क्या यह समस्त जगत ब्रह्म के कारण ही उत्पन्न हुआ है, इस प्रश्न का योगवासिष्ठ एक अत्यंत गहरा उत्तर देता है। यद्यपि लोक व्यवहार में ब्रह्म को ही कर्ता कहा गया है, परंतु परमार्थ दृष्टि से जो जगत वस्तुतः है ही नहीं, उसका कोई रचयिता नहीं हो सकता; केवल आत्म-सन्निधि के कारण ही मन द्वारा यह दृश्य प्रपंच दर्पण में प्रतिबिंब की तरह प्रतीत हो रहा है, यह महर्षि वशिष्ठ ने स्पष्ट किया है।
हमारे चारों ओर दिखाई देने वाले इस अनंत ब्रह्मांड और इसमें व्याप्त सुख-दुःखों की रचना किसने की, यह प्रश्न कभी न कभी प्रत्येक मनुष्य के हृदय में अवश्य उठता है। इस सृष्टि का कर्ता ईश्वर को मानकर उनसे प्रार्थना करना, अथवा विपत्ति आने पर भाग्य को दोष देना संसार में सर्वत्र देखा जाता है।
रघुकुल तिलक श्रीराम के अंतःकरण में भी ठीक इसी प्रकार का गंभीर संशय उत्पन्न हुआ। महर्षियों से सुशोभित उस राजसभा में, मानव चेतना की आध्यात्मिक जिज्ञासा का मूल आधार बने इस संशय को श्रीराम ने महर्षि वशिष्ठ के समक्ष प्रस्तुत किया। उस प्रश्न के उत्तर में प्रवाहित ज्ञान की पावन धारा ही यह अद्भुत संवाद है।
लोक व्यवहार और परमार्थ सत्य
सभा मंडप में सूर्य की किरणें फैल रही थीं, तभी श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर महर्षि वशिष्ठ की ओर देखा। उनके मुखमंडल पर सत्य को जानने की तीव्र उत्कंठा स्पष्ट रूप से झलक रही थी।
सभी महर्षि मौन होकर सुन रहे थे, तभी श्रीराम ने अपनी जिज्ञासा को अत्यंत सहज भाव से प्रकट किया।
श्रीराम: “हे महर्षि! संसार में ज्ञानी जन प्रायः यही कहते हैं कि माया के विस्तार वाले इस समस्त जगत का मूल कारण ब्रह्म ही है, और वही समस्त कार्यों का कर्ता है। ऐसी स्थिति में इस सृष्टि का कर्तृत्व ब्रह्म पर आरोपित करना कहाँ तक उचित है?”
महर्षि वशिष्ठ: “हे राघव! लोक में ऐसा व्यवहार प्रचलित है, यह सत्य है। परंतु वे सभी वचन केवल आरंभिक साधकों को समझाने के लिए कहे गए साधन मात्र हैं। जब तक साधक के भीतर यह दृढ़ निश्चय नहीं हो जाता कि वास्तव में तीनों कालों में ‘जगत’ का कोई अस्तित्व ही नहीं है, तब तक ही ऐसे वचनों की सार्थकता है। सत्य का साक्षात्कार हो जाने पर कर्तृत्व का कोई भाव शेष नहीं रहता।”
दर्पण का दृष्टांत – सन्निधि की महिमा
सभा में उपस्थित विद्वान इस उत्तर को सुनकर चकित रह गए। बिना किसी कर्तृत्व के यह जगत कैसे दृश्यमान होता है, इसे गहराई से समझाने के लिए महर्षि वशिष्ठ ने शांत और गंभीर स्वर में एक सुंदर उपमा प्रस्तुत की।
महर्षि के वचन सुनते ही सभासदों के हृदयों में एक नवीन दार्शनिक प्रकाश का संचार होने लगा। महर्षि ने अपनी बात को आगे बढ़ाया।
महर्षि वशिष्ठ: “हे राम! सामने रखे दर्पण में अनेक प्रकार के पदार्थ और उनकी गतिशीलता प्रतिबिंबित होती है। उस दर्पण के भीतर ‘मैं इस वस्तु को दिखाऊँगा और उस वस्तु को नहीं दिखाऊँगा’ जैसी कोई पसंद-नापसंद या राग-द्वेष नहीं होता। केवल वस्तुओं के समीप होने मात्र से ही वह प्रतिबिंब दर्पण में उभरता है। इतने मात्र से हम दर्पण को कर्ता नहीं कह सकते!”
श्रीराम: “हाँ गुरुदेव, दर्पण में कोई स्वार्थ या संकल्प नहीं होता।”
महर्षि वशिष्ठ: “ठीक उसी प्रकार, आत्म-चैतन्य की सन्निधि मात्र से यह जगत भासित हो रहा है। जैसे दर्पण के बिना प्रतिबिंब संभव नहीं, वैसे ही आत्म-चैतन्य के बिना जगत का अनुभव किसी को नहीं हो सकता। परंतु यह जगत किसी भी रूप में आत्मा का कोई शारीरिक अंग नहीं है।”
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बीज में छिपा वृक्ष – दीपक का प्रकाश
महर्षि की व्याख्या से राजसभा में उत्सुकता और अधिक बढ़ गई। प्रकृति में छिपी शक्तियों का रहस्य समझाते हुए वशिष्ठ जी ने बीज और दीपक के दृष्टांतों से श्रीराम को अवगत कराया।
बीज से विशाल वृक्ष के विस्तार की विचित्र प्रक्रिया की तुलना करते हुए उन्होंने समझाया कि आत्मा से ही चेतना कैसे शाखा-प्रशाखाओं के रूप में विकसित होती है।
महर्षि वशिष्ठ: “एक छोटे से बीज में अंकुर, पत्ते, शाखाएं और फल सूक्ष्म रूप से समाए रहते हैं, जो समय पाकर प्रकट होते हैं। प्रलय काल में समस्त सृष्टि सूक्ष्म रूप में विलीन हो जाती है और केवल शुद्ध चैतन्य ही शेष रहता है। पुनः सृष्टि काल में उसी बीज-शक्ति से समस्त जीव और मन अभिव्यक्त होते हैं।”
श्रीराम: “इसका अर्थ यह हुआ कि जैसे बीज से वृक्ष भिन्न नहीं है, वैसे ही ब्रह्म से यह जगत भी भिन्न नहीं है?”
महर्षि वशिष्ठ: “वास्तव में ज्ञानी जनों की दृष्टि में बीज और वृक्ष दोनों ही ब्रह्म हैं। प्रज्वलित दीपक के समीप आने पर वस्तुएं दिखाई देने लगती हैं; इसका अर्थ यह नहीं कि दीपक ने उन वस्तुओं का निर्माण किया है! उसी प्रकार भूमि को कहीं भी खोदने पर जैसे भीतर आकाश सदा विद्यमान रहता है, वैसे ही सर्वत्र वह एकमात्र अद्वितीय आत्म-तत्व ही व्याप्त है।”
स्फटिक में चंद्रमा – अबोध बालक का भ्रम
सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति तन्मयता से महर्षि का उपदेश सुन रहा था। महर्षि ने श्रीराम की ओर वात्सल्यपूर्ण दृष्टि से देखते हुए अज्ञान द्वारा मनुष्य के भ्रमित होने की स्थिति को स्पष्ट करने वाला एक और दृष्टांत प्रस्तुत किया।
इन वचनों को सुनते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो श्रीराम संसार के सभी लौकिक भ्रमों के पीछे छिपे सत्य को भली-भाँति समझ रहे हों।
महर्षि वशिष्ठ: “हे राघव! कोई अबोध बालक स्फटिक मणि अथवा दर्पण में चंद्रमा के प्रतिबिंब को देखकर यह भ्रम पाल लेता है कि ‘यही वास्तविक चंद्रमा है, मैं इसे पकड़ूँगा’। अविवेकी मनुष्य भी ब्रह्म में प्रतिबिंबित होने वाले इस जगत को देखकर व्याकुल हो उठते हैं कि ‘यही सत्य लोक है’। जल में दिखने वाला चंद्रमा मात्र प्रतिबिंब होता है, वास्तविक नहीं!”
श्रीराम: “अद्भुत गुरुदेव! असत्य वस्तु को सत्य मान लेना ही अज्ञान का मूल लक्षण है, यह स्पष्ट हो गया।”
महर्षि वशिष्ठ: “इतना ही नहीं राम, जिस प्रकार निराकार पिशाच का भय किसी बालक के मन में बैठ जाता है, ठीक उसी प्रकार वास्तव में निराकार परब्रह्म में जीव-भाव की कल्पना आरोपित हो जाती है।”
समष्टि चेतना और व्यष्टि का भ्रम
वशिष्ठ जी की देशना अब सर्वोच्च दार्शनिक ऊंचाइयों को छू रही थी। समुद्र की जल-बूंदों और लहरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने समष्टि और व्यष्टि तत्वों के आपसी संबंध का विश्लेषण किया।
महाराज दशरथ सहित सभी मंत्रीगण मौन होकर उस परम रहस्य का श्रवण कर रहे थे।
महर्षि वशिष्ठ: “जैसे एक ही विशाल जलराशि में अनगिनत तरंगें उठती हैं, वैसे ही चिदाकाश में समष्टि अहंकार और व्यष्टि अहंकार का प्राकट्य होता है। जो समस्त ब्रह्मांड को अपनी कल्पना के रूप में देखता है, वह हिरण्यगर्भ अथवा ब्रह्मा है; और जो केवल सीमित देह को ही ‘मैं’ मानता है, वह व्यष्टि जीव है।”
श्रीराम: “तो फिर परमात्मा स्वयं को जीव के रूप में क्यों कल्पित करता है? अज्ञान का स्पर्श उसे कैसे हुआ?”
महर्षि वशिष्ठ: “परमात्मा के ‘मैं देह हूँ, मैं परिमित हूँ’ जैसी कल्पना का आश्रय लेने से ही जीव-भाव उत्पन्न होता है। सूक्ष्म आतिवाहिक देह का निर्माण होकर, वह पूर्व वासनाओं के अनुसार मन-बुद्धि को प्रकाशित करता है और स्वयं को बंधनों में जकड़ा हुआ मान बैठता है।”
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योगवासिष्ठ में श्रीराम और महर्षि वशिष्ठ के मध्य हुए सृष्टि-रहस्य के संपूर्ण दार्शनिक संवाद का गहन अध्ययन करने के लिए यह ग्रंथमाला अत्यंत श्रेष्ठ है।
‘दृष्टि ही सृष्टि’ के सिद्धांत और आत्मज्ञान के मार्ग को मूल ग्रंथ की प्रामाणिकता के साथ अनुभव करने के लिए इस चार खंडों की प्रति को अपने पूजा स्थल या स्वाध्याय कक्ष में अवश्य स्थान दें।
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इंद्रियों का प्राकट्य – ब्रह्मांडों की कल्पना
मन सांसारिक विषयों का अनुभव किस प्रकार करता है तथा इंद्रियों की संरचना के पीछे का दार्शनिक क्रम क्या है, महर्षि ने इसका सविस्तार वर्णन किया।
सभा में बैठे प्रत्येक व्यक्ति को अपनी देह और इंद्रियों की क्रियाशीलता के पीछे प्रवाहित होने वाली चेतना का बोध होने लगा।
महर्षि वशिष्ठ: “मन की वासनाएं जब घनीभूत होती हैं, तब इंद्रियां प्रकट होती हैं। रस का आस्वादन करने के लिए जिह्वा, रूप देखने के लिए नेत्र, गंध ग्रहण करने के लिए नासिका और शब्द सुनने के लिए श्रवणेंद्रिय निर्मित हुईं। इस प्रकार चिद्रूप जीव अज्ञान का स्वांग रचकर जगत रूपी रंगमंच पर विचरण कर रहा है।”
श्रीराम: “अर्थात बाहर दिखाई देने वाला यह संपूर्ण प्रपंच इंद्रियों के माध्यम से मन द्वारा ही चित्रित किया गया है?”
महर्षि वशिष्ठ: “निःसंदेह राम! ब्रह्मा के संकल्प में जिस प्रकार अनंत ब्रह्मांड कल्पित रूपों में स्थित हैं, वैसे ही साधारण जीव में भी देह-भाव अनेक जन्मों की वासनाओं के कारण निरंतर दोहराया जाता है।”
दृष्टि ही सृष्टि – कीट से लेकर ब्रह्मा तक
श्रीराम ने अपने मन की अत्यंत रोचक जिज्ञासा महर्षि के सम्मुख रखी। क्या सृष्टि सबके लिए एक समान है अथवा भिन्न-भिन्न, इस संशय का यहाँ निवारण किया गया।
महर्षि के समाधान ने सभा के विद्वानों के चिरकाल से संचित संशयों को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया।
श्रीराम: “हे स्वामी! आपने कहा कि ब्रह्मा की सृष्टि और एक तुच्छ कीट की सृष्टि दोनों समान हैं। क्या प्रत्येक प्राणी की अपनी एक स्वतंत्र सृष्टि होती है?”
महर्षि वशिष्ठ: “हाँ राम! दृष्टि ही सृष्टि है। एक छोटा सा कीट अपनी सीमित देह को ही सर्वस्व और सामने पड़े तिनके को ही अपना संसार समझता है। उसकी दृष्टि के अनुसार ही उसकी सृष्टि होती है। इसी प्रकार मनुष्य, देवता और ब्रह्मा जी… जिसकी भावना का बल जितना विस्तृत होता है, उसकी सृष्टि भी उतनी ही फैलती है। ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान की यह त्रिपुटी केवल एक ही चेतना का विलास है।”
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मकड़ी का जाला – नियति के पीछे की माया
महर्षि वशिष्ठ ने प्रकृति में जीवों के बंधन को समझाने के लिए एक अत्यंत प्रभावी उपमा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि जैसे मकड़ी अपने ही शरीर के रस से जाला बुनती है और स्वयं उसी में उलझ जाती है, ठीक वैसे ही जीव का आचरण है।
सभा मंडप में गहरा सन्नाटा छा गया। महर्षि के शब्द सीधे प्रत्येक श्रोता के हृदय में उतर रहे थे।
महर्षि वशिष्ठ: “मकड़ी जैसे अपने लार से जाले का निर्माण करती है और अंततः उसी में फँसकर नष्ट हो जाती है, वैसे ही जीव अपनी ही कल्पनाओं से बंधनों का सृजन करके विलाप करता है। समष्टि मन रूपी ब्रह्मा ने जिस वस्तु को जैसा संकल्पित किया, सभी जीव उस ‘नियति’ व्यवस्था के अधीन होकर जगत को सत्य मान बैठते हैं।”
श्रीराम: “चूँकि वह नियति निश्चित रूप से घटित हो रही है, तो क्या इसे सत्य माना जा सकता है गुरुवर?”
महर्षि वशिष्ठ: “कदापि नहीं! जिस प्रकार सरोवर की लहरों को देखकर कोई बालक उन्हें अलग-अलग उतार-चढ़ाव समझ बैठता है अथवा रस्सी को देखकर सर्प के भय से कांपता है, वैसे ही एकमात्र परब्रह्म में अनेकता रूपी मायावी नियति भासित होती है।”
निर्विकल्प मन – जगत रूपी स्फुरण
उपदेश अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने जगत के समस्त भ्रम के वास्तविक कारण को स्पष्ट करते हुए अपने दिव्य संदेश का समापन किया।
श्रीराम के नेत्रों में परम शांति और आत्म-साक्षात्कार का आलोक स्पष्ट रूप से झलक रहा था।
महर्षि वशिष्ठ: “सर्वप्रथम केवल परिपूर्ण शुद्ध आत्मा ही विद्यमान थी। वही आत्मा मन के रूप में प्रकाशित हुई। निर्विकल्प और निश्चल जल के समान शांत मन में कल्पना के प्रभाव से ‘अहंकार’ की तरंग उठी। उस अहंकार से पूर्व स्मृतियों के आधार पर पंचतन्मात्राएं उत्पन्न हुईं। तत्पश्चात जीव काकतालीय न्याय से इस जगत को देखने लगा।”
श्रीराम: “अर्थात मन जिस भाव को दृढ़ता से मान लेता है, वही अनुभव में परिवर्तित हो जाता है।”
महर्षि वशिष्ठ: “सत्य कहा तुमने राम! यह मन जिस वस्तु को दीर्घकाल तक ‘सत्य’ मानकर गहराई से धारण करता है, वही उस रूप में स्थिर होकर भासित होने लगती है। अतः मन ही इस समस्त जगत का मूल कारण है।”
जगत सृष्टि का क्रम – योगवासिष्ठ का दार्शनिक विश्लेषण
| विभाग | दार्शनिक स्थिति | उपमा / दृष्टांत | आध्यात्मिक यथार्थ |
|---|---|---|---|
| परब्रह्म / आत्मा | शुद्ध चैतन्य, निर्विकल्प | स्वच्छ दर्पण, निश्चल जल | राग-द्वेष से रहित निर्लिप्त साक्षी |
| समष्टि चेतना | हिरण्यगर्भ / ब्रह्मा जी | महासमुद्र की तरंग | समस्त विश्व की संकल्पना का मूल |
| व्यष्टि जीव | सीमित देहाभिमान | जल की बूंद, मकड़ी | अपने ही कल्पना-जाल में उलझी हुई स्थिति |
| पंचतन्मात्राएं / इंद्रियां | विषय ग्रहण के साधन | जिह्वा, नेत्र, नासिका, श्रवणेंद्रिय | मन की वासनाओं के घनीभूत रूप |
| जगत-भ्रांति | दृष्टि ही सृष्टि का रूप | स्फटिक में चंद्रमा, रस्सी में सर्प | मन द्वारा दीर्घकाल से सत्य मानी गई कल्पना |
आध्यात्मिक अंतर्भाव
यह अध्याय बाह्य जगत के प्रति हमारी गहरी भ्रांति को दूर कर हमें अपने वास्तविक आत्म-स्वरूप की ओर लौटने की प्रेरणा देता है। ईश्वर ने किसी बाह्य साधन या मिट्टी से घड़े की भाँति इस संसार का निर्माण नहीं किया है। जैसे दर्पण के सम्मुख खड़े होने पर प्रतिबिंब स्वतः दिखाई देने लगता है, वैसे ही परमात्मा के चैतन्य की सन्निधि में मनोमय जगत भासित होता है।
एक छोटे से कीट से लेकर ब्रह्मा जी तक, प्रत्येक जीव अपनी मान्यताओं और भावनाओं के अनुरूप ही संसार का अनुभव करता है। हम जिसे दृढ़ता से सत्य मान लेते हैं, वही हमारी वास्तविकता बन जाता है। हमारे समस्त बंधन और भय मन द्वारा ही बुने गए मकड़ी के जाले के समान हैं। जब मन पूर्णतः शांत और निश्चल हो जाता है, तब अहंकार विलीन हो जाता है और केवल शुद्ध आत्म-तत्व ही शेष रहता है।
अपने जीवन में आने वाली प्रतिकूलताओं और भयों को केवल अपने मन की दीर्घकालीन विचार-तरंगें समझकर साक्षी भाव से देखें। शांत अंतर्मुखी ध्यान के द्वारा मन की व्यर्थ कल्पनाओं को समेटकर, निरंतर प्रशांत आत्म-साक्षी के रूप में जीने का अभ्यास कीजिए।
इस अध्याय का सारांश
श्रीराम के संशय का निवारण करते हुए महर्षि वशिष्ठ ने जगत-सृष्टि के गूढ़ रहस्य का उपदेश दिया। ब्रह्म जगत का प्रत्यक्ष कर्ता नहीं है; केवल आत्म-सन्निधि के कारण ही मन के माध्यम से यह दृश्य संसार दर्पण के प्रतिबिंब की भाँति प्रतीत होता है। बीज-वृक्ष, दर्पण का प्रतिबिंब, स्फटिक में चंद्रमा और मकड़ी के जाले जैसे दृष्टांतों से समष्टि और व्यष्टि जीव के भेद को स्पष्ट किया गया। महर्षि ने उद्घोष किया कि दृष्टि ही सृष्टि है और मन ही समस्त प्रपंच का मूल कारण है।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: जगत ब्रह्म द्वारा निर्मित कोई बाह्य पदार्थ नहीं है; यह आत्म-चैतन्य में मन द्वारा रचित केवल एक विचार-तरंग मात्र है।
- तात्विक शिक्षा: दृष्टि ही सृष्टि है। मन जिस विषय को दीर्घकाल तक सत्य मान लेता है, वही अनुभव का रूप ले लेता है। अज्ञान के निवृत्त होते ही सर्वत्र केवल शुद्ध ब्रह्म ही शेष रहता है।
- अगले अध्याय से संबंध: मन को ही सबका मूल कारण जानकर श्रीराम अब यह जानने के लिए अग्रसर होंगे कि इस मन का लय कैसे किया जाए और जगत-भ्रम से सदा के लिए कैसे मुक्त हुआ जाए।
जैसे दर्पण की वस्तुओं में कोई आसक्ति नहीं होती, वैसे ही आत्मा का जगत के कर्तृत्व से कोई संबंध नहीं है।
जैसे मकड़ी अपनी ही लार से निर्मित जाले में स्वयं बंध जाती है, वैसे ही जीव अपनी मनोकल्पनाओं से स्वयं को बांध लेता है।
मन जिसे गहराई से सत्य मान लेता है, वही जगत के रूप में भासित होने लगता है; अतः मन ही सबका मूल कारण है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या ब्रह्म ही इस जगत का वास्तविक कारण है?
परमार्थ दृष्टि से ब्रह्म जगत का कर्ता नहीं है। केवल आत्म-चैतन्य की सन्निधि के कारण दर्पण में प्रतिबिंब की भाँति मन के द्वारा जगत भासित होता है; ब्रह्म में कोई कर्तृत्व-संकल्प नहीं होता।
‘दृष्टि ही सृष्टि’ का वास्तविक अर्थ क्या है?
प्रत्येक प्राणी अपनी मनोभावनाओं और वासनाओं के दायरे के अनुसार अपने निजी संसार का अनुभव करता है। कीट से लेकर ब्रह्मा तक, जिसकी भावना का जितना विस्तार है, उसकी सृष्टि भी उतनी ही विस्तृत है।
समष्टि जीव और व्यष्टि जीव में क्या अंतर है?
समस्त ब्रह्मांड को अपनी कल्पना मानने वाला हिरण्यगर्भ समष्टि जीव है, जबकि केवल एक सीमित शरीर को ‘मैं’ मानने वाला साधारण प्राणी व्यष्टि जीव कहलाता है।
मकड़ी के दृष्टांत से योगवासिष्ठ क्या संदेश देता है?
जैसे मकड़ी अपने ही शरीर के रस से जाला बनाकर स्वयं उसी में उलझ जाती है, वैसे ही जीव भी अपने मन से राग-द्वेष और कल्पनाएं उत्पन्न कर बंधनों का अनुभव करता है।
इस अध्याय के अनुसार सृष्टि का वास्तविक मूल कारण क्या है?
सृष्टि का एकमात्र मूल कारण मन है। मन जिस भाव को दीर्घकाल तक दृढ़तापूर्वक सत्य मानता है, वही सांसारिक रूप में स्थिर होकर दिखाई देने लगता है।
निष्कर्ष
सृष्टिकर्ता की संकल्पना केवल आरंभिक उपदेशों के लिए है, परमार्थ रूप से समस्त दृश्य प्रपंच आत्म-चैतन्य में मन की ही कल्पना है—यह महर्षि वशिष्ठ ने भली-भाँति स्पष्ट किया। जब यह सिद्ध हो गया कि मन ही बंधन और जगत-भ्रांति की जड़ है, तब उस मन को पूर्णतः शांत करने का परम रहस्य क्या है? श्रीराम का अंतर्मन अगली जिज्ञासा की ओर कैसे मुड़ा, यह हम अगले अध्याय में जानेंगे।