दृश्य भ्रांति मिटाकर मन को शांत करने का रहस्य | Yoga Vasistha S3 EP-37

संसार सत्य है या मन का भ्रम? महर्षि वशिष्ठ द्वारा श्रीराम को दिए गए आत्मज्ञान उपदेश को योगवाशिष्ठ S3 EP-37 में विस्तार से जानें।

दिखाई देने वाला संसार वास्तव में सत्य है या मन द्वारा रची गई एक भ्रांति, योगवाशिष्ठ इसका स्पष्ट उत्तर देता है। महर्षि वशिष्ठ उपदेश देते हैं कि अज्ञान के कारण एक ही परमात्मा जगत के रूप में प्रतीत हो रहा है, और मन की वासनाओं को मिटाकर जब इस दृश्य प्रपंच को आत्मस्वरूप मान लिया जाता है, तभी शाश्वत मुक्ति संभव होती है।

हमारे जीवन में आने वाली अनेक चिंताओं, भयों और शोकों का कारण हम बाहरी परिस्थितियों को मान लेते हैं। परंतु यदि सूक्ष्मता से विचार करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे मन की अनगिनत कल्पनाएं ही हमें भ्रम में डालकर निरंतर बंधनों में जकड़ती हैं। बाहर की वस्तुओं को देखकर आकर्षित होना और जो नहीं है उसकी कल्पना करके भयभीत होना मनुष्य का दैनिक अनुभव बन चुका है।

श्रीराम के हृदय के संशयों को समूल नष्ट करने के लिए महर्षि वशिष्ठ ने इस अध्याय में दृश्य भ्रांति के मूल कारणों को अत्यंत सुंदर दृष्टांतों के माध्यम से उद्घाटित किया है। मन किस प्रकार उस अविचल आत्मतत्व में अनेकता का भ्रम उत्पन्न करता है, और इस भ्रम से मुक्त होकर आत्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इसका उन्होंने बहुत गहरा विवेचन किया है।

एक ही ज्योति से प्रज्वलित अनंत दीपक

सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति मौन होकर महर्षि वशिष्ठ की ओर देख रहा था। श्रीराम के नेत्रों में ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र जिज्ञासा और उत्कंठा स्पष्ट झलक रही थी। महर्षि ने शांत मुखमंडल के साथ अपनी दिव्य दृष्टि राम पर केंद्रित की और संपूर्ण सृष्टि के मूल, परमात्मा के एकत्व तथा उसमें प्रतीत होने वाले अनेकत्व का रहस्य समझाना आरंभ किया।

महर्षि ने गंभीर वाणी में अपने प्रिय शिष्य राघव को संबोधित करते हुए कहा।

महर्षि वशिष्ठ: «हे रामचंद्र! एक ही मूल दीपक से लाखों अन्य दीपक जलाए जा सकते हैं न! उन जलने वाले प्रत्येक दीपकों में उसी पहले दीपक का प्रकाश विद्यमान होता है। ठीक वैसे ही, वह एकमात्र परमात्मा ही इस जगत के नानाविध रूपों में प्रकाशित हो रहा है।»

महर्षि वशिष्ठ: «परंतु विचारयुक्त ज्ञानदृष्टि रखने वालों को ही ब्रह्म का यथार्थ स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।»

चित्त द्वारा रची गई जीव-भावना

महर्षि के वचनों को राजसभा में उपस्थित विद्वान और ऋषि-मुनि अत्यंत एकाग्रता से सुन रहे थे। केवल राम के लिए ही नहीं, बल्कि संसार के मोहजाल में फंसे समस्त मानव समुदाय का मार्गदर्शन करने के उद्देश्य से वशिष्ठ जी ने अपने उपदेश का विस्तार किया। अज्ञान के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर कैसे बंधन में पड़ता है, इसका उन्होंने विशद वर्णन किया।

आत्मज्ञान की दिशा में मनुष्य के मन को जागृत करते हुए महर्षि ने इस प्रकार उपदेश दिया।

महर्षि वशिष्ठ: «हे लोगो! तुम सब उस परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए तत्पर हो जाओ। जब वह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब यह चित्त द्वारा की गई जीव की कल्पना, दृश्य पदार्थों से होने वाला संयोग और उसके परिणाम स्वरूप मिलने वाला बंधन—यह सब केवल एक मिथ्या कल्पना सिद्ध हो जाता है।»

महर्षि वशिष्ठ: «तब भ्रम, शोक, मोह, संकीर्णता, निराशा, भय और उद्वेग जैसे स्वयं गढ़े गए सभी दोष समूल नष्ट हो जाते हैं। स्वतःसिद्ध मोक्ष का अनुभव तुम्हारा अपना हो जाता है।»

आत्मविचार से विलीन होता संसार

सभामंडप में वशिष्ठ जी के वचन ज्ञान की किरणों के समान प्रस्फुटित हो रहे थे। महर्षि ने स्पष्ट किया कि मन स्वयं ही स्वयं को एक सीमित ‘जीव’ मान लेता है और उस भाव को अपने ऊपर थोप लेता है, इसी कारण यह सारा दुख उत्पन्न होता है। विचार करते ही यह दृश्य जगत का अनुभव किस प्रकार तिरोहित हो जाता है, उन्होंने यह भली-भांति समझाया।

विचारहीन मनुष्यों के अज्ञान का वर्णन करते हुए महर्षि ने राम से कहा।

महर्षि वशिष्ठ: «राम! यह चित्त स्वयं पर ‘मैं जीव हूँ’ का स्वभाव आरोपित कर लेता है। किंतु जैसे ही आत्मविचार आरंभ होता है, उसी क्षण यह दृश्य प्रपंच स्वतः ही विलीन हो जाता है। सत्य का बोध हो जाने पर असत्य भाव और उद्वेग भला कैसे टिक सकते हैं!»

महर्षि वशिष्ठ: «जो इतना सा भी प्रयास करके विचारशील बनने को तैयार नहीं होते, उनका उद्धार कौन कर सकता है? जैसे कोई मूर्ख अपना भला करने वाले के वचनों में भी स्वार्थ और छल देखता है, वैसे ही अज्ञानी अपने अज्ञान का आरोप उस निर्मल परमात्मा पर लगा देता है। उसी अज्ञान का संसार के रूप में दिखाई देना ही संसार कहलाता है।»

मदिरा के नशे में डोलता मायावी संसार

श्रीराम हाथ जोड़कर महर्षि के मुख की ओर एकटक देख रहे थे। भ्रांति में पड़ा मन कैसे-कैसे विचित्र खेल दिखाता है, इसे स्पष्ट करने के लिए वशिष्ठ जी ने अत्यंत प्राचीन और स्पष्ट दृष्टांत प्रस्तुत किए। उन्होंने सिद्ध किया कि संसार चक्र को चलाने वाला केवल मन का भ्रम ही है।

महर्षि ने और अधिक दृढ़ वाणी में इस प्रकार कहा।

महर्षि वशिष्ठ: «हे प्रिय रघुपति! मैं पुनः-पुनः कह रहा हूँ, ध्यान से सुनो। भ्रांति में पड़ा हुआ यह चित्त ही जन्म-मृत्यु, बाल्य-यौवन-वृद्धावस्था और स्वर्ग-नरक को देखता हुआ नाच रहा है।»

महर्षि वशिष्ठ: «अत्यधिक मदिरापान के नशे में डूबे व्यक्ति को शून्य आकाश में भी न होने वाली लहरें, वृक्ष, बालों के गुच्छे और भांति-भांति के आकार दिखाई देने लगते हैं न! ठीक वैसे ही अज्ञान से ग्रस्त चित्त भी इस जीव के सम्मुख न होने वाले असंख्य ब्रह्मांडों को प्रत्यक्ष खड़ा कर देता है।»

अफीम का नशा.. हवा में उड़ते वृक्ष

यह दृष्टांत सुनकर सभा में उपस्थित सभी लोग मन की भ्रांति-शक्ति पर चकित रह गए। महर्षि यहीं नहीं रुके, उन्होंने एक अन्य उपमा के माध्यम से समझाया कि किस प्रकार मानसिक भ्रम अचल सत्य को चंचल बना देता है। स्थिर वस्तु को हिलती हुई मानना ही संसार के दुख का मूल कारण है।

महर्षि ने उस उपमा को स्पष्ट करते हुए राम को प्रबोधित किया।

महर्षि वशिष्ठ: «राम! अफीम खाए हुए व्यक्ति को भूमि पर मजबूती से जड़े हुए वृक्ष भी आकाश में उड़कर नाचते हुए प्रतीत होते हैं। उसी प्रकार चित्त के भ्रम में डूबा हुआ जीव किसी भी विकार से रहित अविचल आत्मा में इस संसार चक्र को घूमता हुआ मानकर व्यर्थ ही भयभीत होता रहता है।»

नेत्र रोग के दो चंद्रमा.. घूमता हुआ पहिया

सभा में सन्नाटा और अधिक गहरा हो गया। मन के दोष के कारण उस अद्वितीय एक परमात्मा में द्वैत कैसे दिखाई देता है, इसे महर्षि ने नेत्र रोग और तेजी से घूमते चक्र के उदाहरण से समझाना शुरू किया। उन्होंने बताया कि प्रतिक्षण बदलने वाला मन ही सृष्टि की विविधता का निर्माण करता है।

वशिष्ठ जी ने अपने उपदेश को आगे बढ़ाते हुए कहा।

महर्षि वशिष्ठ: «जिस रोगी की आंख में तिमिर रोग का दोष हो जाता है, उसे आकाश में एक ही चंद्रमा होने पर भी दो चंद्रमा दिखाई देते हैं। चित्त के रोग से पीड़ित यह जीव भी उस एकमात्र परमात्मा में द्वैत का भ्रम देख रहा है।»

महर्षि वशिष्ठ: «जब कोई छोटा बालक तेजी से घूमते हुए झूले या पहिये पर बैठता है, तो वह चिल्ला उठता है—’अरे देखो! ये घर, धरती, तालाब और पर्वत सब गोल-गोल घूम रहे हैं।’ वास्तव में घूम वह यंत्र रहा होता है, पूरा नगर नहीं। वैसे ही चित्त की निरंतर चंचलता के कारण ही ये सारे दृश्य अत्यंत विचित्र और नाना रूपों में प्रतीत होते हैं।»

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इस अध्याय में महर्षि वशिष्ठ द्वारा बताए अनुसार दृश्य भ्रांति को मिटाकर अंतर्मन में निर्विकल्प समाधि का अनुभव करने के लिए निरंतर ध्यान अत्यंत आवश्यक है।

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ईंधन हटने पर शांत होती विषयों की अग्नि

द्वैत की भ्रांति नष्ट होते ही असत्य संसार विलीन हो जाता है और केवल एकमात्र सत्य परमतत्व ही शेष रहता है, यह वशिष्ठ जी ने भली-भांति प्रतिपादित किया। जैसे ईंधन न मिलने पर अग्नि शांत हो जाती है, वैसे ही विषय-वासनाएं न मिलने पर मन भी शांत हो जाता है। महर्षि ने मन को स्थिर करने का गुप्त साधन प्रकट किया।

महर्षि ने साधना के क्रम को समझाते हुए राम से कहा।

महर्षि वशिष्ठ: «यदि जलती हुई लकड़ी को हटा दिया जाए, तो प्रज्वलित अग्नि शांत होने के अतिरिक्त और क्या करेगी? आत्मतत्व के विचार और निरंतर अभ्यास से बाह्य विषयों की ओर दौड़ने वाली यह प्रवृत्ति रूपी अग्नि शांत हो जाती है। विषय-दर्शन समाप्त होते ही चित्त भी समूल लय को प्राप्त हो जाता है।»

महर्षि वशिष्ठ: «’यह सब कुछ आत्मस्वरूप ही है’—मन को निरंतर ऐसा अभ्यास कराना चाहिए। चित्त से भिन्न इंद्रिय-विषय कुछ भी नहीं हैं, यह जानकर अज्ञान को अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिए।»

‘यह मैं नहीं.. यह मेरा नहीं’ की दिव्य स्थिति

श्रीराम महर्षि के उपदेश के व्यावहारिक पक्ष को समझते हुए अत्यंत विनम्रतापूर्वक श्रवण कर रहे थे। दैनिक जीवन में कर्म करते हुए भी मन को कैसे मुक्त रखा जाए, इसका सर्वोच्च मार्ग वशिष्ठ जी ने समझाया। इस सृष्टि के किसी भी पदार्थ के साथ तादात्म्य स्थापित न कर साक्षी रूप में स्थित रहना ही मुक्ति का राजमार्ग है।

महर्षि वशिष्ठ ने अभ्यास की विधि बताते हुए कहा।

महर्षि वशिष्ठ: «हे राघव! चित्त के विकारों को मिटाकर ‘यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा नहीं है’—इस दृढ़ भाव के साथ अभ्यास करना चाहिए। जो जीव इस स्थिति को सिद्ध कर लेता है, वह इस लोक में नित्य कर्मों को करते हुए भी सर्वदा मुक्त ही रहता है।»

नशे के पार निर्विकल्प समाधि का प्रकाश

चेतना जितनी अधिक विकसित होती है, भ्रांति उतनी ही नष्ट होती है—इस परम सत्य का महर्षि ने विश्लेषण किया। मादक पेय के विभिन्न स्तरों का दृष्टांत देते हुए उन्होंने बताया कि पूर्ण चेतना में यह दृश्य जगत कैसे विलीन हो जाता है। प्रपंच रहित आत्म-स्थिति ही परमपद है।

वशिष्ठ जी ने निर्विकल्प स्थिति का वर्णन करते हुए उपदेश दिया।

महर्षि वशिष्ठ: «प्रिय राम! यदि कोई व्यक्ति थोड़ी मदिरा पिए, तो उसे हल्का नशा होता है और बुद्धि चंचल हो जाती है। किंतु यदि वह अत्यधिक पी ले, तो गहरे नशे में अचेत होकर गिर पड़ता है न! उसी प्रकार जब चेतना परिपूर्ण रूप से प्रकाशित होती है, तब दृश्य विषयों का भान ही समाप्त हो जाता है।»

महर्षि वशिष्ठ: «जब तक मन में कुछ चेतना और कुछ जड़ता रहती है, तभी तक जीव बाह्य विषयों की ओर भागता है। निर्विकल्प समाधि में चेतना का प्रकाश अपनी चरम सीमा पर होता है। घनीभूत चैतन्य स्वरूप स्थिति ही परमपद है। संपूर्ण दृश्य को अपने ही स्वरूप के रूप में अनुभव करना ही निर्विकल्प स्थिति है!»

रस्सी में सर्प का भ्रम.. वासना त्याग ही मुक्ति

सभा में उपस्थित सभी जिज्ञासुओं के हृदय से अज्ञान का अंधकार मिटने लगा था। रस्सी में सांप दिखाई देने के सुप्रसिद्ध दृष्टांत के माध्यम से महर्षि वशिष्ठ ने अविद्या के बंधन को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि बाह्य पदार्थों की अपेक्षा अंतःकरण में छिपी वासनाएं ही जीव को संसार में बांधती हैं।

महर्षि ने मुक्ति के मार्ग को विस्तार देते हुए कहा।

महर्षि वशिष्ठ: «जैसे रस्सी में अज्ञानवश सांप की भ्रांति हो जाती है, वैसे ही अविद्या के प्रभाव से शुद्ध चैतन्य में दृश्य का भ्रम उत्पन्न होता है। रस्सी का यथार्थ ज्ञान होने पर जैसे सर्प का भय नहीं रहता, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर यह संसार का भ्रम भी स्वतः समाप्त हो जाता है।»

महर्षि वशिष्ठ: «जो मनुष्य बाह्य दृश्यों और अंतर्मन की वासनाओं का पूर्णतः परित्याग कर देता है, उसे यहीं और इसी क्षण मुक्ति प्राप्त हो जाती है। वासनाओं का होना ही बंधन है, और वासनाओं का त्याग ही वास्तविक मोक्ष है।»

सामने खड़ा पर्वत.. समुद्र की तरंगें

उपदेश अपने समापन की ओर पहुंच गया था। वशिष्ठ जी ने स्पष्ट किया कि परमात्मा कोई दूर देश में खोजने की वस्तु नहीं है, बल्कि सम्मुख खड़े विशाल पर्वत की भांति यहीं प्रत्यक्ष अनुभव करने योग्य सत्य है। जैसे समुद्र में उठने वाली तरंगें समुद्र का ही जल हैं, वैसे ही यह संपूर्ण जगत केवल परमात्मा का ही स्वरूप है।

महर्षि वशिष्ठ ने परम सत्य की घोषणा करते हुए गंभीर स्वर में उपसंहार किया।

महर्षि वशिष्ठ: «राम! सम्मुख खड़े पर्वत की भांति परमात्म तत्व को अभी और यहीं प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। दृश्यों की आसक्ति मिट जाने पर जो तुम्हारा वास्तविक स्वरूप शेष रहता है, वही परमात्मा है। वह परमात्मा कहीं दूर से आने वाली कोई वस्तु नहीं है!»

महर्षि वशिष्ठ: «तरंगों के रूप में जो कुछ दिखाई देता है, वह सब समुद्र का जल ही तो है! परमात्मा ही अज्ञानियों को जगत के रूप में भासता है, जबकि ज्ञानियों को सर्वत्र केवल आत्मस्वरूप ही अनुभव होता है। इस दृश्य को आत्मा के रूप में जान लेने से ही मोक्ष प्राप्त होता है। जब तक ऐसा बोध नहीं होता, तब तक यह संसार बंधन बना ही रहेगा।»

दृश्य भ्रांति बनाम आत्मज्ञान दर्शन — मुख्य अंतर

लक्षण अज्ञान दृष्टि (दृश्य भ्रांति) ज्ञान दृष्टि (आत्म दर्शन)
जगत का दर्शन अनेकता से युक्त सत्य जगत मानना परमात्मा का एकमात्र चैतन्य प्रकाश देखना
उपमा की स्थिति मदिरा का नशा, तिमिर रोग, घूमते चक्र का भ्रम एक ही मूल दीपक, समुद्र में तरंगों का एकत्व
मन की स्थिति वासनाओं से भरकर ‘मैं कर्ता हूँ, जीव हूँ’ कहना ‘यह मैं नहीं, यह मेरा नहीं’ कहते हुए शांत हो जाना
बंधन व मुक्ति दृश्य पदार्थों के पीछे भागते हुए संसार का बंधन दृश्य को आत्मा जानकर यहीं और इसी क्षण मोक्ष

आध्यात्मिक अंतर्निहित भाव

इस अध्याय में महर्षि वशिष्ठ द्वारा प्रतिपादित परम रहस्य दृश्य का अभाव नहीं, अपितु दृश्य को ही आत्मा के रूप में पहचानना है। बाहर दिखाई देने वाला भौतिक संसार वस्तुतः सत्य नहीं है, बल्कि वह मन द्वारा रचित एक मायावी चित्र है—यह जानना ही आत्मज्ञान का प्रथम सोपान है। जैसे मदिरापान किया हुआ व्यक्ति शून्य में आकृतियां देखता है, अथवा नेत्र दोष से ग्रस्त व्यक्ति को दो चंद्रमा दिखाई देते हैं, वैसे ही मन अपने भीतर की वासनाओं के कारण अद्वैत परमात्मा को द्वैत प्रपंच मान बैठता है।

जैसे लकड़ियों को हटा देने पर अग्नि स्वतः शांत हो जाती है, वैसे ही विचार द्वारा बाह्य विषयों के प्रति आसक्ति (वासनाओं) को मिटा देने पर मन अपने आप अविचल हो जाता है। परमात्मा को किसी अन्य लोक में खोजने की आवश्यकता नहीं है; सामने खड़े पर्वत की भांति वह सर्वदा हमारे सम्मुख हमारा अपना ही स्वरूप बनकर विद्यमान है। जिस प्रकार तरंगें समुद्र का ही अभिन्न अंग हैं, उसी प्रकार यह संपूर्ण दृश्य जगत उसी परमात्मा में उत्पन्न होकर परमात्मा रूप में ही प्रकाशित हो रहा है।

अपने जीवन में आने वाले तनावों और भयों को दूसरों का कारण न मानकर यह समझें कि ये आपके अपने मन की कल्पनाएं हैं। प्रतिदिन कुछ क्षण ‘यह मैं नहीं हूँ, यह मेरा नहीं है’ के भाव से मन की व्यर्थ वासनाओं को विसर्जित करें और अपने भीतर के अविचल आत्मतत्व की शरण लें।

इस अध्याय का सारांश

महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को दृश्य भ्रांति का स्वरूप समझाया। जैसे एक दीपक से अनेक दीपक जलते हैं, वैसे ही एक परमात्मा जगत के रूप में प्रतीत होता है। मदिरा के नशे, नेत्र रोग और घूमते झूले पर बैठे बालक की भांति जीव चित्त दोष के कारण द्वैत देखता है। ईंधन हटाने पर अग्नि शांत होने की तरह, विचार से वासनाएं मिटते ही चित्त शांत हो जाता है। रस्सी में सर्प की भांति यह संसार अज्ञान की रचना है। सम्मुख पर्वत की भांति परमात्मा यहीं विद्यमान है। इस दृश्य को आत्मा जान लेने पर ही शाश्वत मुक्ति मिलती है।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: दृश्य जगत मात्र मनोभ्रांति है; संपूर्ण दृश्य को आत्मस्वरूप में देखना ही वास्तविक मोक्ष है।
  • तात्विक शिक्षा: अद्वैत ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। वासनाबद्ध चित्त जीवभाव और द्वैत प्रपंच की कल्पना करता है। आत्मविचार और वासना-त्याग से चित्त का लय होकर निर्विकल्प स्थिति सिद्ध होती है।
  • अगले अध्याय से संबंध: दृश्य भ्रांति को दूर कर लेने वाला साधक परमात्मा को जानकर आत्मानंद में कैसे स्थिर होता है, इसका विवेचन महर्षि अगले अध्याय में करेंगे।

एक ही दीपक से जलने वाले लाखों दीपकों के पीछे एक ही प्रकाश विद्यमान है।

वासनाओं का होना ही संसार बंधन है; वासनाओं का त्याग ही प्रत्यक्ष मोक्ष है।

दृश्य को आत्मा के रूप में जान लेने से ही शाश्वत मोक्ष प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दृश्य भ्रांति क्या है?

अविचल और अद्वितीय परमात्मा में मन द्वारा अपने वासना दोष के कारण अनेक रूपों वाले जगत को सत्य मान लेना ही दृश्य भ्रांति है।

चित्त को शांत और विलीन कैसे करें?

जैसे ईंधन हटाने से अग्नि बुझ जाती है, वैसे ही आत्मविचार और ‘यह मैं नहीं, मेरा नहीं’ के अभ्यास से विषय-वासनाओं को हटाने पर चित्त स्वतः शांत हो जाता है।

मद्यपान और नेत्र रोग के दृष्टांतों से वशिष्ठ जी ने क्या समझाया?

नशे में व्यक्ति शून्य में दृश्य देखता है और तिमिर रोग वाला दो चंद्रमा देखता है; ठीक वैसे ही चित्त रोग से ग्रस्त जीव असत्य संसार और द्वैत को देखता है।

निर्विकल्प समाधि क्या है?

मन की समस्त कल्पनाएं शांत हो जाने पर, चेतना के परम प्रकाश में संपूर्ण दृश्य प्रपंच को अपने ही स्वरूप के रूप में अनुभव करना निर्विकल्प समाधि है।

मोक्ष कब और कहाँ प्राप्त होता है?

दृश्य की आसक्ति और आंतरिक वासनाओं का त्याग करते ही, सम्मुख खड़े पर्वत की भांति प्रत्यक्ष परमात्मा का यहीं और इसी क्षण अनुभव कर मोक्ष पाया जा सकता है।

योगवाशिष्ठ के अनुसार संसार बंधन कैसे कटता है?

इस दिखाई देने वाले संपूर्ण दृश्य प्रपंच को परमात्मा के स्वरूप के रूप में जान लेने पर ही संसार बंधन सदा के लिए कटता है।

निष्कर्ष

जैसे समुद्र की तरंगें समुद्र का ही जल हैं, वैसे ही हमारे सम्मुख विद्यमान यह समस्त दृश्य परमात्मा का ही स्वरूप है—यह महर्षि वशिष्ठ ने भली-भांति स्पष्ट किया। जब तक दृश्य को आत्मा के रूप में नहीं जाना जाता, तब तक यह संसार बंधन बना ही रहेगा। तो फिर उस परमात्मा का पूर्ण बोध प्राप्त कर इन बंधनों से सदा के लिए मुक्त होने का महर्षि द्वारा बताया गया अगला उपाय क्या है? आइए, इस ज्ञान रहस्य को अगले प्रसंग में जानें।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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