क्या द्वंद्व सच हैं? भेद दृष्टि की माया | Yoga Vasistha S3 EP-28

क्या सुख-दुःख और अच्छे-बुरे के द्वंद्व सच हैं? माँ सरस्वती द्वारा लीला को दिया गया अभेद दर्शन का उपदेश। योगवाशिष्ठ S3 EP-28 में पढ़ें।

क्या अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य और जन्म-मृत्यु जैसे द्वंद्व इस संसार में सचमुच मौजूद हैं या यह केवल हमारे मन का भ्रम है? योगवाशिष्ठ के अनुसार, संपूर्ण चेतना केवल एक ही है। अज्ञान भरी दृष्टि भेद और जन्म-मरण देखती है, जबकि निर्मल आत्म-दृष्टि हर जगह केवल अभेद सत्य का ही दर्शन करती है।

जीवन में हम अक्सर दूसरों से अपनी तुलना करते हुए अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य और सुख-दुःख जैसे द्वंद्वों में उलझकर अशांत रहते हैं। क्या ये भेद वास्तव में सृष्टि में मौजूद हैं या यह हमारी दृष्टि का दोष है—यह संशय हर साधक के मन में उठता है।

ज्ञान प्राप्त होने के बाद रानी लीला के मन में भी ठीक यही जिज्ञासा जागी। जब आत्मा सर्वदा परम पवित्र और एक ही है, तो इस संसार में लोगों के बीच इतने भेद क्यों दिखाई देते हैं—उन्होंने माँ सरस्वती से अत्यंत विनम्रतापूर्वक यह प्रश्न पूछा।

लीला का संशय और ज्ञानी-अज्ञानी का भेद

आध्यात्मिक मार्ग पर मनुष्य चाहे कितनी भी उच्च अवस्था प्राप्त कर ले, संसार में दिखने वाली विविधता कभी-कभी मन में संशय उत्पन्न कर देती है। दिव्य ज्ञान-दृष्टि पाने के बाद भी, सांसारिक द्वंद्वों के मूल कारण को समझने के लिए लीला माँ सरस्वती के समक्ष उपस्थित हुईं।

सभा में छाई अलौकिक शांति के बीच, लीला ने देवी के चरण कमलों में प्रणाम किया और अपने हृदय का प्रश्न उनके सामने रखा।

लीला: हे माँ! आपने बताया कि आत्मा सभी प्राणियों में वास्तविक स्वरूप है और सर्वदा परम निर्मल रहती है। फिर इस संसार में ज्ञानी, अज्ञानी, पुण्यात्मा, पापी, सुखी और दुःखी लोग अलग-अलग क्यों दिखाई देते हैं? इस तत्त्व को जानने वाले और न जानने वाले के बीच इस भेद का वास्तविक कारण क्या है?

नदी के जल का दृष्टांत और चेतना तत्त्व

माँ सरस्वती ने मंद मुस्कान के साथ लीला की ओर देखा और सृष्टि के इस गूढ़ रहस्य को एक सहज दृष्टांत के माध्यम से समझाना आरंभ किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चेतना एक होने पर भी उपाधियों के कारण भिन्न कैसे प्रतीत होती है।

देवी की वाणी में अपार गंभीरता और करुणा गूंज उठी।

श्री सरस्वती देवी: लीला! क्या तुमने बहती हुई नदी के जल को देखा है? कहीं वही जल तीव्र लहरों और तरंगों के कारण मटमैला व अशांत दिखाई देता है, तो कहीं बिना किसी तरंग के अत्यंत निर्मल और शांत नजर आता है। ठीक इसी प्रकार, शुद्ध चेतना जब जीव-भाव को स्वीकार करती है, तो राग-द्वेष के कारण अज्ञान से मलिन प्रतीत होती है; और साधना से निर्मलता पाती है। इसके बावजूद, ज्ञानी और अज्ञानी दोनों में स्थित चेतना तत्त्व एक ही है, कोई भिन्नता नहीं है।

लताओं की गांठें और जन्म-मरण का भ्रम

माँ सरस्वती का उपदेश आगे बढ़ा और लीला पूर्ण एकाग्रता से उसे सुनने लगीं। जब सभी प्राणियों में व्याप्त आत्मा एक ही है, तो बंधन कहाँ है—देवी ने इस बात को स्पष्ट रूप से उजागर किया।

देवी ने समझाया कि भेद-भाव को त्याग देना ही परम मुक्ति का मार्ग है।

श्री सरस्वती देवी: राक्षस, देवता, मुनि, मनुष्य, पशु-पक्षी और यहाँ तक कि तुम में और मुझ में भी स्थित आत्मा केवल एक ही है। भेद देखना ही संसार का बंधन है; और अभेद दर्शन ही मुक्ति है। जैसे लंबी लताओं के बीच-बीच में गांठें होती हैं, वैसे ही इस अचेतन शरीर रूपी उपाधि में जन्म और मृत्यु की गांठें बन जाती हैं। जब तक शरीर की दृष्टि से देखोगी, जन्म-मरण दिखाई देते रहेंगे; चेतना की दृष्टि के लिए न कोई जन्म है और न कोई मृत्यु।

त्रिविध दृष्टि भेद

इस सत्य को और गहराई से समझाने के लिए माँ सरस्वती ने जीव द्वारा संसार को देखने की तीन दृष्टियों का विस्तार से वर्णन किया।

देवी ने बताया कि मनुष्य अपनी चेतना की स्थिति के अनुसार संपूर्ण जगत का अनुभव किस प्रकार करता है।

श्री सरस्वती देवी: हम जगत को तीन प्रकार से देखते हैं: पहली है पांचभौतिक दृष्टि—जिसमें केवल भौतिक शरीर और बाह्य वस्तुएं दिखाई देती हैं। दूसरी है मनोदृष्टि—जिसमें दूसरों के मन, उनकी भावनाएं और गुण प्रकट होते हैं। तीसरी है चिदाकाश दृष्टि—जिसमें सभी के भीतर देही रूप में प्रकाशित केवल शुद्ध चेतना का ही दर्शन होता है।

स्वप्न का भ्रम और शरीरों की नश्वरता

लीला ने पुनः अत्यंत विनयपूर्वक कहा, ‘माँ! यह जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह क्या है? इसे बार-बार समझे बिना माया का आवरण दूर नहीं होता।’ इस पर देवी ने करुणा से उत्तर दिया।

देवी ने स्पष्ट किया कि जीव अपनी ही माया के प्रभाव से इस दृश्य प्रपंच का निर्माण करता है।

श्री सरस्वती देवी: शुद्ध स्वरूप वाला चैतन्य पुरुष स्वप्न के भ्रम की भांति जन्म-मरण, प्रिय-अप्रिय और स्थूल-सूक्ष्म को अपनी ही माया से देखता है। वास्तव में चेतना का कभी विनाश नहीं होता। केवल जड़ और अचेतन शरीर ही नष्ट होते हैं। इसे देखकर लोग ‘मैं जन्म ले रहा हूँ, मैं मर रहा हूँ’ का भ्रम पाल लेते हैं। चेतना सर्वदा अक्षय, एक और स्थिर रहती है।

वासना का प्रवाह और भंवर

शरीर नष्ट होने पर भी जीव बार-बार जन्म क्यों लेता है, माँ सरस्वती ने उस चक्र के पीछे का रहस्य स्पष्ट किया।

उन्होंने बताया कि मन में बसी पूर्व वासनाएं किस प्रकार इस दृश्य जगत को निरंतर बनाए रखती हैं।

श्री सरस्वती देवी: शरीर त्यागने वाला कोई भी प्राणी वास्तव में मरता नहीं है; सुख-दुःख और जीव-भाव सब वासनाओं के ही चित्र हैं। जीव वासना-प्रवाह रूपी भंवर में बहता रहता है। जब तक दृढ़ आत्म-विचार न किया जाए, यह दृश्य भ्रम समाप्त नहीं होता। विचार से जब वासनाएं क्षीण हो जाती हैं, तब दृश्य जगत को मिथ्या जानकर जीव भयमुक्त और मुक्त हो जाता है।

वायु और सुगंध जैसी सूक्ष्म चेतना

मृत्यु के समय प्राणों का क्या होता है और जीव परलोक कैसे जाता है, इसे समझाने के लिए देवी ने एक और सुंदर दृष्टांत दिया।

उन्होंने परम सत्य उजागर किया कि चेतना न कहीं से आती है और न कहीं जाती है।

श्री सरस्वती देवी: जब प्राण वायु रुक जाती है, तो शरीर शव बन जाता है। तब वह चेतना अपनी वासनाओं के साथ सूक्ष्म रूप से बाहर निकलती है। शास्त्रों में इसी को जीव कहा गया है। जैसे वायु सुगंध को अपने साथ ले जाती है, वैसे ही वासनाओं से युक्त चेतना संसार रूप में प्रतीत होती है। चेतना न कहीं से आती है, न कहीं जाती है। वासना के बल पर किसी अन्य स्थान में नए शरीर की कल्पना कर लेना ही परलोक जाना और इस लोक में आना कहलाता है!

निद्रा से उपजा स्वप्न जगत

देह छूटने के बाद जीव को होने वाले अनुभवों को माँ सरस्वती ने लीला के समक्ष पूरी तरह स्पष्ट किया।

उन्होंने बताया कि जीव अपने चित्ताकाश में ही संपूर्ण जगत की रचना स्वप्न की तरह कैसे करता है।

श्री सरस्वती देवी: जैसे एक शरीर के नष्ट होते ही सोता हुआ व्यक्ति स्वप्न देखने लगता है, वैसे ही जीव अपनी पूर्व वासनाओं के अनुसार नए जगत और नए शरीर की कल्पना कर लेता है। वह अपने ही भीतर पृथ्वी आदि तत्त्वों से युक्त आकाश और संपूर्ण सृष्टि को देखता है। जैसे कई लोग एक ही स्थान पर अपने-अपने स्वप्नों में अलग-अलग दृश्य देखते हैं, वैसे ही ये सभी जीव अपने चिदाकाश में ही भिन्न-भिन्न जगतों को देख रहे हैं।

श्री सरस्वती देवी की अंतिम घोषणा

समस्त जीवों के भ्रम का कारण बने वासना-बंधन को काटना ही सच्चा ज्ञान है—यह कहते हुए देवी ने अपने उपदेश को पूर्णता दी।

देवी ने पुनः स्मरण कराया कि सत्य सर्वदा एक रूप में ही प्रकाशित रहता है।

श्री सरस्वती देवी: हे लीला! सभी प्राणियों के कल्याण हेतु मैं बार-बार यह उद्घोष करती हूँ—केवल शुद्ध आत्म-स्वरूप ही एकमात्र सत्य है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह केवल मिथ्या है। यह दृढ़ निश्चय ही तुम्हें समस्त द्वंद्वों और संसार के भयों से सदा के लिए मुक्त कर देगा।

दृष्टि भेद और अनुभव की अवस्थाएं

दृष्टि का प्रकार अनुभूत होने वाला विषय आध्यात्मिक स्थिति
पांचभौतिक दृष्टि भौतिक शरीर और बाह्य जड़ वस्तुएं अज्ञान / बंधन की अवस्था
मनोदृष्टि दूसरों के मन, गुण और अंतःकरण के भाव साधना की अवस्था
चिदाकाश दृष्टि सभी प्राणियों में एक ही शुद्ध चेतना मुक्ति / ज्ञान की अवस्था

आध्यात्मिक अंतर्भाव

इस प्रसंग में माँ सरस्वती द्वारा प्रकट किया गया परम रहस्य यह है कि संसार में दिखने वाले भेद वास्तविक नहीं हैं; वे केवल मानसिक रचनाएं हैं। जैसे नदी में लहरें उठें या न उठें, जल एक ही रहता है, वैसे ही जीवों में राग-द्वेष दिखें या न दिखें, अंतःकरण में प्रकाशित आत्मा सदा एक ही रहती है। जैसे वायु गंध को ले जाती है, वैसे ही मन अपने संस्कारों को लेकर नए शरीरों और नए लोकों की रचना स्वप्न की तरह करता है।

द्वंद्व वास्तव में हमारी पूर्व वासनाओं के ही प्रतिबिंब हैं। जब आत्म-विचार द्वारा वासनाएं समाप्त हो जाती हैं, तब जन्म-मृत्यु का भय और सुख-दुःख का प्रभाव पूरी तरह मिट जाता है। अभेद दृष्टि का अनुभव ही समस्त साधना का अंतिम लक्ष्य है।

अपने दैनिक जीवन में मिलने वाले व्यक्तियों और परिस्थितियों को अच्छे-बुरे के आधार पर आंकना बंद करें और सभी में एक ही चेतना देखने का अभ्यास करें। याद रखें, आपके मन की वासनाएं ही आपके संसार का निर्माण कर रही हैं।

इस अध्याय का सारांश

श्री सरस्वती देवी ने रानी लीला को द्वंद्वों और भेदों का रहस्य समझाया। जैसे नदी का जल लहरों से अशांत दिखे तब भी जल ही रहता है, वैसे ही आत्मा राग-द्वेष से मलिन दिखे तब भी सर्वदा निर्मल रहती है। भेद दृष्टि ही संसार है और अभेद दृष्टि ही मुक्ति है। देवी ने पांचभौतिक, मनो और चिदाकाश दृष्टि का भेद बताया और स्पष्ट किया कि शरीर नष्ट होते हैं, चेतना नहीं। वासनाओं का प्रवाह ही पुनर्जन्म का कारण है और शुद्ध आत्मा ही एकमात्र सत्य है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: सभी प्राणियों में शुद्ध चेतना एक ही है; भेद देखना ही संसार का बंधन है और अभेद दर्शन ही परम मुक्ति है।
  • तात्विक शिक्षा: जन्म-मृत्यु और सुख-दुःख केवल देह की वासनाओं से उपजे भ्रम हैं। आत्मा नित्य शुद्ध, अक्षय और निर्विकार है।
  • अगले अध्याय से संबंध: मृत्यु के उपरांत जीव किस प्रकार पुनर्जन्म लेता है और नाड़ी-स्पंदन रुकने के बाद की आंतरिक यात्रा क्या होती है, इसका वर्णन अगले अध्याय में किया जाएगा।

भेद देखना ही संसार का बंधन है; अभेद दर्शन ही मुक्ति है।

जैसे वायु सुगंध को ले जाती है, वैसे ही चेतना वासनाओं को धारण कर संसार रूप में भासती है।

शुद्ध आत्म-स्वरूप ही एकमात्र सत्य है; अन्य सब केवल मिथ्या है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या सुख-दुःख और अच्छे-बुरे जैसे द्वंद्व सच हैं?

द्वंद्व केवल अज्ञान दृष्टि से उपजे मानसिक भ्रम हैं; वास्तव में संपूर्ण सृष्टि में केवल एक ही शुद्ध चेतना व्याप्त है।

ज्ञानी और अज्ञानी के बीच मुख्य अंतर क्या है?

चेतना दोनों में एक समान है, किंतु अज्ञानी राग-द्वेष की वासनाओं से बंधा रहता है जबकि ज्ञानी निर्मल आत्म-स्थिति में स्थित रहता है।

संसार बंधन का मूल कारण क्या है?

संसार और प्राणियों में भेद देखना ही बंधन है; सर्वत्र एकत्व का दर्शन करना ही मुक्ति है।

क्या मृत्यु के साथ चेतना का भी नाश हो जाता है?

मृत्यु केवल भौतिक शरीर की होती है; चेतना सर्वदा नित्य और अक्षय सत्य है।

जीव को पुनर्जन्म क्यों लेना पड़ता है?

मन में जमी पूर्व वासनाओं के कारण जीव स्वप्न की भांति नए शरीर की कल्पना कर लेता है, जिससे पुनर्जन्म होता है।

निष्कर्ष

सभी भेदों के पीछे छिपे हुए एकमात्र चैतन्य सत्य को माँ सरस्वती ने पूर्ण स्पष्टता से उद्घाटित किया। ‘शुद्ध आत्मा ही एकमात्र सत्य है’—इस परम वचन से लीला का हृदय परम शांति से भर गया। परंतु शरीर से प्राण वायु छूटने के उस क्षण में जीव वास्तव में कैसे यात्रा करता है? उस पुनर्जन्म का रहस्य क्या है?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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