दैव और पुरुषार्थ के बीच का वास्तविक रहस्य क्या है? | Yoga Vasistha S3 EP-35

दैव क्या है? क्या भाग्य से पुरुषार्थ बलवान है? महर्षि वशिष्ठ द्वारा श्रीराम को दिया गया परम उपदेश।

दैव का अर्थ आकाश से गिरने वाली कोई अदृश्य शक्ति नहीं है; ब्रह्मांड को संचालित करने वाली परम नियति और हमारी निरंतर संकल्प-शक्ति ही दैव है। महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को स्पष्ट किया कि मानवीय प्रयास के बिना कोई फल सिद्ध नहीं हो सकता, और पूर्व कर्मों के प्रभाव को केवल वर्तमान के तीव्र पुरुषार्थ से ही जीता जा सकता है।

जीवन में जब विपरीत परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तो अधिकांश लोग ‘यह सब मेरे भाग्य का खेल है, ईश्वर ही मुझे इस तरह नचा रहा है’ कहकर असहाय होकर हाथ खड़े कर देते हैं। परंतु क्या वास्तव में हमारा भाग्य किसी ने पहले ही लिख दिया है, या फिर हमारा भविष्य हमारे ही हाथों में है—यह संशय हर साधक के हृदय में निरंतर बना रहता है।

राजसभा में जब शांत वातावरण बना हुआ था, तब श्रीराम ने ठीक यही गंभीर प्रश्न अपने गुरुदेव के समक्ष रखा। महर्षि वशिष्ठ ने दैव, नियति और पुरुषार्थ के मूल रहस्य को अत्यंत गूढ़ दृष्टांतों के माध्यम से स्पष्ट करते हुए, इस अध्याय में मनुष्य के कर्तव्य के स्वरूप का सजीव मार्गदर्शन किया है।

परमाणु में अनंत लोक – कल्पना का चमत्कार

सभामंडप में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। श्रीराम की आँखों में तात्त्विक जिज्ञासा को देखकर महर्षि वशिष्ठ ने अत्यंत शांत स्वर में संवाद आरंभ किया। परब्रह्म तत्त्व में यह दृश्य जगत किस प्रकार भासित होता है, इसे समझाने के लिए उन्होंने काल और पदार्थ के अतिसूक्ष्म विभाजन को दृष्टांत के रूप में चुना।

वशिष्ठ जी की बातों ने सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को विस्मय में डाल दिया। देश और काल से परे परमात्मा के चैतन्य में केवल संकल्प ही सृष्टि के रूप में कैसे विस्तार पाता है, यह उन्होंने विस्तार से समझाया। उन्होंने यह बोध कराया कि बाहर दिखाई देने वाला यह दृश्य प्रपंच केवल मानसिक कल्पना का चमत्कार है, कोई स्वतंत्र और स्थायी सत्य नहीं।

महर्षि वशिष्ठ: हे राम! यदि तुम एक सूक्ष्म परमाणु को एक लाख भागों में विभाजित करो, और उसी प्रकार एक मिनट के समय को भी लाख भागों में बाँट दो, तो उस अतिसूक्ष्म काल-खंड में भी हजारों जगत और हजारों कल्प एक साथ प्रकट हो सकते हैं!

महर्षि वशिष्ठ: आश्चर्य तो यह है कि इस प्रकार भासित होने वाले प्रत्येक जगत के कण-कण में पुनः ऐसे ही अनगिनत लोकों की अनुभूति निरंतर होती रहती है। इसीलिए तत्त्वज्ञानी यह उद्घोष करते हैं कि यह दिखाई देने वाला सारा जगत केवल एक अंतहीन भ्रांति मात्र है।

भंवर में जल – मृगतृष्णा में तरंगों का भ्रम

महर्षि के वचनों को सुनते हुए सभासदों के हृदयों में इस भ्रांति के प्रति गहरी स्पष्टता आने लगी। कोई वस्तु वास्तव में न होते हुए भी किस प्रकार प्रतीत होती है, इसे समझाने के लिए उन्होंने दैनिक जीवन की सहज घटनाओं का उदाहरण दिया।

भूत, वर्तमान और भविष्य काल की यह संपूर्ण सृष्टि हमारी आँखों को अचल और सुदृढ़ जैसी प्रतीत होकर भ्रमित करती है। परंतु परमार्थ दृष्टि से विचार करने पर उसमें किसी भी क्षण कोई स्थिरता नहीं होती; मूल चैतन्य ही विभिन्न नाम और रूपों में दिखाई दे रहा है, यह महर्षि ने स्पष्ट किया।

महर्षि वशिष्ठ: राघव! बहती हुई नदी में भंवर स्पष्ट वृत्तों के रूप में दिखाई देते हैं न! वास्तव में उस भंवर में दिखने वाला जल क्या किसी भी क्षण स्थिर रहता है? और क्या वहाँ जल के अतिरिक्त ‘भंवर’ नाम की कोई अलग वस्तु कहीं मौजूद है?

महर्षि वशिष्ठ: मरुभूमि में दिखने वाली मृगतृष्णा को देखो। उसमें नदी की तरंगें जैसी प्रतीत होती हैं। क्या उन तरंगों में छोटा, बड़ा, लंबा या चौड़ा होने का कोई वास्तविक भेद है? ब्रह्म में हमारे अज्ञान के कारण दिखाई देने वाली यह सृष्टि भी बिल्कुल वैसा ही एक भ्रम है।

श्रीराम का संशय – ज्ञानी का शरीर और दैव नियति

इन वचनों को सुनकर श्रीराम अत्यंत विनयपूर्वक हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उनके मुख पर एक और गहरा दार्शनिक संशय प्रकट हुआ। आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके सिद्ध पुरुषों के शरीरों के व्यवहार के पीछे कौन-सा मूल नियम कार्य करता है, यह जानने की इच्छा राम ने प्रकट की।

सामान्य मनुष्यों को बाँधने वाला भाग्य या नियति क्या सिद्ध पुरुषों पर भी शासन करती है—इस प्रश्न ने सभा के विद्वानों के विचारों को भी झकझोर दिया। श्रीराम की इस जिज्ञासा पर महर्षि मंद-मंद मुस्कुराए।

श्रीराम: हे तत्त्वज्ञानी गुरुदेव! ज्ञानी पुरुष अपने आत्म-विचार द्वारा निर्विकल्प परमात्मा की स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं। फिर उस स्थिति में उनका शरीर किसके अधीन रहकर कार्य करता है? क्या दैव उनके शरीर को भी अपने वश में करके कर्म करवाता है?

श्रीराम: इसके अतिरिक्त, ‘सब कुछ नियति ही तय करती है, मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं’—इस नियतिवाद के सिद्धांत पर आपका अमूल्य निर्णय क्या है गुरुदेव?

महानियति का वैभव – प्रकृति के धर्मों का प्राकट्य

श्रीराम के प्रश्न के उत्तर में वशिष्ठ जी ने ‘महानियति’ के विश्वव्यापी स्वरूप का वर्णन करना आरंभ किया। उन्होंने बताया कि इस ब्रह्मांड में कुछ भी अकस्मात नहीं होता; प्रत्येक गति के पीछे एक शाश्वत धर्म-सूत्र कार्य कर रहा है।

महर्षि ने समझाया कि यह महानियति केवल कोई बाह्य नियम नहीं है, बल्कि वह परब्रह्म की ही अभिन्न शक्ति है। सृष्टि के आरंभ से लेकर अंत तक समस्त प्राणी-जगत और प्रकृति की शक्तियों को क्रमबद्ध रूप से संचालित करने वाली यही महाशक्ति है।

महर्षि वशिष्ठ: हे राम! एक शाश्वत ‘महानियति’ है। वह प्राणियों में स्पंदन के रूप में, पदार्थों में उनके अनिवार्य स्वभाव के रूप में, और संकल्पों में ईश्वर-संकल्प के रूप में व्यक्त होती है। इसी नियति के कारण ज्ञानियों के शरीर भी लोक-व्यवहार के अनुकूल बने रहते हैं।

महर्षि वशिष्ठ: कल्पादि में परब्रह्म में जो यह संकल्प उठा कि ‘अग्नि ऊपर की ओर प्रज्वलित हो और जल नीचे की ओर बहे’, वही संकल्प यह नियति है। शास्त्र इसी को महासत्ता, महाचित्, महाशक्ति और महास्पंदन जैसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं। स्वयं ब्रह्मा जी भी इसी नियति के बल पर लोकों का निर्माण करते हैं।

स्फटिक में प्रतिबिंब – ब्रह्म और नियति की एकता

महर्षि के विश्लेषण से सभा में उपस्थित सभी लोगों को सृष्टि के नियमों के विषय में अद्भुत स्पष्टता प्राप्त हुई। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्म, नियति और सृष्टि—ये तीन अलग-अलग तत्त्व नहीं हैं, बल्कि एक ही परम सत्य के विभिन्न पहलू हैं।

स्फटिक के दृष्टांत के माध्यम से महर्षि ने अद्वैत सत्य को हृदयस्पर्शी ढंग से समझाया। उन्होंने बताया कि जिसे अज्ञानी बाह्य सृष्टि मानते हैं, वही तत्त्वज्ञानियों को निरंतर ब्रह्म-चैतन्य के रूप में दिखाई देता है।

महर्षि वशिष्ठ: हे राघव! जब किसी स्वच्छ स्फटिक के सामने कोई वन प्रतिबिंबित होता है, तो वह वन स्फटिक के ही प्रकाश से चमकता है न! ठीक इसी प्रकार मायायुक्त प्रतीत होने वाला ब्रह्म भी अपने ही भीतर इस संपूर्ण सृष्टि को प्रतिबिंबित करता है।

महर्षి वशिष्ठ: वास्तव में ब्रह्म, नियति और सृष्टि भिन्न नहीं हैं, ये तीनों एक ही हैं। जनसाधारण को समझाने के लिए इसे ‘सृष्टि’ नाम दिया गया है। यह सृष्टि आदि, मध्य और अंत से रहित परब्रह्म में ही सदा स्थित है।

दैव क्या है? – पुरुषार्थ की मूल शक्ति

इसके बाद महर्षि ने ‘दैव’ शब्द के वास्तविक अर्थ से सभा को अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार में लोग दैव को किसी अदृश्य व्यक्ति या पक्षपाती शक्ति के रूप में मानकर भ्रमित होते हैं, जबकि वास्तव में दैव विशुद्ध चैतन्य स्वरूप ईश्वर का संकल्प ही है।

मनुष्यों, पशुओं और वृक्षों में दिखने वाली समस्त क्रियाएँ तथा शारीरिक व मानसिक चेष्टाएँ ही ‘पुरुषार्थ’ या स्व-प्रयत्न हैं, यह उन्होंने परिभाषित किया। उन्होंने दैव और पुरुषार्थ के बीच के अटूट संबंध को उद्घाटित किया।

महर्षि वशिष्ठ: हिरण्यगर्भ ने अपने भीतर की नियति को जानकर ही सृष्टि का विस्तार किया। उसी महानियति को विद्वान ‘दैव’ कहते हैं। और प्राणियों में होने वाली समस्त क्रियाएँ एवं चेष्टाएँ ‘पुरुषार्थ’ कहलाती हैं।

महर्षि वशिष्ठ: पुरुषार्थ नियति के कारण टिकता है, और नियति पुरुषार्थ के माध्यम से कार्य करती है। ये दोनों एक-दूसरे पर आश्रित होकर पूरी सृष्टि में एकाकार हैं। अतः पुरुषार्थ से पृथक कोई अन्य दैव कहीं नहीं है!

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कर्म का त्याग और जड़ता – वास्तविक भ्रम

भाग्य का बहाना बनाकर कर्मों का त्याग करने वाले आलस्य की महर्षि वशिष्ठ ने कटु शब्दों में निंदा की। उन्होंने सचेत किया कि ‘सब कुछ दैव ही करवा रहा है’ सोचकर प्रयत्न छोड़ देना भी उस व्यक्ति की अज्ञानमयी नियति का ही प्रभाव है।

इस संवाद ने सभासदों में एक नए कर्मोत्साह का संचार किया। जीवन को चलाने के लिए निरंतर प्रयत्न क्यों अनिवार्य है, यह महर्षि ने सिद्ध किया।

महर्षि वशिष्ठ: हे राम! यदि कोई यह सोचकर बैठ जाए कि ‘सब कुछ दैव ही करेगा, मैं कुछ नहीं करूँगा’, तो ऐसा विचार भी उसकी अज्ञानता की नियति से ही उत्पन्न हुआ है! केवल नियति के भरोसे पुरुषार्थ छोड़ देने वाला व्यक्ति विवेकहीन हो जाता है।

महर्षि वशिष्ठ: क्या बिना कोई कर्म किए केवल बैठकर जिया जा सकता है? मुख में ग्रास डालने के लिए, यहाँ तक कि साँस लेने के लिए भी मनुष्य को पुरुषार्थ करना ही पड़ता है! इसलिए श्रेष्ठ फल की प्राप्ति के लिए सदा सत्प्रयास का ही आश्रय लेना चाहिए।

ज्ञान नियति और अज्ञान नियति का भेद

वशिष्ठ जी ने उपदेश दिया कि यह नियति संसार में दो रूपों में कार्य करती है। एक है आत्म-विचार से युक्त ‘ज्ञान नियति’, और दूसरी है सांसारिक वासनाओं से बंधी ‘अज्ञान नियति’।

ज्ञानियों द्वारा अपने स्व-प्रयत्न से अज्ञान को काटकर मुक्ति प्राप्त करने और अज्ञानियों के बाह्य नियति के दास बनकर सुख-दुःख के चक्रव्यूह में उलझने के भेद को महर्षि ने भली-भाँति समझाया।

महर्षि वशिष्ठ: यह नियति दो मार्गों पर चलती है। पहली है ‘ज्ञानियों की नियति’—जिसका अनुसरण करने पर अविद्या नष्ट हो जाती है और शाश्वत मोक्ष प्राप्त होता है। दूसरी है ‘अज्ञानियों की नियति’—जो सांसारिक संकल्पों और फलासक्ति युक्त कर्मों को बंधन में बदल देती है।

महर्षि वशिष्ठ: जिस प्रकार जल का तरलता-धर्म ही तरंगों के रूप में फैलता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही समस्त पुरुषार्थों में साधक, साधन और साध्य के रूप में प्रकाशित हो रहा है। जो इस सत्य को जान लेता है, वह कभी कर्मफलों से नहीं बँधता।

स्वर्ण और आभूषण: सब कुछ एक ही ब्रह्म है

इसके उपरांत महर्षि ने समस्त भेदों को मिटा देने वाला परम अद्वैत दर्शन श्रीराम को प्रदान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार की सारी विविधता केवल नाम और रूपों में है, मूल तत्त्व में नहीं।

स्वर्ण के आभूषणों, समुद्र की लहरों और दर्पण के प्रतिबिंबों के दृष्टांतों से महर्षि ने सृष्टि की एकता को हृदयंगम रूप में उद्घाटित किया। उन्होंने बताया कि जब बुद्धि समत्व की दृष्टि प्राप्त कर लेती है, तब सर्वत्र ब्रह्म ही साक्षात् होता है।

महर्षि वशिष्ठ: हे राघव! एक ही स्वर्ण से अनेक आभूषण बनाए जा सकते हैं। आभूषण अलग-अलग दिखते हैं, परंतु उनमें विद्यमान तो स्वर्ण ही है न! समुद्र में तरंगें, फेन और बुलबुले भिन्न प्रतीत होते हैं, पर वह सब केवल जल ही तो है!

महर्षि वशिष्ठ: उसी प्रकार इस जगत में ब्रह्म के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है। जैसे दर्पण के सामने होने पर ही प्रतिबिंब दिखाई देता है, वैसे ही मन के रहने तक ही यह जगत भासित होता है। मन के लीन होते ही सब कुछ ब्रह्म स्वरूप हो जाता है!

जागो राम! – अज्ञान को त्यागो

उपदेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया। श्रीराम के अंतःकरण में घिरे संशयों के सारे बादल महर्षि के ज्ञान-किरणों के प्रभाव से छिन्न-भिन्न हो गए। वशिष्ठ जी का मुखमंडल दिव्य तेज से आलोकित हो रहा था।

निराशा और भय को त्यागकर अपने स्वाभाविक आत्मस्वरूप में स्थित होने का महर्षि ने श्रीराम को परम आदेश दिया। संपूर्ण सभामंडप आत्मिक शांति से भर गया।

महर्षि वशिष्ठ: फिर ‘मैं एक दीन जीव हूँ, असहाय हूँ’ जैसी निराशा तुम्हारे मन में क्यों, राम? अज्ञान से उत्पन्न इस हीनभावना का तत्काल त्याग करो!

महर्षि वशिष्ठ: हे रामचंद्र! जागो! अज्ञान को त्यागो। अपने नित्य-शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होकर, निश्चिंत होकर प्रकाशित होओ!

नियति और पुरुषार्थ तत्त्व का विश्लेषण

लक्षण / आयाम महानियति (दैव) पुरुषार्थ (मानवीय प्रयास)
स्वरूप विश्वव्यापी ईश्वर-संकल्प, प्राकृतिक धर्म का नियम प्राणियों की शारीरिक, मानसिक चेष्टाएँ और क्रियाएँ
कार्य-पद्धति सृष्टि के आरंभ में अग्नि, जल जैसी शक्तियों के धर्म निर्धारित करना आहार ग्रहण, श्वास लेने से लेकर आत्म-विचार तक निरंतर कर्म
साधना में भूमिका पूर्व कर्मों के आधार पर परिस्थितियाँ निर्मित करना वर्तमान के तीव्र प्रयत्न से प्रतिकूलताओं पर विजय पाना
परमार्थ दृष्टि परब्रह्म से अभिन्न महास्पंदन की शक्ति ब्रह्म का ही साधक, साधन और साध्य के रूप में प्रकाशित होना

आध्यात्मिक अंतर्निहित भाव

यह अध्याय मनुष्य के भीतर व्याप्त असहायता की भावना को समूल नष्ट कर उसमें आत्मविश्वास जगाता है। दैव कोई आकाश में बैठकर हम पर शासन करने वाला व्यक्ति नहीं है; ब्रह्मांड में प्रतिक्षण कार्य करने वाले प्राकृतिक नियमों का समुच्चय ही दैव है। उस नियति को समझकर उसके अनुरूप धर्मसम्मत तीव्र पुरुषार्थ करने पर ही किसी कार्य की सिद्धि होती है।

स्वर्ण में आभूषण और जल में भंवर के दृष्टांत हमें बाह्य जगत के द्वंद्वों से परे जाकर अंतर्निहित एकता के सत्य को देखने की प्रेरणा देते हैं। भाग्य के नाम पर कर्मों का त्याग करना केवल जड़ता है, ज्ञान नहीं। परमात्मा के चैतन्य में हमारा प्रयास ही महाशक्ति का रूप लेता है, यही समझना सच्ची साधना है।

विपरीत परिस्थितियों के आने पर भाग्य को कोसना छोड़कर अपने वर्तमान संकल्प बल को बढ़ाइए। दैव आपके ही भीतर पुरुषार्थ की शक्ति के रूप में स्थित है—इस बोध के साथ दैनिक जीवन में निर्भय होकर कदम बढ़ाइए।

इस अध्याय का सारांश

महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को दैव, नियति और पुरुषार्थ का वास्तविक परमार्थ समझाया। परमाणु विभाजन, जल के भंवर, स्फटिक प्रतिबिंब और स्वर्ण आभूषणों के दृष्टांतों से उन्होंने सिद्ध किया कि यह सृष्टि ब्रह्ममयी है। दैव को विश्वव्यापी ईश्वरीय संकल्प बताते हुए, उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना पुरुषार्थ के कुछ भी संभव नहीं है, और अज्ञान की निद्रा त्यागकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का श्रीराम को प्रबोधन दिया।

ग्रंथ टिप्पणियाँ

  • मुख्य संदेश: दैव और पुरुषार्थ एक-दूसरे से अभिन्न हैं; सम्यक आत्म-विचार से युक्त तीव्र पुरुषार्थ ही मनुष्य को बंधनों से मुक्त करता है।
  • तात्विक शिक्षा: सर्वत्र केवल परब्रह्म ही व्याप्त है। नियति ब्रह्म की महास्पंदन शक्ति है, और पुरुषार्थ उसी की चैतन्य अभिव्यक्ति है।
  • अगले अध्याय से संबंध: सर्वं खल्विदं ब्रह्म के अद्वैत भाव को और गहराई से समझाते हुए महर्षि अगले अध्याय में मनो-लय की प्रक्रिया का विस्तार करेंगे।

पुरुषार्थ के बिना जीव श्वास भी नहीं ले सकता; दैव वास्तव में निरंतर क्रियाशीलता की शक्ति ही है।

स्वर्ण में आभूषण भिन्न प्रतीत होने पर भी जैसे स्वर्ण ही होते हैं, वैसे ही जगत की समस्त भिन्नता केवल ब्रह्म है।

अज्ञान की निद्रा को त्यागो और अपने सहज आत्मप्रकाश में निश्चिंत होकर स्थित होओ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वास्तव में दैव क्या है?

दैव विशुद्ध चैतन्य स्वरूप ईश्वर का संकल्प और ब्रह्मांड को सुव्यवस्थित रूप से चलाने वाली महानियति है।

क्या भाग्य से पुरुषार्थ (स्व-प्रयत्न) अधिक बलवान है?

हाँ, पूर्व कर्मों के परिणाम रूपी भाग्य को वर्तमान समय में किए गए तीव्र और धर्मसम्मत पुरुषार्थ से ही जीता जा सकता है, यह महर्षि वशिष्ठ ने स्पष्ट किया है।

जब सब कुछ दैव ही चला रहा है, तो क्या मनुष्य बिना कोई कर्म किए बैठ सकता है?

नहीं। भोजन करने और साँस लेने के लिए भी स्व-प्रयत्न अनिवार्य है। कर्म का त्याग करना केवल अज्ञान है, मोक्ष नहीं।

महानियति प्रकृति में किस प्रकार व्यक्त होती है?

अग्नि का ऊपर की ओर जलना और जल का नीचे की ओर बहना जैसे शाश्वत प्राकृतिक नियमों के रूप में महानियति निरंतर व्यक्त होती है।

स्वर्ण और आभूषणों के उदाहरण से यह ग्रंथ क्या सिखाता है?

आभूषण भिन्न-भिन्न आकारों में होने पर भी मूल धातु स्वर्ण ही होती है; ठीक वैसे ही संसार के समस्त नाम-रूप परब्रह्म के ही अभिन्न रूप हैं, यह बोध कराता है।

ज्ञानी के शरीर को दैव किस प्रकार संचालित करता है?

ज्ञानी के भीतर वासनाएँ नष्ट हो जाने पर भी, महानियति के प्रभाव से उसका शरीर लोक-कल्याण के लिए स्वाभाविक रूप से कर्म करते हुए स्थित रहता है।

निष्कर्ष

दैव और भाग्य की धारणाओं के पीछे छिपे वास्तविक मर्म को जब मनुष्य समझ लेता है, तब वह अपनी दुर्बलता को त्यागकर आत्मशक्ति से आलोकित हो उठता है। सब कुछ ब्रह्मस्वरूप ही है—यह जानकर भ्रांति को छोड़ निश्चिंत जीवन जीना ही सच्चा मोक्ष है। तो फिर इस जगत-भ्रांति को समूल नष्ट करने वाली मनो-लय की साधना क्या है? आइए, इसे अगले अंक में विस्तार से जानें।


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A. Ravinder, RamthaMedia
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