अगर ब्रह्मांड ही एक सपना है, तो हम असल में हैं कहाँ? | Yoga Vasistha S3 EP-19

ब्रह्मांड हीरे जैसा कठोर है या सिर्फ भ्रम? वशिष्ठ मुनि ने राम को समझाया गहरा सत्य - योगवाशिष्ठ S3 EP-19।

ब्रह्मांड, संसार और दूरी – ये सब केवल भ्रम मात्र हैं, ऐसा योगवाशिष्ठ कहता है। वास्तव में आकाश के अलावा कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं। वासनाओं के प्रभाव से ही चित्त में ये सारे दृश्य प्रतिबिंबित होते हैं। वासनाएँ न हों तो न ब्रह्मांड है, न संसार है – चिदाकाश ही हर जगह शांत होकर प्रकाशमान है।

हम रोज़ सोते हैं। सपने में एक पूरी दुनिया दिखाई देती है – लोग, गाँव, दुख, सुख। जागने के बाद यह सब गायब हो जाता है। लेकिन जब हम उस सपने के बीच होते हैं, तो वह कितना सच लगता है?

श्रीराम के मन में भी ऐसा ही एक संदेह उठा। लीलादेवी और सरस्वतीदेवी की कथा में दो स्त्रियाँ एक छोटे-से ब्राह्मण घर के आकाश से ही दूसरे ब्रह्मांड में यात्रा कर गईं। अगर वह ब्रह्मांड हीरे जैसा कठोर माना जाता है, तो वे उसे कैसे पार कर पाईं? इसी प्रश्न के साथ वशिष्ठ मुनि राम के सामने संसार का असली स्वरूप खोलने वाले हैं।

राम का संदेह – हीरे जैसा कठोर ब्रह्मांड

सभा में श्रीराम थोड़ा आगे झुककर बैठे थे। उनकी आँखों में एक गहरा विचार घूम रहा था। लीलादेवी की कथा सुनते-सुनते उनके मन में एक बड़ा सवाल जन्म ले चुका था।

उन्होंने वशिष्ठ मुनि की ओर देखते हुए धीरे से पूछा।

श्रीराम: मुनिवर! ये लीला-जन्म मुझे बहुत विचित्र लगते हैं। मुझे समझ आ रहा है कि इतने सारे जीवों की परंपराएँ आपस में जुड़ी हुई हैं। पर एक शंका है – वह ब्रह्मांड करोड़ों योजन विस्तार वाला और हीरे जैसा कठोर माना जाता है, है न? तो फिर वे दोनों स्त्रियाँ उन ब्रह्मांडों को भेदकर बाहर कैसे आ गईं?

वशिष्ठ का उत्तर – अंतःपुर का आकाश ही ब्रह्मांड है

वशिष्ठ मुनि मुस्कुराते हुए राम की आँखों में देखने लगे। मानो उनके प्रश्न की ईमानदारी को सराहते हुए उन्होंने सिर हिलाया।

फिर उन्होंने समझाना शुरू किया।

वशिष्ठ मुनि: हे रामचंद्र! तुम्हारा प्रश्न ठीक है। लेकिन ब्रह्मांड का उठना, उसका हीरे जैसा कठोर होना – यह कहाँ से आया? वे दोनों तो अब भी उसी अंतःपुर के आकाश में हैं! उस पहाड़ी गाँव के घर के आकाश में ही तो ‘वशिष्ठ’ नाम का एक ब्राह्मण रह चुका था न! उसी शून्य आकाश में वह राजा बना और एक विशाल राज्य भी चलाया।

अरुंधती रानी का राज्य-अनुभव

वशिष्ठ मुनि ने अपनी बात आगे बढ़ाई, राम के चेहरे पर बढ़ती जिज्ञासा को देखते हुए।

वशिष्ठ मुनि: वही अरुंधती रानी बनकर उस राज्य का भोग किया। लीला नाम की उस रानी ने सरस्वती देवी की आराधना की, और उनकी कृपा से उसी घर के आकाश में रहते हुए ही, उन्हीं के साथ मिलकर अद्भुत आकाश-मंडलों को पार किया।

सपने में सपना – निद्रा के भीतर का स्वप्न

सभा में सन्नाटा छा गया। वशिष्ठ मुनि की बातें एक-एक करके सबके मन में गहराई से उतर रही थीं। उन्होंने उस रहस्य को और स्पष्ट करके समझाया।

वशिष्ठ मुनि: वे दोनों उसी सीमित घर के आकाश में रहते हुए एक और ब्रह्मांड की यात्रा कर रही थीं। यह सब कुछ… एक नींद के भीतर के सपने से दूसरी नींद के भीतर के सपने में प्रवेश करने जैसा ही है!

सिर्फ भ्रम – आकाश के सिवा कुछ और नहीं

वशिष्ठ मुनि की आँखों में एक गहरी शांति झलक रही थी। अब वे इस पूरे रहस्य की जड़ को खोलने जा रहे थे।

सभा में सब और आगे झुककर सुनने लगे।

वशिष्ठ मुनि: इसलिए समझो, यह सब मात्र भ्रम है। वास्तव में ‘आकाश’ के अलावा कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं। ‘ब्रह्मांड – संसार – दूरी’ जैसे शब्द सब मिथ्या हैं। वासनाओं के प्रभाव से ही उन दोनों के चित्त में ये मनोहर दृश्य प्रतिबिंबित हो रहे हैं।

वासनाएँ ही ब्रह्मांड की जड़ हैं

वशिष्ठ मुनि कुछ पल रुके, ताकि सभा उनकी बातों का वज़न समझ सके। फिर उन्होंने आगे कहना शुरू किया।

वशिष्ठ मुनि: वासनाएँ ही न हों, तो ब्रह्मांड कहाँ? संसार कहाँ? उनके चित्त की चमत्कारिक शक्ति से ही चिदाकाश आवरण-सहित ब्रह्मांड जैसा रचा गया है। समझो कि चिदाकाश हर जगह, हमेशा, जन्मरहित होकर शांत बना रहता है।

अज्ञान ही हीरे जैसा दिखता है

सभा में कोई एक शब्द भी नहीं बोला। वशिष्ठ मुनि की बातों ने गहरे मौन को जन्म दिया। उन्होंने इस तत्व को और स्पष्ट करते हुए आगे बढ़ाया।

वशिष्ठ मुनि: चिदाकाश स्वयं अपने भीतर ही ‘जगत’ के रूप में प्रकाशित होता है। जो इस तत्व को समझ लेते हैं, उन्हें यह दिखने वाला जगत आकाश से भी कहीं अधिक शून्य प्रतीत होता है। कुछ लोग इसे समझ पाते हैं। पर कुछ लोग… नहीं समझ पाते। क्यों? इसका कारण है अज्ञान। उसी अज्ञान के कारण यह सब हीरे जैसा दृढ़ प्रतीत होता है।

सपने के शहर – सच या झूठ?

वशिष्ठ मुनि अब एक सरल उदाहरण से इस गहरे तत्व को सबके लिए समझाने लगे। सभा में हर किसी के चेहरे पर जिज्ञासा झलक रही थी।

वशिष्ठ मुनि: सपने में शहर, रिश्तेदार – सपने के दौरान वे सब वास्तविक जैसे ही अनुभव होते हैं न! पर क्या वे सच हैं? नहीं। यह संसार जो असत्य होते हुए भी, चित्त-तत्व में सत्य जैसा प्रतीत होता है। विशाल रेगिस्तान में दिखने वाले मृगतृष्णा में पानी होने का भ्रम सच नहीं होता न! क्या सोने में आभूषण होने का गुण पहले से रहता है? आत्मा में ये सारे दिखने वाले दृश्य असत्य होते हुए भी सत्य जैसे दिखाई देते हैं।

वशिष्ठ मुनि द्वारा बताया गया ब्रह्मांड-भ्रम का तत्व – तीन उदाहरण

उदाहरण जो सत्य यह दर्शाता है
नींद के भीतर के सपने से दूसरे सपने में प्रवेश करना एक ब्रह्मांड के भीतर ही दूसरा ब्रह्मांड भ्रम के रूप में दिखना संभव है
रेगिस्तान में दिखने वाली मृगतृष्णा में पानी का भ्रम संसार असत्य होते हुए भी सत्य जैसा अनुभव होना
सोने में आभूषण होने का गुण है या नहीं, यह प्रश्न आत्मा में जगत एक कल्पित रूप मात्र है, अलग कोई वस्तु नहीं

आध्यात्मिक निहितार्थ

इस प्रसंग का असली सत्य यही है – दूरी, आकार, कठोरता जैसी भावनाएँ मन की रची हुई भ्रांतियाँ मात्र हैं। एक छोटे से घर के आकाश में ही अनंत ब्रह्मांड समा सकते हैं, क्योंकि वास्तव में आकाश के सिवा कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं।

वासना का अर्थ है पिछले अनुभवों की छाप, इच्छाओं का संस्कार। इन्हीं वासनाओं के आधार पर चित्त स्वयं अपने लिए दुनिया रचता है। जब तक अज्ञान है, तब तक यह रचना हीरे जैसी कठोर, अभेद्य लगती है। जब ज्ञान आता है, तो वही रचना आकाश से भी हल्की, शून्य जैसी दिखाई देने लगती है।

अगर आपके जीवन में कोई समस्या हीरे जैसी कठोर, न टलने वाली लगती है – तो एक बार खुद से पूछिए कि क्या वह वाकई इतनी कठोर है, या आपके मन ने ही उसे यह भार दिया है। यह देखिए कि कौन-सा डर, कौन-सा बंधन आपको जकड़े हुए है।

इस अध्याय का सारांश

श्रीराम पूछते हैं कि जब ब्रह्मांड हीरे जैसा कठोर माना जाता है, तो लीलादेवी और सरस्वतीदेवी उसे कैसे पार कर पाईं। वशिष्ठ मुनि उत्तर देते हैं कि वे दोनों अब भी उसी छोटे से घर के आकाश में हैं, और यह एक नींद के भीतर के सपने से दूसरे सपने में प्रवेश करने जैसा है। ब्रह्मांड, संसार, दूरी – ये सब मिथ्या हैं, आकाश के अलावा कोई वस्तु नहीं है, और वासनाओं के प्रभाव से ही चित्त में ये दृश्य प्रतिबिंबित होते हैं, यह वे समझाते हैं। अज्ञान के कारण ही यह सब हीरे जैसा दृढ़ दिखता है, और ज्ञानियों को यह शून्य जैसा प्रतीत होता है, यह कहकर वे बात समाप्त करते हैं।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: ब्रह्मांड, संसार और दूरी जैसी भावनाएँ चित्त की रची हुई भ्रांतियाँ मात्र हैं; वास्तव में चिदाकाश के सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं है।
  • तात्विक शिक्षा: वासनाओं के प्रभाव से ही जीव अपने चित्त में दुनिया, दूरियाँ और आकार गढ़ता है। अज्ञान इस रचना को हीरे जैसा कठोर दिखाता है, जबकि ज्ञान इसे आकाश से भी हल्का दिखाता है।
  • अगले अध्याय से संबंध: लीलादेवी अपने पूर्वजन्म की स्मृतियों को गाँव में घूमते हुए और गहराई से याद करती है – यह कथा अगले एपिसोड में जारी रहेगी।

आकाश के सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं है – बाकी सब मिथ्या है।

नींद के भीतर के सपने से दूसरे सपने में प्रवेश करना ही इन ब्रह्मांडों का रहस्य है।

वासनाएँ न हों, तो ब्रह्मांड कहाँ? संसार कहाँ?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

योगवाशिष्ठ में ब्रह्मांड का क्या अर्थ है?

योगवाशिष्ठ के अनुसार ब्रह्मांड चित्त द्वारा अपनी वासनाओं के आधार पर रची गई एक कल्पित रचना मात्र है। वास्तव में आकाश के सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं है, ब्रह्मांड का आकार और कठोरता सब मिथ्या है।

लीलादेवी और सरस्वतीदेवी ब्रह्मांड को कैसे पार कर पाईं?

वास्तव में उन्होंने किसी ब्रह्मांड को भेदा नहीं – वे अब भी उसी छोटे से घर के आकाश में हैं। वशिष्ठ मुनि बताते हैं कि यह एक नींद के भीतर के सपने से दूसरे सपने में प्रवेश करने जैसा है।

योगवाशिष्ठ में वासना का क्या अर्थ है?

वासना का अर्थ है पिछले अनुभवों की छाप, इच्छाओं का संस्कार। इन्हीं वासनाओं के प्रभाव से चित्त में संसार के दृश्य और ब्रह्मांड प्रतिबिंबित होते हैं, यह वशिष्ठ मुनि बताते हैं।

योगवाशिष्ठ संसार को मिथ्या क्यों कहता है?

योगवाशिष्ठ कहता है कि संसार चित्त द्वारा रचा गया एक कल्पित अनुभव मात्र है। जैसे रेगिस्तान में मृगतृष्णा में पानी दिखता है, वैसे ही संसार असत्य होते हुए भी सत्य जैसा अनुभव होता है।

अज्ञान ब्रह्मांड को हीरे जैसा कठोर कैसे दिखाता है?

जब तक अज्ञान है, चित्त की रची हुई दुनिया अभेद्य और कठोर लगती है। जब ज्ञान आता है, वही दुनिया आकाश से भी अधिक शून्य और हल्की दिखाई देने लगती है, यह वशिष्ठ मुनि सिखाते हैं।

निष्कर्ष

वशिष्ठ मुनि की बातों ने सभा में एक गहरा मौन भर दिया। ब्रह्मांड, संसार, दूरी – यह सब मिथ्या है, यह जानते हुए भी उस सत्य को अनुभव में लाना कितना कठिन है, यह सबको समझ आ गया। लीलादेवी अपने पूर्वजन्म की स्मृतियों को और कितनी गहराई से याद करेगी, उस गाँव में वह क्या देखने वाली है – यह हम अगले एपिसोड में जानेंगे।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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