सपने की वस्तुएं कहाँ विलीन होती हैं? राजा पद्म का पुनर्जीवन | Yoga Vasistha S3 EP-32

सपने की वस्तुएं कहाँ विलीन होती हैं? राजा पद्म का पुनर्जीवन और लीलोपाख्यान का रहस्य जानें योगवाशिष्ठ S3 EP-32 में।

सपने में दिखने वाले पर्वत और नगर जागते ही कहाँ गायब हो जाते हैं? स्वप्न के सभी दृश्य मन की चेतना में ही प्रकट होते हैं और जागते ही पुनः उसी चेतना में विलीन हो जाते हैं। योगवाशिष्ठ के अनुसार यह जाग्रत संसार भी एक दीर्घ स्वप्न ही है। आत्मज्ञान प्राप्त होने पर सभी भौतिक भ्रम मिट जाते हैं और केवल विशुद्ध आत्म-चैतन्य ही शेष रहता है।

जब हम गहरी नींद में होते हैं, तब एक सर्वथा नए संसार की रचना कर लेते हैं। वहाँ हम विशाल पर्वतों को लांघते हैं, नए संबंध बनाते हैं, और किसी की मृत्यु देखकर हृदय विदारक रुदन करते हैं। किंतु जैसे ही आँखें खुलती हैं और हम जागते हैं, वे नगर, वे लोग और वह सारा शोक पलक झपकते ही कहाँ गायब हो जाते हैं? शून्य से उत्पन्न हुए वे सारे दृश्य बिना किसी भौतिक आधार के आखिर कहाँ विलीन हो गए?

मानव मन जिस जाग्रत जगत को नित्य और सत्य मानता है, क्या वह भी केवल एक विशाल भ्रम मात्र है? इस शाश्वत जिज्ञासा का महर्षियों ने परम सत्य के आलोक में उत्तर दिया है। योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ श्रीराम को स्वप्न जगत का गूढ़ रहस्य समझाते हुए बताते हैं कि कैसे राजा विदूरथ के देह त्याग के उपरांत राजा पद्म के भौतिक शरीर में प्राणों का पुनः प्रवेश हुआ और माँ सरस्वती की दिव्य कृपा से वह राज-दंपति किस प्रकार परम ज्ञान को प्राप्त हुआ।

वायु में स्पंदन – स्वप्न पदार्थों का वास्तविक स्वरूप

सभामंडप में पूर्ण नीरवता छाई हुई थी। श्रीराम के अंतःकरण में उठती दार्शनिक जिज्ञासा को देखकर महर्षि वशिष्ठ के नेत्रों में अपार करुणा और शांति झलक उठी। आकाश में बहती वायु की ओर संकेत करते हुए वशिष्ठ जी की गंभीर वाणी सभा में गूँज उठी।

वायु में निरंतर एक गति या स्पंदन रहता है। गतिशील वायु चाहे शांत वायु में समा जाए या उसकी गति थम जाए, अंततः वहाँ केवल वायु ही शेष रहती है। गति या स्पंदन वायु से भिन्न कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है।

स्वप्न में हमें विशाल पर्वत, घाटियाँ और नदियाँ दिखाई देती हैं। किंतु नींद से जागते ही वे पर्वत कहीं बाहर छिपने नहीं जाते; वे केवल स्वप्न-चेतना में ही पूर्णतः विलीन हो जाते हैं। यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो स्वप्न में दिखने वाले पदार्थों का वास्तविक स्वरूप शून्य के सिवा कुछ भी नहीं है।

महर्षि वशिष्ठ: हे राम! स्वप्न में भासमान समस्त पदार्थ आत्मा के विशुद्ध चैतन्य को क्षण भर के लिए ढकते हुए से प्रतीत होते हैं। किंतु अगले ही पल वे उसी चैतन्य में तिरोहित हो जाते हैं। दृष्टा के स्फुरण, संकल्पित कल्पना और आंतरिक भ्रम के अतिरिक्त स्वप्न का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। जब वह भ्रम दूर होता है, तब सब कुछ एकमात्र अद्वैत आत्मतत्त्व के रूप में ही प्रकाशित होता है। हमारा यह जाग्रत संसार भी ठीक वैसा ही है!

मन का संकल्प – कल्पना-रचित संसार

महर्षि के वचन सुनकर सभा के विद्वान और मुनिगण विस्मय से सिर हिलाने लगे। वशिष्ठ जी ने एक साधारण मनुष्य के अंतर्मन का दृष्टांत देकर विचारों के पीछे छिपे मायाजाल को खोलना प्रारंभ किया। सभा का प्रत्येक व्यक्ति अपने ही अनुभवों की पड़ताल करते हुए स्तब्ध होकर सुन रहा था।

कल्पना कीजिए, कोई व्यक्ति अपने मन में कोई दृढ़ संकल्प करके भीतर ही एक सुंदर दृश्य, उसमें अनेक नगर और जनसमूह देखने लगे। जैसे ही वह उस कल्पना को छोड़ देता है, वे दृश्य और लोग कहाँ चले जाते हैं? जो शून्य से उपजे थे, वे पुनः शून्य में ही विलीन हो जाते हैं!

स्वप्न की सारी सृष्टि भी ठीक इसी प्रकार विलीन हो जाती है। यह जाग्रत संसार भी इससे तनिक भी भिन्न नहीं है। जागृत अवस्था में हम जिन द्वंद्वों और प्रपंचों का अनुभव करते हैं, वे सब भी मन के संकल्पों के ही प्रतिबिंब हैं।

महर्षि वशिष्ठ: हे रघुनंदन! इस जाग्रत अवस्था में जो तुम्हें ‘मैं, मेरा, तुम, प्रिय, अप्रिय, देश, काल, देह, संबंध, मित्र और शत्रु’ जैसी अनेक धारणाएँ सत्य प्रतीत हो रही हैं, ज्ञान का उदय होते ही वे सब स्वप्नवत ही स्पष्ट हो जाएँगी। तब सब कुछ एकमात्र अद्वैत आत्मा के रूप में ही साक्षात होगा।

भेद-दृष्टि ही संसार का बंधन है

महर्षि वशिष्ठ के स्वर में दार्शनिक गांभीर्य और गहरा हो गया। क्या जल और उसकी तरलता में कोई भेद हो सकता है? क्या वायु और उसके स्पंदन के बीच कोई विभाजन रेखा खींची जा सकती है? जैसे वे दोनों अभिन्न हैं, वैसे ही आत्म-चैतन्य और इस जगत के पदार्थों के मध्य वास्तव में कोई भेद नहीं है।

यह मानना कि आत्म-चैतन्य अलग है, स्वप्न के पदार्थ अलग हैं और यह जाग्रत जगत अलग है जो कहीं बाहर से आकर आत्मा से चिपक गया है—यही मनुष्य का सबसे बड़ा अज्ञान है। शास्त्रों में इसी भेद-दृष्टि को ‘मिथ्या ज्ञान’, ‘संसार’, ‘संसृति’ और ‘अलिक’ जैसे नामों से पुकारा गया है।

क्या स्वप्न में दिखने वाले पदार्थों का स्वप्नदृष्टा से भिन्न कोई बाहरी कारण या प्रयोजन होता है? कभी नहीं! इसलिए स्वप्न के सभी पदार्थ सर्वथा निरर्थक और अवास्तविक हैं। इसी दृष्टि से विचार करने पर सिद्ध होता है कि स्वप्न-जगत और जाग्रत-जगत दोनों एक ही श्रेणी के हैं।

महर्षि वशिष्ठ: हे सभासदों! हे जनसमूह! अपने वास्तविक स्वरूप ‘आत्मा’ को भुलाकर, भ्रम से जन्मे इन बाह्य पदार्थों में सत्यता का आरोप करते हुए तुम नाना प्रकार के दुखों की श्रृंखला भोग रहे हो। इस अज्ञान की नींद को त्यागो! परम सत्यद्रष्टाओं के अनुभूत वचनों को ध्यानपूर्वक सुनो!

मृत्यु के पीछे छिपा वासना-प्रवाह

श्रीराम ने हाथ जोड़कर महर्षि की ओर देखा। संसार चक्र में जीव के भटकने के स्वरूप और मरणोपरांत होने वाले अनुभवों के विषय में उन्होंने अपना प्रमुख संशय प्रस्तुत किया। संपूर्ण सभा श्रीराम के प्रश्न पर महर्षि के समाधान की उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगी।

अनादि काल से चले आ रहे भ्रम के प्रवाह में पड़ा जीव मृत्यु होते ही आतिवाहिक शरीर धारण करता है। वहाँ अंतःकरण में संचित वासनाओं की तीव्रता के कारण वह भविष्य की सृष्टि और नाना लोकों का स्वयं अनुभव करता है। वे सब उसे अपने सम्मुख वास्तविक लगते हैं, किंतु बाहर वास्तव में कोई भौतिक सृष्टि नहीं होती।

वह सब केवल मन में ही प्रतिभासित होता है। जैसे कोई बालक अंधकार में बिना किसी अस्तित्व के भी वेताल की कल्पना करके भयभीत हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी अपनी वासनाओं के वशीभूत होकर दृश्य जगत को सत्य मान बैठता है।

श्रीराम: हे महात्मन! मृत जीव जिन लोकों और शरीरों का अनुभव करता है, क्या वे वास्तव में बाहर स्थित होते हैं अथवा केवल मनोकल्पित भ्रम मात्र हैं? कृपया स्पष्ट कीजिए।

महर्षి वशिष्ठ: हे राम! यह सब केवल भ्रम का ही प्रभाव है! बाहर कोई भौतिक सृष्टि नहीं है। मन के भीतर ही यह सब भासता है। अज्ञान के रहते ही दृष्टा और दृश्य का यह संबंध रहता है। तत्त्वज्ञान होते ही यह दृश्य-भ्रम शांत हो जाता है।

राजमहल में प्रबुद्ध लीला – भौतिक देह का रहस्य

वशिष्ठ जी ने लीलोपाख्यान के अगले प्रसंग को आगे बढ़ाया। युद्धभूमि में राजा विदूरथ के स्थूल देह के पतन के उपरांत, उनका जीव-चैतन्य ज्ञानदेवी सरस्वती और प्रबुद्ध लीला के साथ राजा पद्म के सुरक्षित रखे गए अंतःपुर मंडप में पहुँचा।

उस राजमहल में समाधि की अवस्था से जागी प्रबुद्ध लीला ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। वर्षों से देखा हुआ वही कक्ष और पुष्प-शय्या पर चिरनिद्रा में लीन राजा पद्म का शव उसे दिखाई दिया। किंतु अपनी भौतिक देह को कहीं न पाकर वह अत्यंत विस्मित हो गई।

उसने अत्यंत भक्तिभाव से जगज्जननी माँ सरस्वती के चरण कमलों में प्रणाम किया और पूछा कि उसके शरीर का क्या हुआ।

प्रबुद्ध लीला: हे लोकपावनी! हे जगद्देवि! मैं इस कक्ष में कितने समय तक समाधि में रही? मेरा यह भौतिक शरीर कहाँ गया? वह मुझे दिखाई क्यों नहीं दे रहा? मेरी देह कैसे लुप्त हो गई? और मेरे पति राजा पद्म इस प्रकार शव बने कब से पड़े हैं?

देवी सरस्वती: पुत्री लीले! तुम अपने भौतिक शरीर को यहीं छोड़कर मेरे साथ ब्रह्मांडों की यात्रा पर गई थीं। इस लोक की गणना के अनुसार उसे बीते एक मास हो चुका है। तुम्हारी देह की रक्षा के लिए दो दासियाँ निरंतर पहरा दे रही थीं। किंतु पंद्रह दिनों के बाद तुम्हारा शरीर सूखकर काष्ठ की भांति कठोर और शीतल हो गया।

दाह-संस्कार – आतिवाहिक देह की स्थिति

देवी सरस्वती द्वारा बताए गए सत्य को प्रबुद्ध लीला ने शांत चित्त से सुना। अज्ञान में डूबे बंधु-बांधवों और मंत्रियों द्वारा लिए गए निर्णय को देवी ने आगे स्पष्ट किया। उस समय राजभवन में घटी घटनाएँ लीला की आँखों के सामने साकार हो उठीं।

रानी के शरीर में जीवन के लक्षण न पाकर मंत्रियों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उन्हें पुष्प-शय्या से बाहर लाकर, चंदन की लकड़ियों से चिता सजाई गई और शास्त्रोक्त विधि से दाह-संस्कार संपन्न किया गया। सभी परिजन शोक में डूब गए और परलोक-शांति के लिए श्राद्ध आदि समस्त कर्म विधिपूर्वक किए गए।

अतः अब लीला के लौटने पर भी प्रवेश करने के लिए कोई स्थूल शरीर शेष नहीं बचा था। किंतु सत्य-संकल्प से युक्त दिव्य आतिवाहिक देह प्राप्त कर लेने के कारण, अब उसे किसी भौतिक देह की तनिक भी आवश्यकता नहीं रह गई थी।

देवी सरस्वती: लीले! तुम्हारा भौतिक शरीर भस्म हो चुका है। अब तुम विशुद्ध आतिवाहिक शरीर में स्थित हो। अज्ञानी मनुष्य वासना के बल पर ही शरीरों को स्थूल मानते हैं। जैसे अंधकार में बालक न होते हुए भी वेताल को देखकर डरता है, वैसे ही अज्ञानी इस मायावी देह को सत्य मानता है। ज्ञानियों के लिए यह देह केवल नाममात्र का स्फुरण है!

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सुगंध के मार्ग से द्वितीय लीला का प्रवेश

उसी समय राजा विदूरथ के अंतःपुर में स्थित द्वितीय लीला भी ज्ञानदेवियों के दर्शन के दृढ़ संकल्प के साथ ध्यान में लीन हो गई। वह भी अपने सूक्ष्म रूप से आकाश मार्ग में गति करती हुई राजा पद्म के अंतःपुर में आ पहुँची।

कक्ष में प्रवेश करते ही द्वितीय लीला ने स्वर्ण सिंहासन पर तेजोमयी माँ सरस्वती को और उनके समीप अपने ही रूप-रंग वाली प्रबुद्ध लीला को देखा। वह असीम आश्चर्य से भर उठी और साष्टांग प्रणाम करते हुए उनके चरण कमलों में गिर पड़ी।

युद्ध में अपने पति विदूरथ की मृत्यु के शोक से व्याकुल वह यहाँ शय्या पर सोए राजा पद्म को देखकर स्तब्ध रह गई।

द्वितीय लीला: हे पुण्य देवियो! युद्धभूमि में मेरे पति के धराशायी होते ही मैं मूर्छित हो गई थी। आँखें खुलीं तो आकाश में सुगंध के कणों का अनुसरण करते हुए उड़ती हुई इस कक्ष में पहुँची हूँ। यहाँ मेरे पति गहरी नींद में सोए प्रतीत हो रहे हैं। आपके दिव्य दर्शन से मेरा सारा शोक मिट गया है!

प्रबुद्ध लीला: हे जगन्माता! राजा पद्म को इस शव-शय्या पर पड़े एक महीना बीत चुका है। कृपा कर मेरे पति को इस निद्रा से जगाइए और हम सभी को पूर्व वैभव प्रदान कीजिए!

नासिका-छिद्रों से प्राण-प्रवेश – राजा पद्म का पुनर्जीवन

माँ सरस्वती ने मंद मुस्कान के साथ अपने संकल्प-बल का संचार किया। पूर्व में राजा विदूरथ के देह से निकलने से रोके गए प्राणवायु और सूक्ष्म चैतन्य को उन्होंने राजा पद्म के नासिका-छिद्रों के मार्ग से भीतर प्रविष्ट कराया।

जैसे समुद्र के गर्भ में सूर्य की किरणें प्रवेश कर जाती हैं, वैसे ही वे प्राणवायु राजा पद्म के हृदय-कमल में समा गए। क्षण भर में उस सूखे हुए शरीर में रक्त का संचार होने लगा। मुख पर पूर्ववत तेज छा गया और सभी अंग चेतन होकर हिलने-डुलने लगे।

मानो एक मास की लंबी नींद से जागा हो, राजा पद्म जम्हाई लेते हुए धीरे से आँखें खोलकर बैठ गए। सम्मुख साक्षात विद्यादायिनी माँ सरस्वती और उनके दोनों ओर एक ही रूप, एक से वस्त्र और एक जैसे आभूषणों से सुसज्जित दो लीलाओं को देखकर वे चकित रह गए।

राजा पद्म: हे देवी! आपका कल्याण हो! मेरे सम्मुख प्रकाशित यह दिव्य मातृ-मूर्ति कौन हैं? और मेरी पत्नी लीला दो रूपों में एक ही सांचे में ढली हुई क्यों दिखाई दे रही है? क्या यह मेरा कोई भ्रम है या सत्य?

प्रबुद्ध लीला: स्वामी! भयभीत न हों। मैं आपकी प्रथम पत्नी हूँ, जिसने माँ सरस्वती के वरदान से आत्मज्ञान प्राप्त किया है। और यह आपके ही संकल्प से विदूरथ राज्य के स्वप्न में उत्पन्न हुई द्वितीय लीला है। और ये स्वयं साक्षात ज्ञानदेवी सरस्वती हैं!

राज्य में आनंदोत्सव – जीवन्मुक्त स्थिति

राजा पद्म ने असीम आनंद के साथ माँ सरस्वती के चरणों में गिरकर अपने अश्रुओं से उनका पाद-प्रक्षालन किया। आत्मज्ञान, पत्नियों और राज्य को पुनः लौटाने वाली जगज्जननी की उन्होंने दिव्य स्तुतियों से वंदना की। माँ सरस्वती उस राज-दंपति को आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो गईं।

प्रातःकाल होते ही जब रक्षकों और मंत्रियों ने राजा को जीवित और दोनों रानियों को साथ देखा, तो वे विस्मय और आनंद से भर उठे। राज्य भर में मंगल वाद्य गूँज उठे। चारों दिशाओं के समुद्रों से लाए गए पवित्र जलों से राजा का अभिषेक कर राज्यारोहण किया गया।

राजा पद्म ने अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत और लीलोपाख्यान के समस्त रहस्यों को समझकर, दोनों पत्नियों के साथ सहस्रों वर्षों तक जीवन्मुक्त होकर धर्मपूर्वक शासन किया। अंततः वे सभी विदेह-मुक्ति को प्राप्त हुए।

देवी सरस्वती: हे प्रिय पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो! तुम्हारी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हों! तुम्हारे राज्य की प्रजा पापरहित होकर समस्त संपदाओं के साथ नित्य आनंद प्राप्त करे!

महर्षि वशिष्ठ: देखा तुमने, हे राम! राजा पद्म ने अपने पौरुष के बल और माँ सरस्वती की कृपा से परम कल्याणकारी आत्मज्ञान को प्राप्त किया। उसने पुनर्जन्म और राज्य को भी पाया और अंत में विदेह-मुक्त हुआ। प्रथम लीला द्वारा साधा गया मुमुक्षुत्व ही तो इस सबका मूल कारण था!

स्वप्न, जाग्रत और आत्म-चैतन्य का तुलनात्मक अध्ययन

लक्षण / अवस्था स्वप्न जगत जाग्रत जगत विशुद्ध आत्मतत्त्व
अस्तित्व केवल निद्रा में सत्य केवल जागने पर सत्य त्रिकालाबाधित एकमात्र सत्य
पदार्थों का स्वभाव शून्य / मनोकल्पित वासनाजनित / नश्वर नित्य, स्वयंप्रकाश, अद्वैत
कारण दृष्टा का मनोभ्रम अनादि अज्ञान व भेद-दृष्टि निर्निमित्त, स्वतंत्र
लय का स्थान जाग्रत चेतना में आत्मज्ञान में लय किसी में लय नहीं (सर्वाधार)

आध्यात्मिक अंतर्गर्भित अर्थ – भौतिक देह-भ्रम की निवृत्ति

इस प्रसंग में महर्षि वशिष्ठ ने स्वप्न के पदार्थों के विश्लेषण द्वारा हमारे भौतिक देह-भ्रम का खंडन किया है। जैसे स्वप्न में देखे गए पर्वत और नगर जागते ही चेतना में लीन हो जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर यह जाग्रत दृश्य-प्रपंच भी केवल आत्मस्वरूप ही भासित होता है।

लीला का भौतिक शरीर भस्म हो जाने पर भी उसका आतिवाहिक देह में निर्बाध विचरण करना यह सिद्ध करता है कि देह नहीं, अपितु आत्म-चैतन्य ही प्रधान है। जैसे अंधकार में बालक काल्पनिक वेताल से भयभीत होता है, वैसे ही अज्ञानवश मनुष्य इस दृश्य जगत को सत्य मानकर जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है। आत्म-विचार, स्वप्रयत्न और गुरु/ईश्वर की कृपा से प्रत्येक साधक जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त कर सकता है।

अपने दैनिक जीवन में आने वाले लाभ-हानि, सुख-दुख और संबंधियों को रात्रि के स्वप्न के पात्रों के समान देखने का प्रतिदिन ध्यान करें। बाहरी भ्रमों से विचलित हुए बिना अंतर्मुखी होकर विशुद्ध साक्षी चैतन्य में प्रतिष्ठित होना ही वास्तविक शांति का मार्ग है।

इस अध्याय का सारांश

महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को वायु-स्पंदन और जल-तरलता के दृष्टांतों से स्वप्न-पदार्थों की निरर्थकता व जाग्रत जगत के भ्रम को समझाया। माँ सरस्वती की कृपा से प्रबुद्ध लीला भौतिक देह के भस्म होने पर भी आतिवाहिक स्थिति में स्थित रही। द्वितीय लीला भी सुगंध-मार्ग से अंतःपुर पहुँची। देवी सरस्वती के संकल्प से राजा पद्म के मृत शरीर में प्राणों का संचार हुआ और वे पुनर्जीवित हो उठे। दोनों पत्नियों संग सहस्रों वर्षों तक जीवन्मुक्त होकर राज्य करने के उपरांत राजा पद्म ने विदेह-मुक्ति प्राप्त की।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: स्वप्न और जाग्रत के समस्त दृश्य विशुद्ध चैतन्य में भासने वाली मनोकल्पना मात्र हैं; आत्मज्ञान ही शाश्वत मुक्ति का एकमात्र मार्ग है।
  • तात्विक शिक्षा: दृष्टा और दृश्य का भेद ही संसार का बंधन है। वासनाओं के क्षय होने पर भौतिक देह-भ्रम समाप्त होकर आतिवाहिक विशुद्ध आत्म-स्थिति प्राप्त होती है।
  • अगले अध्याय से संबंध: राजा पद्म और लीलाओं की कथा की पूर्णता के साथ जीवन्मुक्त स्थिति स्पष्ट हुई; आगामी अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति के क्रम पर और भी गहन तत्त्व-रहस्य उद्घाटित होंगे।

जैसे वायु और उसकी गति में कोई भेद नहीं, वैसे ही आत्म-चैतन्य और स्वप्न-जाग्रत पदार्थों में कोई भेद नहीं है।

जैसे अंधकार में बालक काल्पनिक वेताल से डरता है, वैसे ही अज्ञानी इस मायावी देह को सत्य मानता है।

जब पौरुष (स्वप्रयत्न) और भगवत्कृपा का मिलन होता है, तब जीव संसार-भ्रम को पार कर जीवन्मुक्त हो जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सपने की वस्तुएं जागने पर कहाँ चली जाती हैं?

सपने की वस्तुएं वास्तव में शून्य स्वरूप होती हैं, इसलिए जागते ही वे पुनः स्वप्न-चेतना में ही पूर्णतः विलीन हो जाती हैं।

क्या योगवाशिष्ठ के अनुसार जाग्रत संसार भी स्वप्न जैसा है?

हाँ, योगवाशिष्ठ स्पष्ट करता है कि जाग्रत संसार भी मन के संकल्पों और वासनाओं से भासने वाला एक दीर्घ स्वप्न ही है, जो आत्मज्ञान होते ही स्वप्नवत् सिद्ध होता है।

प्रबुद्ध लीला के भौतिक शरीर का क्या हुआ?

समाधि अवस्था में लीला का शरीर काष्ठवत कठोर व निष्प्राण हो जाने के कारण, मंत्रियों ने उसे मृत समझकर विधिपूर्वक उसका दाह-संस्कार कर दिया था।

राजा पद्म किस प्रकार पुनर्जीवित हुए?

माँ सरस्वती के दिव्य संकल्प बल से, पूर्व में सुरक्षित रखी गई विदूरथ की प्राणवायु को नासिका-छिद्रों के मार्ग से पद्म के शरीर में प्रविष्ट कराया गया, जिससे वे पुनः जीवित हो उठे।

जीवन्मुक्त किसे कहते हैं?

जो भौतिक देह में रहते हुए भी दृश्य जगत के समस्त भ्रमों से मुक्त होकर, निरंतर आत्म-चैतन्य में स्थित रहकर अनासक्त भाव से कर्म करता है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं।

निष्कर्ष

राजा पद्म का पुनर्जीवन यह प्रमाणित करता है कि बाह्य जगत के समस्त नाम-रूप मन के संकल्पों के प्रतिबिंब मात्र हैं और आत्मज्ञान ही सभी दुखों का अंतिम निवारण है। हमने देखा कि लीला ने अपने तीव्र मुमुक्षुत्व के बल पर मृत्यु और माया के पार जाकर अपने पति को पुनर्जीवित कर किस प्रकार जीवन्मुक्ति प्राप्त की। किंतु, इस अनंत सृष्टि में जीव को जन्म-मरण की परंपरा से सर्वथा मुक्त करने का और कौन सा मार्ग है?


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A. Ravinder, RamthaMedia
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