यह संसार वास्तव में कैसे बना, यह किस तत्व से बना है — इस प्रश्न का उत्तर वशिष्ठ महर्षि यहाँ देते हैं। जिस तरह नींद में हम जो सपनों का संसार देखते हैं, वह हमारे ही मन से जन्म लेकर हमारा ही स्वरूप बन जाता है, ठीक उसी तरह यह जाग्रत अवस्था का संसार भी परब्रह्म स्वरूप से ही उदय होकर, उसी परब्रह्म स्वरूप का ही रूप है — यही योगवाशिष्ठ की शिक्षा है।
मान लीजिए रात को नींद में आपने एक सपना देखा। उस सपने में गाँव होते हैं, लोग होते हैं, सुख-दुःख होते हैं। जागने तक वह सब कुछ बिल्कुल सच लगता है।
पर जागने के बाद वह संसार कहाँ चला जाता है? आखिर वह बना किससे था? सपना देखते समय उसे झूठ मान ही नहीं पाते, तो फिर अभी जिस संसार में हम जी रहे हैं, उसकी क्या सच्चाई है?
ठीक यही प्रश्न श्रीराम वशिष्ठ महर्षि के सामने रखते हैं — आँखों के सामने दिखने वाला यह विशाल संसार आखिर कैसे जन्मा, किस पदार्थ से बना।
इस प्रश्न का जो उत्तर वशिष्ठ सभा में देते हैं, वह सृष्टि के जन्म के पीछे छिपे सूक्ष्म रहस्य को परत-दर-परत खोलकर रख देता है। जैसे-जैसे एक-एक परत खुलती जाती है, यह समझ आता जाता है कि यह पूरा संसार कितनी सूक्ष्मता से, कितने क्रमबद्ध ढंग से आकार लेता है।
परम पवित्र उत्तर के लिए वशिष्ठ की भूमिका
सभा में सन्नाटा छा गया। श्रीराम का पूछा हुआ प्रश्न मानो अभी भी हवा में तैर रहा था। वशिष्ठ महर्षि की आँखों में शांति और वाणी में गंभीरता झलक रही थी।
सभा में बैठे हर व्यक्ति की नज़र अब वशिष्ठ की ओर मुड़ गई। कोई हिला नहीं, कोई बोला नहीं। कोई महान रहस्य अब खुलने वाला है, यह एहसास सबके चेहरों पर साफ दिख रहा था।
श्रीराम की ओर देखते हुए वशिष्ठ ने कहा —
वशिष्ठ महर्षि: राम! परम पवित्र, परम शांत ब्रह्मपद से यह संसार कैसे जन्मा, यह सुनो।
सपना रचने वाला मन, संसार रचने वाला ब्रह्म
वशिष्ठ ने अपनी बात एक सामान्य अनुभव से शुरू की — नींद में जब हम सोते हैं तो सपने देखते हैं न, यह पूछा। हर किसी को परिचित इस अनुभव को ही उन्होंने बड़े रहस्य का द्वार बना दिया।
सभा में बैठे सबको यह उदाहरण तुरंत समझ आ गया। राजा, मुनिकुमार, ऋषि — सभी ने किसी न किसी रात देखे सपने को याद करते हुए सिर हिलाया।
वशिष्ठ महर्षि: जो सो रहा है, वह अपने ही स्वरूप से सपने देख रहा है न! ठीक उसी तरह ब्रह्म भी अपनी सृष्टि के साथ स्वयं जुड़ा हुआ प्रतीत हो रहा है।
👉 पिछला एपिसोड: क्या जगत का कोई कारण ही नहीं है? बांझ के पुत्र से इस संसार की तुलना क्यों? | Yoga Vasistha S3 EP-10
यह विश्व आखिर किस चीज़ से बना है?
श्रीराम की खामोशी ही अगला प्रश्न बन गई। वशिष्ठ ने इसे भाँप लिया और और गहराई से समझाना शुरू किया।
उनकी नज़र अब पूरी सभा पर एक बार घूमकर फिर राम पर ही टिक गई। अब आने वाले शब्द केवल राम के लिए नहीं, वहाँ मौजूद हर साधक के लिए समझ में आने चाहिए, यह चिंता उनकी आवाज़ में झलक रही थी।
वशिष्ठ महर्षि: यह विश्व अनंत प्रकाश स्वरूप, अनंत चिन्मय स्वरूप परमात्मा का स्वाभाविक स्वभाव ही है। यह इससे अलग कुछ और नहीं है।
चित्त का जन्म — ज्ञान संस्कारों का उदय
सभा में कुछ लोगों के चेहरों पर संदेह दिखा। उस परमात्मा से यह पूरा लोक कैसे अलग होकर दिखाई दे रहा है, यह सवाल सबके मन में उठा। वशिष्ठ ने मानो पहले से ही इसे भाँपते हुए आगे बढ़ाया।
उनकी वाणी की गति थोड़ी धीमी हो गई, हर शब्द को सावधानी से, स्पष्टता से कहते हुए — यह वह सीढ़ी है जिसे सभा में मौजूद सबको ज़रूर समझना है, यह उन्हें पता था।
वशिष्ठ महर्षि: उसी परमात्मा से ये सारे ज्ञान संस्कार उठ रहे हैं। वही ज्ञान संस्कार बाकी संस्कारों के साथ मिलकर ‘चित्त’ को जगा रहा है।
परमपद का ओझल होना, ‘मैं जीव हूँ’ भाव का जन्म
यहाँ वशिष्ठ की आवाज़ में एक कोमल करुणा झलकी। आत्मा अपनी असली महानता को कैसे भूल जाती है, यह वे समझाने लगे।
उनकी आँखों में वैसा ही भाव था जैसे कोई पिता अपने बच्चे को रास्ता भटकते देख रहा हो, पर उसी समय उनके शब्दों में यह विश्वास भी झलक रहा था कि वह बच्चा फिर से रास्ता पा सकता है।
वशिष्ठ महर्षि: आत्मस्वरूप दृश्यों में घूमते-घूमते, आसक्त होकर धीरे-धीरे आत्मभाव को भूलने लगता है। यानी परमपद को त्यागकर, संसार से बंधे जीवभाव को अपना लेता है।
आकाशसत्ता से लेकर काल तक — सृष्टि क्रम का प्रकटीकरण
सभा में एक अजीब सी एकाग्रता छा गई। वशिष्ठ अब यह दिखाना शुरू करते हैं कि सृष्टि किस तरह परत-दर-परत फैलती है।
उनके हाथों की हरकत भी अब धीरे-धीरे, एक-एक परत दिखाते हुए सी चल रही थी। सभा में मौजूद लोग इस क्रम को मानो अपने मन में ही खींचते हुए ध्यान से सुन रहे थे।
वशिष्ठ महर्षि: ब्रह्म में जीवसत्ता के चमकने के बाद, धीरे-धीरे शून्यरूप आकाशसत्ता उदय होती है। यही आकाशसत्ता ‘आकाश, शब्दगुण’ कहलाती है।
शिल्पी के मन में शिल्प — हिरण्यगर्भ की उपमा
सभा में कुछ लोगों की आँखों में अब भी अस्पष्टता दिखी। यह पूरी सृष्टि संकल्प मात्र से कैसे होती है, यह समझना कठिन लग रहा था। वशिष्ठ ने इसके लिए एक सुंदर उपमा दी।
वे थोड़ा आगे झुके, आवाज़ में थोड़ा उत्साह भरकर बोलना शुरू किया — यह सभा में सबको आसानी से समझ आने वाला उदाहरण है, यह उन्हें पता था।
वशिष्ठ महर्षि: आकाश-अहंकार-कालरूप उस सृष्टि को संकल्प मात्र से रचने वाले तत्व को ही शास्त्र ‘हिरण्यगर्भ’ या ‘समष्टि जीव’ कहते हैं।
संकल्प का बीज, वेदों में खिला शब्द
वशिष्ठ की आवाज़ में अब एक लय थी, एक परत के बाद दूसरी परत में सृष्टि कैसे फैलती है, यह वे बताने लगे।
उनके शब्द अब थोड़े तेज़, पर उतने ही स्पष्ट थे — जैसे कोई नदी कई धाराओं में बँटकर अंत में सागर में मिल जाती है, वैसे ही ये तत्व भी एक-दूसरे से जन्म लेते हुए आखिरकार संसार के रूप में फैल जाते हैं, यह वे सभा को बता रहे थे।
वशिष्ठ महर्षि: अहंकार आदि तत्वों से जुड़ी संवित् ही ‘संकल्प’ नाम के वृक्ष का बीज है। उसी संवित् (Existence knowledge) के अंश से ही स्पंदन धर्म वाली वायु उत्पन्न होती है।
प्राणतत्व, चौदह लोक, भौतिक शरीर
सभा में अब सब उत्सुकता से सुनने लगे कि यह सृष्टि क्रम और कितनी दूर तक फैलता है। वशिष्ठ ने इस प्रवाह को आगे बढ़ाया।
उनकी आवाज़ में अब एक स्वाभाविक बहाव था, जैसे कोई कहानी सुना रहे हों — यह आखिरी सीढ़ियाँ पार करते ही संसार पूरी तरह आकार ले लेगा, यह उन्हें पता था।
वशिष्ठ महर्षि: धीरे-धीरे ‘अहं-तन्मात्रा’ तत्व से प्रीति के प्रभाव के कारण ‘प्राणतत्व’ उदय होता है। भावी जीव के रूप में रहने वाला यह प्राणतत्व ही इंद्रियों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले इन रूपों आदि का कारण है।
पंचेंद्रियों का जन्म — दृष्टि, गंध, स्पर्श कैसे आए
सभा में किसी बच्चे जैसी उत्सुकता से बैठा एक शिष्य अपने स्थान से ही वशिष्ठ की ओर देखने लगा। इंद्रियाँ कैसे जन्मीं, यह जानने की उत्सुकता पूरी सभा में फैल गई। वशिष्ठ ने इसे भाँपकर आगे बढ़ाया।
उनकी आवाज़ में अब एक गुरु का सा धैर्य था, जो अपने शिष्यों को एक-एक पाठ खोलकर समझा रहा हो — हर इंद्रिय के पीछे छिपे सूक्ष्म तत्व को वे स्पष्टता से अलग-अलग करके दिखा रहे थे।
वशिष्ठ महर्षि: यह ‘तेजोतन्मात्रा’ संकल्प मात्र से नेत्रेंद्रिय का कारण बनती है। इसी तरह जल की ‘रूपतन्मात्रा’ से रूप-निर्धारण शक्ति, अग्नितत्व से स्वाद से जुड़ी जीभ जन्म लेती है।
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श्रीराम का आश्चर्य — ‘क्या यह सब भ्रम ही है?’
यह पूरी व्याख्या सुनने के बाद श्रीराम के चेहरे पर एक गहरा आश्चर्य, और साथ ही एक तीव्र संदेह दिखाई दिया। वे अपनी जगह से थोड़ा आगे झुककर पूछ बैठे।
उनकी आँखों में अब तक सुनी हुई बात को पचाने की कोशिश साफ झलक रही थी — इतनी सूक्ष्म, इतनी परतों में बँटी इस सृष्टि-क्रम को सुनने के बाद, अपने देखे हुए संसार को लेकर उनके मन में ही एक नया संदेह उठ गया।
श्रीराम: महात्मन्! यह ‘संसार’ इतना सूक्ष्म, इतनी परतों वाला, इतने रूपांतरणों से गुज़रने वाला है — तो जो दृश्य-संसार मैं अभी अनुभव कर रहा हूँ, वह असली है या फिर यह सब एक कल्पना का ही विस्तार है?
माया नाम का एक ही कारण, सब कुछ बदल रहा पर पिता वैसे ही
वशिष्ठ ने अपनी आवाज़ में एक सकारात्मक निश्चय के साथ उत्तर दिया। उनके शब्दों में करुणा और स्पष्टता दोनों घुले हुए थे।
उनकी आँखें अब सीधे राम की आँखों में देख रही थीं, इस आखिरी सत्य को पूरे विश्वास के साथ घोषित करने को तैयार।
वशिष्ठ महर्षि: हे राम! इस दृश्य-संसार का कारण एक ही है — ‘माया’ नाम की यह संपत्कारण्य। इसी माया के कारण परमात्मा अलग-अलग रूपों में, नामों में चमक रहा है।
सृष्टि क्रम — चित् चैतन्य से संसार तक (वशिष्ठ महर्षि की शिक्षा के अनुसार)
| परत | तत्व/नाम |
|---|---|
| 1 | चित् चैतन्य (परमात्मा स्वरूप) |
| 2 | जीव चैतन्य (‘मैं’ भाव का उदय) |
| 3 | आकाश सत्ता — शब्द गुण |
| 4 | काल सत्ता |
| 5 | अहंकार-अभिमान |
| 6 | जगत सृष्टि (पंचतन्मात्राएँ, इंद्रियाँ, चौदह लोक) |
आध्यात्मिक अंतरार्थ
इस अध्याय की गहरी सच्चाई यह है — यह संसार परमात्मा से अलग कोई नया पदार्थ नहीं है। जैसे नींद में हम जो सपना देखते हैं, वह हमारे ही मन से जन्म लेकर हमारा ही स्वरूप बन जाता है, वैसे ही यह संसार भी ब्रह्म से ही उदय होकर, ब्रह्म के स्वाभाविक स्वभाव के रूप में ही फैला हुआ है।
‘मैं जीव हूँ, केवल शरीर हूँ’ — यह भाव चाहे कितना भी मज़बूत क्यों न लगे, यह मात्र एक अस्थायी भाव है, भीतर मौजूद ब्रह्मस्थिति कभी नष्ट नहीं होती, यह वशिष्ठ स्पष्ट करते हैं।
आकाश, काल, अहंकार, पंचेंद्रियाँ — ये सब एक क्रम में जन्मी परतें भर हैं, असली सत्य नहीं। एक-एक परत को अलग करके देखें, तो अंत में जो बचता है वह एक ही चेतना है — यही वह असली ‘मैं’ है जिसे हमें पहचानना चाहिए।
इस शिक्षा में एक सांत्वना भी है — चाहे संसार में कितनी दूर भटक जाएँ, ‘मैं जीव हूँ’ के भाव में कितना गहरा उलझ जाएँ, भीतर मौजूद ब्रह्मस्थिति एक पल के लिए भी दूर नहीं हुई। वह बस ढक गई है, कभी नष्ट नहीं हुई।
अपने चारों ओर के संसार को एक पल के लिए सपने जैसा देखिए — यह डराता नहीं, क्योंकि यह जानते ही कि वह आपकी भीतरी चेतना से ही आया है, जीवन के तनाव हल्के हो जाते हैं।
इस अध्याय का सारांश
वशिष्ठ महर्षि श्रीराम को संसार के जन्म के बारे में समझाते हैं। जैसे नींद में सपना मन से ही जन्मता है, वैसे ही यह संसार परमात्मा से ही उदय होता है, यह वे बताते हैं। चित् चैतन्य से जीव चैतन्य, आकाशसत्ता, कालसत्ता, अहंकार धीरे-धीरे जन्म लेकर, अंत में पंचतन्मात्राओं, इंद्रियों, चौदह लोकों वाले संसार का निर्माण होता है, यह वे समझाते हैं। हिरण्यगर्भ की शिल्पी वाली उपमा से सृष्टि संकल्प मात्र से कैसे होती है, यह वे दिखाते हैं। अंत में, इस सबका कारण माया है, पर परमात्मा सदा बिना बदलाव के नित्य रहता है, यह वे घोषित करते हैं।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: संसार परमात्मा से अलग नहीं है — यह परमात्मा स्वरूप से ही धीरे-धीरे उदय हुआ एक प्रकाश मात्र है।
- तात्विक शिक्षा: सृष्टि चित् चैतन्य से शुरू होकर, जीव चैतन्य, आकाश-काल-अहंकार तत्वों के ज़रिए धीरे-धीरे फैलकर, पंचेंद्रियों वाले इस दृश्य-संसार के रूप में आकार लेती है। इस सबका कारण माया है, पर मूल में मौजूद परमात्मा कभी नहीं बदलता।
- अगले अध्याय से संबंध: संसार कैसे जन्मा, यह जानने के बाद, अगले अध्याय में वशिष्ठ इस संसार के वास्तविक स्वभाव को — यह क्यों, कैसे वेद के रूप में अनुभव में आता है, इसे और गहराई से स्पष्ट करेंगे।
जो सो रहा है, वह अपने ही स्वरूप से सपने देख रहा है, ठीक वैसे ही ब्रह्म भी अपनी सृष्टि के साथ स्वयं जुड़ा हुआ प्रतीत हो रहा है।
जैसे शिल्पी के मन में शिल्प संकल्प रूप में होता है, वैसे ही हिरण्यगर्भ समष्टि सृष्टि को संकल्प रूप में ही धारण किए हुए है।
कई सृष्टि-संहार क्रमों से परे वह पिता सदैव नित्य, अविनाशी रूप में रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
योगवाशिष्ठ के अनुसार संसार कैसे जन्मा?
परम पवित्र, परम शांत ब्रह्मपद से यह संसार धीरे-धीरे उदय हुआ, यह वशिष्ठ महर्षि बताते हैं। जैसे नींद में सपना मन से ही जन्मता है, वैसे ही यह संसार भी परमात्मा स्वरूप से ही जन्मता है। चित् चैतन्य से शुरू होकर, जीव चैतन्य, आकाशसत्ता, कालसत्ता, अहंकार धीरे-धीरे फैलकर, अंत में पंचेंद्रियों, चौदह लोकों वाले इस दृश्य-संसार का आकार लेता है।
चित्त क्या है?
चित्तवृत्तियों से जुड़ी हुई चेतन ब्रह्मसत्ता ही चित्त कहलाती है। यह ज्ञान संस्कारों से जन्म लेती है। परमात्मा से उठा ज्ञान संस्कार ही बाकी संस्कारों के साथ मिलकर चित्त को जगाता है, फिर आत्मस्वरूप एक ही क्षण में द्रष्टापन को प्राप्त कर दृश्यज्ञानघन बन जाता है।
हिरण्यगर्भ कौन है?
आकाश-अहंकार-कालरूप सृष्टि को संकल्प मात्र से रचने वाले तत्व को ही शास्त्र हिरण्यगर्भ या समष्टि जीव कहते हैं। जैसे शिल्पी अपने मन में मूर्ति को पहले से ही संकल्प के रूप में धारण किए रहता है, वैसे ही हिरण्यगर्भ समष्टि सृष्टि को संकल्प रूप में धारण किए रहता है।
क्या यह संसार सच है या भ्रम?
आत्मा से ही पहचाना जाने वाला यह मिथ्या संसार परमात्मा से ही उत्पन्न होकर सत्यरूप में चमक रहा है। यह पूरी तरह झूठ नहीं, बल्कि परमात्मा का ही स्वरूप है। माया के कारण ही यह अलग, अलग-अलग रूपों में दिखता है, वरना मूल में यह ब्रह्म से अलग नहीं है।
माया क्या है, संसार से इसका क्या संबंध है?
माया इस दृश्य-संसार का कारण बनने वाली संपत्कारण्य है। इसी के कारण परमात्मा अलग-अलग रूपों में, नामों में चमकता है। इसी माया के कारण ही वर्ण-आश्रम-अनुष्ठानों की परंपरा बनती है, पर इन सभी परिवर्तनों से परे वह पिता (परमात्मा) सदा नित्य, अपरिवर्तित रहता है।
पंचेंद्रियाँ कैसे जन्मीं?
तेजोतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, गंधतन्मात्रा जैसे सूक्ष्म तत्वों से धीरे-धीरे आँख, जीभ, नाक जैसी इंद्रियाँ आकार लेती हैं। तेजोतन्मात्रा से नेत्रेंद्रिय, रसतन्मात्रा से जिह्वेंद्रिय, गंधतन्मात्रा से नाक उदय होती है, यह वशिष्ठ समझाते हैं।
चौदह लोक कैसे बने?
प्राणतत्व से ही चौदह लोक, जरायुज-अंडज-स्वेदज-बीजज नाम के चारों प्रकार के प्राणी समूह जन्म लेते हैं। अहं-तन्मात्रा से प्रीति के प्रभाव के कारण प्राणतत्व उदय होकर, उसी से ये लोक, प्राणी समूह, भौतिक शरीर आकार लेते हैं।
निष्कर्ष
इस पूरे सृष्टि-क्रम को सुनने के बाद सभा में एक गहरी शांति छा गई। बदलते रहने वाले इस संसार के पीछे, कभी न बदलने वाला एक सत्य है, यह जानना मन को बहुत राहत देता है। पर इस माया नाम के पर्दे को पार करके, उस असली नित्य सत्य को प्रत्यक्ष रूप से कैसे अनुभव करें? इस प्रश्न का वशिष्ठ महर्षि आगे क्या उत्तर देते हैं, यह जानते हैं।