मनुष्य अपने अस्तित्व के मूल को और इस संसार चक्र में जीव के प्रवेश के रहस्य को जानने के लिए निरंतर व्याकुल रहता है। योगवाशिष्ठ के अनुसार जीव परमात्मा से अलग उत्पन्न नहीं हुआ है; शुद्ध चैतन्य अविद्या का आश्रय लेकर, संकल्पों के माध्यम से स्वयं को सीमित जीव मान लेता है, और यही संसार का वास्तविक कारण है।
जीवन की यात्रा में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कभी न कभी एक गहरा अंतर्मंथन शुरू होता है। वास्तव में मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, और मेरे सुख-दुःख का उत्तरदायी कौन है—ये प्रश्न अंतःकरण को झकझोर देते हैं। यह अस्तित्वगत वेदना केवल किसी साधारण मनुष्य की नहीं थी; रघुकुल तिलक श्रीराम को भी इसने विचलित कर दिया था। राजसी भोग-विलासों के बीच रहते हुए भी, मानव जन्म के मूल रहस्य को जानने की तीव्र पिपासा उनके भीतर उमड़ पड़ी।
समस्त सृष्टि के मूल उस परब्रह्म तत्व और देहधारी इस अल्प जीव के बीच का आंतरिक संबंध क्या है—यह अनादिकाल से चला आ रहा एक महान प्रश्न है। जब आत्मा सर्वव्यापी है, तो फिर जीव जन्म-मरण के भंवर में क्यों फँसता है? राजसभा में आसीन महर्षि वशिष्ठ की ओर देखते हुए श्रीराम द्वारा पूछा गया यह मूल प्रश्न संपूर्ण मानवता की आध्यात्मिक खोज की एक दिव्य कुंजी बन गया।
श्रीराम का मौलिक संशय — जीव कहाँ से आया?
राजसभा में एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। सभा में उपस्थित महर्षि और विद्वान एकटक श्रीराम के मुखमंडल के तेज को निहार रहे थे। अपने अंतःकरण में उमड़ती दार्शनिक जिज्ञासा को अपनी आँखों में समेटे, श्रीराम ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान वशिष्ठ को प्रणाम किया।
श्रीराम ने अत्यंत गंभीर स्वर में महर्षि से यह प्रश्न पूछा —
राम के स्वर की वेदना और सत्य को जानने की तड़प को पूरी सभा ने एक ही क्षण में अनुभव कर लिया। सभी समझ गए कि यह प्रश्न केवल एक राजकुमार का व्यक्तिगत संशय नहीं है, बल्कि युगों-युगों से मानव जाति को मोक्ष का मार्ग दिखाने वाली एक महान दार्शनिक खोज है।
श्रीराम: हे महर्षि! ‘चित्त’ रूपी उपाधि से युक्त इस ‘जीव’ का उस ‘परमात्मा’ से क्या संबंध है? वास्तव में यह जीव कौन है? क्या यह परमात्मा से ही प्रकट हुआ है? यह कब और किस कारण से उत्पन्न होता है? या फिर यह कहीं और से आया है? कृपया इस गूढ़ रहस्य को मुझ पर स्पष्ट कीजिए।
शुद्ध चैतन्य में चित्-शक्ति का स्पंदन — द्वैत भावना की उत्पत्ति
महर्षि वशिष्ठ के अधरों पर एक मंद मुस्कान तैर गई। श्रीराम के प्रश्न की गंभीरता की सराहना करते हुए, उन्होंने सर्वसृष्टि के मूल परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करना आरंभ किया। उनके मुख से निकलते शब्द सभामंडप में अमृत की वर्षा की भाँति बरस रहे थे।
वशिष्ठ जी ने अपनी शांत और करुणामयी दृष्टि श्रीराम पर टिकाते हुए कहा —
सभा में उपस्थित सभी लोग अपनी साँसें थामकर सुन रहे थे। इस सर्वोच्च ज्ञान को समझाते हुए महर्षि और अधिक गहराई में उतरे। निर्गुण आत्मा किस प्रकार दृश्य जगत का रूप धारण करती है, जब वे इसका वर्णन कर रहे थे, तब श्रीराम के अंतःकरण से अज्ञान के पर्दे एक-एक कर हटने लगे।
जीव किसी अन्य लोक से या किसी बाहरी शक्ति द्वारा नहीं आया, बल्कि अपने ही संकल्पों के कारण उसने इस भ्रम की रचना की है—यह सुनकर सभा के सभी ज्ञानी विस्मय से सिर हिलाने लगे।
महर्षि वशिष्ठ: हे राम! ध्यानपूर्वक सुनो। स्वभावतः शुद्ध, निर्मल, नित्य और अखंड ब्रह्म कभी-कभी अविद्या से युक्त प्रतीत होता है। जब वह अविद्या का आश्रय लेता है, तो जिस शक्ति के रूप में अभिव्यक्त होता है, स्वयं को उसी रूप में मानने लगता है। उसी भाव और उसी दर्शन को हम ‘संसार’ कहते हैं।
महर्षि वशिष्ठ: बंधन और मोक्ष भौतिक जन्म और कर्मों से जुड़े नहीं हैं। वे तो अखंड चैतन्य रूपी द्रष्टा के अपने बोध के अनुसार ही निर्मित होते हैं। अनादिकाल से प्रकट हो रही इस चेतन शक्ति को ही हम ‘जीव’ कहते हैं। चित्-शक्ति संकल्पों का आश्रय लेकर ‘मैं जीव हूँ, मैं जन्म लेता हूँ, मैं मरता हूँ’—इस द्वैत भावना को स्वयं ही सुदृढ़ करती रहती है।
श्रीराम का प्रतिप्रश्न — दैव और कर्म का औचित्य क्या है?
महर्षि की व्याख्या सुनकर श्रीराम के मुख पर एक और गहरा संशय उभर आया। जब चित्-शक्ति ही अपने स्वभाववश जीव बनकर सुख-दुःख भोग रही है, तो इस संसार में कहे जाने वाले शास्त्र नियमों और विधि-विधानों का क्या मूल्य है—इस विचार ने उन्हें मंथन में डाल दिया।
श्रीराम ने अत्यंत विनयपूर्वक आगे झुकते हुए महर्षि से पुनः प्रश्न किया —
राम के सूक्ष्म तर्क को सुनकर सभा के विद्वान मुग्ध हो गए। यदि सब कुछ स्वभाव ही है, तो फिर मानव प्रयास, कर्मफल और दैव का क्या अर्थ रह जाता है—इस प्रश्न ने पूरी सभा को एक दार्शनिक मौन में डुबो दिया।
श्रीराम: हे मुनिश्रेष्ठ! आपके कथनानुसार जब सर्वोत्कृष्ट चित्-शक्ति ही स्वभाववश जीव बनकर जन्म-मरण को प्राप्त होती है, और जब सब कुछ स्वभाव ही है, तब यह दैव है, यह कर्म है, यह बद्ध जीव है, यह मुक्त जीव है, अथवा यह कारण है—ऐसा भेद करने का क्या औचित्य रह जाता है?
आकाश में वायु का संचलन — चित्-स्पंदन ही है यह जगत
श्रीराम के विवेक और तीक्ष्ण बुद्धि को देखकर वशिष्ठ जी अत्यंत प्रसन्न हुए। इस जगत की उत्पत्ति के रहस्य को प्रत्यक्ष करने के लिए उन्होंने प्रकृति के अत्यंत सूक्ष्म उदाहरण को चुना। उनके इस उपदेश ने सभा के प्रत्येक व्यक्ति को एक अमूल्य ध्यान की अवस्था में पहुँचा दिया।
वशिष्ठ जी ने अपनी करुणामयी दृष्टि से सभा को देखते हुए प्रबोधन दिया —
सभा का हर व्यक्ति उस उपमा के गहरे रहस्य को आत्मसात कर रहा था। वायु के होने पर भी आकाश जिस प्रकार निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार जगत के चलायमान होने पर भी आत्मा सदा अपरिवर्तनीय रहती है—वशिष्ठ जी ने यह पूर्णतः स्पष्ट कर दिया।
वशिष्ठ जी के इस स्पष्टीकरण से सभासदों को यह भली-भाँति समझ आ गया कि संसार कोई अलग से स्थित वस्तु नहीं है, बल्कि वह केवल परमात्मा का स्पंदन मात्र है।
महर्षि वशिष्ठ: हे राघव! आकाश में वायु विद्यमान रहती है। जब वह तीव्र गति से चलती है, तब हम स्पर्श द्वारा उसकी अनुभूति करते हैं; जब गति नहीं होती, तब उसका भान नहीं होता। किंतु आकाश इन सबसे परे और निराकार ही रहता है। इसी प्रकार आत्मा रूपी आकाश में जीव-चैतन्य के भीतर ‘भावना करने’ रूपी वायु का संचलन होता है। उन संकल्पों के स्पंदन और निस्पंदन से ही सृष्टि और प्रलय का चक्र चलता है।
महर्षि वशिष्ठ: यह संपूर्ण जगत केवल चैतन्य ही है! जब यह रजोगुण से युक्त होता है, तो सृष्टि का विस्तार होता है; और जब वह शांत हो जाता है, तो सब कुछ उपशमित हो जाता है। अज्ञान के कारण चैतन्य अपने भाव को ‘यह मेरा चित्त है’ ऐसा मान बैठता है। शास्त्रकारों ने इसे ही ‘चित्-स्पंदन’ कहा है। वही स्पंदन जगत है, और स्पंदन का अभाव ही परब्रह्म है!
स्वर्ण और आभूषण — एकत्व में अनेकत्व का भ्रम
चित्-स्पंदन को ही जीव, कर्म, दैव आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है—महर्षि ने इसे और अधिक स्पष्ट किया। यह अनेकता का भ्रम मानव मन को किस प्रकार आच्छादित कर लेता है, इसे समझाने के लिए उन्होंने दैनिक जीवन से जुड़े एक अन्य प्रसिद्ध दृष्टांत का उल्लेख किया।
महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम की ओर देखते हुए शांत और गंभीर भाव से कहा —
श्रीराम अत्यंत एकाग्रता से महर्षि के वचनों को श्रवण कर रहे थे। शरीर का आकार होता है, किंतु देह के भीतर स्थित देही का कोई आकार नहीं होता—इस सत्य ने सभामंडप को ज्ञान के प्रकाश से भर दिया।
माया के प्रभाव से चैतन्य भले ही अपने अखंड स्वरूप को क्षण भर के लिए भूल जाए, किंतु उसका मूल तत्व कभी नष्ट नहीं होता—महर्षि ने इस सत्य की घोषणा की।
महर्षि वशिष्ठ: हे वत्स राम! स्वर्ण तो सदा एक ही रहता है, किंतु जब वह अंगूठी, कंगन या कुंडल आदि आकारों को धारण करता है, तब भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। ठीक वैसे ही समस्त जीवों में एक ही चैतन्य विद्यमान है। किंतु भिन्न उपाधियों का आश्रय लेकर वह ‘यह पिता है, यह पुत्र है, यह मित्र है’—इस प्रकार के मनोकल्पित व्यवहार रचता है।
महर्षि वशिष्ठ: पंचमहाभूतों के संयोग से बने ये शरीर तरंगों के समान क्षणभंगुर हैं। चैतन्य अपने संकल्प, इच्छा और वासनाओं के वशीभूत होकर पिता के शरीर से शुक्र रूप में निकलकर अनेक शरीरों को धारण करता चला जाता है। जीव चाहे कितने भी जन्म क्यों न ले ले, उसका सर्वव्यापी आत्मस्वरूप किसी भी क्षण नष्ट नहीं होता।
स्वप्न में पैर फिसलने का अनुभव — राजा लवण का दृष्टांत
संसार का यह भ्रम जितना वास्तविक प्रतीत होता है, गहराई से विचार करने पर उतना ही शून्य है—यह दर्शाने के लिए वशिष्ठ जी ने स्वप्न जगत का उदाहरण दिया। स्वप्न के अनुभव जागते ही जिस प्रकार तिरोहित हो जाते हैं, उन्होंने उसे अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किया।
महर्षि ने अपनी वाणी को और अधिक भावपूर्ण बनाते हुए समझाया —
इन वचनों को सुनते हुए सभा में उपस्थित साधक अपने स्वयं के जीवन का अवलोकन करने लगे। वे जिन सुख-दुःखों को भोग रहे हैं, वे भी स्वप्न की घटनाओं के समान ही हैं—यह बोध उनके भीतर जाग उठा।
भ्रम भले ही अनुभव के समय सत्य जैसा लगे, किंतु ज्ञान का उदय होते ही वह केवल मनोविकार सिद्ध होता है—वशिष्ठ जी ने इसे भली-भाँति स्पष्ट किया।
महर्षि वशिष्ठ: हे राम! स्वप्न में पैर फिसलकर खाई में गिर जाना केवल एक मिथ्या भ्रम है। किंतु जब तक निद्रा रहती है, तब तक विचार करो कि वह कितना भयानक सत्य प्रतीत होता है! यह चित्त भी वैसा ही है। ‘मैं और मेरा’ के भ्रम में अविद्या से मोहित होकर, वह इस स्वप्नवत् जगत को देखते हुए जन्म और मरण को ही वास्तविक मान बैठता है।
महर्षि वशिष्ठ: हमारे द्वारा पूर्व में कही गई राजा लवण की कथा का स्मरण करो। मात्र एक घड़ी के भीतर उन्होंने चांडाल बनकर कई वर्षों का लंबा जीवन, भूख-प्यास और दारुण दुःख भोगा था। जिस प्रकार शांत समुद्र में तरंगें उठती हैं, उसी प्रकार शांतिमय चिदाकाश में सृष्टि की ओर उन्मुख चित्त का उदय होना ही इस संसार का चमत्कार है!
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ब्रह्म सागर के भंवर और बुलबुले — वृक्ष की छाया सदृश माया
इस अनंत सृष्टि में दिखाई देने वाले स्वर्ग-नरक और बंधन-मोक्ष के पीछे छिपे परम रहस्य को बताते हुए महर्षि ने ब्रह्म रूपी सागर की उपमा का विस्तार किया। परब्रह्म किस प्रकार अपनी छाया की भाँति माया को धारण किए रहता है, इसे उन्होंने अद्भुत रूप में प्रकट किया।
वशिष्ठ जी ने स्नेहपूर्ण नेत्रों से श्रीराम को देखते हुए कहा —
उन वचनों से सभा में उपस्थित महात्माओं के हृदय भक्ति और ज्ञान से परिपूर्ण हो गए। माया परब्रह्म से भिन्न कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है, बल्कि वह उसका एक अनिर्वचनीय प्रतिबिंब मात्र है—यह बात सबकी समझ में आ गई।
मनोविकारों के शांत होने पर मन पुनः आत्मा में ही लीन हो जाता है, और तब केवल शाश्वत ब्रह्म ही शेष रहता है—महर्षि ने इसका दृढ़ता से प्रतिपादन किया।
महर्षि वशिष्ठ: हे रामचंद्र! चित् रूपी जल से परिपूर्ण इस ब्रह्म सागर में ये समस्त जीव भंवरों के समान हैं। और हम जो कुछ दृश्य देखते हैं, वे जल के बुलबुलों के समान हैं। स्वर्ग और नरक भी उन्हीं बुलबुलों के अंश मात्र हैं! जिस प्रकार एक वृक्ष के समीप स्वाभाविक रूप से छाया बन जाती है, वैसे ही परब्रह्म के सान्निध्य में माया का विस्तार होता है। उस माया में एक ओर जीव (द्रष्टा) और दूसरी ओर जगत (दृश्य) एक साथ ही प्रकट होते हैं।
महर्षि वशिष्ठ: इस माया का भेदन करने का एकमात्र मार्ग परब्रह्म तत्व का बोध ही है। ‘मैं इस दृश्य से संबंधित नहीं हूँ, यह दृश्य मुझसे संबंधित नहीं है, मैं तो केवल निर्मल और शुद्ध तत्व हूँ’—इस भाव का निरंतर मनन करने से ही आत्मज्ञान प्रतिष्ठित होता है।
चैतन्य की चार अवस्थाएं — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय
मानव मन द्वारा प्रतिदिन अनुभव की जाने वाली चेतना की अवस्थाओं का विश्लेषण करते हुए महर्षि वशिष्ठ ने साधक के लिए प्राप्तव्य सर्वोच्च तुरीय अवस्था का विस्तार से उपदेश दिया। इन चार अवस्थाओं का ज्ञान आत्म-साक्षात्कार का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है।
महर्षि वशिष्ठ ने अपने प्रवचन को आगे बढ़ाते हुए कहा —
सभामंडप उस दिव्य उपदेश से परम शांति में निमग्न हो गया। श्रीराम के नेत्र आत्मज्ञान के प्रकाश से दीप्तिमान हो रहे थे। सभी ने यह अनुभव किया कि समस्त द्वैत भावों से परे वह तुरीय अवस्था ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।
श्रीराम उन चारों अवस्थाओं के गूढ़ अर्थ का ध्यान करते हुए अपने मन को सर्वव्यापी आत्मा में स्थिर करने का प्रयास करने लगे।
महर्षि वशिष्ठ: हे राम! जब चित्त इंद्रियों के माध्यम से बाहरी विषयों का अनुभव करता है, तो उस अवस्था को ‘जाग्रत’ कहते हैं। वही चित्त जब अहंकार के साथ हृदय और कंठ के मध्य विचरण करता है, तो वह ‘स्वप्न’ है। समस्त वासनाओं को समेटकर मौन हो जाने की अवस्था ‘सुषुप्ति’ है। और इन तीनों अवस्थाओं से परे जाकर, जब सब कुछ अपने भीतर ही देखा जाता है, तो वह अखंड चैतन्य की अवस्था ‘तुरीय’ कहलाती है!
महर्षि वशिष्ठ: तुरीय अवस्था में द्रष्टा और दृश्य का भेद मिट जाता है। ‘जाग्रत में मैं हूँ, स्वप्न में मैं हूँ’ का सीमित भाव समाप्त होकर ‘मुझमें ही जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति स्थित हैं’—यह समग्र सत्य प्रत्यक्ष हो जाता है। वही परमपद है, और वहीं समस्त दुःखों का समूल नाश होता है।
निर्मल आकाश में मोतियों का भ्रम — जगत का वास्तविक सत्य
यह विश्व परमात्मा में किस प्रकार दिखाई देता है और ज्ञानियों की दृष्टि में इसकी क्या वास्तविकता है, इसे स्पष्ट करने के लिए वशिष्ठ जी ने दृष्टि-दोष की उपमा प्रस्तुत की।
महर्षि ने श्रीराम की आँखों में सीधे देखते हुए प्रबोधित किया —
श्रीराम के हृदय से संशय की अंतिम छाया भी दूर हो रही थी। यह समस्त ब्रह्मांड परमात्मा को किंचित भी स्पर्श नहीं करता, यह सब केवल देखने वाले के दृष्टि-दोष के कारण ही प्रतीत हो रहा है—यह सभा को भली-भाँति स्पष्ट हो गया।
बाहरी रूप से दिखाई देने वाले इस जगत का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है, केवल परमात्मा ही एकमात्र सत्य है—यह जान लेने पर समस्त भय और शोक विलीन हो जाते हैं, ऐसा महर्षि ने स्पष्ट किया।
महर्षि वशिष्ठ: हे राघव! जब किसी व्यक्ति को नेत्र रोग अथवा दृष्टि-भ्रम होता है, तो उसे निर्मल नीले आकाश में मोतियों के हार लटकते हुए दिखाई देते हैं और अगले ही क्षण वे लुप्त हो जाते हैं। आकाश में दिखने वाले उन मोतियों का भला क्या वास्तविक अस्तित्व है? क्या हम कह सकते हैं कि आकाश उनका आधार है? कदापि नहीं! वैसे ही द्रष्टा की अज्ञानमयी दृष्टि के कारण ही परमात्मा में ब्रह्मांड प्रकट होते और विलीन होते दिखाई देते हैं।
आकाश वृक्ष — निष्क्रिय ब्रह्म तत्व
अध्याय की पराकाष्ठा पर पहुँचते हुए भगवान वशिष्ठ ने एक अबोध बालक की कल्पना से तुलना करते हुए ब्रह्म के निष्क्रिय स्वभाव को उजागर किया। इस परम सत्य के उद्घाटन के साथ ही सभा में एक अनिर्वचनीय शांति छा गई।
महर्षि वशिष्ठ ने अपने अंतिम उपदेश वाक्य का गंभीर उच्चारण करते हुए उपसंहार किया —
इस महान उद्घोष से सभामंडप निस्तब्ध रह गया। कर्तृत्व और भोक्तृत्व से रहित वह अचल ब्रह्म ही हमारा वास्तविक स्वरूप है—यह जानकर श्रीराम के मुख पर परम प्रशांत भाव छा गया।
ब्रह्म न तो किसी का कारण है और न ही कार्य—इस परम सत्य ने सभा के सभी साधकों को शांत समाधि की अवस्था में पहुँचा दिया।
महर्षि वशिष्ठ: एक बालक अपनी कल्पना से आकाश में एक विशाल वृक्ष की कल्पना कर उसे ‘आकाश-वृक्ष’ मान लेता है। क्या हम कह सकते हैं कि उस वृक्ष की उत्पत्ति, वृद्धि या विनाश का कारण आकाश है? नहीं! वह सब केवल बालक का भ्रम है, भला आकाश में वृक्ष कहाँ हो सकता है? उसी प्रकार निष्क्रिय ब्रह्म किसी का भी कारण नहीं है!
चैतन्य की चार अवस्थाएं — लक्षण और दार्शनिक भावार्थ
| चेतनावस्था (State) | चित्त का संचरण | अनुभव का स्वरूप | दार्शनिक स्थिति |
|---|---|---|---|
| जाग्रत अवस्था | इंद्रियों द्वारा बाह्य जगत में प्रसरित होना | शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध का प्रत्यक्ष अनुभव | बाह्य द्वैत भ्रम (संसार स्थिति) |
| स्वप्नावस्था | अहंकार के साथ हृदय और कंठ के मध्य विचरण | मन द्वारा स्वयं रचित दृश्यों की अनुभूति | आंतरिक मनोविकार भ्रम |
| सुषुप्ति अवस्था | समस्त वासनाओं को सुषुप्ति रूपी घोंसले में छिपा देना | दृश्य-विहीन प्रगाढ़ निद्रा / अज्ञान का मौन | बीज रूप में विद्यमान अविद्या |
| तुरीय स्थिति | त्रिगुणों और तीनों अवस्थाओं से परे आत्मा में लीन होना | द्रष्टा-दृश्य भेद से रहित अखंडानंद स्वरूप | जीवन्मुक्ति / परमपद (निष्क्रिय ब्रह्म) |
आध्यात्मिक भावार्थ
यह अध्याय जीव की उत्पत्ति से जुड़े पारंपरिक भ्रमों का पूरी तरह खंडन करता है। जीव परमात्मा से अलग बनाई गई कोई नई रचना नहीं है, बल्कि अखंड चैतन्य ही अविद्यावश स्वयं को सीमित मान लेता है और इसी को ‘जीव-भाव’ कहा गया है। जिस प्रकार सोने में आभूषण और समुद्र में तरंगों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा में यह जीव और जगत भी उससे पृथक नहीं हैं।
हम जिन संसार-दुःखों का अनुभव करते हैं, वे केवल मन का ‘चित्-स्पंदन’ मात्र हैं। जिस प्रकार स्वप्न के कष्टों से मुक्ति जागने पर ही संभव है, वैसे ही आत्म-साक्षात्कार द्वारा तुरीय अवस्था को प्राप्त करना ही वास्तविक मोक्ष है। परब्रह्म ने किसी वस्तु की रचना नहीं की और न ही वह किसी का कारण है; हमारी अज्ञानमयी दृष्टि ही आकाश में वृक्ष देखने के समान परमात्मा में इस जगत की कल्पना कर बैठती है।
अपने दैनिक जीवन में आने वाले सुख-दुःखों को एक स्वप्न दृश्य की भाँति साक्षी भाव से देखना सीखें। ‘मैं शरीर या परिस्थितियों का दास नहीं हूँ; मैं तो इन सबको प्रकाशित करने वाला अखंड चैतन्य हूँ’—इस भाव के साथ प्रतिदिन कुछ क्षण मौन होकर ध्यान करें।
इस अध्याय का सारांश
श्रीराम के प्रश्न से प्रारंभ हुए इस अध्याय में महर्षि वशिष्ठ ने जीव के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन किया। उन्होंने समझाया कि शुद्ध ब्रह्म ही अविद्या के कारण चित्-स्पंदन प्राप्त कर जीव और जगत के रूप में भासित होता है। आकाश में वायु, सोने में आभूषण, समुद्र में बुलबुले, स्वप्न के अनुभव और आकाश-वृक्ष जैसे अद्भुत दृष्टांतों द्वारा उन्होंने द्वैत के मिथ्यात्व को सिद्ध किया। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे तुरीय अवस्था को ही मोक्ष बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि निष्क्रिय ब्रह्म किसी का भी कारण नहीं है।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: जीव परमात्मा से अलग उत्पन्न नहीं हुआ है; शुद्ध चैतन्य ही अपने संकल्पों के कारण स्वयं को जीव मान बैठता है। इस भ्रम का निवारण ही तुरीय स्थिति है।
- तात्विक शिक्षा: चित्-स्पंदन ही जगत है और स्पंदन का अभाव ही ब्रह्म है। निष्क्रिय परब्रह्म न तो सृष्टि का कर्ता है और न ही जीव का।
- अगले अध्याय से संबंध: जीव के स्वरूप और चित्-स्पंदन के मिथ्यात्व को समझ लेने के पश्चात, राक्षसी कर्कटी द्वारा पूछे गए अगले गूढ़ प्रश्नों के समाधान महर्षि वशिष्ठ आगामी प्रसंग में प्रस्तुत करेंगे।
सोने में आभूषणों की भाँति, अखंड चैतन्य में जीव और जगत केवल नाम-रूप का भ्रम मात्र हैं।
चित्-स्पंदन ही यह संसार है; उस स्पंदन का शांत हो जाना ही परब्रह्म स्थिति है।
आकाश में प्रतीत होने वाले मोतियों की भाँति, अज्ञानमयी दृष्टि से देखने पर ही परमात्मा में ब्रह्मांड दिखाई देते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जीव कौन है? क्या वह परमात्मा से ही उत्पन्न हुआ है?
जीव परमात्मा से अलग उत्पन्न हुई कोई वस्तु नहीं है; शुद्ध परब्रह्म ही अविद्या रूपी उपाधि का आश्रय लेकर, अपने संकल्पों के द्वारा स्वयं को जीव मानने वाला चैतन्य का अंश है।
चित्-स्पंदन किसे कहते हैं?
अज्ञान के कारण जब चैतन्य अपने स्वाभाविक स्वरूप को भूलकर ‘यह मेरा चित्त है’ मानकर बाह्य विषयों की ओर गतिशील होता है, तो उसे चित्-स्पंदन कहते हैं। यही स्पंदन जगत के रूप में दिखाई देता है।
संसार के बंधन से मुक्ति कैसे प्राप्त करें?
‘मैं इस दृश्य से संबंधित नहीं हूँ और दृश्य मुझसे संबंधित नहीं है’—इस दृढ़ आत्म-विचार के माध्यम से जब साधक तुरीय स्थिति को प्राप्त कर लेता है, तब संसार का बंधन समूल नष्ट हो जाता है।
तुरीय अवस्था का क्या अर्थ है?
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों मानसिक अवस्थाओं से परे जाकर, सर्वत्र केवल अपने आत्मस्वरूप का दर्शन करते हुए द्रष्टा और दृश्य के भेद से रहित अखंड आनंद में स्थिर हो जाना ही तुरीय अवस्था है।
क्या निष्क्रिय ब्रह्म इस सृष्टि का कारण नहीं है?
नहीं; जिस प्रकार बालक द्वारा कल्पित ‘आकाश-वृक्ष’ आकाश के कारण उत्पन्न नहीं होता, उसी प्रकार परब्रह्म किसी भी कार्य का कारण नहीं है; केवल अज्ञान दृष्टि से ही यह जगत सत्य जैसा प्रतीत होता है।
निष्कर्ष
जीव, जगत और संसार कोई पृथक सत्य नहीं हैं; वे अखंड चैतन्य में उठी हुई केवल भावना रूपी तरंगें हैं—यह बोध होते ही साधक को असीम शांति की प्राप्ति होती है। जब निष्क्रिय ब्रह्म किसी का कारण नहीं है, तो फिर इस अनंत सृष्टि को संचालित करने वाली कर्कटी के अगले प्रश्नों का भावार्थ क्या है? यह रहस्य अगले प्रसंग में उद्घाटित होगा।