वसिष्ठ महर्षि उपदेश देते हैं कि यह जगत बांझ स्त्री के पुत्र के समान, आकाश में उगे वृक्ष के समान, केवल एक कल्पना मात्र है। प्रलयकाल में यह संसार कहाँ चला जाता है, यह प्रश्न श्रीराम पूछते हैं, तो वसिष्ठ स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म ही सत्य है, और जगत केवल अज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाली एक भावना मात्र है, जिसकी न तो स्वतंत्र उत्पत्ति है और न ही विनाश।
कभी किसी सपने से जागने के बाद सोचा है – उस समय आँखों के सामने दिखने वाला वह गाँव, वे लोग, वे इमारतें, आखिर कहाँ चली गईं? वे कहाँ से आई थीं? यह जानकर आश्चर्य होता है कि यह सवाल सिर्फ सपनों तक सीमित नहीं है।
अयोध्या की सभा के बीच श्रीराम के मन में भी यही जिज्ञासा उठी। आँखों के सामने दिखने वाला यह चराचर जगत, इतना स्पष्ट, इतना ठोस अनुभव होने वाला यह संसार, प्रलयकाल में कहाँ चला जाता है? क्या हो जाता है इसका? यही प्रश्न उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठ महर्षि के सामने रखा।
श्रीराम की जिज्ञासा – प्रलय में जगत का क्या होता है?
सभा में सन्नाटा छा गया। श्रीराम अपने गुरु वसिष्ठ महर्षि की ओर विनम्रता से देखते हुए, मन में लंबे समय से घूम रहे प्रश्न को बाहर लाए। उनकी आँखों में सच्ची जिज्ञासा झलक रही थी।
“हे ब्रह्मज्ञानी! यह चराचर जगत कितना स्पष्ट, कितना ठोस दिखाई देता है! इस तरह प्रत्यक्ष अनुभव होने वाला यह जगत प्रलयकाल में कहाँ चला जाता है? क्या हो जाता है इसका?” राम ने पूछा।
इस प्रश्न में कोई साधारण जिज्ञासा नहीं थी। आँखों के सामने दिखने वाली हर चीज़ एक दिन विलीन हो जाएगी, यह जानते हुए भी, वह कैसे और कहाँ जाएगी, यह बात मन को मथती है। राम का प्रश्न कुछ ऐसा ही था।
वसिष्ठ का पलटवार – बांझ स्त्री का पुत्र कहाँ से आता है?
वसिष्ठ महर्षि के चेहरे पर कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। उन्होंने शांत, लेकिन गहरे अर्थ से भरे एक पलटवार प्रश्न से उत्तर देना शुरू किया।
“किसी बांझ स्त्री का दूसरा पुत्र कहाँ से आता है?” वसिष्ठ ने पूछा।
वसिष्ठ महर्षि: किसी बांझ स्त्री का दूसरा पुत्र कहाँ से आता है? कहाँ रहता है? कहाँ चला जाता है?
आकाश का वृक्ष, दूसरा चंद्रमा – जो है ही नहीं उसके बारे में सवाल कैसा
सभा में सब लोग यह प्रश्न सुनकर सोच में पड़ गए। वसिष्ठ ने अपने प्रश्न को और विस्तार दिया, चुपचाप सबके मन में एक हलचल पैदा करते हुए।
“आकाश में किसी बालक को बादलों के आकार के कारण दिखने वाले वन, जानवरों की आकृतियाँ, कहाँ से आईं? कहाँ हैं? कहाँ चली जाती हैं? पहले मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दो” वसिष्ठ ने राम से पूछा।
श्रीराम ने इन प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश की। उनकी बातों में स्पष्टता झलक रही थी।
“बांझ का पुत्र, आकाश में वन – ये किसी भी काल में जन्मे ही नहीं। ये कहीं भी नहीं हैं। इसलिए इनका न अस्तित्व है, न अभाव। इस भावना का कोई अर्थ ही नहीं है” राम ने उत्तर दिया।
श्रीराम: बांझ का पुत्र, आकाश में वन – ये किसी भी काल में जन्मे ही नहीं। ये कहीं भी नहीं हैं। इसलिए इनका न अस्तित्व है, न अभाव।
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जगत और बांझ के पुत्र की तुलना
राम का उत्तर सुनते ही वसिष्ठ के चेहरे पर एक सूक्ष्म संतोष झलका। उन्होंने इसी उत्तर को पकड़कर जगत के रहस्य की ओर आगे बढ़ाया।
“वे दोनों अभाव पदार्थ ही हैं न! उसी तरह यह जगत भी अभाव पदार्थ ही है। इसका कोई अस्तित्व है ही नहीं। तो फिर ‘यह कैसे उत्पन्न हुआ?’ यह प्रश्न कहाँ रह जाता है? जो शुरू से ही अभाव है, उस जगत की न उत्पत्ति है, न अस्तित्व, न विनाश” वसिष्ठ ने कहा।
सभा में एक पल के लिए स्तब्धता छा गई। इतने स्पष्ट रूप से दिखने वाले इस संसार को न होने के समान कहना सबके लिए एक नया अनुभव था।
वसिष्ठ ने आगे कहा – “सपने में दिखी इमारत को किसने बनवाया? कब, क्यों बनवाया? इन सवालों का क्या अर्थ रह जाता है?”
वसिष्ठ महर्षि: वे दोनों अभाव पदार्थ ही हैं न! उसी तरह यह जगत भी अभाव पदार्थ ही है। इसकी न उत्पत्ति है, न अस्तित्व, न विनाश।
कल्पनाओं की भी उत्पत्ति-नाश होती है न – राम का पलटवार
श्रीराम ने ये बातें शांति से सुनीं, लेकिन मन में एक छोटी सी शंका उठी। उन्होंने तुरंत अपना तर्क सामने रखा।
“तो फिर मेरे मन में एक छोटा सा सुझाव है। मान लीजिए ‘बांझ का पुत्र’, ‘आकाश का वृक्ष’ ये सिर्फ कल्पनाएँ हैं। लेकिन ‘कल्पना’ भी एक समय शुरू होती है और दूसरे समय समाप्त होती है। तो कल्पनाओं की भी उत्पत्ति-नाश होती है न! फिर इस जगत की भी उत्पत्ति-नाश मान लेने में क्या गलत है?” राम ने पूछा।
श्रीराम: कल्पनाओं की भी उत्पत्ति-नाश होती है न! फिर इस जगत की भी उत्पत्ति-नाश मान लेने में क्या गलत है?
कल्पना जब तक है, तभी तक जगत है
वसिष्ठ ने इस तर्क को खारिज नहीं किया, बल्कि उसी को और गहराई से समझाया। उनकी आवाज़ में एक अटल निश्चय गूंज रहा था।
“बिल्कुल सही। ‘कल्पना’ जब तक रहती है, तभी तक ‘आकाश का वृक्ष – बांझ का पुत्र’ अस्तित्व में रहते हैं। कल्पना समाप्त होते ही वे भी न होने के बराबर हो जाते हैं। इस जगत का मामला भी वैसा ही है! जब तक कल्पना है, जगत है। जब कल्पना नहीं है, जगत भी नहीं है। इसी तरह बांझ के पुत्र और जगत में समानता है” वसिष्ठ ने समझाया।
वसिष्ठ महर्षि: जब तक कल्पना है, जगत है। जब कल्पना नहीं है, जगत भी नहीं है। इसी तरह बांझ के पुत्र और जगत में समानता है।
सोने की चूड़ी, आकाश में आकाश – ब्रह्म ही जगत का रूप है
अब वसिष्ठ ने जगत ‘कहाँ है’ इस पहलू को खोला। उनकी आवाज़ में एक सूक्ष्म उपमा शुरू हुई।
“‘यह जगत आखिर है क्या? कहाँ है?’ अब इस प्रश्न पर आते हैं। ‘सोने की चूड़ी’ में सोने से अलग ‘चूड़ी’ नाम की कोई चीज़ कहीं अलग से मौजूद है क्या? आकाश में शून्यता के अलावा कोई और आकाशत्व कहाँ है?” वसिष्ठ ने पूछा।
ठीक उसी तरह यह जगत भी ब्रह्म में ही रहते हुए, इसका ब्रह्म से अलग कोई रूप नहीं है। वसिष्ठ ने इस बात को और स्पष्ट करते हुए आगे कहा।
“काजल और उसकी कालिमा में, बर्फ और उसकी ठंडक में कोई अंतर नहीं है। मृगतृष्णा के पानी में और तिरछी नज़र से दिखने वाले दूसरे चंद्रमा में – इन दोनों का अस्तित्व क्या है? ये बिना हुए ही हैं” वसिष्ठ ने कहा।
वसिष्ठ महर्षि: सोने की चूड़ी में सोने से अलग चूड़ी नाम की कोई चीज़ कहीं अलग से मौजूद है क्या? आकाश में शून्यता के अलावा कोई और आकाशत्व कहाँ है?
मृगतृष्णा का पानी – तुम क्या कहोगे?
सभा में सब इन उपमाओं को मन ही मन दोहरा रहे थे। वसिष्ठ ने अब राम को एक काल्पनिक संवाद में खींचा, तत्व को और सीधे तौर पर समझाने के लिए।
“अत्यंत अभाव ही सिद्ध होता है न! अगर कोई तुम्हारे पास आकर कहे – ‘मृगतृष्णा में मुझे पानी दिखाई देता है न! नहीं तो मुझे क्या फायदा?’ तो तुम क्या कहोगे?” वसिष्ठ ने पूछा।
वसिष्ठ महर्षि: अगर कोई तुम्हारे पास आकर कहे – ‘मृगतृष्णा में मुझे पानी दिखाई देता है न! नहीं तो मुझे क्या फायदा?’ तो तुम क्या कहोगे?
दृष्टि शुद्ध करने पर वहाँ न जल है, न लहरें
इस प्रश्न का उत्तर वसिष्ठ ने स्वयं दिया, राम की ओर से कहे जाने वाले शब्दों को खुद बोलते हुए। उनकी आवाज़ में करुणा से भरी एक स्पष्टता गूंज रही थी।
“बेटा! तुम्हें दिख सकता है। लेकिन हमने इसे बारीकी से देखकर परखा है। तुम भी अपनी दृष्टि शुद्ध करके देखो। तुम्हें खुद पता चल जाएगा। वहाँ बिल्कुल भी जल नहीं है, लहरें नहीं हैं, यही कहना पड़ेगा न!” वसिष्ठ ने कहा।
इस जगत का मामला भी ऐसा ही है। लोभ-मोह-मद-मत्सर आदि के कारण, अविवेक से भरे मन के साथ, केवल इंद्रिय दृष्टि से देखने वालों को यह संकुचित नज़रिए में ठोस लगता है। लेकिन शुद्ध स्वस्वरूप ब्रह्म को जान लेने पर, इस जगत का अभाव ही सिद्ध होता है, वसिष्ठ ने घोषित किया।
वसिष्ठ महर्षि: तुम अपनी दृष्टि शुद्ध करके देखो। तुम्हें खुद पता चल जाएगा। वहाँ बिल्कुल भी जल नहीं है, लहरें नहीं हैं, यही कहना पड़ेगा न!
द्रष्टा की दृष्टि में जगत का विलीन होना – सृष्टि-प्रलय का असली स्वरूप
सभा और गहरी शांति में डूब गई। वसिष्ठ ने अब समझाना शुरू किया कि जगत कई नज़रियों से कैसे अनुभव होता है।
“कई दृष्टिकोणों से ‘जगत’ नाम की चीज़ को परखने पर, ‘यह ऐसा है’ यह निश्चित रूप से नहीं मिलता। अलग-अलग दृष्टियों को यह अलग-अलग तरह से अनुभव होता है। असल में यह है क्या? है भी या नहीं?” वसिष्ठ ने पूछा।
उन्होंने आगे कहा, “बेटा रामचंद्र! यह जगत नाम की चीज़ न पहले थी, न अब है। जो पहले भी नहीं थी और अब भी नहीं है, उसके बारे में ‘यह किसी दिन नष्ट हो जाएगी’ यह वाक्य कहना कहाँ तक ठीक बैठता है?” वसिष्ठ ने प्रश्न किया।
किसी द्रष्टा की दृष्टि में यह ‘जगत’ नाम की भावना विलीन हो जाना ही असल में होता है। ‘जगत’ के रूप में अनुभव होने वाली इस ‘भावना’ की उत्पत्ति-नाश को ही शास्त्रों ने ‘सृष्टि-प्रलय’ नाम दिया है, वसिष्ठ ने स्पष्ट किया।
वसिष्ठ महर्षि: बेटा रामचंद्र! यह जगत नाम की चीज़ न पहले थी, न अब है।
जगत का कोई कारण ही नहीं – राम का प्रश्न, वसिष्ठ का निर्णय
इतनी गहरी व्याख्या सुनने के बाद, श्रीराम को जगत के मूल कारण के बारे में और स्पष्टता चाहिए थी।
“महर्षि! इस जगत का कोई कारण ही नहीं है, यह आप कैसे निश्चित रूप से कह सकते हैं?” राम ने पूछा।
वसिष्ठ ने इस प्रश्न का उत्तर बड़े ही तीक्ष्ण तर्क से दिया। “अगर हम कहें कि ‘इस जगत का कारण ब्रह्म ही है’ – तो पृथ्वी जैसी जड़ वस्तुओं का कारण जड़ ही होना चाहिए, लेकिन शुद्ध चैतन्य स्वरूप ‘ब्रह्म’ इसका कारण कैसे हो सकता है?” वसिष्ठ ने पूछा।
उन्होंने धूप-छाया की उपमा से इस तर्क को और सीधे तौर पर समझाया – “‘धूप’ यानी प्रकाश… ‘छाया’ यानी प्रकाश का अभाव। सूर्य की रोशनी में कुछ आड़े आने पर बनने वाली चीज़ को ही हम ‘छाया’ कहते हैं। लेकिन ‘छाया का कारण धूप है’ यह तो नहीं कह सकते न! ब्रह्म जड़ नहीं है न! धूप छाया का कारण कैसे बन सकती है?” वसिष्ठ ने समझाया।
अखंड, चैतन्यमय, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, निर्विकार, अनिर्वचनीय ब्रह्म इस जगत को बनाने का कारण कैसे बन सकता है? ब्रह्म के अलावा और कुछ भी इस जगत का कारण नहीं मिलता। इसलिए ‘इस जगत का कोई कारण नहीं है’ यह समझा जाता है, वसिष्ठ ने निर्णय दिया। जहाँ कारण ही नहीं है, वहाँ कार्य कैसे सिद्ध हो सकता है?
वसिष्ठ महर्षि: ब्रह्म के अलावा और कुछ भी इस जगत का कारण नहीं मिलता। इसलिए इस जगत का कोई कारण नहीं है, यह समझा जाता है। जहाँ कारण ही नहीं है, वहाँ कार्य कैसे सिद्ध हो सकता है?
अज्ञान ही इस भ्रम का कारण है – जगत को कैसे समझें
सभा एक मौन आश्चर्य से भर गई। वसिष्ठ कुछ देर मौन रहे, फिर स्वयं बताने लगे कि इस जगत को कैसे समझा जाए।
“अब मैं बताता हूँ कि हम इस जगत को कैसे समझते हैं, सुनो” वसिष्ठ ने कहा।
आदि कारण वह ब्रह्म वस्तु ही विश्व के रूप में दिखाई दे रही है। इस भ्रम (प्रतिबिंब जैसा, न होने वाली चीज़ का सच जैसा प्रतीत होना) का कारण अज्ञान ही है, वसिष्ठ ने स्पष्ट किया। ब्रह्म वस्तु निर्विकार है इसलिए ‘ब्रह्म विश्व की रचना कर रहा है’ यह बात सही नहीं है।
अत्यंत सूक्ष्म अपने स्वस्वरूप को जीव जब भूल जाता है, तभी यह ‘जगत’ नाम का अनुभव सच जैसा दिखाई देने लगता है, वसिष्ठ ने समझाया।
सपने में महल, जागृति में नगर – दोनों ही कल्पनाएँ हैं
अब वसिष्ठ ने स्वप्न-जागृति के अनुभवों की तुलना सामने रखी, इस पूरे उपदेश को एक अंतिम स्पष्टता के साथ समाप्त करने के लिए।
“इसलिए राघव! यह सारा जगत-दृश्य सपने में दिखने वाली वस्तुओं जैसा ही है, यह समझो। सपने में एक बड़ा महल दिखाई देता है, लेकिन क्या वह सच है? अपनी ही कल्पना सपने के समय उस रूप में सामने आ जाती है न!” वसिष्ठ ने कहा।
उसी तरह ब्रह्म में भी ‘जगत’ नाम की कोई वस्तु न होते हुए भी, इसकी वजह से एक ठोस अनुभव की तरह भावना के खेल के साथ अज्ञानियों को दिखाई देता है। यानी ज्ञानियों को तो यह बिना किसी संदेह के, पूरी तरह स्पष्ट दिखाई देता है, वसिष्ठ ने कहा।
यह ‘जगत’ नाम की सारी चीज़ परमात्मा में हमेशा स्थिर रहती है – न कभी उदय होती है, न कभी अस्त होती है। पानी अपने द्रव रूप को, प्रकाश अपनी चमक को धारण किए ही रहते हैं न – वायु के बिना कोई और चीज़ नहीं रह सकती न! ब्रह्म भी जगत के रूप को धारण किए ही रहता है।
वसिष्ठ महर्षि: यह सारा जगत-दृश्य सपने में दिखने वाली वस्तुओं जैसा ही है, यह समझो, राघव!
गंधर्व नगर, स्वप्नद्रष्टा की चेतना – आत्मा ही ब्रह्म है
वसिष्ठ ने अपने उपदेश को समापन की ओर ले जाना शुरू किया। उनकी आवाज़ में एक अंतिम निर्णय गूंज रहा था।
“किसी गंधर्व नगर की कल्पना कहाँ से आती है, बताओ? उस स्वप्नद्रष्टा की चेतना ही अपने भीतर ऐसे नगर की कल्पना करके, स्वयं ही वह ‘कल्पना’ बनकर, फिर स्वयं को ही उस रूप में देख रही होती है, यह हमें मानना ही पड़ेगा” वसिष्ठ ने कहा।
“इस जगत का मामला भी ठीक ऐसा ही है! अपनी आत्मा ही ब्रह्म होते हुए, ब्रह्म में ही जगत के रूप में एक कल्पना मात्र बनकर दिखाई दे रही है” वसिष्ठ ने अपने उपदेश को समाप्त किया।
वसिष्ठ महर्षि: अपनी आत्मा ही ब्रह्म होते हुए, ब्रह्म में ही जगत के रूप में एक कल्पना मात्र बनकर दिखाई दे रही है।
वसिष्ठ द्वारा दी गई तीन कल्पना-उपमाएँ – उनका अर्थ
| उपमा | समझने योग्य सत्य |
|---|---|
| बांझ का दूसरा पुत्र / आकाश का वन | जो कभी जन्मा ही नहीं, उसके लिए उत्पत्ति, स्थिति, नाश जैसे प्रश्न लागू ही नहीं होते |
| सोने की चूड़ी / आकाश में आकाश | जगत का ब्रह्म से अलग कोई स्वतंत्र रूप नहीं है, दोनों एक ही हैं |
| मृगतृष्णा का पानी / तिरछी नज़र का चंद्रमा | दृष्टि दोष के कारण जो दिखता है वह सच नहीं होता, दृष्टि शुद्ध होने पर वह स्वयं मिट जाता है |
| सपने का महल / गंधर्व नगर | द्रष्टा की चेतना ही कल्पना बनकर, स्वयं उसे देख रही है – जगत भी बिल्कुल ऐसा ही है |
आध्यात्मिक अंतरार्थ
यह अध्याय गहराई से जो सत्य बताता है वह यह है – हम जो भी दृश्य, जो भी घटना, समय से जुड़ी हर भावना अनुभव करते हैं, वह सब एक कल्पना मात्र है। यह है या नहीं है, इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने की बजाय, यह ऐसा क्यों प्रतीत होता है, इसे समझ लेना ही असली ज्ञान है।
वसिष्ठ द्वारा दी गई हर उपमा एक ही बात को अलग-अलग नज़रिए से दिखाती है – जगत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, यह ब्रह्म पर आधारित एक भ्रम मात्र है। यह सिर्फ एक दार्शनिक चर्चा नहीं है, यह जीवन में भय, दुःख, बंधन क्यों उत्पन्न होते हैं, इसे समझाने वाला मूल सूत्र है।
आज अपने आस-पास मौजूद किसी एक समस्या, भय या बंधन को लीजिए – और एक बार खुद से पूछिए कि वह कितना सच में ‘है’, और कितना आपके मन की कल्पना का भ्रम मात्र है। दृष्टि शुद्ध करने पर वह बदल जाता है या नहीं, इसे ध्यान से देखिए।
इस अध्याय का सारांश
श्रीराम पूछते हैं कि प्रलयकाल में जगत कहाँ चला जाता है। वसिष्ठ बांझ के पुत्र, आकाश के वन जैसी उपमाओं से बताते हैं कि जगत की न उत्पत्ति है, न नाश। जब तक कल्पना है, तभी तक जगत है, यह समझाते हुए, सोने की चूड़ी की तरह जगत का ब्रह्म से अलग कोई रूप नहीं है, यह वर्णन करते हैं। मृगतृष्णा के पानी, सपने के महल जैसी उपमाओं से बताते हैं कि दृष्टि शुद्ध होने पर जगत का अभाव ही सिद्ध होता है। ब्रह्म जड़ नहीं है, इसलिए जगत का कोई कारण भी नहीं है, यह तर्क से सिद्ध करते हैं। अंत में बताते हैं कि अज्ञान ही इस भ्रम का कारण है, आत्मा ही ब्रह्म होकर, जगत के रूप में एक कल्पना मात्र बनकर दिखाई दे रही है।
ग्रंथ टिप्पणियाँ
- मुख्य संदेश: जगत ब्रह्म पर आधारित एक कल्पना मात्र है, जिसकी न स्वतंत्र उत्पत्ति है, न स्थिति, न नाश।
- तात्विक शिक्षा: अज्ञान ही जगत के इस भ्रम का कारण है। ब्रह्म निर्विकार है, जड़ नहीं है, इसलिए वह जगत का जड़ कारण नहीं बन सकता। आत्मा ही ब्रह्म होकर, स्वयं जगत के रूप में स्वयं को ही देख रही है।
- अगले अध्याय से संबंध: जगत एक भ्रम है, यह जान लेने के बाद भी, इस दृश्य-भ्रम से पूरी तरह मुक्त कैसे हुआ जाए, इस प्रश्न के साथ अगला अध्याय शुरू होता है।
जब तक कल्पना है, जगत है। जब कल्पना नहीं है, जगत भी नहीं है।
दृष्टि शुद्ध करने पर वहाँ बिल्कुल भी जल नहीं है, लहरें नहीं हैं, यह तुम्हें खुद पता चल जाएगा।
जहाँ कारण ही नहीं है, वहाँ कार्य कैसे सिद्ध हो सकता है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वसिष्ठ के अनुसार जगत क्यों अभाव है?
जगत बांझ के पुत्र, आकाश के वन जैसी एक कल्पना मात्र है, इसलिए इसकी न कोई स्वतंत्र उत्पत्ति है, न अस्तित्व, न विनाश, वसिष्ठ कहते हैं। कल्पना जब तक रहती है, तभी तक जगत है, कल्पना हट जाने पर जगत भी नहीं रहता।
ब्रह्म जगत का कारण क्यों नहीं है?
ब्रह्म शुद्ध चैतन्य स्वरूप है, निर्विकार है, अखंड है। जड़ वस्तुओं का कारण जड़ ही होना चाहिए, लेकिन चैतन्य स्वरूप ब्रह्म जड़ जगत का कारण कैसे बन सकता है, यह वसिष्ठ तार्किक रूप से समझाते हैं।
बांझ के पुत्र और जगत में क्या समानता है?
बांझ का पुत्र कभी जन्मा ही नहीं, इसलिए उस पर उत्पत्ति-नाश जैसे प्रश्न लागू नहीं होते। उसी तरह जगत भी वास्तव में कभी उत्पन्न नहीं हुआ, इसलिए उस पर भी उत्पत्ति-नाश लागू नहीं होते, वसिष्ठ यह तुलना करके समझाते हैं।
मृगतृष्णा के पानी की उपमा क्या बताती है?
दूर से मृगतृष्णा में पानी दिखाई देता है, लेकिन पास जाकर देखने पर पता चलता है कि वहाँ पानी है ही नहीं। उसी तरह जगत भी अज्ञान की दृष्टि में सच जैसा दिखाई देता है, दृष्टि शुद्ध करने पर उसका अभाव स्पष्ट हो जाता है, वसिष्ठ समझाते हैं।
सृष्टि-प्रलय शब्दों का असली अर्थ क्या है?
द्रष्टा की दृष्टि में ‘जगत’ नाम की भावना का उत्पन्न होना ‘सृष्टि’ और वह भावना विलीन होना ‘प्रलय’ कहलाता है, ऐसा शास्त्रों ने नाम दिया है। यह वास्तविक पदार्थ की उत्पत्ति-नाश नहीं है, वसिष्ठ स्पष्ट करते हैं।
जगत को अभाव समझने से मनुष्य को क्या लाभ है?
जगत को लेकर मन में बैठी दृढ़ सच्चाई की भावना से ही भय, दुःख, बंधन उत्पन्न होते हैं। उसके अभाव स्वरूप को समझ लेने से मन को शांति मिलती है, बंधन से मुक्ति संभव होती है, वसिष्ठ यह संकेत देते हैं।
निष्कर्ष
यह जगत एक कल्पना मात्र है, इसकी न कोई स्वतंत्र उत्पत्ति है, न विनाश, वसिष्ठ ने स्पष्ट किया। आत्मा ही ब्रह्म होकर, स्वयं जगत के रूप में स्वयं को देख रही है, इसी के साथ यह उपदेश समाप्त हुआ। लेकिन इतने स्पष्ट रूप से दिखने वाले इस दृश्य-भ्रम से पूरी तरह मुक्ति कैसे मिले? इस दृश्य-बुद्धि से छुटकारा पाने का मार्ग क्या है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अगले एपिसोड में वसिष्ठ द्वारा दिए जाने वाले उपदेश को जानेंगे।