीवन में कभी-कभी सब कुछ होते हुए भी एक अनजाना खालीपन, असहायता और अकेलापन हमें भीतर से तोड़ देता है। समस्त सृष्टि का मूल असीम सामर्थ्य हमारे ही भीतर है, यह जानते हुए भी दैनिक जीवन में हम स्वयं को इतना दुर्बल और बंधनों में जकड़ा हुआ क्यों अनुभव करते हैं—यह संशय हर साधक के हृदय में कभी न कभी अवश्य उठता है।

ठीक ऐसा ही गहरा दार्शनिक अंतर्द्वंद्व श्रीराम को भी मथ रहा था। अनंत और निष्कलंक परब्रह्म से संसार चक्र में भटकने वाले ‘जीव’ का भाव कैसे उत्पन्न हुआ, यह समझाने की उन्होंने महर्षि वासिष्ठ से प्रार्थना की। उसी पावन संवाद में प्रस्फुटित हुए परम सत्यों का संकलन यह अध्याय है।

अनंत चैतन्य में पहली तरंग

महाराज की राजसभा में महर्षि वासिष्ठ का स्वर एक शांत और गंभीर नाद की भांति गूंज उठा। उनके वचनों की स्पष्टता वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्पर्श कर रही थी। परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करते हुए महर्षि ने सीधे उपदेश में प्रवेश किया।

श्रीराम एकाग्रचित्त होकर सुन रहे थे, तभी सृष्टि के आरंभ में चैतन्य सागर में घटित हुए सूक्ष्म रूपांतरण को महर्षि स्पष्ट करने लगे। निर्मल जलराशि में सहसा एक विशाल तरंग उठने के समान परमात्मा से पहला संकल्प प्रकट हुआ।

महर्षि वासिष्ठ: हे राम! परमात्मा सर्वदा अत्यंत निर्मल, स्वयंप्रकाशित और परिपूर्ण आनंद स्वरूप हैं। उनका न कोई आदि है, न कोई अंत। वे सर्वव्यापी हैं और बिना किसी विकार या परिवर्तन के सदा एकरस रहने वाले परमानंद स्वरूप हैं।

महर्षि वासिष्ठ: उसी शांत परमात्मा के चैतन्य में, जैसे निश्चल समुद्र में पहली विशाल तरंग उठती है, प्रथम चित्त से युक्त ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ‘मैं इस समष्टि सृष्टि का मूल स्वरूप हूँ’—इस भाव से युक्त चित्त ही उनका शरीर बना। शास्त्रों ने उन्हें हिरण्यगर्भ और प्रथम जीव कहा है। उसी समष्टि से संपूर्ण जगत का विस्तार हुआ।

राम का संशय — पूर्णता से सीमा का जन्म कैसे?

महर्षि वासिष्ठ की यह व्याख्या सुनकर श्रीराम के नेत्रों में गहरा कौतूहल और जिज्ञासा झलक उठी। एक परम सत्य से उसके सर्वथा विपरीत स्थिति का प्राकट्य कैसे संभव है, इस विचार ने उनके भीतर गहन मंथन छेड़ दिया।

सभा में उपस्थित विद्वान भी श्रीराम के प्रश्न की गंभीरता देखकर स्तब्ध रह गए। श्रीराम ने हाथ जोड़कर महर्षि की ओर देखते हुए अत्यंत विनयपूर्वक अपने हृदय का संशय व्यक्त किया।

श्रीराम: हे महर्षि! परब्रह्म तो असीम, अद्वितीय, स्वयंप्रकाश और अखंड तत्व है। फिर इस जीव को देखें तो यह सीमित और अल्प सामर्थ्य वाला है। ‘मुझसे भिन्न भी कुछ है’—इस द्वैत-भाव के कारण यह निरंतर दूसरों पर निर्भर रहकर भयभीत रहता है।

श्रीराम: ऐसे परम पवित्र ब्रह्म से, उसके सर्वथा विपरीत दुर्बल लक्षणों वाली यह जीव-सत्ता बाहर कैसे आई? अथवा वह ब्रह्म ही ऐसा संकुचित और सीमित अनुभव क्यों कर रहा है? ये सारे जगत कहां से उत्पन्न हो रहे हैं? इस रहस्य को मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कृपया स्पष्ट कीजिए।

मिट्टी की मूर्ति का दृष्टांत — आकार के पीछे का सत्य

श्रीराम के प्रश्न की गहराई को भांपकर महर्षि वासिष्ठ के मुख पर एक शांत और सौम्य मुस्कान तैर गई। संसार के इस भ्रम का कोई वास्तविक बाह्य कारण नहीं है और यह केवल अज्ञानजनित धारणा मात्र है, यह स्पष्ट करने के लिए उन्होंने व्यावहारिक दृष्टांतों का आश्रय लिया।

महर्षि का दृष्टिकोण सभा में उपस्थित प्रत्येक जन के समक्ष अद्वैत तत्व को प्रत्यक्ष करने लगा। उन्होंने समझाया कि भ्रांति केवल देखने वाली दृष्टि में है, मूल वस्तु में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

महर्षि वासिष्ठ: हे राघव! उस ब्रह्म में यह मिथ्या द्वैत-भाव बिना किसी बाह्य कारण के स्वतः ही भासित होता है। जैसे समुद्र के जल में छोटी-बड़ी तरंगें उठती हैं, वैसे ही ‘मैं समष्टि जीव हूँ, मैं व्यष्टि जीव हूँ’ जैसी संकल्पनाएं ब्रह्म-चैतन्य में उदित होती हैं।

महर्षि वासिष्ठ: परंतु वास्तव में ब्रह्म कभी जीव में रूपांतरित नहीं होता। मान लो मिट्टी से एक खिलौना या मूर्ति बनाई जाए; क्या उस मूर्ति के कारण मिट्टी अपना मूल स्वभाव खो देती है? क्या वास्तव में मिट्टी का कोई निश्चित आकार होता है? मूर्ति में दिखने वाला आकार भी तो मिट्टी से ही आया है! वैसे ही ब्रह्म सर्वदा निर्मल रहते हुए भी, अविद्या के कारण ‘जीव’ की संकीर्णता को ओढ़ लेता है। जीव वस्तुतः ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

महर्षि वासिष्ठ: आत्म-तत्व का यथार्थ दर्शन न होने से उत्पन्न भ्रम और विचार का अभाव ही इस परिसीमन का कारण है। इसी भ्रांति के कारण विशाल चिदाकाश अज्ञानियों को भयानक संसार प्रतीत होता है; वही चिदाकाश ज्ञानियों के लिए शांत और परमानंदमय दिखाई देता है। न तुम, न मैं—हम किसी भी क्षण उस ब्रह्म से पृथक नहीं हैं।

दर्पण में प्रतिबिंब — शांत जल में कंकड़

उपदेश और अधिक गहराई में उतरने लगा। चिदाकाश में प्रतिबिंबित होने वाले संसार चैतन्य को तनिक भी विकृत नहीं कर सकते, यह दृढ़ करने के लिए महर्षि वासिष्ठ ने दर्पण और स्वर्ण के दृष्टांत प्रस्तुत किए।

उस नीरव वातावरण में सभी श्रोता परम तत्व के इन गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सहजता से आत्मसात कर रहे थे। महर्षि की वाणी विचारों के जाल को काटते हुए आगे बढ़ी।

महर्षि वासिष्ठ: हे राम! दर्पण में चाहे कितनी भी वस्तुएं प्रतिबिंबित हों, अथवा कुछ भी प्रतिबिंबित न हो, क्या उस दर्पण में कोई विकार आता है? नहीं न! चिदाकाश परब्रह्म की स्थिति भी ठीक वैसी ही है। वायु चलने पर शांत समुद्र में लहरें उठती हैं; वायु थमते ही वह निश्चल हो जाता है। दोनों ही अवस्थाओं में केवल जल ही विद्यमान रहता है।

महर्षि वासिष्ठ: जैसे शांत जल में कंकड़ गिरने पर हलचल मच जाती है, वैसे ही चित्त में चंचलता उठने पर मनोवृत्तियों से युक्त जीव-सत्ता प्रतीत होने लगती है। जैसे जल न देखकर केवल तरंग देखी जाए, स्वर्ण न देखकर केवल आभूषण देखा जाए… वैसे ही मूल ब्रह्म-तत्व ओझल हो जाता है और परिच्छिन्न ‘अहं-भाव’ स्फुरित होता है। उसी स्फुरण को हम जीव कहते हैं।

आकाश का नीला रंग — अग्नि में ताप का स्वभाव

जीव-भाव कब तक रहता है और इसका वास्तविक स्वरूप क्या है, यह समझाते हुए महर्षि ने आकाश की ओर संकेत किया। उन्होंने श्रीराम को स्मरण कराया कि आंखों से दिखने वाला हर दृश्य सत्य नहीं होता।

अहंकार की भावना दृढ़ वासनाओं के बल पर कैसे रूप धारण करती है और प्रकृति के सहज गुण चैतन्य में किस प्रकार समाए हुए हैं, यह सभा के सम्मुख स्पष्ट हो गया।

महर्षि वासिष्ठ: जैसे अग्नि में ताप और बर्फ में शीतलता स्वाभाविक होती है… वैसे ही ब्रह्म में चंचल स्वरूप जीव-भावना भी मुक्ति प्राप्त होने तक बनी रहती है। वासनाओं के दृढ़ बल से ही यह अहंकार रूपी भाव स्थिर होता है।

महर्षि वासिष्ठ: हे रामचंद्र! तनिक उस आकाश की ओर देखो। वहां तुम्हें नीला रंग दिखाई दे रहा है न! क्या वास्तव में आकाश का कोई रंग होता है? कदापि नहीं! फिर भी वह सबको दिखता है। जीव का अहंकार भी ठीक ऐसा ही है। आत्म-दर्शन न होने के कारण चित्त-चैतन्य स्वयं को संकुचित मानकर देश, काल और देह के बंधनों में जकड़ा हुआ समझता है।

पंचतन्मात्राओं का विकास — जल का बर्फ बनना

महर्षि वासिष्ठ ने सृष्टि के क्रम और पंचमहाभूतों की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया कि सूक्ष्म चैतन्य किस प्रकार स्थूल पदार्थ के रूप में घनीभूत होता है। उन्होंने सिद्ध किया कि संकल्प शक्ति ही इस संपूर्ण विश्व का आधार है।

शुद्ध चैतन्य अपने संकल्प के वशीभूत होकर आकाश में एक देदीप्यमान नक्षत्र की भांति, दिव्य तेजःकण में रूपांतरित होने के दृश्य को सभा ने महर्षि के शब्दों में साक्षात अनुभव किया।

महर्षि वासिष्ठ: चित्त ही अपने संकल्प के बल से पंचमहाभूतों और उनके स्वभाव रूप शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध—इन पंचतन्मात्राओं की रचना करता है। देखा राम! इस प्रकार चैतन्य स्वरूप स्थिति जड़ तन्मात्राओं में परिवर्तित होती है।

महर्षि वासिष्ठ: पंचतन्मात्राओं का भाव ग्रहण करके शुद्ध चित्त आकाश में तारे की भांति एक तेजःकण बन जाता है। जैसे बीज अंकुरित होकर विशाल वृक्ष बनता है, जैसे जल जमकर बर्फ बन जाता है… वैसे ही वह तेजःकण अंडत्व और दिव्य देह को प्राप्त करता है। तत्पश्चात अपने संकल्प के प्रभाव से वह स्थावर, जंगम और नभचर रूप वाले समस्त लोकों में संचरण करता है।

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तरंग से उत्पन्न झाग — विराट का संकल्प

महर्षि ने उद्घोष किया कि समष्टि सृष्टिकर्ता हिरण्यगर्भ भी ब्रह्म स्वरूप ही हैं; वे जगत की रचना करते हुए भी अपने मूल चैतन्य को कभी नहीं खोते।

समुद्र के जल में उठने वाले झाग के दृष्टांत द्वारा उन्होंने कर्मों की भ्रांति और उनके अंतर्निहित सत्य को अत्यंत सरलता से उद्घाटित किया।

महर्षि वासिष्ठ: सृष्टि से पूर्व पंचतन्मात्राओं के संकल्प से उदित हुआ जीव-देह ही ब्रह्मा का पद प्राप्त करता है। वे समष्टि जीव-भाव से इस जगत का निर्माण करते हैं। अपने ही संकल्पित जगत को देखकर वे विस्मित होते हैं कि ‘अहा! यह सब कहां से आ गया!’ फिर भी वे चिन्मय स्वरूप होने के कारण मूल ब्रह्म-भाव का कभी त्याग नहीं करते।

महर्षि वासिष्ठ: जैसे जल अपना स्वभाव छोड़े बिना तरंगों को प्रकट करता है, वैसे ही चित् से चित्त का उदय होता है। यदि तरंग को स्पर्श करके विचारपूर्वक देखा जाए, तो वह केवल जल ही सिद्ध होती है! जगत के कारण रूप कर्म भी जल के झाग की भांति भ्रांति मात्र हैं। चित्-चैतन्य कभी कर्मों अथवा जन्मों से नहीं बंधता।

महर्षि वासिष्ठ: जैसे एक बीज से अंकुर, शाखाएं, पत्ते, फूल और फल क्रमशः विस्तार पाते हैं… वैसे ही हिरण्यगर्भ के संकल्प से समस्त जीवों की पूर्वकर्म-वासनाएं शाखा-प्रशाखाओं के रूप में प्रकट होती हैं। वृक्ष से फूल झड़ने के समान ही जीव जन्मते और मरते हुए इस संसार चक्र में घूमते रहते हैं।

अंधकार में बालक का भय — मन द्वारा रचित संसार

मन के महत्व को उजागर करते हुए महर्षि ने इस अध्याय के दार्शनिक मर्म को स्पर्श किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दृश्य जगत वस्तुतः मन के संकल्प-विकल्पों का ही ताना-बाना है।

अंधेरे में अकेला बालक किस प्रकार न होते हुए भी भूत की कल्पना करके डर जाता है, इस मानसिक स्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि संसार का सारा भय केवल स्व-निर्मित है।

महर्षि वासिष्ठ: परब्रह्म से सर्वप्रथम मन का ही प्राकट्य हुआ। यह संपूर्ण दृश्य प्रपंच मनोमय ही है। मन जिस ओर मुड़ता है, जगत का विस्तार उसी ओर हो जाता है। संसार में दिखने वाले सारे भेद मन के ही रचे हुए हैं। मन का लय होते ही जगत विलीन हो जाता है और केवल शुद्ध ब्रह्म शेष रहता है।

महर्षि वासिष्ठ: यह जगत एक दृष्टि से सत्य है और दूसरी दृष्टि से असत्य। ज्ञानियों की दृष्टि में यह परमार्थ सत्य ब्रह्म है; अज्ञानियों की दृष्टि में यह नाम-रूपों से युक्त मिथ्या है। जैसे अंधेरे में चलता पथिक मार्ग के किनारे पड़े ठूंठ को देखकर चोर या राक्षस समझकर डर जाता है! वैसे ही अज्ञान से ग्रस्त बालक अंधकार में न होने वाले भूत की कल्पना करके थर-थर कांपने लगता है।

महर्षि वासिष्ठ: ठीक उस बालक के भय की तरह ही, आत्मज्ञान से रहित मन इस संसार की रचना करके स्वयं ही भयभीत होता है। आत्म-विचार द्वारा सत्य का बोध होते ही वह सारा भय क्षण भर में तिरोहित हो जाता है।

कक्ष में जलता हुआ दीपक — साक्षी रूप में प्रकाशित आत्मा

उपदेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया। देह, इंद्रियां, जन्म-परंपराएं और सुख-दुःख आत्मा को किसी भी प्रकार स्पर्श नहीं करते, यह सिद्ध करने के लिए महर्षि वासिष्ठ ने दीपक का दृष्टांत दिया।

महर्षि के अंतिम वचनों ने सभा में अगाध शांति और अद्वैत अनुभूति का संचार कर दिया। रामचंद्र के मुखमंडल पर अप्रतिम दिव्यता और शांति छा गई।

महर्षि वासिष्ठ: मान लो किसी कक्ष में एक दीपक जल रहा है। उस दीपक के प्रकाश में एक बालक बैठकर पुस्तक पढ़ रहा है। अब बताओ राम! उस पढ़ी जा रही विषय-वस्तु से अथवा उस बालक से क्या दीपक का कोई संबंध है? वह दीपक न किसी को पढ़ने के लिए विवश करता है, न किसी को रोकता है। वह केवल प्रकाशित करते हुए निष्क्रिय भाव से साक्षी बना रहता है।

महर्षि वासिष्ठ: आत्मा भी ठीक उसी दीपक के समान है। वह निष्क्रिय, सर्वसाक्षी, नित्य और सर्वगत है। वह कभी अपनी निर्मलता नहीं खोती। देह उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं; सुख-दुःख आते हैं और चले जाते हैं। परंतु साक्षी स्वरूप आत्मा का न कोई जन्म है, न मृत्यु। अकर्ता चित्त ही सारे कर्मों की कल्पना करता है।

महर्षि वासिष्ठ: शुद्ध चैतन्य की दृष्टि में इस जीव का स्वरूप अत्यंत शुद्ध ब्रह्म ही है। केवल लौकिक व्यवहार में मन के माध्यम से इसे ‘जीव’ आदि नामों से पुकारा जाता है। विचार द्वारा इस सत्य को जानकर सर्वथा निश्चिंत हो जाओ!

पंचमहाभूत और पंचतन्मात्राओं के प्राकट्य का क्रम

पंचमहाभूत तत्व उद्भूत सूक्ष्म तन्मात्रा विषय अनुभव
आकाश तत्व शब्द तन्मात्रा श्रवण शक्ति / शब्द का अनुभव
वायु तत्व स्पर्श तन्मात्रा स्पर्श शक्ति / त्वचा का अनुभव
तेज (अग्नि) तत्व रूप तन्मात्रा दर्शन शक्ति / नेत्र का अनुभव
जल तत्व रस तन्मात्रा स्वाद शक्ति / रस का अनुभव
पृथ्वी तत्व गंध तन्मात्रा घ्राण शक्ति / गंध का अनुभव

आध्यात्मिक भावार्थ

इस अध्याय में महर्षि वासिष्ठ ने जीव के अस्तित्व और ब्रह्म-तत्व के बीच के अभेद संबंध को भलीभांति स्पष्ट किया है। समुद्र में लहरें, स्वर्ण में आभूषण और मिट्टी में मूर्तियां जिस प्रकार अपने मूल उपादान से भिन्न नहीं होतीं, वैसे ही ब्रह्म में भासित होने वाला जीव भी परमात्मा से पृथक नहीं है। मन द्वारा रचित अहं-भाव की वासनाएं ही जीव को स्वयं के सीमित होने का भ्रम कराती हैं।

कक्ष में जलने वाले दीपक के नीचे चाहे कोई शुभ कार्य हो या अशुभ, दीपक जिस प्रकार सर्वथा निर्लिप्त रहकर केवल साक्षी रहता है, वैसे ही हमारे शरीर में होने वाले समस्त कर्मों की अंतरात्मा केवल साक्षी मात्र है। कर्म, बंधन, सुख और दुःख सब मनोकल्पित हैं। आत्म-विचार द्वारा जब मन का लय हो जाता है, तब जीव अपने वास्तविक ब्रह्म-स्वरूप को जानकर मुक्त हो जाता है।

दैनिक जीवन में लाभ-हानि और तीव्र भावनाओं के भंवर में जब भी उलझें… तब कक्ष में जलते दीपक की भांति अपने भीतर के साक्षी चैतन्य का स्मरण करें। विचार मन के हैं, आपके आत्म-स्वरूप के नहीं—यह बोध साधते ही आपको तत्काल आंतरिक शांति की अनुभूति होगी।

इस अध्याय का सारांश

परब्रह्म से समष्टि संकल्प द्वारा हिरण्यगर्भ, और उनके माध्यम से पंचतन्मात्राओं व जगत की उत्पत्ति का महर्षि वासिष्ठ ने विशद वर्णन किया है। मिट्टी की मूर्ति, सागर की लहरें, आकाश का नीलापन और साक्षी दीपक जैसे अद्भुत दृष्टांतों से उन्होंने प्रमाणित किया कि जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है, अपितु केवल अज्ञान और मनोभ्रांति के कारण ही संसार-बंधन प्रतीत हो रहा है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: जीव ब्रह्म से पृथक नहीं है; अविद्या और मानसिक संकल्पों के कारण ही जीव-भाव का प्राकट्य हुआ है।
  • तात्विक शिक्षा: चिदाकाश में यह जगत केवल प्रतिबिंब के समान है। आत्मा निष्क्रिय और सर्वसाक्षी चैतन्य मात्र है।
  • अगले अध्याय से संबंध: मन का लय होने पर संसार का भ्रम कैसे मिटता है और विचार के द्वारा चित्तशुद्धि कैसे प्राप्त की जा सकती है, इसका निरूपण महर्षि अगले अध्याय में करेंगे।

मिट्टी की मूर्ति का आकार बदल जाने पर भी जैसे मिट्टी का स्वभाव नहीं बदलता, वैसे ही जीव-भाव में भी केवल ब्रह्म ही व्याप्त है।

अंधेरे में बालक जैसे न होने वाले भूत से डरता है, वैसे ही अज्ञानी मन स्वयं ही संसार-भय का निर्माण कर लेता है।

कक्ष में जलते दीपक की भांति आत्मा समस्त कर्मों से निर्लिप्त रहने वाला परम साक्षी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रह्म से जीव की उत्पत्ति कैसे हुई?

जैसे शांत समुद्र में वायु के वेग से तरंगें उठती हैं, वैसे ही परब्रह्म-चैतन्य में चित्त की चंचलता के कारण जीव-भाव का प्राकट्य हुआ। वास्तव में अविद्या के कारण ब्रह्म ही जीव की भांति प्रतीत हो रहा है, कोई वास्तविक पृथकता नहीं आई है।

जीव को सीमितता का अनुभव क्यों होता है?

आत्म-दर्शन के अभाव और दृढ़ वासनाओं के प्रभाव से उत्पन्न अहंकार ही जीव में सीमितता का भाव जगाता है। जैसे शून्य आकाश में नीले रंग का आरोप कर दिया जाता है, वैसे ही जीव स्वयं को बंधनों में जकड़ा हुआ मान बैठता है।

मिट्टी की मूर्ति के दृष्टांत से महर्षि वासिष्ठ ने क्या समझाया?

जैसे मिट्टी से मूर्ति बन जाने पर भी मिट्टी अपना मूल स्वरूप नहीं खोती, वैसे ही ब्रह्म के जीव रूप में भासित होने पर भी उसका नित्य शुद्ध और निर्विकार स्वभाव कभी नहीं बदलता।

आत्मा की तुलना दीपक से क्यों की गई है?

कक्ष में जलता हुआ दीपक बालक के पढ़ने के विषय से निरपेक्ष रहकर केवल प्रकाश देता है और साक्षी रहता है; वैसे ही आत्मा भी देह में होने वाले किसी भी कर्म की कर्ता न होकर केवल निर्लिप्त साक्षी मात्र है।

पंचतन्मात्राओं की उत्पत्ति कैसे हुई?

शुद्ध चित्त ने जब संकल्प शक्ति से पंचमहाभूतों की भावना की, तब शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध रूपी पंचतन्मात्राएं ठीक वैसे ही घनीभूत होकर प्रकट हुईं जैसे जल जमकर बर्फ बन जाता है।

संसार के भय का वास्तविक कारण क्या है?

जैसे अंधेरे में बालक किसी काल्पनिक भूत से डरकर कांपने लगता है, वैसे ही आत्मज्ञान से शून्य मन अपनी ही कल्पित भ्रांतियों के कारण संसार के दुखों और भयों का सृजन करता है।

निष्कर्ष

जीव, जगत और मन—ये सभी परब्रह्म-चैतन्य की ही तरंगें हैं, यह जान लेने पर समस्त संताप विलीन हो जाते हैं। तरंगों के शांत हो जाने पर निश्चल जल की भांति श्रीराम का हृदय परम शांति से भर गया। परंतु उस मन का समूल लय करके अखंड आनंद की स्थिति कैसे प्राप्त की जाए? इस विचार-मार्ग को महर्षि वासिष्ठ अगले अध्याय में कैसे उद्घाटित करते हैं, आइए दर्शन करें।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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