आँखों के सामने दिखाई देने वाला यह विचित्र संसार वास्तविक है या केवल मन द्वारा रचा गया एक भ्रम—इस प्रश्न का योगवाशिष्ठ अत्यंत स्पष्ट उत्तर देता है। दूध में घी, सुवर्ण में आभूषण और समुद्र में तरंगों के समान यह समस्त सृष्टि परब्रह्म का ही स्वरूप है। महर्षि वशिष्ठ ने प्रमाणित किया कि आत्म-विचार से युक्त ज्ञानदृष्टि जागृत होने पर यह संपूर्ण बाह्य दृश्य अपने ही स्वरूप चैतन्य में विलीन हो जाता है।
हम अपने चारों ओर उपस्थित मनुष्यों, वस्तुओं और नित्य अनुभव होने वाले सुख-दुःखों को सत्य मानकर जीवन भर भटकते रहते हैं। किंतु यदि तनिक ठहरकर विचार करें—तो जैसे नींद में दिखा स्वप्न जागते ही विलीन हो जाता है, वैसे ही क्या हमारा यह दृश्यमान संसार भी किसी उच्चतर सत्य पर आधारित है? यह संदेह प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के मन में कभी न कभी अवश्य उठता है।
ठीक इसी गहन जिज्ञासा के साथ श्रीराम राजसभा के मध्य खड़े हुए और उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से प्रश्न किया। ‘मैं’ और ‘जगत’ के द्वैत भाव का मूल रहस्य उजागर करते हुए महर्षि द्वारा प्रारंभ किया गया यह जगत-स्वभाव विचार, समस्त जीवों की भ्रांति को मिटा देने वाली एक अद्भुत आध्यात्मिक यात्रा है।
श्रीराम की जिज्ञासा — भ्रांति का मूल कारण क्या है?
राजसभा में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। ब्रह्मज्ञान का अभ्यास करने वाले महर्षि और विद्वान परम एकाग्रता से बैठे थे। श्रीराम के मुख पर सत्य की खोज का तेज स्पष्ट रूप से झलक रहा था। गुरुदेव के सम्मुख हाथ जोड़कर रघुनंदन अत्यंत विनम्रता से खड़े हुए।
उस शांत सभा में रघुवीर ने अपनी गंभीर वाणी से अपनी शंका व्यक्त की।
श्रीराम: हे महात्मा! ब्रह्मज्ञान के श्रेष्ठतम ज्ञाता हे मुनींद्र! आपके उपदेशों से मैं यह तो समझ रहा हूँ कि ‘मैं’ और ‘यह जगत’ केवल एक भ्रांति मात्र हैं। किंतु किस कारण से इस भ्रांति की उत्पत्ति होती है? यदि इसका कोई कारण नहीं है, तो फिर यह सब किस प्रकार विस्तृत हो रहा है? इनके वास्तविक स्वरूप और स्वभाव के विषय में मुझे विस्तार से उपदेश दीजिए!
आत्म-विचार के आठ मार्ग — विदितवेद्य के लक्षण
श्रीराम का प्रश्न सुनकर महर्षि वशिष्ठ के मुख पर एक सौम्य मुस्कान तैर गई। समस्त श्रोताओं के हृदय को छूते हुए महर्षि ने अमृततुल्य ज्ञानधारा प्रवाहित करना आरंभ किया। उन्होंने सत्य-साधना में सूक्ष्म बुद्धि के महत्व को रेखांकित किया।
महर्षि ने सीधे श्रीराम की ओर दृष्टि डालकर गंभीर स्वर में कहा।
महर्षि वशिष्ठ: हे राम! तुम्हारा प्रश्न अत्यंत श्रेष्ठ है। साधक को अपनी शुद्ध और अत्यंत सूक्ष्म बुद्धि से पहले इन आठ प्रश्नों पर विचार करना चाहिए—’मैं कौन हूँ? यह मन या चित्त क्या है? मुझे इस जगत की प्राप्ति कैसे हुई? मेरे द्वारा अनुभव किए जाने वाले इन पदार्थों और व्यक्तियों से बने संबंध सत्य हैं या कल्पित? यदि वे कल्पित हैं, तो उनकी कल्पना करने वाला मैं स्वयं हूँ या कोई बाह्य सत्ता? यदि कोई बाह्य सत्ता यह कर रही है, तो वह किस प्रयोजन से कर रही है? उपनिषद् और आत्मज्ञानियों के अनुभव इस विषय में क्या समाधान देते हैं? और बुद्धि को दोषरहित बनाकर विकसित करने के उत्तम मार्ग क्या हैं?’
महर्षि वशिष्ठ: हे रघुनंदन! जो साधक निरंतर इन प्रश्नों पर विचार करते हुए तीव्र पुरुषार्थ का आश्रय लेता है, वही ‘विदितवेद्य’ बनता है—अर्थात वह जानने योग्य परम सत्य को जान लेता है। तब उसके समक्ष यह स्पष्ट हो जाता है—’मैं शुद्ध चैतन्य स्वरूप हूँ। यह समस्त भ्रांति चैतन्य में ही स्थित है। चैतन्य के बाहर कोई भी पदार्थ नहीं है। जो मेरा स्वरूप नहीं है, ऐसा कुछ भी मेरे समक्ष प्रकाशित नहीं हो रहा है!’ ऐसा ज्ञानी समस्त जीवों का अंतर्यामी होकर, सर्वथा निष्क्रिय और असंग भाव में स्थित रहता है।
महर्षि वशिष्ठ: केवल पुरुषार्थ करने वाला साधक ही इस विदितवेद्य अवस्था को प्राप्त करता है। जो उत्तम साधना नहीं करता, वह अप्रयत्नशील व्यक्ति इस भ्रमपूर्ण संसार-चक्र में व्यर्थ ही ऊपर-नीचे भटकता रहता है। तीनों कालों में केवल वही परब्रह्म सत्य है। तुम्हें और मुझे निमित्त बनाकर, योग्य साधकों के कल्याण हेतु मैं इस परमात्म-तत्व को संसार के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ।
स्वर्ण और आभूषण — अवयवों के पीछे स्थित अवयवी
सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति श्वास रोककर सुन रहा था। महर्षि ने तात्विक सत्य को सिद्ध करने के लिए दैनिक जीवन के सहज दृष्टांत प्रस्तुत किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इंद्रियों द्वारा दिखाई देने वाला यह जगत वास्तव में मूल तत्व ब्रह्म से भिन्न नहीं है।
वशिष्ठ जी ने अपने उपदेश को आगे बढ़ाते हुए कहा।
महर्षि वशिष्ठ: हे रामचंद्र! संसार में पंच ज्ञानेंद्रियों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले किसी भी पदार्थ का कोई स्थायी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। ये सभी ब्रह्म में ही ब्रह्म रूप से प्रकाशित हो रहे हैं। क्या स्वर्ण से आभूषण भिन्न है? क्या तरंग से जल भिन्न है? आभूषण बन जाने मात्र से स्वर्ण अपना मूल स्वरूप नहीं खो देता! हम आभूषण को हार या कंगन जैसे नाम अवश्य दे देते हैं, किंतु मूल रूप में वह केवल स्वर्ण ही है।
महर्षि वशिष्ठ: शरीर धारण करने वाले अवयवी (चेतन पुरुष) को देखो। वह आँखों से देखता है, कानों से सुनता है और त्वचा से स्पर्श का अनुभव करता है। समस्त इंद्रिय-क्रियाओं का कर्ता होने पर भी वह स्वयं केवल दर्शन, श्रवण या स्पर्श रूप में नहीं बदल जाता! ठीक उसी प्रकार, अवयवरहित चिद्वस्तु (चैतन्य) सर्वात्मक होकर अनेक रूपों में भासित होने पर भी सदा अपने शुद्ध स्वरूप में ज्यों की त्यों स्थित रहती है।
सूर्य की किरणों का प्रकाश — स्फटिक में वन का प्रतिबिंब
ज्ञान श्रोताओं के मनों में और अधिक गहराई से उतर रहा था। यह समझाते हुए कि अज्ञान भी ब्रह्म के स्वभाव का ही एक अंश है, महर्षि ने सूर्य का एक अनुपम दृष्टांत दिया। सभा के साधकों ने अनुभव किया कि महर्षि के विवेचन से उनके संशय एक-एक कर समाप्त हो रहे थे।
महर्षि वशिष्ठ ने आत्मतत्व के रहस्य को स्पष्ट करते हुए गंभीरतापूर्वक कहा।
महर्षि वशिष्ठ: जैसे सूर्य से ही सूर्य की किरणें निकलती हैं, वैसे ही जीवों के अंतःकरण में अज्ञानवश उत्पन्न होने वाली ‘मैं और जगत’ की भावनाएँ भी ब्रह्म का ही स्वभाव हैं, ऐसा जानो। इससे परब्रह्म में कोई न्यूनता या विकार नहीं आता। अज्ञान को स्वीकार करना भी ब्रह्म की ही सामर्थ्य है—यह जानने पर ही सर्वात्मकता का अनुभव होता है। तभी अनेकता का यह जगत-रूपी रोग समूल नष्ट होता है।
महर्षि वशिष्ठ: मान लो किसी निर्मल स्फटिक शिला या दर्पण के सामने सघन वन का प्रतिबिंब पड़ रहा हो। क्या दर्पण में दिखने वाला वह वन दर्पण से भिन्न है? कदापि नहीं! जैसे दर्पण में दिखने वाला तुम्हारा मुख दर्पण से भिन्न नहीं है, वैसे ही चिन्मय परमेश्वर से यह अहंभाव और जगत भिन्न नहीं है। किंतु अज्ञानियों को यह पृथक प्रतीत होता है।
महासागर की तरंगें — सृष्टि और स्थिति का आंतरिक अर्थ
महर्षि के वचनों से श्रीराम का चित्त परम शांति की ओर अग्रसर हो रहा था। ब्रह्म रूपी अनंत महासागर में विश्व किस प्रकार उत्पन्न होते हैं, यह समझाते हुए वशिष्ठ जी ने सिद्ध किया कि सृष्टि का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
दृष्टांत को आगे बढ़ाते हुए वशिष्ठ जी ने स्पष्ट रूप से बोध कराया।
महर्षि वशिष्ठ: समुद्र के जल से अनेक तरंगें उठती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं। यद्यपि वे तरंगें जल से भिन्न नाम और रूप में दिखाई देती हैं, फिर भी क्या कोई कह सकता है कि तरंग जल से भिन्न है? ठीक इसी प्रकार, ब्रह्म रूपी महासागर में अनंत सृष्टियाँ रूपी तरंगें उठती हैं और पुनः उसी में लीन हो जाती हैं। वे समस्त सृष्टियाँ ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीं हैं।
महर्षि वशिष्ठ: हे रघुकुल तिलक! वास्तव में परब्रह्म सर्वथा पदार्थरहित है। सृष्टि में परब्रह्म नहीं है और न ही परब्रह्म में सृष्टि है। परब्रह्म की दृष्टि से देखने पर सृष्टि जैसी कोई वस्तु ही नहीं है। सृष्टि केवल भेद-दृष्टि रखने वालों को ही प्रतीत होती है। अखंड, अप्रमेय और अद्वितीय तत्व-दृष्टि से देखने पर जो कुछ भी विद्यमान है, वह केवल एक अद्वितीय परमात्मा ही है!
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इस अध्याय में महर्षि वशिष्ठ द्वारा उपदेशित निर्गुण परब्रह्म तत्व और अंतर्मुखी ध्यान के नित्य अभ्यास के लिए पद्मासन में स्थित यह ध्यानी शिव प्रतिमा एक पवित्र प्रतीक है।
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निमेष के लक्षांश में पंचमहाभूतों का विस्तार
सृष्टि का आरंभ कैसे होता है, यह स्पष्ट करने का समय आ गया था। चैतन्य अपने संकल्प मात्र से किस प्रकार क्रमशः पंचमहाभूतों का रूप धारण करता है, महर्षि ने इसे शास्त्रीय रीति से सिद्ध किया। उन्होंने दर्शाया कि यह संपूर्ण प्रक्रिया क्षणमात्र में घटित होने वाली एक विचित्र लीला है।
श्रीराम को सृष्टि-विस्तार का क्रम समझाते हुए महर्षि ने कहा।
महर्षि वशिष्ठ: हे राम! अज्ञानियों को दृश्य रूप में जो कुछ दिखाई देता है, वह केवल माया का आभास मात्र है। समस्त कारणों के मूल कारण ब्रह्म में सर्वप्रथम शब्द तन्मात्रा लीन होकर आकाश का रूप धारण करती है। वही आकाशरूप ब्रह्म स्पर्श तन्मात्रा से युक्त होकर वायु बनता है। वही वायुरूप ब्रह्म रूप तन्मात्रा से मिलकर तेज (अग्नि) का रूप लेता है। वही तेजोमय ब्रह्म रस तन्मात्रा से मिलकर जल का भाव प्राप्त करता है। और वही जलरूप ब्रह्म गंध तन्मात्रा से युक्त होकर पृथ्वी का स्वरूप धारण करता है।
महर्षि वशिष्ठ: इस प्रकार यह जगत चिन्मय रूप में ही प्रकाशित होता है। यह सब निमेष (पलक झपकने) के लाखवें भाग में ही संपन्न हो जाता है। चाहे सृष्टि करोड़ों कल्पों तक विस्तृत रहे, परब्रह्म में कोई परिवर्तन नहीं होता। वह विशुद्ध, नित्यप्रकाशवान, सृष्टि और प्रलय से परे, तथा उदय और अस्त से रहित है। वह बिना किसी आधार के केवल अपनी ही महिमा में सर्वथा निर्लिप्त और निष्कलंक स्थित रहता है।
मिट्टी की मूर्तियाँ — मृगतृष्णा का सत्य
उदाहरणों की अनवरत श्रृंखला से वशिष्ठ जी श्रीराम के चित्त को घेरे हुए भ्रम का निवारण कर रहे थे। क्या भौतिक पदार्थ सचमुच रूपांतरित होते हैं या केवल हमारी दृष्टि का भ्रम है, इसे उन्होंने शिल्पकला के एक सहज उदाहरण से स्पष्ट किया।
वशिष्ठ जी की वाणी सभा में गूँज उठी।
महर्षि वशिष्ठ: मान लो हमने मिट्टी से कोई मूर्ति बनाई—उस मूर्ति के निर्माण से पूर्व भी केवल मिट्टी ही थी! यदि वह मूर्ति टूटकर खंडित भी हो जाए, तो भी मिट्टी ही शेष रहेगी। काष्ठ (लकड़ी) से बनी मूर्ति भी वस्तुतः काष्ठ ही है। यह जगत भी उत्पत्ति से पूर्व ब्रह्म ही था, वर्तमान में प्रतीत होते समय भी ब्रह्म है, और लय होने के पश्चात भी ब्रह्म ही रहता है। जैसे विशाल मरुस्थल में मृगतृष्णा का जल भ्रम उत्पन्न करता है, वैसे ही यह संपूर्ण जगत चिन्मय चमत्कार के कारण सत्य जैसा प्रतीत होता है।
दूध में घी, बीज में अंकुर — अभिन्न चैतन्य
प्रकृति के स्वाभाविक नियमों का उल्लेख करते हुए महर्षि ने दृष्टा और दृश्य के अभेद को उद्घाटित किया। उन्होंने स्मरण कराया कि जिस प्रकार किसी वस्तु से उसके स्वाभाविक गुण को अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार परमात्मा से सृष्टि को पृथक नहीं देखा जा सकता।
महर्षि वशिष्ठ ने आत्म-ऐक्य के भाव को समझाते हुए कहा।
महर्षि वशिष्ठ: दूध में घी छिपा हुआ है, बीज में वृक्ष उत्पन्न करने की अंकुर शक्ति निहित है, वायु में स्पर्श और गतिशीलता है, काली मिर्च में तीखापन है और जल में तरलता है। ये सभी गुण अपने मूल पदार्थों से भिन्न नहीं हैं। उसी प्रकार, जब ब्रह्म-सत्ता ही दृश्य के रूप में प्रतीत हो रही है, तब दृष्टा से भिन्न कोई दृश्य कहीं है ही नहीं। ब्रह्म से पृथक जगत का कोई अस्तित्व न होने के कारण ही ज्ञानियों ने इसे ‘मिथ्या’ प्रतिपादित किया है।
वासना-चित्र को मिटाने वाला दृढ़ाभ्यास
सृष्टि के आरंभ का कोई बाह्य कारण नहीं है, केवल मन के संकल्प-विकल्प ही इस संसार का निर्माण करते हैं—महर्षि ने इस सत्य को स्थापित किया। उन्होंने श्रीराम को मन के अतिक्रमण का दिव्य मार्ग उपदेशित किया।
वशिष्ठ जी ने दृढ़ स्वर में कहा।
महर्षि वशिष्ठ: बिना किसी बाह्य कारण के ही ब्रह्म जगत रूप में प्रकाशित हो रहा है। वासनाओं का चित्र ही मन है। जब तक मन का अस्तित्व है, तभी तक यह संसार रूपी जगत है। यह मन अपने सामर्थ्य से ‘जगत और जीव’ के भ्रम का स्वयं अनुभव करता है। पुरुषार्थ और दृढ़ाभ्यास द्वारा जब मन का लय हो जाता है, तब ज्ञानी की दृष्टि में इस जगत का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। जल में तरंगें, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति की अवस्थाएँ और देह आते-जाते रहते हैं; किंतु ज्ञानी देहाध्यास से मुक्त होकर नित्यानंद स्वरूप में ही विराजमान रहता है।
ईश्वर चैतन्य और जीव चैतन्य — अहं ब्रह्मास्मि
उपदेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुका था। जीव और ईश्वर भिन्न नहीं हैं, बल्कि एक ही महाचैतन्य अहंकार रूपी मेघ को धारण करने के कारण जगत रूप में प्रतीत हो रहा है—महर्षि ने इस अद्वैत सत्य का उद्घाटन किया। सभा में उपस्थित सभी के हृदयों में आत्मज्ञान का आलोक भर गया।
महर्षि वशिष्ठ ने अपना अंतिम संदेश इस प्रकार घोषित किया।
महर्षि वशिष्ठ: हे राघव! यह जान लो कि ईश्वर चैतन्य और जीव चैतन्य—ये दोनों ही कारण, कार्य और उपाधि से सर्वथा रहित हैं! जो इनके अभेद और ऐक्य को पहचान लेते हैं, वे ही इस संसार को जीतते हैं। जैसे आकाश पर मेघों का आवरण छा जाता है, वैसे ही वह ईश्वर चैतन्य ही अहंभाव का आवरण ग्रहण कर लेता है। उस अहंकार के आवरण से जगत की भावना को प्राप्त होने वाला ईश्वर चैतन्य ही यह जगत है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ यह महावाक्य इसी सत्य का उद्घोष करता है!
महर्षि वशिष्ठ: हे राम! इस जगत के रूप में बाहर जो कुछ भी दृढ़तापूर्वक अनुभव हो रहा है, ज्ञानदृष्टि से देखने पर वह क्षणमात्र में अपने सत्य स्वरूप में विलीन हो जाता है। वह अपने ही स्वरूप के रूप में साक्षात अनुभूत होता है!
जगत-स्वभाव विचार — लौकिक भ्रम बनाम परमार्थ सत्य
| विषय / दृष्टांत | अज्ञानी का दृष्टिकोण (लौकिक भ्रम) | ज्ञानी का दर्शन (परमार्थ सत्य) |
|---|---|---|
| स्वर्ण और आभूषण | आभूषणों (हार, कंगन) को स्वतंत्र वस्तु मानना | रूप बदलने पर भी मूल सत्य केवल स्वर्ण ही है |
| समुद्र और तरंगें | तरंग और जल को भिन्न-भिन्न समझना | समस्त तरंगें जल ही हैं; समस्त सृष्टियाँ ब्रह्म ही हैं |
| स्फटिक और वन का प्रतिबिंब | दर्पण में दिखने वाले दृश्य को सत्य मान लेना | प्रतिबिंब दर्पण से भिन्न नहीं; समस्त जगत चैतन्य ही है |
| दूध में घी, बीज में अंकुर | आँखों से न दिखने पर वस्तु का अभाव मान लेना | अंतर्निहित अद्वैत चैतन्य ही बाह्य रूप में प्रकट हो रहा है |
| मिट्टी और काष्ठ की मूर्ति | मूर्ति के आकार को ही स्थायी सत्य समझना | सृष्टि से पूर्व, स्थिति में और प्रलय के बाद केवल मिट्टी/ब्रह्म ही है |
| जीव और ईश्वर | ‘मैं अलग हूँ, परमात्मा अलग है’ ऐसा द्वैत भाव | ‘अहं ब्रह्मास्मि’ — अहंकार हटते ही केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है |
आध्यात्मिक भावार्थ
इस अध्याय में महर्षि वशिष्ठ द्वारा उपदेशित जगत-स्वभाव का तत्व केवल कोई सैद्धांतिक चर्चा नहीं है, अपितु यह मानव मन को भ्रमों से मुक्त करने वाली एक अद्भुत आध्यात्मिक साधना है। हमें दिखाई देने वाले इस दृश्य संसार का कोई स्वतंत्र या पृथक अस्तित्व नहीं है। मन अपनी वासनाओं के कारण ‘मैं-अन्य-जगत’ की कल्पनाएँ गढ़ता है और स्वयं उन्हीं कल्पनाओं के बंधन में बँध जाता है।
जैसे स्वर्ण में आभूषण, समुद्र में तरंगें और स्फटिक में प्रतिबिंब मूल तत्व से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह संपूर्ण ब्रह्मांड परब्रह्म चैतन्य की ही एक लीला है। जब साधक अपने भीतर के अहंकार भाव को त्यागकर आत्म-विचार करता है, तब यह बाह्य जगत अपने ही स्वरूप में लीन हो जाता है और अखंड आनंद की अनुभूति होती है।
दैनिक जीवन की विषम परिस्थितियों और भावनात्मक उथल-पुथल के समय यह स्मरण करें—’यह समस्त दृश्य बदलती हुई लहरों के समान है, मेरे अंतःकरण का चैतन्य ही नित्य सत्य है।’ इस भाव के साथ शांत चित्त होकर अपने कर्तव्यों का पालन करें।
इस अध्याय का सारांश
जब श्रीराम ने पूछा कि जगत की उत्पत्ति कैसे हुई, तब महर्षि वशिष्ठ ने आठ प्रकार के आत्म-विचार का उपदेश दिया। उन्होंने स्वर्ण-आभूषण, समुद्र-तरंग, दर्पण-प्रतिबिंब, दूध-घी और मिट्टी की मूर्ति जैसे सार्वभौमिक दृष्टांतों द्वारा सिद्ध किया कि जगत ब्रह्म से भिन्न नहीं है। चैतन्य शब्द तन्मात्रा के माध्यम से क्षणमात्र में पंचमहाभूतों के रूप में विस्तृत होकर भी निर्विकार रहता है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के बोध से जब ज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, तब बाह्य जगत अपने ही स्वरूप में विलीन हो जाता है।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: यह ब्रह्मांड परब्रह्म से भिन्न नहीं है; मनोनाश द्वारा जब ज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, तब समस्त दृश्य अपने ही स्वरूप चैतन्य के रूप में साक्षात प्रकट होता है।
- तात्विक शिक्षा: सृष्टि का कोई स्वतंत्र कारण नहीं है। पंचमहाभूतों का विस्तार परब्रह्म में भासित होने वाला एक चिन्मय चमत्कार मात्र है। जीव और ईश्वर के ऐक्य को पहचानना ही मोक्ष है।
- अगले अध्याय से संबंध: जगत के ब्रह्ममय स्वभाव को जानने के उपरांत, उस चैतन्य से मन किस प्रकार उत्पन्न होकर संसार की रचना करता है—आगामी अध्यायों में महर्षि वशिष्ठ इस गूढ़ रहस्य का और विस्तार से विवेचन करेंगे।
आभूषण का रूप धारण करने पर भी स्वर्ण अपना स्वभाव नहीं खोता; रूप बदलते रहें, सत्य सदा ब्रह्म ही रहता है।
वासनाओं का चित्र ही मन है; दृढ़ाभ्यास से जब मन का लय होता है, तब संसार-भ्रम क्षणभर में विलीन हो जाता है।
ज्ञानदृष्टि से देखने पर यह बाह्य जगत अपने ही सत्य स्वरूप में विलीन हो जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यदि जगत भ्रम है, तो यह इतना वास्तविक क्यों प्रतीत होता है?
अज्ञान और मन में स्थित वासनाओं के कारण ही जगत वास्तविक प्रतीत होता है। जैसे मरुस्थल में मृगतृष्णा का जल सत्य प्रतीत होता है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य में मन की कल्पनाओं के कारण यह दृश्य संसार सत्य जैसा भासित होता है।
महर्षि वशिष्ठ द्वारा वर्णित ‘विदितवेद्य’ कौन है?
जिसने जानने योग्य परमतत्व को पूर्णतः जान लिया है, उस ज्ञानी को विदितवेद्य कहते हैं। ‘मैं ही शुद्ध चैतन्य हूँ और मुझसे भिन्न कोई जगत नहीं है’—इसका जिसे साक्षात अपरोक्ष अनुभव हो चुका है, वही साधक विदितवेद्य है।
स्वर्ण और आभूषण के दृष्टांत से ग्रंथ क्या शिक्षा देता है?
यह दृष्टांत प्रमाणित करता है कि जिस प्रकार आभूषण बन जाने पर भी स्वर्ण अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता, उसी प्रकार संसार के विविध रूपों में प्रकट होने पर भी परब्रह्म अपनी सत्यता को कभी नहीं खोता।
सृष्टि के आरंभ में पंचमहाभूत कैसे उत्पन्न होते हैं?
परब्रह्म में सर्वप्रथम शब्द तन्मात्रा से आकाश, स्पर्श से वायु, रूप से तेज, रस से जल और गंध से पृथ्वी—निमेष के लक्षांश मात्र में उत्पन्न होते हैं।
मन को विलीन करने के लिए वशिष्ठ जी ने क्या उपाय बताया है?
तीव्र पुरुषार्थ, निरंतर आत्म-विचार और दृढ़ाभ्यास के द्वारा ही मन की वासनाएँ नष्ट होती हैं, जिससे मनोनाश सिद्ध होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ईश्वर चैतन्य और जीव चैतन्य में क्या संबंध है?
ईश्वर चैतन्य और जीव चैतन्य वास्तव में एक ही हैं। अहंकार रूपी आवरण होने पर वही जीव कहलाता है, और उस आवरण के हटते ही वह ‘अहं ब्रह्मास्मि’ रूपी शुद्ध परब्रह्म के रूप में प्रकाशित होता है।
निष्कर्ष
महर्षि वशिष्ठ ने स्पष्ट किया कि बाहर दिखाई देने वाला यह संसार चैतन्य की तरंगों की लीला मात्र है; आत्म-विचार से युक्त ज्ञानदृष्टि से देखने पर सर्वत्र आत्मस्वरूप ब्रह्म ही प्रकाशित होता है। किंतु इस अनंत चैतन्य में संकल्पों का उदय कैसे होता है? और उन संकल्पों से यह दृश्यजाल किस प्रकार विस्तृत होता है? इस परम रहस्य का दर्शन हम अगले प्रसंग में करेंगे।