पत्थर जैसा बनकर बैठ जाने से भी बंधन नहीं छूटता? वशिष्ठ ने बताया ब्रह्मसाक्षात्कार का रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-6

परमात्मा न दूर है न पास — वशिष्ठ द्वारा बताया गया ब्रह्मसाक्षात्कार का रहस्य। योगवाशिष्ठ S3 EP-6 पढ़ें।

क्या मन को पत्थर जैसा कठोर बनाकर मौन बैठ जाने से मोक्ष मिल जाता है? वशिष्ठ महर्षि श्रीराम को स्पष्ट करते हैं कि ऐसा नहीं होता। कर्मों को त्यागना समाधान नहीं है, बल्कि मन को शुद्ध करते हुए आत्मज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा मार्ग है — यही योगवाशिष्ठ का उपदेश है।

हम में से बहुतों को एक भ्रम रहता है — आध्यात्मिकता का मतलब है सब कुछ छोड़कर, कुछ भी न बोलते हुए, कुछ भी न करते हुए एक कोने में बैठ जाना। दुख आए या सुख आए, पत्थर की तरह अडिग बने रहना ही ज्ञान समझ लिया जाता है। पर सच में ऐसा करने से जो शांति हम चाहते हैं वह मिलती है, या यह सिर्फ एक तरह की जड़ता बन जाती है?

यही संदेह श्रीराम के मन में भी उठा। राज-कर्तव्य, सांसारिक व्यवहार — इन सबको निभाते हुए परमात्मा तक कैसे पहुँचा जाए, यह सवाल उन्हें बेचैन कर रहा था। वशिष्ठ महर्षि ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया, वही इस अध्याय की आत्मा है।

ज्ञानयोग ही एकमात्र मार्ग

सभा-मंडप में सब लोग आँखें बंद करके वशिष्ठ महर्षि की ओर मुड़ गए। उनकी वाणी में एक अटल दृढ़ता झलक रही थी। परमेश्वर के साथ, सबके वास्तविक स्वरूप — शुद्ध चैतन्य के साथ एकत्व केवल ज्ञानयोग से ही संभव है, यह उन्होंने पहले स्पष्ट किया।

पर इसके साथ ही एक चेतावनी भी दी। केवल शरीर से जुड़े कर्मों को करते रहने से यह सिद्ध नहीं होता, यह उन्होंने सबको याद कराया।

वशिष्ठ महर्षि: कोई भी कर्म करो, वह ‘मन की शुद्धि’ के लक्ष्य से ही करना चाहिए। निर्दोष मन में ज्ञान की स्फुरणा स्वयं ही उठती है। तभी आत्मदर्शन का अनुभव मिलता है।

मृगतृष्णा जैसा भ्रम

यह कहने के बाद वशिष्ठ ने श्रीराम की ओर और सीधे देखा। सभा में सबकी नज़रें उन दोनों पर ही टिक गईं। सांसारिक व्यवहारों को गहराई से देखने के बाद ही इस निर्णय पर पहुँचे हैं, यह उन्होंने बताना शुरू किया।

वशिष्ठ महर्षि: हे रामचंद्र! इस संसार में मिलने वाले सुख-दुख का यह पूरा भ्रम — रेगिस्तान में मृगतृष्णा को पानी समझ लेने जैसा ही है। इस भ्रम को शांत करने का उपाय तत्त्वज्ञान ही है।

वशिष्ठ महर्षि: मैं कौन हूँ? ये सब कौन हैं? यह दृश्य, इस दृश्य में दिखने वाले ये शरीर क्या हैं? — इस विषय की पूरी समझ ही सब भ्रमों की सही दवा है।

न दूर है, न पास है

वशिष्ठ की वाणी अब सभा में मौजूद हर व्यक्ति को छू रही थी। वे अब सिर्फ श्रीराम से नहीं, बल्कि सभा के सभी लोगों से बात कर रहे थे, अपने उपदेश को और विस्तार दे रहे थे।

वशिष्ठ महर्षि: हे लोगों! सब वृत्तियों से परे, शुद्ध स्वरूप वाला परमात्मा कहीं दूर बैठा नहीं है। वह पास बैठा भी नहीं है। दूर या पास कहना तो तभी लागू होता है जब कोई चीज़ बाहरी हो।

वशिष्ठ महर्षि: परमात्मा तो द्रष्टा का वास्तविक स्वरूप ही है, तो फिर पास-दूर कैसे हो सकता है? स्वानंद-स्वरूप वह ब्रह्म तुम्हारे अपने शरीर में ही हर पल विद्यमान है।

कर्मों के बीच ही ज्ञान

यहाँ वशिष्ठ और गहरे उपदेश की ओर बढ़ रहे हैं, यह सभा में सभी को समझ आ गया। कर्म करें या न करें, इस दुविधा को पूरी तरह दूर कर देने वाली बात उनके मुख से निकली।

वशिष्ठ महर्षि: मैं हमेशा इंद्रिय-संबंधी अनुभवों में रुचि न रखते हुए, ज्ञान की स्थिति में ही स्थिर रहूँगा — यही भाव लेकर दृढ़ रहना सही मार्ग है।

बिना अंत वाली इच्छा का जाल

श्रीराम मौन होकर सुन रहे थे। वशिष्ठ की बातों ने उनके मन में एक सवाल जगा दिया — इच्छाओं और द्वेष के बारे में। इसका उत्तर देते हुए वशिष्ठ ने एक और उपदेश दिया।

वशिष्ठ महर्षि: हे राम! काम, क्रोध, मोह, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या — इनमें से कोई भी विकार हो, ‘यह मेरे स्वार्थ के लिए है’ सोचकर उनका पीछा नहीं करना है, यह ठान लेना चाहिए।

वशिष्ठ महर्षि: जिसे भी हम लाभ मानते हैं, वह असल में तृष्णा — यानी लालच — को ही बढ़ाता है। इस लालच के जाल से बच निकलना ही सच्ची मुक्ति है।

खुशी और संतोष, दोनों दुश्मन नहीं

सभा में कुछ चेहरों पर आश्चर्य दिखा। क्या खुशी और संतोष को भी छोड़ देने को कहा जा रहा है, यह कुछ लोगों ने सोचा। वशिष्ठ ने फौरन इस शंका को दूर कर दिया।

वशिष्ठ महर्षि: पुरुषार्थ का तत्त्वज्ञान, जो कुछ भी मिल जाए उसमें तृप्ति पाना, विषय-वासनाओं से मुक्त होकर जो है उसी में संतुष्ट रहना — ये सभी हमेशा बनाए रखने योग्य उत्तम गुण हैं।

भ्रमों से भरा सवाल

उपदेश समाप्त हो गया है, यह सभी सोच ही रहे थे कि उस क्षण श्रीराम उठकर खड़े हो गए। उनके चेहरे पर आदरपूर्ण संदेह स्पष्ट दिख रहा था। महर्षि की बातों पर वे कितना विश्वास करते हैं, यह पहले कहकर, फिर उन्होंने अपनी असली उलझन रखी।

श्रीराम: हे महर्षि! आप हमें परमात्मा की सेवा करने का आदेश दे रहे हैं। उस परमात्मा की समीपता से अद्भुत प्रभाव प्राप्त होता है, यह हम आपकी बातों से समझ रहे हैं।

श्रीराम: पर महोदय! मेरे मन में एक और उलझन आ गई है। आप जिस ‘परमात्मा’ की बात कर रहे हैं, वह कौन है? उसे जानना कैसे? उस तक पहुँचना कैसे? कृपया थोड़ा और स्पष्ट करें।

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तुम्हारे भीतर ही बसा चैतन्य

वशिष्ठ के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान चमकी। श्रीराम के सवाल को उन्होंने तुरंत जड़ से पलट दिया — वह परमात्मा कहीं दूर नहीं है, यह उन्होंने साफ कहा।

वशिष्ठ महर्षि: जिस आत्मा-भगवान की मैं बात कर रहा हूँ, वह कहीं दूर नहीं है। वह चैतन्य-रूप में हम सबके शरीर में ही निवास करता है। यह पूरा विश्व वही है।

वशिष्ठ महर्षि: पर वह विश्व-रूप नहीं बन जाता। है तो वही एक। उससे अलग विश्व नाम की कोई चीज़ कभी कहीं थी ही नहीं।

अनेकता महज़ एक भ्रम

श्रीराम की आँखों में एक और सवाल चमका। यह पूरा विश्व चैतन्य-स्वरूप ही है, तो यह बात तो सबको पहले से ही पता होनी चाहिए, यह उन्होंने तुरंत पूछा।

वशिष्ठ ने इस सवाल को शांति से स्वीकार किया। चित्तत्व एक ही है, फिर भी जड़-चैतन्य, तुम-मैं जैसे अनेक रूपों में क्यों दिखता है, यह समझाना शुरू किया।

श्रीराम: स्वामी! यह पूरा विश्व अगर चैतन्य-स्वरूप ही है, तो यह बात तो पहले से ही सबको मालूम होनी चाहिए! फिर वही चित्तत्व इस तरह जड़-चैतन्य जैसे अनेक रूपों में क्यों प्रकट होता है?

वशिष्ठ महर्षि: इस भौतिक दृष्टि से अनेकता के रूप में दिखने वाला यह दृश्य, चित्तत्व का परिणाम नहीं है। चिदात्मा या चिद्वस्तु सदा परिणाम-रहित ही बनी रहती है।

संसार आखिर क्या है

वशिष्ठ अब अपनी बातों को और सीधे, जीवन-मृत्यु की जड़ की ओर ले जा रहे थे। अनेकता के रूप में दिख रहा यह दृश्य ही सच है, ऐसा मानने वाले पशु-तुल्य चेतन जीवों की सोच को उन्होंने ‘संसार’ कहा।

इस तरह की सोच ही जन्म-मृत्यु जैसे परिणाम लाती है, यह उन्होंने साफ कर दिया। सभा में एक सन्नाटा पसर गया — जैसे यह बात हर किसी के मन में गहरे उतर गई हो।

वशिष्ठ महर्षि: इस जीव को देखो! यह अज्ञानी है, सच्चाई को न समझने वाला है, अपने वास्तविक स्वरूप-स्वभाव को भूल जाने वाला है, और इसी वजह से अनेक दुखों की श्रृंखला भोग रहा है।

वशिष्ठ महर्षि: ‘मैं यही शरीर हूँ। मेरे यह इंद्रिय-अनुभव सच हैं। दूसरों से बने ये रिश्ते-नाते सच हैं’ — यह मानने से ही यह अपने असली स्वरूप के अनुभव को छोड़कर घाटे में रहता है।

तत्त्वसाक्षात्कार नाम का मंदिर

वशिष्ठ की वाणी में अब एक करुणा भरी उत्कंठा दिखी। बाहरी वृत्तियाँ शांत होकर, भीतर की ओर मुड़ी हुई चित्तवृत्ति जब आत्मदर्शन कर लेती है, तब क्या होता है, यह वे समझाने लगे।

वशिष्ठ महर्षि: इस तरह बाहर की ओर बहती चित्तवृत्ति, नित्य-चेतन आत्मा के दर्शन से ही शांत हो जाती है। बाहरी वृत्तियाँ जब भीतर की ओर मुड़ जाती हैं, तब इस जीव में एक पूर्णता प्रकाशित होने लगती है।

वशिष्ठ महर्षि: ‘मैं पूर्ण हूँ, शुद्ध हूँ, नित्य हूँ’ — इस बोध को ही हम ‘तत्त्वसाक्षात्कार’ कहते हैं। जिसने इसे पा लिया, उसे फिर शोक और मोह नहीं सताते।

वशिष्ठ महर्षि: ब्रह्म को जान लेने वाले की हृदय-गांठें, कुसंस्कार टूट जाते हैं। ‘मैं मांस-मज्जा-हड्डी से बना एक ढांचा भर हूँ, ये सिर्फ मेरे अपने हैं, वे पराए हैं’ — जैसी सभी झूठी धारणाएँ छूट जाती हैं। सारे संदेह मिट जाते हैं। जमा हुए सारे कर्म लय हो जाते हैं।

भ्रम बनाम तत्त्वसाक्षात्कार

जीव की अज्ञान-अवस्था (संसार) तत्त्वसाक्षात्कार की अवस्था
मैं यही शरीर हूँ, यह मानना मैं चैतन्य-रूप आत्मा हूँ, यह समझ आना
इंद्रिय-अनुभवों को ही सच मान लेना इंद्रिय-अनुभव भ्रम हैं, यह जान लेना
रिश्ते-नाते हमेशा के लिए हैं, यह सोचना रिश्ते-नाते अस्थायी हैं, आत्मा ही नित्य है
बाहर खोजते रहना (दूर या पास) परमात्मा मेरे अपने शरीर में ही हमेशा मौजूद है, यह जानना
जमा हुए कर्मों का भार जमा हुए कर्मों का लय हो जाना

आध्यात्मिक सार

वशिष्ठ के इस उपदेश में एक सूक्ष्म चेतावनी छिपी है — आध्यात्मिकता का मतलब बाहर से कर्मों को छोड़ देना नहीं है, बल्कि भीतर मन की दिशा बदल देना है। जब तक मन बाहरी विषयों की ओर बहता रहता है, वह चाहे कितना भी मौन दिखे, भीतर से अशांत ही बना रहता है।

‘मैं यह शरीर हूँ, मेरे रिश्ते ही सच हैं’ — यह धारणा जीव को कैसे जकड़ रखती है, यह वशिष्ठ ने स्पष्ट किया। जब यह धारणा छूट जाती है, तब परमात्मा न दूर है न पास — यह सत्य स्वयं के अनुभव से समझ में आता है, क्योंकि वह हमारे भीतर से ही प्रकाशित हो रहा है।

आज एक पल ठहरकर देखें — ‘जो काम मैं कर रहा हूँ, उसमें मेरे मन की दिशा किस ओर है?’ बाहरी परिणाम पर ही नहीं, बल्कि उस काम को करने वाले चैतन्य पर ध्यान टिकाने की कोशिश करें — यही वशिष्ठ द्वारा बताए मार्ग का पहला कदम है।

इस अध्याय का सारांश

वशिष्ठ महर्षि श्रीराम को ब्रह्मसाक्षात्कार का उपदेश देते हैं — परमात्मा से एकत्व केवल ज्ञानयोग से ही संभव है, पर मन की शुद्धि को लक्ष्य बनाकर ही कर्म करना चाहिए। संसार के सुख-दुख मृगतृष्णा जैसे भ्रम हैं, और तत्त्वज्ञान ही उनकी एकमात्र दवा है। परमात्मा न दूर है न पास, वह हमारे अपने शरीर में ही निवास करता है, यह वे समझाते हैं। जब श्रीराम पूछते हैं कि वह परमात्मा कौन है, उसे कैसे जाना और पाया जाए, तो वशिष्ठ बताते हैं कि आत्मा हमारे भीतर ही चैतन्य-रूप में है, और अनेकता महज़ एक भ्रम है। ‘मैं यही शरीर हूँ’ — इस धारणा को ही संसार कहकर, इसे छोड़ने वाले को शोक-मोह नहीं सताते और जमा हुए कर्म लय हो जाते हैं, यह कहकर वे उपदेश पूरा करते हैं।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: परमात्मा न दूर है न पास — वह हमारे अपने असली स्वरूप, यानी चैतन्य में ही हर पल प्रकाशित हो रहा है। इसे समझ लेना ही तत्त्वसाक्षात्कार है।
  • तात्विक शिक्षा: कर्मों को छोड़ देना मोक्ष नहीं है; मन को शुद्ध करते हुए, ‘मैं यही शरीर हूँ’ इस धारणा को छोड़कर, अपने असली स्वरूप का ज्ञान पाना ही सच्चा मार्ग है।
  • अगले अध्याय से संबंध: परमात्मा हमारे भीतर ही है, यह जानते हुए भी यह जीव भ्रमों में क्यों उलझा रहता है? इस सवाल का और गहरा उत्तर वशिष्ठ अगले अध्याय में देंगे।

परमात्मा न दूर बैठा है, न पास बैठा है — वह द्रष्टा का वास्तविक स्वरूप ही है।

अनेकता के रूप में दिखने वाला यह दृश्य चित्तत्व का परिणाम नहीं है।

‘मैं पूर्ण हूँ, शुद्ध हूँ, नित्य हूँ’ — इस बोध को ही तत्त्वसाक्षात्कार कहते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रह्मसाक्षात्कार का मतलब क्या है?

ब्रह्मसाक्षात्कार का मतलब है यह समझ आना कि मैं पूर्ण हूँ, शुद्ध हूँ, नित्य हूँ। यह सिर्फ शब्दों का ज्ञान नहीं है, बल्कि मन शुद्ध होने पर स्वयं ही उठने वाला अनुभव है।

कर्म करना क्या मोक्ष में बाधा नहीं बनता?

नहीं। कर्म करना बाधा नहीं है, बल्कि उन्हें किस भाव से किया जा रहा है, यह ज़रूरी है। वशिष्ठ के अनुसार, मन की शुद्धि के लक्ष्य से कर्म करने पर ज्ञान स्वयं ही जाग्रत हो जाता है।

परमात्मा दूर है या पास है?

दोनों नहीं, ऐसा वशिष्ठ महर्षि कहते हैं। दूर-पास की बात बाहरी वस्तुओं पर लागू होती है। परमात्मा तो द्रष्टा का असली स्वरूप ही है, इसलिए उसमें दूर-पास का भेद नहीं होता।

योगवाशिष्ठ में संसार को कैसे परिभाषित किया गया है?

अनेकता के रूप में दिखने वाला यह दृश्य ही सच है, ऐसा मानने वाले चेतन जीवों की सोच को ही योगवाशिष्ठ में संसार कहा गया है। यही सोच जन्म-मृत्यु का कारण बनती है।

अगर यह विश्व चैतन्य-स्वरूप ही है, तो यह अनेक रूपों में क्यों दिखता है?

भौतिक दृष्टि से अनेकता के रूप में दिखने वाला यह दृश्य चित्तत्व का परिणाम नहीं है, यह वशिष्ठ कहते हैं। चिदात्मा हमेशा परिणाम-रहित ही रहती है; अनेकता केवल भौतिक दृष्टि का भ्रम है।

तत्त्वसाक्षात्कार पाने वाले व्यक्ति को क्या होता है?

तत्त्वसाक्षात्कार पाने वाले व्यक्ति को शोक और मोह नहीं सताते। उसकी हृदय-गांठें, कुसंस्कार टूट जाते हैं, सारे संदेह मिट जाते हैं, और जमा हुए सारे कर्म लय हो जाते हैं।

निष्कर्ष

वशिष्ठ के इस उपदेश के साथ सभा में एक गहरा सन्नाटा फैल गया। परमात्मा कहीं दूर नहीं, हमारे अपने शरीर में ही चैतन्य-रूप में मौजूद है, यह जानते हुए भी यह जीव अज्ञान में क्यों भटकता रहता है, यह सवाल श्रीराम के मन में उठा। इस भ्रम की जड़ को वशिष्ठ महर्षि अगले अध्याय में और गहराई से खोलकर बताएंगे।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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